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Meerut News: नौचंदी मेला खत्म, पर विरासत पर सवाल: क्या अगली पीढ़ी देख पाएगी वही पहचान?
Meerut News: नौचंदी मेला भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन इसके साथ एक बड़ा सवाल छोड़ गया है—क्या आने वाली पीढ़ियां उस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नौचंदी मेले को उसी स्वरूप में देख पाएंगी, जिसे मेरठ की जनता वर्षों से जीती और संजोती आई है?
Meerut News(Photo-Social Media)
Meerut News: नौचंदी मेले का समापन हो गया। लगभग तीन महीने तक चले इस ऐतिहासिक आयोजन में लाखों लोगों ने शिरकत की, झूलों का आनंद लिया, खरीदारी की, सांस्कृतिक कार्यक्रम देखे और मेले की रौनक का हिस्सा बने। लेकिन मेला खत्म होने के बाद अब मेरठ में एक अलग तरह की चर्चा शुरू हो गई है। चर्चा इस बात की नहीं कि इस बार कितनी भीड़ आई या कितनी दुकानें लगीं, बल्कि इस सवाल की है कि क्या नौचंदी मेला अपनी मूल पहचान को बचा पा रहा है?
हर साल की तरह इस बार भी मेले में रोशनी थी, रंग था, भीड़ थी और कारोबार भी था। लेकिन जो लोग दशकों से नौचंदी मेले को देखते आए हैं, उनका मानना है कि इसकी आत्मा धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। उनके मुताबिक नौचंदी की पहचान सिर्फ झूलों, खाने-पीने की दुकानों और व्यावसायिक स्टॉलों से नहीं थी। इसकी पहचान उस सांस्कृतिक विरासत से थी जिसने इसे देश के चुनिंदा ऐतिहासिक मेलों में शामिल किया। नौचंदी मेला खत्म होने के बाद जब मैदान से अस्थायी दुकानें हटने लगीं और झूले खुलने लगे, तो एक बार फिर यह सवाल सामने आया कि आखिर इस ऐतिहासिक मेले को आने वाले वर्षों में किस दिशा में ले जाया जाएगा।
सिर्फ आयोजन नहीं, मेरठ की सांस्कृतिक पहचान है नौचंदी
मेरठ के इतिहास का जिक्र नौचंदी मेले के बिना अधूरा माना जाता है। नौचंदी देवी मंदिर और बाले मियां की दरगाह से जुड़ी यह परंपरा सदियों से सामाजिक सौहार्द और गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक रही है। यही वह विशेषता है जिसने इसे साधारण मेले से अलग पहचान दी। पुराने मेरठ के निवासी और सेवानिवृत्त शिक्षक ओमप्रकाश अग्रवाल कहते हैं, "पहले नौचंदी मेला शहर का सबसे बड़ा सांस्कृतिक उत्सव हुआ करता था। लोग सिर्फ घूमने नहीं, बल्कि परंपरा का हिस्सा बनने आते थे। अब माहौल बदल रहा है।" उनकी यह बात केवल भावनात्मक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस बदलाव की ओर संकेत है जिसे मेले से जुड़े कई लोग महसूस कर रहे हैं।
कहां खो गए लोक कलाकार और पारंपरिक आकर्षण?
एक समय था जब नौचंदी मेला लोक संस्कृति का सबसे बड़ा मंच माना जाता था। नौटंकी, रागनी, कव्वाली, लोकनृत्य, कठपुतली शो और पारंपरिक कलाकारों के कार्यक्रम लोगों को देर रात तक बांधे रखते थे। गांवों और कस्बों से आए कलाकारों के लिए यह मंच सम्मान का विषय होता था। अब मेले में आधुनिक मनोरंजन के साधन तो बढ़े हैं, लेकिन पारंपरिक कलाओं की मौजूदगी पहले जैसी नहीं दिखाई देती। सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, लेकिन उनका प्रभाव और पहचान सीमित होती जा रही है। स्थानीय इतिहासकारों का कहना है कि यदि लोक संस्कृति को मेले के केंद्र में नहीं रखा गया तो नौचंदी की सबसे बड़ी विशेषता धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है।
बाजार बढ़ा, लेकिन क्या पहचान घट गई?
