Nishad Party Political Journey: निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल, निषाद पार्टी की राजनीतिक यात्रा

Nishad Party Political Journey: निषाद पार्टी की पूरी राजनीतिक यात्रा जानिए। संजय निषाद, कसरवल आंदोलन, गोरखपुर उपचुनाव, भाजपा गठबंधन, विधायक, सांसद, आरक्षण और 2027 की रणनीति।

Yogesh Mishra
Published on: 9 Aug 2026 3:09 PM IST
Nishad Party Political Journey
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Nishad Party Political Journey

Nishad Party Political Journey: निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल, जिसे उसके संक्षिप्त नाम निषाद पार्टी के रूप में जाना जाता है, उत्तर प्रदेश की उन नई जाति-आधारित क्षेत्रीय पार्टियों में है जिन्होंने बहुत कम समय में अपनी संख्या से कहीं अधिक राजनीतिक प्रभाव अर्जित किया। पार्टी का पूरा नाम ही उसका राजनीतिक संदेश है—Nirbal Indian Shoshit Hamara Aam Dal, जिसके अंग्रेजी अक्षरों को मिलाकर NISHAD बनता है। इस नाम के माध्यम से संस्थापक डॉ. संजय कुमार निषाद ने निषाद, मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप, धीवर, मांझी, साहनी, बेलदार और नदी–मत्स्य व्यवसाय से जुड़ी दूसरी जातियों को एक साझा राजनीतिक पहचान में संगठित करने का प्रयास किया। पार्टी की स्थापना 16 अगस्त, 2016 को हुई। लेकिन उसकी पृष्ठभूमि 2015 के कसरवल आरक्षण आंदोलन और उससे भी पहले निषाद समुदाय के सामाजिक संगठनों में तैयार हो चुकी थी।

निषाद पार्टी की यात्रा विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसने गठन के केवल कुछ महीनों बाद 2017 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ा, राज्य में लगभग 5.41 लाख वोट प्राप्त किए और ज्ञानपुर से एक सीट जीती। इसके एक वर्ष बाद समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में संजय निषाद के पुत्र प्रवीण कुमार निषाद ने गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव जीतकर भारतीय जनता पार्टी के तीन दशक पुराने गढ़ को ध्वस्त कर दिया। लेकिन 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले निषाद पार्टी ने समाजवादी पार्टी–बसपा गठबंधन छोड़कर भाजपा से समझौता कर लिया। प्रवीण निषाद भाजपा के चुनाव चिह्न पर संत कबीर नगर से सांसद बने। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन के अंतर्गत निषाद पार्टी के छह प्रत्याशी उसके अपने चुनाव चिह्न पर और उससे जुड़े पांच अन्य नेता भाजपा के चिह्न पर निर्वाचित हुए। संजय निषाद स्वयं विधान परिषद सदस्य बनाए गए और योगी आदित्यनाथ सरकार में मत्स्य विभाग के कैबिनेट मंत्री बने।


अगस्त, 2026 की स्थिति में निषाद पार्टी भाजपा-नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश विधानसभा की आधिकारिक पार्टीवार सूची में उसके छह विधायक दर्ज हैं और संजय निषाद विधान परिषद के सदस्य हैं। लोकसभा में इस समय उसका कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है। क्योंकि 2024 में भाजपा के चिह्न पर संत कबीर नगर से लड़े प्रवीण निषाद चुनाव हार गए। पार्टी ने अभी तक राज्यसभा में किसी सदस्य को नहीं भेजा है। फिर भी संजय निषाद उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। उनकी पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अधिक सीटों की माँग करते हुए निषाद–मछुआरा समुदाय के आरक्षण तथा नदी आधारित आजीविका के प्रश्नों को फिर प्रमुखता से उठा रही है।

निषाद राजनीति की सामाजिक पृष्ठभूमि (Nishad Politics in Uttar Pradesh)

उत्तर प्रदेश में ‘निषाद’ किसी एक समान जाति का नाम नहीं। बल्कि नदी, नाव, मछली, जल-संसाधन और परंपरागत रूप से जल-आधारित व्यवसायों से जुड़े अनेक समुदायों की व्यापक सामाजिक पहचान है। विभिन्न क्षेत्रों में यही समुदाय निषाद, मल्लाह, केवट, मांझी, बिंद, कश्यप, धीवर, बाथम, रायकवार, कहार, तुरैहा, गोंड, साहनी और दूसरे स्थानीय नामों से जाने जाते हैं। संवैधानिक आरक्षण की सूची में इन जातियों की स्थिति समान नहीं है। कुछ समूह अन्य पिछड़ा वर्ग में हैं, कुछ स्थानों पर अनुसूचित जाति की समानार्थी प्रविष्टियों का दावा करते हैं और अनेक संगठन ‘मझवार’ अथवा ‘तुरैहा’ जैसी अनुसूचित जाति प्रविष्टियों के अंतर्गत निषाद उपजातियों को शामिल करने की माँग करते रहे हैं। निषाद पार्टी ने इसी जटिल सामाजिक और कानूनी प्रश्न को अपनी राजनीति का सबसे बड़ा आधार बनाया।

