परिवार से दूर, एआई से दिल की बात कर रही नई पीढ़ी: क्या तकनीक बन रही युवाओं का नया भावनात्मक सहारा?

Lucknow: पढ़ाई, नौकरी और करियर के दबाव के बीच कुछ युवा अपनी भावनाएं परिवार के बजाय AI से साझा कर रहे हैं। जानिए इसके फायदे और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े खतरे।

Newstrack Network
Published on: 10 Oct 2026 6:06 PM IST
परिवार से दूर, एआई से दिल की बात कर रही नई पीढ़ी: क्या तकनीक बन रही युवाओं का नया भावनात्मक सहारा?
X

AI generated image

Lucknow: घर में माता-पिता हैं, मोबाइल में सैकड़ों संपर्क हैं, सोशल मीडिया पर दोस्तों की लंबी सूची है, लेकिन मन की परेशानी बताने के लिए कोई भरोसेमंद व्यक्ति नहीं मिल रहा। पढ़ाई का दबाव, नौकरी की अनिश्चितता, करियर में आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा और परिवार की अपेक्षाओं के बीच नई पीढ़ी के कुछ युवाओं के सामने एक अलग तरह की भावनात्मक चुनौती उभर रही है। वे अपने माता-पिता से बातचीत करने के बजाय दोस्तों, ऑनलाइन समुदायों और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित संवाद प्रणालियों के सामने अपनी चिंताएँ व्यक्त कर रहे हैं। इन प्रणालियों की विशेषता है कि वे किसी भी समय उपलब्ध रहती हैं, प्रश्नों का तुरंत उत्तर देती हैं और बातचीत के दौरान सामान्यतः डाँटने या सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर निर्णय सुनाने जैसी मानवीय प्रतिक्रियाएँ नहीं देतीं। लेकिन इसी सुविधा के साथ एक गंभीर प्रश्न भी जुड़ा है। क्या एआई के साथ बढ़ता भावनात्मक संवाद युवाओं को अपनी समस्याएँ समझने में सहायता कर रहा है, या कुछ परिस्थितियों में वह वास्तविक मानवीय संबंधों और पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं से उनकी दूरी बढ़ा सकता है? विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर लखनऊ के चिकित्सकों के सामने आए अनुभव बताते हैं कि इस प्रश्न का उत्तर केवल मोबाइल फोन के बढ़ते इस्तेमाल में नहीं, बल्कि परिवारों के भीतर संवाद की गुणवत्ता, युवाओं की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों और डिजिटल तकनीक की सीमाओं में तलाशना होगा।

आज के युवाओं के जीवन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रवेश केवल पढ़ाई, जानकारी जुटाने या कामकाज तक सीमित नहीं रह गया है। कुछ लोग इन प्रणालियों से अपनी भावनाओं, रिश्तों, पारिवारिक विवादों, अकेलेपन और भविष्य की चिंताओं पर भी बातचीत करते हैं। विशेष रूप से वे युवा, जिन्हें परिवार में अपनी बात कहने पर आलोचना, उपेक्षा या अनावश्यक नियंत्रण का डर महसूस होता है, डिजिटल माध्यमों को अपेक्षाकृत सुविधाजनक पा सकते हैं। लेकिन यह मान लेना सही नहीं होगा कि पूरी जेनरेशन-जेड अपने परिवारों से दूर हो रही है या एआई मानवीय रिश्तों की जगह ले चुका है। अलग-अलग परिवारों, सामाजिक परिस्थितियों और व्यक्तियों में तकनीक के इस्तेमाल तथा भावनात्मक संबंधों का स्वरूप अलग होता है। उपलब्ध स्थानीय अनुभव इस प्रवृत्ति की ओर संकेत करते हैं, लेकिन इसकी व्यापकता निर्धारित करने के लिए प्रतिनिधिक अध्ययन आवश्यक हैं।