इस बार मेले में बड़ी संख्या में व्यावसायिक स्टॉल लगे। खानपान, घरेलू सामान, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद और आधुनिक बाजार से जुड़ी वस्तुएं आसानी से उपलब्ध थीं। लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितना ऐसा था जो सिर्फ नौचंदी मेले में ही देखने को मिलता है? मेले में वर्षों से दुकान लगाने वाले एक व्यापारी कहते हैं, "पहले लोग खास चीजें खरीदने आते थे। अब अधिकांश सामान बाजार या ऑनलाइन भी मिल जाता है। इसलिए मेले को अपनी अलग पहचान बनानी होगी।" विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारंपरिक हस्तशिल्प, स्थानीय उत्पाद और क्षेत्रीय कला को प्राथमिकता दी जाए तो मेले की विशिष्टता दोबारा मजबूत हो सकती है।
युवाओं के लिए विरासत, सिर्फ सेल्फी प्वाइंट नहीं
मेले में बड़ी संख्या में युवा पहुंचे। सोशल मीडिया पर नौचंदी से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो भी खूब साझा किए गए। लेकिन सवाल यह है कि क्या युवाओं को मेले के इतिहास और महत्व की जानकारी भी उतनी ही है? मेरठ विश्वविद्यालय के एक छात्र का कहना है, "हम हर साल मेले में जाते हैं, लेकिन वहां इसके इतिहास के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है।" यह टिप्पणी बताती है कि विरासत को सिर्फ संरक्षित करना ही पर्याप्त नहीं है, उसे नई पीढ़ी तक रोचक तरीके से पहुंचाना भी जरूरी है।
दूसरे शहरों से सीखने की जरूरत
देश के कई ऐतिहासिक मेले और उत्सव समय के साथ खुद को बदलते हुए भी अपनी मूल पहचान बचाने में सफल रहे हैं। राजस्थान के लोक उत्सव, प्रयागराज का कुंभ और उत्तराखंड के पारंपरिक मेले इसका उदाहरण हैं। सांस्कृतिक मामलों के जानकार मानते हैं कि नौचंदी मेले को भी "हेरिटेज फेस्टिवल" के रूप में विकसित किया जा सकता है। इसके लिए स्थायी सांस्कृतिक परिसर, इतिहास प्रदर्शनी, लोक कला गांव और पारंपरिक कलाकारों के लिए विशेष मंच तैयार किए जा सकते हैं।
समापन के बाद सबसे जरूरी चर्चा
नौचंदी मेला समाप्त हो गया है। अगले साल फिर झूले लगेंगे, दुकानें सजेंगी और भीड़ उमड़ेगी। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या अगले साल तक मेले की पहचान को लेकर कोई गंभीर पहल होगी? क्योंकि किसी भी ऐतिहासिक आयोजन की सबसे बड़ी ताकत उसकी भीड़ नहीं, बल्कि उसकी विरासत होती है। यदि विरासत कमजोर पड़ने लगे तो आयोजन भले चलता रहे, उसकी आत्मा धीरे-धीरे खो जाती है।
आखिर में...
16 जून को नौचंदी मेले की रोशनियां बुझ गईं, मैदान खाली होने लगा और अस्थायी शहर फिर से अपने मूल स्वरूप में लौटने लगा। लेकिन मेला इस बार एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया है। क्या हम नौचंदी मेले को सिर्फ एक वार्षिक आयोजन के रूप में देखेंगे, या उसे उस सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संजोएंगे जिसने सदियों तक मेरठ की पहचान को जीवित रखा? क्योंकि अगर विरासत की चिंता आज नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में नौचंदी मेला तो रहेगा, लेकिन वह नौचंदी शायद नहीं रहेगी जिसे कभी मेरठ ने गर्व से अपनी पहचान कहा था।