स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश में नदी-आधारित जातियों का मत कांग्रेस, समाजवादी दलों, बहुजन समाज पार्टी और बाद में भारतीय जनता पार्टी के बीच बँटा रहा। इन समुदायों से नेता तो विभिन्न दलों में उभरे। लेकिन राज्यव्यापी स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व विकसित नहीं हो पाया। बहुजन समाज पार्टी ने कांशीराम के दौर में निषाद, मल्लाह, बिंद और दूसरी अति पिछड़ी जातियों को ‘बहुजन’ राजनीति से जोड़ने का प्रयास किया। समाजवादी पार्टी ने भी पिछड़ा वर्ग की व्यापक राजनीति के अंतर्गत इन्हें प्रतिनिधित्व दिया, किंतु उसकी पहचान मुख्यतः यादव नेतृत्व से जुड़ी रही। भाजपा ने 2014 के बाद गैर-यादव पिछड़ों के सामाजिक विस्तार की रणनीति अपनाई। निषाद पार्टी इसी प्रतिस्पर्धा के बीच यह दावा लेकर सामने आई कि नदी से जुड़े समुदाय अब किसी बड़े दल के केवल हस्तांतरित होने वाले वोट नहीं रहेंगे। बल्कि अपनी स्वतंत्र राजनीतिक सौदेबाजी करेंगे।

संजय निषाद ने बार-बार कहा कि निषाद समुदाय ने कभी बसपा, कभी समाजवादी पार्टी और कभी भाजपा को जिताया। लेकिन उसे जनसंख्या और चुनावी योगदान के अनुपात में टिकट, पद, आरक्षण तथा सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी नहीं मिली। पार्टी के गठन का मूल संदेश था—पहले समुदाय को अलग राजनीतिक पहचान दी जाए। फिर इस संगठित मत के आधार पर बड़े दलों से हिस्सेदारी तय की जाए। यही रणनीति आगे 2018 में समाजवादी पार्टी और 2019 के बाद भाजपा के साथ उसके संबंधों में दिखाई दी।

संजय निषाद कौन हैं और उनका आंदोलन कैसे शुरू हुआ? (Sanjay Nishad Ke Bare Me Jankari)

डॉ. संजय कुमार निषाद का राजनीतिक परिचय केवल चुनावी नेता का नहीं। बल्कि निषाद आरक्षण आंदोलन के आयोजक का रहा है। वे गोरखपुर क्षेत्र से आते हैं। प्रारंभ में सामाजिक तथा सामुदायिक संगठनों के माध्यम से निषाद जातियों को जोड़ते रहे। उनकी राजनीति ने निषाद समुदाय की तीन मुख्य शिकायतों को केंद्र बनाया—पहली, निषाद उपजातियों को अनुसूचित जाति की सुविधाएँ दिलाने का प्रश्न। दूसरी, नदियों, घाटों, तालाबों, मछली पालन, बालू और नाव संचालन पर परंपरागत अधिकार। और तीसरी, बड़े राजनीतिक दलों में निषाद नेताओं को प्रतीकात्मक पद देने के बजाय वास्तविक सत्ता और टिकट में भागीदारी।


संजय निषाद की सार्वजनिक पहचान को निर्णायक रूप से उभारने वाली घटना कसरवल आंदोलन थी। 7 जून, 2015 को गोरखपुर के सहजनवा क्षेत्र के कसरवल में निषाद समुदाय के लोगों ने अनुसूचित जाति आरक्षण की माँग को लेकर रेलवे ट्रैक पर आंदोलन किया। पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच टकराव हुआ तथा एक युवक की मृत्यु हो गई। निषाद पार्टी इस घटना को अपने आंदोलन के ‘शहादत से नेतृत्व’ तक के मोड़ के रूप में प्रस्तुत करती है। घटना ने संजय निषाद को गोरखपुर और आसपास के जिलों से निकालकर पूरे पूर्वांचल में निषाद आंदोलन के चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया। पार्टी आज भी कसरवल की वर्षगाँठ को अपने प्रमुख राजनीतिक आयोजनों में शामिल करती है।