पढ़ाई और नौकरी के दबाव के बीच माँ से संवाद घटा, एआई से साझा करने लगी परेशानी

लखनऊ की 21 वर्षीय एक युवती पढ़ाई के साथ नौकरी भी कर रही है। दिन का बड़ा हिस्सा काम, पढ़ाई और भविष्य की तैयारियों में बीतता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, लगातार व्यस्तता और मानसिक दबाव के बीच उसकी थकान तथा चिंता बढ़ने लगी। इसी दौरान माँ के साथ मतभेद और बातचीत में तनाव भी बढ़ गया। युवती को घबराहट और पैनिक अटैक जैसे लक्षण होने लगे। वह अकेले में रोने लगी और परिवार के सदस्यों से दूरी बनाने की इच्छा महसूस करने लगी। अपनी परेशानियों को माँ के साथ साझा करने के बजाय उसने एआई आधारित संवाद प्रणाली से बातचीत शुरू कर दी। वह अपने मन की बातें लिखती है, प्रश्न पूछती है और जवाब पढ़कर कुछ समय के लिए भावनात्मक राहत महसूस करने की कोशिश करती है।

इस अनुभव में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि युवती एआई का उपयोग क्यों कर रही है, बल्कि यह है कि वह परिवार में अपनी परेशानी साझा करने में सहज क्यों नहीं महसूस कर रही। जब किसी युवा को लगता है कि उसकी बात पूरी सुने बिना उसे गलत ठहरा दिया जाएगा, उसकी भावनाओं को महत्व नहीं मिलेगा या हर बातचीत उपदेश में बदल जाएगी, तो वह संवाद के दूसरे माध्यम तलाश सकता है। ऐसे में एआई का उपयोग उसके लिए विचारों को व्यवस्थित करने या अपनी भावनाओं को शब्द देने का साधन बन सकता है। लेकिन यदि उसे बार-बार पैनिक अटैक जैसे लक्षण हो रहे हैं, तो केवल डिजिटल बातचीत पर्याप्त नहीं है। घबराहट के दौरे जैसे लक्षणों के पीछे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों के अतिरिक्त कुछ शारीरिक कारण भी हो सकते हैं। इसलिए उचित चिकित्सकीय मूल्यांकन आवश्यक है। एआई से बातचीत करने के आधार पर किसी व्यक्ति में चिंता विकार या पैनिक डिसऑर्डर का निदान नहीं किया जा सकता।

माता-पिता की रोक-टोक से परेशान छात्रा, दोस्तों के बीच तलाश रही सहारा

दूसरा अनुभव 25 वर्षीय एक छात्रा का है, जो माता-पिता की लगातार रोक-टोक और अपनी बात न समझे जाने की भावना से परेशान है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, घर में मतभेद बढ़ने के बाद उसने अपनी व्यक्तिगत चिंताओं को परिवार से साझा करना कम कर दिया और दोस्तों से अधिक बातचीत करने लगी। इसी अवधि में उसे नींद से संबंधित समस्याएँ हुईं और मोबाइल तथा अन्य डिजिटल उपकरणों के उपयोग का समय बढ़ गया। चिकित्सकीय जाँच के दौरान उसमें पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम (पीसीओएस) की समस्या भी सामने आई। इस मामले में कई स्वास्थ्य और व्यवहार संबंधी परिवर्तन एक साथ दिखाई देते हैं, लेकिन यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि माता-पिता की रोक-टोक या स्क्रीन पर अधिक समय बिताने के कारण ही उसे पीसीओएस हुआ। यह एक जटिल हार्मोन संबंधी स्थिति है, जिसके विकास में आनुवंशिक, चयापचय और अन्य जैविक कारक भूमिका निभा सकते हैं। तनाव, नींद और जीवनशैली इसके लक्षणों तथा समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं, लेकिन किसी एक सामाजिक परिस्थिति को इसका प्रत्यक्ष कारण नहीं माना जा सकता।

