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UP News: मेडिकल कॉलेजों की फार्मेसी पर FSDA का छापा, दवाओं की खरीद कीमत और MRP में मिला बड़ा अंतर
UP News: उत्तर प्रदेश के 15 मेडिकल कॉलेजों की फार्मेसी में FSDA की जांच में दवाओं की कीमत, खरीद रिकॉर्ड, MRP, कोल्ड-चेन और आपूर्ति व्यवस्था से जुड़ी गड़बड़ियां सामने आईं। 90 दवाओं के नमूने जांच के लिए भेजे गए हैं।
UP News (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में मरीजों को मिलने वाली दवाओं की कीमत, गुणवत्ता और आपूर्ति व्यवस्था की जांच में कई गंभीर गड़बड़ियां सामने आई हैं। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग यानी FSDA ने प्रदेशव्यापी अभियान के पहले चरण में नौ जिलों के 15 सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों की फार्मेसी पर एक साथ औचक जांच कराई। इसके लिए 50 औषधि निरीक्षकों की टीमें लगाई गईं। जांच में कुछ निजी मेडिकल कॉलेजों में अधिक इस्तेमाल होने वाली और जीवनरक्षक दवाओं की वास्तविक खरीद कीमत तथा उन पर छपी अधिकतम खुदरा कीमत यानी MRP के बीच बड़ा अंतर मिला। कई दवाएं अस्पताल से जुड़े स्टॉकिस्ट को छपी MRP के मुकाबले बहुत कम कीमत पर उपलब्ध कराई गई थीं, जबकि मरीजों को वही दवाएं MRP पर दी जा रही थीं। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसी दवा को MRP से बहुत कम कीमत पर खरीदकर MRP पर बेचना अपने आप में हर मामले में गैरकानूनी या DPCO का उल्लंघन साबित नहीं करता। असली सवाल यह है कि दवा मूल्य नियंत्रण के दायरे में है या नहीं, उसके लिए राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी NPPA ने कितनी अधिकतम कीमत निर्धारित की है और निर्माता, वितरक तथा खुदरा विक्रेता के स्तर पर निर्धारित मूल्य व्यवस्था का पालन हुआ या नहीं। इसी कारण FSDA ने अस्पतालों के साथ दवा निर्माता कंपनियों, वितरकों और स्टॉकिस्टों की आपूर्ति श्रृंखला की जांच शुरू की है।
FSDA का यह विशेष अभियान 24 सितंबर से शुरू किया गया है। पहले चरण में आगरा के एसएन मेडिकल कॉलेज, अयोध्या के राजकीय मेडिकल कॉलेज, बाराबंकी के हिंद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और डॉ. केएनएस मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज/मेयो इंस्टीट्यूट, बरेली के रोहिलखंड मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल, गाजियाबाद के संतोष मेडिकल कॉलेज, हापुड़ के जीएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, डॉ. बीएस कुशवाह मेडिकल कॉलेज, नारायणा मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च सेंटर और रामा मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, मुरादाबाद के तीर्थंकर महावीर मेडिकल कॉलेज, मुजफ्फरनगर मेडिकल कॉलेज तथा वाराणसी के हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और बीएचयू के इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज की फार्मेसी की जांच की गई। इस तरह चार सरकारी और 11 निजी मेडिकल कॉलेजों को अभियान के पहले चरण में शामिल किया गया। टीमों ने केवल कीमत नहीं देखी बल्कि फार्मासिस्ट की मौजूदगी, जीवनरक्षक दवाओं के बिल, खरीद रिकॉर्ड, स्टॉक रजिस्टर, दवाओं के रखरखाव, कोल्ड-चेन और मरीजों को जारी किए गए बिलों तक का मिलान किया। दवाओं की गुणवत्ता जांचने के लिए अलग-अलग कॉलेजों से कुल 90 नमूने लेकर प्रयोगशाला भेजे गए हैं।
जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा दवाओं की खरीद और बिक्री कीमत से जुड़ा है। विभाग को कुछ निजी मेडिकल कॉलेजों में ऐसी दवाएं मिलीं जिनकी अस्पताल या उसके स्टॉकिस्ट की खरीद कीमत MRP के मुकाबले काफी कम थी। अब FSDA यह पता लगा रहा है कि निर्माता कंपनियों ने अस्पतालों से जुड़े स्टॉकिस्ट को किस आधार पर इतनी अधिक छूट दी और आम खुदरा बाजार में उसी दवा की आपूर्ति किस कीमत पर की जा रही है। इसी जांच में 15 औषधि निर्माता इकाइयों से जुड़े 49 सीएंडएफ एजेंटों, प्रमुख वितरकों और स्टॉकिस्टों को नोटिस जारी किए गए हैं। उनसे NPPA की ओर से किसी विशेष छूट अथवा मूल्य व्यवस्था की अनुमति से संबंधित दस्तावेज मांगे गए हैं। विभाग का कहना है कि यदि आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं तो निर्धारित व्यवस्था से अलग कीमत पर आपूर्ति की गई दवाओं के स्टॉक को बाजार से वापस लेने तक की कार्रवाई की जा सकती है। पिछले एक वर्ष के विभागीय निरीक्षणों और अभिलेखीय साक्ष्यों में 76 दवाओं के संबंध में भी DPCO के तहत निर्धारित कीमत से अधिक MRP रखे जाने का मामला सामने आने की जानकारी दी गई है।