कसरवल के बाद संजय निषाद को यह विश्वास हुआ कि केवल सामाजिक आंदोलन और ज्ञापन से समुदाय की माँगें पूरी नहीं होंगी। उनके अनुसार आरक्षण से जुड़ी प्रशासनिक और संवैधानिक प्रक्रिया तभी आगे बढ़ेगी जब समुदाय अपनी स्वतंत्र चुनावी ताकत साबित करेगा। इसी सोच ने सामाजिक संगठन को राजनीतिक दल में बदलने का मार्ग बनाया।

16 अगस्त 2016: निषाद पार्टी की औपचारिक स्थापना (Nishad Party Ke Bare Me Jankari)

निर्बल इंडियन शोषित हमारा आम दल की स्थापना 16 अगस्त, 2016 को गोरखपुर में हुई। पार्टी के नाम के पहले अक्षरों से NISHAD बनता है। इसका अर्थ था कि पार्टी केवल जाति के नाम पर नहीं। बल्कि निर्बल, शोषित और राजनीतिक रूप से उपेक्षित लोगों की व्यापक आवाज बनने का दावा करेगी। व्यवहार में उसका मुख्य सामाजिक आधार निषाद–मल्लाह–केवट–बिंद–कश्यप और उनसे जुड़ी नदीवर्ती जातियाँ रहीं। पार्टी का रंग मरून अथवा गहरा लाल और चुनाव चिह्न भोजन से भरी थाली रहा है। थाली को सामाजिक सम्मान, भोजन, श्रम और सभी समुदायों की साझेदारी का प्रतीक बताया गया।


पार्टी ने अपने राजनीतिक एजेंडे में निषाद उपजातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा, मछुआरों को जल-संसाधनों पर प्राथमिक अधिकार, मत्स्य पालन के लिए सरकारी सहायता, नाविकों की सुरक्षा, नदी और घाट आधारित रोजगार, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व शामिल किया। समय के साथ उसने यह भी कहा कि नदी, तालाब, बालू खनन और घाटों के ठेके पर बड़े पूँजीपतियों या बाहरी ठेकेदारों का वर्चस्व समाप्त कर परंपरागत समुदायों को अधिकार मिलना चाहिए। 2026 में भी पार्टी के आगामी चुनाव अभियान की मुख्य माँगों में अनुसूचित जाति दर्जा और नदी आधारित आजीविका अधिकार शामिल हैं।

पार्टी की संरचना शुरू से ही संजय निषाद और उनके परिवार के आसपास केंद्रित रही। संजय निषाद राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उनके पुत्र प्रवीण निषाद को संसदीय राजनीति का प्रमुख चेहरा बनाया गया और श्रवण निषाद को भी संगठन तथा विधानसभा राजनीति में आगे बढ़ाया गया। यही परिवार आगे पार्टी की सबसे बड़ी शक्ति और परिवारवाद की आलोचना—दोनों का केंद्र बना।

2017 का पहला विधानसभा चुनाव (UP Vidhansabha Chunav 2027)

पार्टी गठन के लगभग छह महीने बाद ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव शुरू हो गए। इतने कम समय में राज्यव्यापी संगठन बनाना संभव नहीं था। फिर भी निषाद पार्टी ने अपनी सामाजिक उपस्थिति सिद्ध करने के उद्देश्य से बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारे। उसने पीस पार्टी, जन अधिकार पार्टी और कुछ छोटे समूहों के साथ चुनावी समझौता किया। अंतिम निर्वाचन आँकड़ों के अनुसार निषाद पार्टी ने 72 सीटों पर चुनाव लड़ा, 5,40,539 मत अर्थात 0.62 प्रतिशत राज्यव्यापी वोट प्राप्त किया और एक सीट जीती।


विधानसभा चुनाव गठबंधन अथवा स्थिति अपने चिह्न पर उम्मीदवार जीती सीटें पार्टी को मिले वोट राज्यव्यापी मत-प्रतिशत

2017 पीस पार्टी व छोटे दलों के साथ 72 1 5,40,539 0.62%

2022 भाजपा–एनडीए

2017 के संबंध में कुछ द्वितीयक स्रोत 100 उम्मीदवारों, लगभग 9.30 लाख वोट अथवा 0.70 प्रतिशत जैसी अलग संख्या देते हैं। निर्वाचन आयोग आधारित अंतिम पार्टीवार तालिका में निषाद पार्टी के 72 प्रत्याशी, 5,40,539 वोट और 0.62 प्रतिशत मत दर्ज हैं; इसलिए इन्हीं आँकड़ों को प्राथमिक माना जाना चाहिए।

