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Mayawati Comeback Plan: यूपी में खोई सियासी जमीन कैसे हासिल करेंगी मायावती?
Mayawati Comeback Plan: यूपी विधानसभा चुनाव में सभी 403 सीटों पर अकेले लड़ने का ऐलान कर मायावती ने बसपा की वापसी का प्लान तैयार किया है। जानिए कैसे सोशल इंजीनियरिंग और बूथ स्तर की रणनीति से बसपा अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पाने की कोशिश में जुटी है।
कभी उत्तर प्रदेश में सबसे ताकतवार पार्टी का दर्जा रखना वाली बहुजन समाज पार्टी आज प्रदेश में अपना अस्तित्व खोने की कगार पर है या कहें खो ही चुकी है। लेकिन एकबार फिर बसपा सुप्रीमो मायावती की अगुवाई में पार्टी अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले अपनी खोई हुई जमीन को वापस पाने के लिये फिर से पूरी जान से जुट गई है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने साफ कर दिया है कि यूपी में किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन का हिस्सा नहीं होंगी और सभी 403 सीटों पर अकेली ही चुनाव लड़ेगी।
अपने मिशन को पूरा करने के लिए पार्टी राज्य में अपने संगठन को मजबूत करने में लगी गई है। कई पदाधिकारियों की जिम्मेदारियां बदली गई हैं ताकि पार्टी को जमीनी स्तर पर फिर से खड़ा किया जा सके। यह वही संगठन है जिसने साल 2007 में पार्टी के संस्थापक कांशीराम के निधन के बाद मायावती को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में मदद की थी।
2007 में बसपा की इस ऐतिहासिक जीत के पीछे उनका सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला था जिसने दलित, मुस्लिम और ब्राह्मणों को एक साथ एक मंच पर ला दिया था। लेकिन साल 2012 के चुनावों के बाद से पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता गया। 2012 में बसपा को 80 सीटें मिलीं वहीं 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का खाता तक नहीं खुला। 2017 के विधानसभा चुनाव में हालत और खराब हो गई और पार्टी सिर्फ 19 सीटों पर सिमट गई। हालांकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके बसपा ने 10 सीटें जरूर जीतीं लेकिन यह गठबंधन भी जल्द ही टूट गया। इसके बाद 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा को सिर्फ एक सीट मिली और 2024 के लोकसभा चुनाव में अकेले लड़ने की वजह से पार्टी को फिर से एक भी सीट नहीं मिल पाई।
अब पार्टी राज्य भर में खास कैंप लगाकर युवा वोटरों, दलितों और मुस्लिमों को अपने साथ जोड़ने की पूरी कोशिश कर रही है। इन कैंपों में कार्यकर्ताओं को समझाया जा रहा है कि वे लोगों को जाकर बताएं कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी को सिर्फ बसपा ही रोक सकती है।
इसके साथ ही मायावती अपने पुराने नारे सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय को फिर से जिंदा कर रही है जिसने उनके सबसे अच्छे दिनों में सरकार चलाने का काम किया था। जानकारों का मानना है कि पार्टी एक बार फिर अपने पुराने दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण वाले गठजोड़ को वापस लाने की तैयारी में है। बीते फरवरी में बसपा ने जालौन जिले की माधौगढ़ सीट से आशीष पांडेय को अपना पहला उम्मीदवार घोषित किया था। इसे फैसले को ब्राह्मण वोटरों को लुभाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। मायावती का आरोप है कि मौजूदा सरकार में ब्राह्मणों की अनदेखी हो रही है और समाजवादी पार्टी केवल फायदे के लिए ब्राह्मणों के साथ होने का नाटक कर रही है। अब बसपा का पूरा ध्यान बूथ स्तर को मजबूत करने पर है। बीजेपी के बंगाल मॉडल से सीख लेते हुए मायावती ने कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे बड़ी-बड़ी रैलियों के भरोसे रहने के बजाय हर पोलिंग बूथ की कमेटियों को मजबूत करें। कार्यकर्ताओं को गांवों में जाकर सीधे वोटरों से मिलने, घर-घर जाकर पार्टी की नीतियां बताने और विरोधी पार्टियों की चालों पर नजर रखने को कहा गया है।