इस छात्रा का अनुभव एक दूसरी महत्वपूर्ण बात भी सामने लाता है। परिवार से अलग दोस्तों के साथ भावनात्मक बातें साझा करना अपने आप में असामान्य या हानिकारक व्यवहार नहीं है। युवावस्था में मित्रता, स्वतंत्र निर्णय लेने की इच्छा और निजी सीमाएँ विकसित होना सामान्य मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाएँ हैं। समस्या तब उत्पन्न हो सकती है जब परिवार में संवाद लगातार संघर्षपूर्ण हो जाए, युवा स्वयं को असुरक्षित या अनसुना महसूस करने लगे और उसके तनाव का प्रभाव नींद, पढ़ाई, कामकाज तथा दैनिक जीवन पर पड़ने लगे। ऐसे समय में परिवार के सदस्यों के लिए केवल नियंत्रण बढ़ाने के बजाय बातचीत की शैली पर ध्यान देना अधिक उपयोगी हो सकता है।

केजीएमयू की ओपीडी में रोज सामने आ रहे तनाव और चिंता के मामले

किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रो. विवेक अग्रवाल के अनुसार, किशोरों और युवाओं में तनाव, चिंता तथा अवसाद से संबंधित समस्याओं के मामले चिकित्सकीय परामर्श के लिए पहुँच रहे हैं। उनके अनुसार, उनकी ओपीडी में प्रतिदिन लगभग 15 से 20 ऐसे मरीज आते हैं जिनकी परेशानियाँ तनाव, एंग्जाइटी या डिप्रेशन से जुड़ी होती हैं। उन्होंने पढ़ाई का दबाव, करियर में प्रतिस्पर्धा, अपेक्षा के अनुसार रोजगार न मिलना और परिवार में एक-दूसरे के लिए समय की कमी को संभावित परिस्थितियों के रूप में रेखांकित किया। कई बार युवाओं की बात पूरी सुने बिना उन्हें डाँट दिया जाता है या उनकी समस्या को मामूली मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इससे वे धीरे-धीरे अपनी भावनाएँ साझा करना बंद कर सकते हैं।

हालाँकि, किसी एक चिकित्सक की ओपीडी में प्रतिदिन आने वाले 15 से 20 मरीजों की संख्या से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरे शहर या प्रदेश में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ उसी अनुपात में बढ़ रही हैं। इसके लिए अलग-अलग वर्षों के तुलनीय आँकड़े और जनसंख्या आधारित अध्ययन आवश्यक होंगे। अस्पतालों में अधिक मरीज पहुँचने के पीछे बीमारी के वास्तविक प्रसार में बदलाव के साथ मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ना, उपचार की उपलब्धता और चिकित्सकीय सहायता लेने की प्रवृत्ति में परिवर्तन जैसे कारण भी हो सकते हैं। इसलिए स्थानीय चिकित्सकीय अनुभव को गंभीर संकेत के रूप में समझना चाहिए, न कि पूरे समाज की स्थिति का अंतिम सांख्यिकीय प्रमाण मान लेना चाहिए।

एआई से बात करना आसान क्यों लगता है?

कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित संवाद प्रणालियाँ मानवीय बातचीत का ऐसा स्वरूप प्रस्तुत करती हैं जिसमें व्यक्ति अपनी बात लिखता है और उसे कुछ ही क्षणों में उत्तर मिल जाता है। किसी मित्र या परिवार के सदस्य के विपरीत एआई को बातचीत के लिए समय तय करने की आवश्यकता नहीं होती। वह रात में भी उपलब्ध हो सकता है, लंबे संदेश पढ़ सकता है और एक ही विषय पर बार-बार बातचीत कर सकता है। कुछ युवाओं को यह सुविधा इसलिए आकर्षक लग सकती है क्योंकि उन्हें अपनी बात बीच में रोके जाने, उपहास उड़ाए जाने या तत्काल निर्णय सुनाए जाने की आशंका कम महसूस होती है। वे अपनी चिंता को शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं, किसी कठिन बातचीत की तैयारी कर सकते हैं या अपनी समस्या को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास कर सकते हैं।