ज्ञानपुर में विजय मिश्र की जीत

2017 में पार्टी की एकमात्र जीत भदोही जिले की ज्ञानपुर विधानसभा सीट से हुई। यहाँ बाहुबली नेता विजय मिश्र निषाद पार्टी के उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुए। विजय मिश्र इससे पहले समाजवादी पार्टी से विधायक रह चुके थे। सपा ने उनका टिकट काटा तो निषाद पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया। उनकी व्यक्तिगत स्थानीय पकड़, संगठन और संसाधनों ने नवगठित पार्टी को अपनी पहली विधानसभा सीट दिला दी।

यह जीत पार्टी के लिए दोहरे अर्थ वाली थी। एक ओर उसने गठन के पहले ही चुनाव में विधानसभा में प्रवेश कर लिया। दूसरी ओर पार्टी की पहली सफलता किसी लंबे समय के निषाद आंदोलनकारी के बजाय एक स्थापित बाहुबली नेता के माध्यम से आई। इससे निषाद पार्टी पर अवसरवादी टिकट वितरण और विवादित नेताओं को संरक्षण देने के आरोप भी लगे।

संजय निषाद स्वयं गोरखपुर ग्रामीण सीट से चुनाव लड़े। उन्हें लगभग 35 हजार मत मिले और वे तीसरे स्थान पर रहे। वे चुनाव नहीं जीत सके। लेकिन इस प्रदर्शन से यह स्पष्ट हुआ कि गोरखपुर क्षेत्र में पार्टी का एक संगठित सामुदायिक वोट बन चुका है।

2017 में पार्टी ने किसके साथ चुनाव लड़ा?

निषाद पार्टी ने 2017 में भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी या बसपा जैसे किसी बड़े दल के साथ गठबंधन नहीं किया था। उसने पीस पार्टी, जन अधिकार पार्टी और कुछ छोटे सामाजिक न्याय दलों के साथ मोर्चा बनाया। पीस पार्टी का आधार मुख्यतः पूर्वांचल के कुछ मुस्लिम क्षेत्रों में था, जबकि जन अधिकार पार्टी बाबू सिंह कुशवाहा के नेतृत्व में मौर्य–कुशवाहा और गैर-यादव पिछड़ा राजनीति का दावा करती थी। निषाद पार्टी का लक्ष्य निषाद–मल्लाह मत को इन सामाजिक समूहों से जोड़ना था।

यह गठबंधन व्यापक सत्ता विकल्प नहीं बन सका। भाजपा की प्रचंड लहर, समाजवादी पार्टी–कांग्रेस गठबंधन और बसपा के संगठित वोट के बीच छोटे दल अधिकांश सीटों पर मुकाबले से बाहर रहे। फिर भी निषाद पार्टी के लगभग साढ़े पाँच लाख वोटों ने बड़े दलों को यह संकेत दिया कि पूर्वांचल में उसका सामाजिक उपयोग है। यही वोट आगे उसकी गठबंधन सौदेबाजी की पहली पूँजी बने।

2018 का गोरखपुर उपचुनाव—पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक छलाँग (Gorakhpur Upchunaav 2018)

योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर लोकसभा सीट खाली हुई। योगी इस सीट से 1998 से लगातार सांसद रहे थे। उनसे पहले उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ ने भी इसका प्रतिनिधित्व किया था। भाजपा 1989 के बाद से गोरखपुर में लोकसभा चुनाव नहीं हारी थी। इसलिए 2018 का उपचुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं। बल्कि मुख्यमंत्री के राजनीतिक गढ़ की प्रतिष्ठा का प्रश्न था।

समाजवादी पार्टी ने समझा कि केवल अपने परंपरागत मुस्लिम–यादव मतों से गोरखपुर नहीं जीता जा सकता। उसने निषाद पार्टी और दूसरे छोटे समूहों को साथ लिया। समझौते के अनुसार संजय निषाद के पुत्र प्रवीण कुमार निषाद को समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न—साइकिल—पर उम्मीदवार बनाया गया। आधिकारिक परिणाम में उनकी जीत समाजवादी पार्टी के खाते में दर्ज हुई। लेकिन राजनीतिक रूप से वे निषाद पार्टी के उम्मीदवार और संस्थापक के पुत्र थे।

प्रवीण निषाद ने भाजपा उम्मीदवार उपेंद्र दत्त शुक्ल को लगभग 21 हजार मतों से हराया। यह परिणाम राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना, क्योंकि मुख्यमंत्री का गढ़ हार गया था। इस जीत के पीछे कई कारक थे—समाजवादी पार्टी का आधार, निषाद पार्टी के माध्यम से निषाद मतों का एकीकरण, बसपा का समर्थन, कम मतदान और भाजपा समर्थकों की अपेक्षाकृत कम सक्रियता। फिर भी इस परिणाम ने संजय निषाद को राज्य की गठबंधन राजनीति का महत्वपूर्ण खिलाड़ी बना दिया।

यह सीट किस पार्टी की मानी जाएगी?

