TRENDING TAGS :
UP के इस जिले में 30 सालों से BJP का दबदबा! यहां विपक्ष का हर चक्रव्यूह होता है फेल, जानिए क्यों?
UP BJP Stronghold Seat: मेरठ कैंट सीट पर करीब 30 साल से बीजेपी का दबदबा कायम है। 2027 यूपी विधानसभा चुनाव से पहले जानिए आखिर क्यों यह सीट बीजेपी का अभेद किला बनी हुई है, क्या है मेरठ कैंट का जातीय समीकरण, कितने हैं वैश्य, पंजाबी, दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम वोटर और क्या BSP समेत विपक्ष इस बार बीजेपी के गढ़ में सेंध लगा पाएगा?
UP BJP Stronghold Seat: उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई सीटें ऐसी हैं जहां हवा का रुख बदलते ही नतीजे बदल जाते हैं, लेकिन पश्चिमी यूपी की प्रतिष्ठित मेरठ कैंट सीट की कहानी पूरी तरह जुदा है। पिछले 3 दशकों से राज्य में चाहे समाजवादी पार्टी की सरकार रही हो, बहुजन समाज पार्टी की या फिर कांग्रेस की, इस सीट पर लगातार भारतीय जनता पार्टी की जीत का सिलसिला कायम है। 2022 के चुनाव में अमित अग्रवाल ने भारी मतों से अपनी जीत दर्ज की। इससे पहले 2002 से 2017 तक लगातार सत्य प्रकाश अग्रवाल यहां के विधायक रहे, जबकि अमित अग्रवाल 1993 और 1996 में भी इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। आखिर क्यों यह क्षेत्र कमल का सबसे मजबूत गढ़ बना हुआ है? आइए इसे विस्तार से समझते है।
विकास की नई रफ्तार से फिर जीत की हैट्रिक का दावा
वर्तमान भाजपा विधायक अमित अग्रवाल के अनुसार, दशकों से लटके हुए बुनियादी विकास कार्यों को धरातल पर उतारा गया है।
बेहतर कनेक्टिविटी: बागपत मार्ग और रेलवे मार्ग को जोड़ने वाली 800 मीटर लंबी लिंक रोड बनाई गई, जिससे दिल्ली मार्ग के दैनिक जाम से नागरिकों को बड़ी राहत मिली।
पुलों का निर्माण: आबू नाले पर नया पुल बनने से रेसना और रली गांव के निवासियों को अब अस्पताल जाने के लिए 5 से 7 किलोमीटर की लंबी दूरी तय करने की मजबूरी खत्म हो गई है।
रैपिड रेल की सौगात: देश की पहली आधुनिक नमो भारत रैपिड रेल सेवा से मेरठ के लोग अब केवल 50 मिनट में दिल्ली का सफर पूरा कर रहे हैं।
BSP का पलटवार: 'जमीनी धरातल पर वादे अधूरे, इस बार होगा बड़ा उलटफेर'
दूसरी तरफ, 2022 के चुनाव में दूसरे स्थान पर रही बहुजन समाज पार्टी (BSP) 2027 के चुनाव में बड़े फेरबदल की रणनीति तैयार कर रही है। बीएसपी नेताओं का कहना है कि उन्होंने बूथ स्तर पर विशेष संपर्क अभियान चलाकर कैंट क्षेत्र में अपने जनाधार को मजबूत किया है। उनका दावा है कि स्थानीय जनता वर्तमान विधायक के काम से असंतुष्ट है और बदलाव का मन बना चुकी है।
करीब 3.16 लाख वोटरों की सामाजिक बनावट और जातीय गणित
मेरठ कैंट सीट का चुनावी समीकरण काफी हद तक इसके जातीय आंकड़ों पर टिका हुआ है। क्षेत्र के कुल 3.16 लाख मतदाताओं की सामाजिक संरचना कुछ इस प्रकार है:
वैश्य समुदाय: 70,000
पंजाबी समुदाय: 50,000
दलित समाज: 40,000 (जिसमें करीब 13,000 जाटव मतदाता शामिल हैं)
ब्राह्मण समाज: 35,000
मुस्लिम मतदाता: 25,000
गुर्जर समाज: 20,000
सैनी समाज: 17,000
जाट समुदाय: 15,000
व्यापारी वर्ग यानी वैश्य और पंजाबी वोटरों का झुकाव पारंपरिक रूप से बीजेपी के पक्ष में रहा है। इसके साथ ही ब्राह्मण, गुर्जर और जाट मतदाताओं के बड़े हिस्से की लामबंदी बीजेपी को हर चुनाव में एकतरफा बढ़त दिला देती है।
आखिर क्यों ढहाना मुश्किल है यह किला?
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक मेरठ कैंट को भेदना किसी भी विरोधी दल के लिए आसान नहीं रहा है:
शहरी और मध्यम वर्ग का प्रभाव: गंगानगर, मोदीपुरम और कंकरखेड़ा जैसे रिहायशी इलाकों में कारोबारी और नौकरीपेशा मध्यम वर्ग बहुसंख्या में है, जो बीजेपी की विचारधारा के प्रति मजबूत वफादारी रखता है।
आरएलडी गठबंधन का असर: राष्ट्रीय लोक दल के एनडीए में शामिल होने से जाट बहुल इलाकों में बीजेपी का वोट बैंक और अधिक पक्का हो गया है।
कम मुस्लिम आबादी: इस क्षेत्र में मुस्लिम वोट बैंक का प्रतिशत कम होने के कारण वोटों का ध्रुवीकरण या विपक्ष के पक्ष में एकतरफा गोलबंदी का प्रभाव बेअसर हो जाता है।
क्या मखमली गढ़ में सेंध लगा पाएगा विपक्ष?
तमाम आंकड़ों और राजनीतिक हवा को देखें तो फिलहाल कोई बड़ा मुद्दा ऐसा नहीं दिखता जो बीजेपी के इस अभेद्य दुर्ग को हिला सके। हालांकि, बहुजन समाज पार्टी और अन्य विपक्षी दल 2027 के विधानसभा चुनावों में नई रणनीतियों के साथ कांटे की टक्कर देने का दावा कर रहे हैं। अब देखना होगा कि क्या विपक्ष कोई बड़ा चमत्कार कर पाता है या मेरठ कैंट की जनता फिर से अपने पुराने भरोसे को ही चुनती है।