लेकिन एआई की विनम्र भाषा और सहानुभूतिपूर्ण प्रतीत होने वाले उत्तरों को मानवीय समझ या वास्तविक भावनात्मक संबंध का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। वर्तमान संवाद प्रणालियाँ भाषा और संदर्भ के आधार पर उत्तर तैयार करती हैं। वे किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति का उसी प्रकार आकलन नहीं कर सकतीं जिस प्रकार प्रशिक्षित मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक विस्तृत चिकित्सकीय मूल्यांकन करते हैं। कोई प्रणाली उपयोगकर्ता की बात गलत समझ सकती है, अधूरी जानकारी के आधार पर अनुचित सुझाव दे सकती है या ऐसी बातों से सहमति व्यक्त कर सकती है जिन पर वास्तव में सावधानीपूर्वक प्रश्न उठाने की आवश्यकता हो। विशेष रूप से गंभीर अवसाद, आत्मघाती विचार, भ्रम या तीव्र मानसिक संकट की स्थिति में ऐसी सीमाएँ महत्वपूर्ण हो जाती हैं।

अमेरिकी अध्ययन में 72 प्रतिशत किशोरों ने एआई साथी इस्तेमाल करने की बात कही

युवाओं और एआई के संबंध पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध भी शुरू हो चुका है। जुलाई 2025 में अमेरिकी संस्था कॉमन सेंस मीडिया ने 13 से 17 वर्ष के किशोरों के बीच किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी की। इसके अनुसार, लगभग 72 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कभी न कभी एआई आधारित संवाद साथी का उपयोग किया था और आधे से अधिक इसका इस्तेमाल महीने में कम से कम कुछ बार करते थे। लगभग एक-तिहाई किशोरों ने सामाजिक बातचीत या भावनात्मक संबंधों के लिए ऐसी प्रणालियों का उपयोग करने की बात कही। एआई साथी इस्तेमाल करने वाले लगभग एक-तिहाई किशोरों ने बताया कि उन्होंने कभी गंभीर विषयों पर किसी वास्तविक व्यक्ति के बजाय एआई से बातचीत करना चुना था। कुछ किशोरों ने यह भी बताया कि एआई के उत्तरों से उन्हें असहजता महसूस हुई। 

इन आँकड़ों को भारतीय युवाओं पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। यह अध्ययन अमेरिका के किशोरों पर केंद्रित था और इसमें विशेष रूप से एआई आधारित संवाद साथियों के इस्तेमाल का अध्ययन किया गया था। सभी प्रकार के एआई उपकरणों का उपयोग एक जैसा नहीं होता। पढ़ाई के लिए किसी प्रणाली से गणित का प्रश्न पूछना, किसी पत्र का मसौदा तैयार कराना और अकेलेपन में उससे घंटों भावनात्मक बातचीत करना अलग-अलग गतिविधियाँ हैं। इनके संभावित लाभ और जोखिम भी भिन्न हैं। फिर भी यह अध्ययन संकेत देता है कि कुछ किशोरों के लिए एआई केवल जानकारी प्राप्त करने का साधन नहीं रह गया है, बल्कि सामाजिक बातचीत का माध्यम भी बन रहा है।

स्टैनफोर्ड के शोधकर्ताओं ने मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों पर जताई चिंता