यहाँ राजनीतिक और तकनीकी गणना अलग है—निर्वाचन आयोग के अनुसार: प्रवीण निषाद समाजवादी पार्टी के चिह्न पर जीते, इसलिए सीट समाजवादी पार्टी की थी।

राजनीतिक पहचान के अनुसार: वे निषाद पार्टी के संस्थापक के पुत्र और पार्टी द्वारा प्रस्तावित उम्मीदवार थे, इसलिए निषाद पार्टी इसे अपनी ऐतिहासिक संसदीय सफलता मानती है।

इसी कारण यह कहना कि ‘निषाद पार्टी ने 2018 में लोकसभा सीट जीती’ राजनीतिक रूप से उचित है। लेकिन पार्टी के अपने चुनाव चिह्न पर जीती सीटों की आधिकारिक गणना में इसे शामिल नहीं किया जा सकता।

समाजवादी पार्टी से समझौता क्यों टूटा?


गोरखपुर उपचुनाव की जीत के बाद निषाद पार्टी को उम्मीद थी कि 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा–बसपा महागठबंधन उसे सम्मानजनक संख्या में सीटें और अपने चुनाव चिह्न पर लड़ने का अवसर देगा। लेकिन सीट-वितरण में सहमति नहीं बन सकी। निषाद पार्टी महाराजगंज सहित एक से अधिक सीटों पर अपने चिह्न से लड़ना चाहती थी, जबकि गठबंधन उसे सीमित स्थान और सहयोगी दल के चिह्न पर उम्मीदवार उतारने का विकल्प दे रहा था।

मार्च 2019 में निषाद पार्टी औपचारिक रूप से सपा–बसपा गठबंधन में शामिल हुई। लेकिन कुछ ही दिनों बाद उससे बाहर निकल गई। संजय निषाद ने शिकायत की कि गठबंधन की प्रचार सामग्री में उनकी पार्टी का चिह्न और नेताओं की तस्वीरें तक उचित रूप से नहीं लगाई गईं तथा उसे स्वतंत्र सहयोगी के बजाय केवल मतदाता समूह माना जा रहा है। इसके बाद संजय और प्रवीण निषाद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और भाजपा से समझौते का रास्ता खुल गया।

यह निषाद पार्टी की राजनीति का पहला बड़ा गठबंधन परिवर्तन था। जिस भाजपा को उसने 2018 में मुख्यमंत्री के गढ़ में हराया था, उसी भाजपा के साथ वह एक वर्ष बाद चुनाव लड़ने लगी।

2019 में भाजपा से गठबंधन

भाजपा ने निषाद पार्टी के साथ समझौते के बाद प्रवीण निषाद को गोरखपुर के बजाय संत कबीर नगर लोकसभा सीट से अपने चुनाव चिह्न पर उम्मीदवार बनाया। निषाद पार्टी को अपने चिह्न पर कोई लोकसभा सीट नहीं मिली। प्रवीण निषाद औपचारिक रूप से भाजपा उम्मीदवार थे, यद्यपि वे निषाद पार्टी से जुड़े रहे और गठबंधन में उसके संसदीय चेहरे के रूप में प्रस्तुत किए गए।

प्रवीण निषाद ने संत कबीर नगर में बसपा उम्मीदवार भीष्म शंकर तिवारी को लगभग 35,749 मतों से हराया। उन्हें 4,67,543 वोट और लगभग 44.5 प्रतिशत मत मिले। इस प्रकार वे लगातार दूसरी बार लोकसभा पहुँचे—पहली बार 2018 में सपा के चिह्न पर और दूसरी बार 2019 में भाजपा के चिह्न पर।

यह व्यवस्था निषाद पार्टी की चुनावी गणना में एक और जटिलता उत्पन्न करती है। पार्टी के नेता लोकसभा पहुँचे। लेकिन पार्टी के अपने चुनाव चिह्न पर नहीं। इसलिए:

  • निषाद पार्टी के सामाजिक–राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में लोकसभा पहुँचे व्यक्ति: एक—प्रवीण निषाद।
  • उनके लोकसभा कार्यकाल: दो—2018 से 2019 और 2019 से 2024।
  • निषाद पार्टी के अपने चुनाव चिह्न पर जीती लोकसभा सीटें: शून्य।
  • समाजवादी पार्टी के चिह्न पर जीत: एक उपचुनाव।
  • भाजपा के चिह्न पर जीत: एक आम चुनाव।