दवा की खरीद कीमत और MRP में अंतर को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि दवा मूल्य नियंत्रण व्यवस्था सामान्य खुदरा कारोबार से अलग है। NPPA के मुताबिक DPCO 2013 के तहत राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में शामिल अनुसूचित दवाओं की अधिकतम कीमत निर्धारित की जाती है। वर्तमान व्यवस्था NLEM 2022 से जुड़ी है, जिसमें 388 दवाएं शामिल हैं। अनुसूचित दवा की अधिकतम कीमत तय करने में बाजार में कम से कम एक प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले ब्रांडों की ‘प्राइस टू रिटेलर’ कीमत का औसत लिया जाता है और उस पर 16 प्रतिशत खुदरा मार्जिन जोड़कर सीलिंग प्राइस निर्धारित किया जाता है। कोई निर्माता इस अधिकतम सीमा से ऊपर MRP नहीं रख सकता। यदि निर्धारित सीमा से अधिक कीमत वसूली जाती है तो अधिक वसूली गई राशि ब्याज सहित जमा कराने की कार्रवाई हो सकती है। इसलिए मौजूदा जांच में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि अस्पताल ने दवा कितने रुपये में खरीदी और कितने में बेची, बल्कि प्रत्येक संदिग्ध दवा का NPPA द्वारा निर्धारित मूल्य और उसकी पूरी आपूर्ति श्रृंखला देखना जरूरी है।
मुरादाबाद के तीर्थंकर महावीर मेडिकल कॉलेज और हापुड़ के जीएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल की जांच में यह अंतर प्रारंभिक तौर पर सीधे DPCO उल्लंघन तक पहुंचता दिखाई दिया है। तीर्थंकर महावीर मेडिकल कॉलेज में चार और जीएस मेडिकल कॉलेज में तीन दवाओं के संबंध में औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश 2013 के उल्लंघन की बात सामने आई है। संबंधित निर्माता कंपनियों से स्पष्टीकरण मांगा जा रहा है और जिला स्तर के औषधि निरीक्षकों को DPCO तथा आवश्यक वस्तु अधिनियम के प्रावधानों के तहत आगे की कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। DPCO 2013 केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की धारा 3 के तहत लागू किया है और इसके तहत निर्धारित अधिकतम कीमत का पालन करना बाध्यकारी है।
जांच में कीमत के साथ दवाओं के सुरक्षित रखरखाव में भी कमियां मिलीं। बाराबंकी के हिंद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और हापुड़ के जीएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल में कुछ दवाओं की कोल्ड-चेन व्यवस्था निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं मिली। ऐसी दवाओं का स्टॉक निर्माता कंपनियों को वापस भेजने के निर्देश दिए गए हैं। कोल्ड-चेन की गड़बड़ी को केवल भंडारण की छोटी कमी नहीं माना जा सकता, क्योंकि निर्धारित तापमान पर रखी जाने वाली दवाओं की गुणवत्ता और प्रभावशीलता गलत तापमान में प्रभावित हो सकती है। इसीलिए FSDA ने अभियान में खरीद-बिक्री के बिल के साथ तापमान नियंत्रण और भंडारण व्यवस्था को भी जांच का हिस्सा बनाया है।
सबसे बड़ी कार्रवाई गाजियाबाद के संतोष मेडिकल कॉलेज में हुई है। यहां दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े दस्तावेजों में विसंगतियां मिलने के बाद 4.86 करोड़ रुपये मूल्य की दवाओं की बिक्री रोक दी गई है। इसका अर्थ अभी यह नहीं है कि 4.86 करोड़ रुपये की पूरी दवाएं नकली या खराब साबित हो गई हैं, बल्कि आपूर्ति श्रृंखला और अभिलेखों से जुड़ी गड़बड़ियों की जांच पूरी होने तक इनके विक्रय पर रोक लगाई गई है। कुछ दूसरी फार्मेसियां भी जांच के समय दवाओं के खरीद बिल प्रस्तुत नहीं कर सकीं, जिन्हें नोटिस जारी किए जा रहे हैं। विभाग अब यह पता लगा रहा है कि दवा निर्माता से लेकर सीएंडएफ एजेंट, वितरक, स्टॉकिस्ट और अस्पताल फार्मेसी तक दवा किस कीमत और किन बिलों के आधार पर पहुंची।
मेडिकल कॉलेजों की फार्मेसी की यह जांच मरीजों के लिहाज से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अस्पताल में भर्ती व्यक्ति के पास सामान्य ग्राहक की तरह अलग-अलग दुकानों में कीमत की तुलना करने की गुंजाइश बहुत कम होती है। डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा तत्काल चाहिए और कई निजी अस्पतालों में मरीज अस्पताल परिसर की फार्मेसी पर ही निर्भर रहता है। ऐसी स्थिति में यदि किसी दवा पर बहुत अधिक व्यापारिक अंतर रखा गया है तो मरीज के उपचार खर्च पर उसका सीधा असर पड़ता है। फिलहाल FSDA की जांच प्रारंभिक चरण में है और 90 नमूनों की प्रयोगशाला रिपोर्ट भी आनी बाकी है। इसलिए सभी 15 मेडिकल कॉलेजों को दोषी मानना सही नहीं होगा। अब जांच का निर्णायक हिस्सा यह होगा कि सात दवाओं में सामने आए DPCO उल्लंघन, 4.86 करोड़ रुपये की रोकी गई दवाओं की आपूर्ति श्रृंखला और 49 वितरकों-स्टॉकिस्टों को भेजे गए नोटिसों पर क्या जवाब मिलता है तथा मरीजों से वास्तव में कितनी अतिरिक्त कीमत वसूली गई।