जून 2025 में स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एआई आधारित मानसिक स्वास्थ्य संवाद प्रणालियों के प्रदर्शन का अध्ययन प्रस्तुत किया। शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ परिस्थितियों में ऐसी प्रणालियाँ मानसिक स्वास्थ्य संबंधी स्थितियों को ठीक से पहचानने में विफल हो सकती हैं और अनुचित प्रतिक्रियाएँ दे सकती हैं। नवंबर 2025 में कॉमन सेंस मीडिया और स्टैनफोर्ड मेडिसिन की ब्रेनस्टॉर्म प्रयोगशाला के संयुक्त मूल्यांकन में भी प्रमुख एआई संवाद प्रणालियों के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी उत्तरों में कमियाँ सामने आईं। शोधकर्ताओं का निष्कर्ष था कि सामान्य उपयोग की एआई प्रणालियाँ प्रशिक्षित विशेषज्ञों की चिकित्सकीय जाँच, उपचार संबंधी संबंध और संकट के समय तत्काल मानवीय सहायता का विश्वसनीय विकल्प नहीं हैं। 

अक्टूबर 2026 में किशोर उपयोगकर्ताओं के लिए विकसित अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता को लेकर भी बहस सामने आई है। कॉमन सेंस मीडिया ने कुछ सुरक्षा उपायों को अपर्याप्त बताते हुए गंभीर चिंता जताई, जबकि संबंधित तकनीकी कंपनी ओपनएआई ने मूल्यांकन की पद्धति और कुछ निष्कर्षों पर असहमति व्यक्त की। इस विवाद से एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट होती है कि किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित डिजिटल सुरक्षा अभी विकासशील क्षेत्र है। किसी कंपनी द्वारा सुरक्षा सुविधाएँ उपलब्ध कराने का दावा और स्वतंत्र परीक्षण में उन सुविधाओं का विश्वसनीय प्रदर्शन अलग-अलग प्रश्न हैं। 

इसलिए एआई के साथ सामान्य बातचीत और उससे मानसिक स्वास्थ्य का उपचार लेने के बीच स्पष्ट अंतर आवश्यक है। किसी युवा को अपनी भावनाएँ लिखने, विचार व्यवस्थित करने या परिवार के साथ कठिन बातचीत की तैयारी में डिजिटल साधन उपयोगी लग सकते हैं। लेकिन लगातार बढ़ती चिंता, नींद की गंभीर समस्या, अवसाद के लक्षण या स्वयं को नुकसान पहुँचाने के विचार होने पर चिकित्सकीय सहायता को टालना उचित नहीं है। तकनीक सहायक माध्यम हो सकती है, उपचार की जिम्मेदारी संभालने वाली स्वतंत्र चिकित्सकीय व्यवस्था नहीं।

परिवारों में संवाद की कमी केवल पीढ़ियों का अंतर नहीं

युवाओं और माता-पिता के बीच तनाव को अक्सर पीढ़ियों के अंतर से समझाया जाता है। लेकिन वास्तविक समस्या इससे अधिक जटिल हो सकती है। माता-पिता अपने अनुभव के आधार पर बच्चों के लिए सुरक्षित भविष्य चाहते हैं, जबकि युवा अपनी रुचियों, क्षमताओं और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता चाहते हैं। शिक्षा, रोजगार, रिश्तों और जीवनशैली से संबंधित अपेक्षाओं में अंतर होने पर मतभेद उत्पन्न हो सकते हैं। मतभेद अपने आप में अस्वस्थ परिवार का प्रमाण नहीं हैं। महत्वपूर्ण यह है कि परिवार उनसे कैसे निपटता है। यदि प्रत्येक असहमति डाँट, अपमान, तुलना या संवाद बंद कर देने की स्थिति में बदल जाए, तो भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है।