भाजपा के साथ स्थायी गठबंधन की शुरुआत

2019 के बाद निषाद पार्टी भाजपा-नेतृत्व वाले एनडीए की नियमित सहयोगी बन गई। भाजपा के लिए यह गठबंधन गैर-यादव पिछड़ी जातियों और विशेष रूप से पूर्वांचल के निषाद–मल्लाह मतों तक पहुँच का साधन था। निषाद पार्टी के लिए भाजपा का संगठन, हिंदुत्व समर्थक आधार, नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता तथा सत्ता में भागीदारी उसकी सीमित सामाजिक ताकत को सीटों में बदलने का माध्यम बने।

संजय निषाद ने भाजपा से गठबंधन के बावजूद निषाद उपजातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने की माँग जारी रखी। कभी-कभी उन्होंने सरकार की धीमी कार्रवाई पर असंतोष भी जताया। लेकिन सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर की तरह गठबंधन छोड़कर विरोध में नहीं गए। 2019 के बाद निषाद पार्टी की रणनीति सरकार के भीतर रहकर पद, योजनाएँ और आरक्षण प्रक्रिया आगे बढ़ाने की रही।

सितंबर, 2021 में भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले निषाद पार्टी के साथ गठबंधन की औपचारिक पुष्टि की। इसी दौरान संजय निषाद को उत्तर प्रदेश विधान परिषद में मनोनीत कराया गया। उनका कार्यकाल 26 सितंबर, 2027 तक दर्ज है।

2022 का विधानसभा चुनाव—आधिकारिक और राजनीतिक गणना का अंतर

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा, अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी ने एनडीए के अंतर्गत चुनाव लड़ा। सीट-वितरण की राजनीतिक घोषणा में निषाद पार्टी से संबद्ध उम्मीदवारों के लिए लगभग 16 सीटें तय की गईं। लेकिन सभी उम्मीदवार निषाद पार्टी के चुनाव चिह्न पर नहीं लड़े। अंतिम व्यवस्था में 10 उम्मीदवार निषाद पार्टी के अपने चिह्न पर और छह उम्मीदवार भाजपा के चिह्न पर मैदान में उतरे।

निषाद पार्टी के अपने चिह्न पर लड़े दस उम्मीदवारों में से छह जीत गए। पार्टी को 8,40,584 वोट और लगभग 0.91 प्रतिशत राज्यव्यापी मत मिला। इसके अतिरिक्त निषाद पार्टी से जुड़े अथवा उसके कोटे के पाँच उम्मीदवार भाजपा के चिह्न पर जीतने में सफल रहे। इस प्रकार आधिकारिक पार्टीवार परिणाम में निषाद पार्टी के छह विधायक हैं, जबकि संजय निषाद और पार्टी नेतृत्व ने अपने राजनीतिक प्रभाव का आंकड़ा 11 विधायकों तक बताया—छह अपने चिह्न पर और पांच भाजपा के चिह्न पर।

यह अंतर समझना आवश्यक है:

गणना का आधार संख्या

निषाद पार्टी के अपने चिह्न पर जीते विधायक 6

निषाद पार्टी के कोटे/संबंध से भाजपा चिह्न पर जीते उम्मीदवार 5

पार्टी नेतृत्व द्वारा राजनीतिक प्रभाव के रूप में दावा 11

निर्वाचन आयोग की पार्टीवार आधिकारिक संख्या 6

निषाद पार्टी के अपने चिह्न पर निर्वाचित प्रमुख विधायक

2022 में निषाद पार्टी के चिह्न पर निर्वाचित छह सदस्यों में आधिकारिक विधानसभा अभिलेख और निर्वाचन परिणामों में ये प्रमुख नाम दर्ज हैं—


1. श्रवण कुमार निषाद—चौरी-चौरा

2. ऋषि त्रिपाठी—नौतनवा

3. अनिल कुमार त्रिपाठी—मेंहदावल

4. डॉ. विनोद कुमार बिंद—मझवां

5. विपुल दुबे—ज्ञानपुर

6. पार्टी के खाते में दर्ज छठे विजेता ने भी एनडीए सीट-वितरण में निषाद पार्टी के चिह्न पर सफलता प्राप्त की।

उत्तर प्रदेश विधानसभा की वर्तमान पार्टीवार सूची निषाद पार्टी के छह सदस्य दर्ज करती है और आधिकारिक सदस्य-सूची में अनिल कुमार त्रिपाठी तथा विपुल दुबे सहित पार्टी के विधायकों की पहचान दी गई है।

प्रत्याशियों की संख्या में भ्रम क्यों होता हैकुछ समाचारों में निषाद पार्टी के लिए 15, कुछ में 16 और कुछ में 17 सीटों का उल्लेख मिलता है। इसका कारण यह है कि प्रारंभिक बातचीत, घोषित कोटा, अंतिम नामांकन और चुनाव चिह्न—चारों अलग चरण थे। कई उम्मीदवार निषाद पार्टी के हिस्से की सीट पर भाजपा के चिह्न से लड़े। इसलिए केवल पार्टीवार निर्वाचन तालिका देखने पर गठबंधन में निषाद पार्टी के पूरे राजनीतिक कोटे का पता नहीं चलता।

2017 और 2022 की तुलना

निषाद पार्टी के अपने चिह्न पर निर्वाचित प्रमुख विधायक

2022 में निषाद पार्टी के चिह्न पर निर्वाचित छह सदस्यों में आधिकारिक विधानसभा अभिलेख और निर्वाचन परिणामों में ये प्रमुख नाम दर्ज हैं—

1. श्रवण कुमार निषाद—चौरी-चौरा

2. ऋषि त्रिपाठी—नौतनवा

3. अनिल कुमार त्रिपाठी—मेंहदावल

4. डॉ. विनोद कुमार बिंद—मझवां

5. विपुल दुबे—ज्ञानपुर

6. पार्टी के खाते में दर्ज छठे विजेता ने भी एनडीए सीट-वितरण में निषाद पार्टी के चिह्न पर सफलता प्राप्त की।

उत्तर प्रदेश विधानसभा की वर्तमान पार्टीवार सूची निषाद पार्टी के छह सदस्य दर्ज करती है और आधिकारिक सदस्य-सूची में अनिल कुमार त्रिपाठी तथा विपुल दुबे सहित पार्टी के विधायकों की पहचान दी गई है।

प्रत्याशियों की संख्या में भ्रम क्यों होता है?

कुछ समाचारों में निषाद पार्टी के लिए 15, कुछ में 16 और कुछ में 17 सीटों का उल्लेख मिलता है। इसका कारण यह है कि प्रारंभिक बातचीत, घोषित कोटा, अंतिम नामांकन और चुनाव चिह्न—चारों अलग चरण थे। कई उम्मीदवार निषाद पार्टी के हिस्से की सीट पर भाजपा के चिह्न से लड़े। इसलिए केवल पार्टीवार निर्वाचन तालिका देखने पर गठबंधन में निषाद पार्टी के पूरे राजनीतिक कोटे का पता नहीं चलता।

2017 और 2022 की तुलना

चुनाव अपने चिह्न पर लड़ी सीटें अपने चिह्न पर जीत वोट मत-प्रतिशत गठबंधन


2017 72 1 5,40,539 0.62% पीस पार्टी व छोटे दल

2022 10 6 8,40,584 0.91% भाजपा–एनडीए

2022 में निषाद पार्टी ने 2017 की तुलना में बहुत कम सीटों पर चुनाव लड़ा। लेकिन वोटों की संख्या लगभग तीन लाख बढ़ी और सीटें एक से बढ़कर छह हो गईं। इसका मुख्य कारण भाजपा का वोट हस्तांतरण, चुनिंदा मजबूत सीटों पर उम्मीदवार उतारना और पाँच वर्षों में निषाद पार्टी की बढ़ी पहचान थी। 2017 में पार्टी ने पूरे राज्य में अपना विस्तार प्रदर्शित करने के लिए बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारे थे।2022 में उसने गठबंधन के अंतर्गत केवल उन सीटों पर चुनाव लड़ा जहाँ उसकी सामाजिक या प्रत्याशीगत संभावना मजबूत मानी गई।

यहाँ वोट-प्रतिशत को अकेले देखकर पार्टी की वास्तविक गठबंधन शक्ति कम आँकी जा सकती है। निषाद पार्टी का 0.91 प्रतिशत मत केवल उन दस सीटों पर उसके चिह्न को मिले वोटों का राज्यव्यापी अनुपात है। जिन क्षेत्रों में उसने उम्मीदवार नहीं उतारा, वहाँ उसके समर्थकों ने भाजपा या अपना दल उम्मीदवारों को वोट दिया। इसी प्रकार उसकी सीटों पर भाजपा का व्यापक मत भी उसके उम्मीदवारों को मिला।

संजय निषाद विधान परिषद और सरकार में पहुँचे

सितंबर, 2021 में संजय निषाद को उत्तर प्रदेश विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया गया। परिषद के आधिकारिक अभिलेख में उनका कार्यकाल 26 सितंबर,,2027 तक दर्ज है। वे प्रत्यक्ष चुनाव से विधानसभा नहीं पहुँचे। बल्कि राज्यपाल द्वारा मनोनीत सदस्य के रूप में उच्च सदन में आए।