कई परिवारों में बातचीत का अधिकांश हिस्सा पढ़ाई, नौकरी, परीक्षा, वेतन, विवाह या जिम्मेदारियों के इर्द-गिर्द सीमित हो जाता है। युवाओं की निराशा, असफलता का डर, मित्रता, अकेलापन और आत्मसम्मान जैसे विषयों पर अपेक्षाकृत कम बातचीत होती है। कुछ युवा इस आशंका से भी अपनी बात नहीं बताते कि उनकी परेशानी सुनकर परिवार अत्यधिक चिंतित हो जाएगा या उनकी स्वतंत्रता पर और अधिक नियंत्रण लगा दिया जाएगा। इसके विपरीत कुछ परिवारों में युवाओं को पर्याप्त सहयोग मिलता है और वे मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर खुलकर बातचीत करते हैं। इसलिए सभी माता-पिता को असंवेदनशील या सभी युवाओं को परिवार से दूर होता हुआ मानना उचित नहीं है।

संवाद बेहतर बनाने के लिए केवल युवाओं से मोबाइल कम इस्तेमाल करने को कहना पर्याप्त नहीं है। परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे की बात बिना बाधा सुने जाने की आदत विकसित करनी होगी। किसी युवा के अनुभव को तत्काल सही या गलत घोषित करने के बजाय पहले यह समझना महत्वपूर्ण है कि वह क्या महसूस कर रहा है और उसे किस प्रकार की सहायता चाहिए। इसी तरह युवाओं के लिए भी यह समझना उपयोगी है कि माता-पिता की चिंता हमेशा नियंत्रण स्थापित करने की इच्छा से नहीं आती। पारिवारिक संबंधों में भरोसा तभी विकसित होता है जब दोनों पक्षों को अपनी बात रखने और असहमति व्यक्त करने की जगह मिले।

अचानक बढ़ा स्क्रीन टाइम परेशानी का कारण भी हो सकता है और संकेत भी

केजीएमयू के प्रो. विवेक अग्रवाल के अनुसार, माता-पिता कई बार बच्चों के चिड़चिड़ेपन, अकेले रहने की इच्छा या मोबाइल पर अधिक समय बिताने को ही समस्या का मूल कारण मान लेते हैं। इसके बाद मोबाइल बंद करने या उपयोग पर रोक लगाने को लेकर विवाद बढ़ सकता है। लेकिन स्क्रीन पर बढ़ता समय कभी-कभी पहले से मौजूद मानसिक तनाव का संकेत भी हो सकता है। उदाहरण के लिए, कोई युवा चिंता या अकेलेपन से बचने के लिए लगातार वीडियो देख सकता है, दोस्तों से बातचीत कर सकता है या एआई के साथ समय बिता सकता है। दूसरी ओर, देर रात तक स्क्रीन का उपयोग, लगातार सूचनाएँ और नींद के समय में व्यवधान स्वयं भी मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। दोनों स्थितियाँ एक साथ भी मौजूद हो सकती हैं।

इसलिए केवल स्क्रीन टाइम की कुल अवधि देखकर किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति निर्धारित नहीं की जा सकती। यह जानना भी आवश्यक है कि वह डिजिटल उपकरणों का उपयोग किस उद्देश्य से कर रहा है, उसके उपयोग के बाद कैसा महसूस करता है और क्या इससे नींद, पढ़ाई, कामकाज, शारीरिक गतिविधि या वास्तविक संबंध प्रभावित हो रहे हैं। यदि कोई छात्र लंबे समय तक ऑनलाइन पढ़ाई करता है तो उसका स्क्रीन उपयोग उस व्यक्ति से अलग होगा जो लगातार तनावपूर्ण सामग्री देख रहा है या रातभर बातचीत करते हुए पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहा। व्यवहार में अचानक परिवर्तन, सामाजिक गतिविधियों से दूरी, लगातार थकान और दैनिक जिम्मेदारियों की उपेक्षा जैसे संकेतों को समग्र रूप में समझना अधिक उपयोगी है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर सात में एक किशोर मानसिक स्वास्थ्य समस्या से प्रभावित