2022 में एनडीए की दोबारा सरकार बनने के बाद संजय निषाद को योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बना कर मत्स्य विभाग सौंपा गया। अगस्त, 2026 तक वे उत्तर प्रदेश के मत्स्य मंत्री हैं। मत्स्य विभाग निषाद पार्टी के सामाजिक आधार के लिए प्रतीकात्मक और व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है, क्योंकि पार्टी जिन समुदायों का प्रतिनिधित्व करती है, उनका परंपरागत संबंध मछली पालन, तालाब, नदियों और नाव संचालन से है।

सत्ता में आने के बाद पार्टी ने मछुआरा कल्याण योजनाओं, मत्स्य संपदा, दुर्घटना सहायता, नाविक सुरक्षा, मत्स्य पालन पट्टों और निषाद परिवारों की शिक्षा–स्वास्थ्य सहायता को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया। आलोचकों का कहना है कि अनुसूचित जाति दर्जे की मूल माँग अब भी पूरी नहीं हुई है। पार्टी स्वयं भी इस माँग को अधूरा मानती है और 2027 के अभियान में इसे फिर उठाने की तैयारी कर रही है।

2024 का लोकसभा चुनाव (Loksabha Chunav 2024)

2024 में निषाद पार्टी एनडीए का हिस्सा बनी रही। लेकिन उसके अपने चुनाव चिह्न पर कोई लोकसभा सीट नहीं दी गई। प्रवीण निषाद को भाजपा ने फिर संत कबीर नगर से उम्मीदवार बनाया। इस प्रकार वे राजनीतिक रूप से निषाद पार्टी के प्रतिनिधि थे।समाजवादी पार्टी ने उनके मुकाबले लक्ष्मीकांत उर्फ पप्पू निषाद को उतारा। परिणाम में पप्पू निषाद को 4,98,695 और प्रवीण निषाद को 4,06,525 वोट मिले। प्रवीण निषाद 92,170 मतों से हार गए। इस हार के साथ निषाद पार्टी का लोकसभा में अप्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व भी समाप्त हो गया।

लोकसभा चुनाव प्रत्याशी की राजनीतिक पहचान चुनाव चिह्न सीट परिणाम

2018 उपचुनाव प्रवीण निषाद—निषाद पार्टी समाजवादी पार्टी गोरखपुर जीत

2019 आम चुनाव प्रवीण निषाद—निषाद पार्टी सहयोगी भाजपा संत कबीर नगर जीत

2024 आम चुनाव प्रवीण निषाद—निषाद पार्टी सहयोगी भाजपा संत कबीर नगर हार

2024 की हार का अर्थ यह नहीं कि निषाद मत पूरी तरह पार्टी से अलग हो गया। उत्तर प्रदेश में भाजपा के विरुद्ध संविधान, आरक्षण, बेरोजगारी और जातीय प्रतिनिधित्व के मुद्दों पर विपक्ष का व्यापक ध्रुवीकरण हुआ। समाजवादी पार्टी ने स्वयं निषाद समुदाय के उम्मीदवार को उतारकर सामाजिक पहचान की निषाद पार्टी–भाजपा की दावेदारी को चुनौती दी। यह रणनीति संत कबीर नगर में सफल रही।

निषाद पार्टी से अब तक कितने लोग लोकसभा पहुँचे? आधिकारिक पार्टी चिह्न के आधार पर

निषाद पार्टी के अपने चुनाव चिह्न पर अभी तक कोई उम्मीदवार लोकसभा नहीं जीता है।

अपने चिह्न पर लोकसभा सीटें: शून्य

राजनीतिक संबद्धता के आधार पर

निषाद पार्टी से जुड़े एक व्यक्ति—प्रवीण कुमार निषाद—दो बार लोकसभा पहुँचे:

मार्च 2018 से मई 2019: गोरखपुर, समाजवादी पार्टी के चिह्न पर;

मई 2019 से जून 2024: संत कबीर नगर, भाजपा के चिह्न पर।

इसलिए व्यक्ति और कार्यकाल का हिसाब होगा—

  • अलग-अलग व्यक्ति: एक
  • कुल लोकसभा कार्यकाल: दो
  • आम चुनाव में जीत: एक
  • उपचुनाव में जीत: एक
  • निषाद पार्टी के अपने चुनाव चिह्न पर जीत: शून्य

यह अंतर पार्टी की पूरी संसदीय यात्रा समझने के लिए आवश्यक है।

विधानसभा में अब तक कितने लोग पहुँचे?

2017

ज्ञानपुर से विजय मिश्र—एक विधायक।

2022

निषाद पार्टी के चिह्न पर छह विधायक।

पार्टी के कोटे अथवा संगठन से जुड़े पाँच अन्य नेता भाजपा के चुनाव चिह्न पर जीते...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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