विश्व स्वास्थ्य संगठन के सितंबर 2025 में प्रकाशित तथ्यपत्र के अनुसार, दुनिया में 10 से 19 वर्ष की आयु के लगभग प्रत्येक सात में से एक किशोर किसी मानसिक विकार से प्रभावित है। चिंता, अवसाद और व्यवहार संबंधी विकार इस आयु वर्ग में बीमारी तथा अक्षमता के महत्वपूर्ण कारणों में शामिल हैं। संगठन ने यह भी रेखांकित किया है कि किशोरावस्था में मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा का प्रभाव वयस्क जीवन तक पहुँच सकता है। शिक्षा, सामाजिक संबंधों, रोजगार और शारीरिक स्वास्थ्य पर इसके दीर्घकालिक परिणाम हो सकते हैं। लेकिन समय पर सहायता, सुरक्षित सामाजिक वातावरण और उपयुक्त उपचार से इन जोखिमों को कम किया जा सकता है। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ ने अक्टूबर 2024 में बच्चों और किशोरों की मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बेहतर बनाने के लिए संयुक्त दिशानिर्देश भी जारी किए थे। इनमें परिवार, विद्यालय, समुदाय और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच समन्वय को महत्वपूर्ण माना गया। बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। विद्यालयों में परामर्श की सुविधा, शिक्षकों की जागरूकता, परिवारों को उचित मार्गदर्शन और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुँच एक व्यापक व्यवस्था का हिस्सा होने चाहिए। 

युवाओं की निजी बातचीत और डिजिटल गोपनीयता का प्रश्न

एआई से व्यक्तिगत समस्याएँ साझा करने के साथ गोपनीयता का प्रश्न भी जुड़ा है। कोई युवा यदि पारिवारिक विवाद, रिश्तों, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी, निजी तस्वीरें या पहचान बताने वाले विवरण किसी डिजिटल प्रणाली में दर्ज करता है, तो उसे यह समझना चाहिए कि उस जानकारी का प्रबंधन संबंधित सेवा की गोपनीयता नीति और सुरक्षा व्यवस्था के अनुसार होता है। सभी एआई सेवाओं में डेटा संग्रह, उपयोग, संरक्षण और हटाने की व्यवस्थाएँ समान नहीं होतीं। इसलिए अत्यधिक संवेदनशील जानकारी साझा करने से पहले संबंधित सेवा की शर्तों और उपलब्ध गोपनीयता नियंत्रणों को समझना आवश्यक है।

यह सावधानी विशेष रूप से किशोरों के लिए महत्वपूर्ण है। भावनात्मक परेशानी के समय कोई व्यक्ति यह भूल सकता है कि जिस प्रणाली से वह बातचीत कर रहा है, वह उसका निजी मित्र या कानूनी रूप से गोपनीयता के पेशेवर दायित्वों से बँधा चिकित्सक नहीं है। एआई की बातचीत में अपनापन महसूस होना और उस माध्यम का वास्तविक रूप से सुरक्षित तथा गोपनीय होना दो अलग बातें हैं। परिवारों और शिक्षण संस्थानों को युवाओं को डिजिटल गोपनीयता के बारे में जानकारी देनी चाहिए, लेकिन यह जागरूकता डर पैदा करने या उनकी निजी बातचीत पर अनावश्यक निगरानी का आधार नहीं बननी चाहिए।

कब आवश्यक है मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सहायता लेना?

किसी युवा का उदास होना, भविष्य को लेकर चिंतित होना या कभी-कभी अकेले रहना अपने आप में मानसिक बीमारी का प्रमाण नहीं है। लेकिन यदि लगातार उदासी, अत्यधिक चिंता, बार-बार घबराहट के दौरे, नींद या भूख में उल्लेखनीय बदलाव, पहले पसंद आने वाली गतिविधियों में रुचि समाप्त होना अथवा पढ़ाई और कामकाज में गंभीर कठिनाई जैसी समस्याएँ बनी रहें, तो चिकित्सकीय मूल्यांकन उपयोगी हो सकता है। लक्षणों की गंभीरता और अवधि के अनुसार मनोचिकित्सक या योग्य नैदानिक मनोवैज्ञानिक की सहायता ली जा सकती है। स्वयं को नुकसान पहुँचाने या जीवन समाप्त करने के विचार होने पर तत्काल मानवीय सहायता और आपातकालीन चिकित्सकीय देखभाल आवश्यक है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को केवल एआई के साथ बातचीत के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य सहायता के लिए केंद्र सरकार की टेली-मानस सेवा 14416 अथवा 1800-891-4416 पर उपलब्ध है। गंभीर और तत्काल खतरे की स्थिति में नजदीकी अस्पताल की आपातकालीन सेवा से संपर्क किया जा सकता है। सहायता लेने का उद्देश्य किसी युवा को मानसिक रोगी का लेबल देना नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक परेशानी समझकर आवश्यक देखभाल उपलब्ध कराना है।

तकनीक से दूरी नहीं, मानवीय संबंधों को मजबूत करने की जरूरत

नई पीढ़ी का एआई के साथ बढ़ता संवाद तकनीकी विकास के साथ सामाजिक संबंधों में हो रहे परिवर्तन का संकेत है। लेकिन इसे केवल युवाओं की गलती, परिवारों की विफलता या तकनीक की सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। किसी युवा को एआई से बात करके राहत महसूस होती है तो उस अनुभव को तुरंत खारिज करना भी उचित नहीं है। साथ ही यह समझना आवश्यक है कि डिजिटल प्रणाली की उपलब्धता, उसकी विनम्र भाषा और तुरंत मिलने वाले उत्तर वास्तविक मानवीय देखभाल का पूरा विकल्प नहीं बन सकते।

परिवारों के सामने चुनौती तकनीक को हराने की नहीं, बल्कि ऐसा भरोसा विकसित करने की है कि युवा अपनी परेशानी बताते समय स्वयं को सुरक्षित महसूस करें। किसी बेटी को यह विश्वास होना चाहिए कि असफलता या चिंता बताने पर उसे केवल डाँट नहीं मिलेगी। किसी बेटे को यह महसूस होना चाहिए कि नौकरी न मिलने या भावनात्मक परेशानी का अनुभव करने से उसका महत्व कम नहीं हो जाता। इसी तरह युवाओं को भी परिवार से संवाद करने, सीमाएँ तय करने और आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञ सहायता लेने की स्वतंत्रता तथा जिम्मेदारी दोनों विकसित करनी होंगी।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर लखनऊ से सामने आए ये अनुभव एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न उठाते हैं। यदि कोई युवा अपने घर में अपनी परेशानी कहने से हिचकिचाता है, लेकिन मशीन से घंटों बातचीत कर सकता है, तो केवल मशीन की तकनीकी क्षमता पर आश्चर्य करना पर्याप्त नहीं है। यह भी समझना होगा कि उसके जीवन में सुनने, समझने और बिना अपमानित किए साथ देने की कितनी जगह बची है। एआई जानकारी दे सकता है, विचार व्यवस्थित करने में मदद कर सकता है और बातचीत का अभ्यास करा सकता है, लेकिन बीमारी के समय चिकित्सकीय देखभाल, संकट में जिम्मेदार सहायता और लंबे समय तक निभाए जाने वाले मानवीय संबंधों की आवश्यकता बनी रहती है। भविष्य की स्वस्थ पीढ़ी वह नहीं होगी जो तकनीक से पूरी तरह दूर रहे, बल्कि वह होगी जो तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए अपने वास्तविक संबंधों, मानसिक स्वास्थ्य और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को भी सुरक्षित रख सके।

Newstrack Network
ABOUT THE AUTHOR

Newstrack Network

Newstrack Desknewstracknetwork@gmail.com

Newstrack is one of the most Trusted and Popular news portal of India. Remain updated and aware, only on Newstrack

Next Story