OP राजभर ने बदल दी 'PDA' की परिभाषा, याद दिलाया 1995 का गेस्ट हाउस कांड, अखिलेश यादव क्यों हुए बेचैन?

OP Rajbhar PDA Formula: यूपी चुनाव 2027 से पहले ओपी राजभर ने अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले पर बड़ा हमला बोला। 1995 के गेस्ट हाउस कांड, दलित राजनीति और नए चुनावी समीकरणों को लेकर सियासत तेज हो गई है।

Harsh Srivastava
Published on: 12 July 2026 7:42 PM IST (Updated on: 12 July 2026 7:42 PM IST)
OP राजभर ने बदल दी PDA की परिभाषा, याद दिलाया 1995 का गेस्ट हाउस कांड, अखिलेश यादव क्यों हुए बेचैन?
X

OP Rajbhar PDA Formula: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर शह और मात का खेल अभी से बेहद दिलचस्प हो चला है। समाजवादी पार्टी (सपा) के मुखिया अखिलेश यादव ने सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक का एक बड़ा चुनावी चक्रव्यूह तैयार किया है। अखिलेश को पूरा भरोसा था कि इस नए फॉर्मूले के दम पर वे यूपी की जंग जीत लेंगे। मगर योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने ऐन वक्त पर उनकी सबसे दुखती रग को छूकर पूरी बाजी पलटने की कोशिश कर दी है। राजभर ने भरे मंच से अखिलेश के इस नारे का ऐसा मतलब निकाला कि सपा खेमे में खलबली मच गई।

जुमले के पीछे का जमीनी सच

ओम प्रकाश राजभर ने अखिलेश के पीडीए को नया नाम देते हुए कह डाला कि इसका असली मतलब 'पीट देगा अहीर' और 'पीट देगा अल्पसंख्यक' है। सुनने में यह भले ही एक आम सियासी जुमला लगे, लेकिन उत्तर प्रदेश की जमीनी हकीकत और इतिहास से वाकिफ लोग जानते हैं कि यह बयान अखिलेश यादव के माथे पर चिंता की लकीरें खींचने वाला है। राजभर इस बयान के जरिए जान-बूझकर अति-पिछड़ों और दलितों को सूबे का वह पुराना दौर याद दिलाना चाहते हैं, जब सपा के शासनकाल में कथित तौर पर सिर्फ कुछ खास तबकों का ही वर्चस्व रहता था और बाकी कमजोर जातियां डर के साये में जीने को मजबूर थीं।

क्यों पड़ी नए नारे की जरूरत?

राजनीतिक समीकरणों को देखें तो सपा का पुराना और पारंपरिक वोट बैंक हमेशा से 'एम-वाई' यानी मुस्लिम और यादव ही रहा है। उत्तर प्रदेश में यादव समाज की आबादी लगभग 9 से 10% है, जबकि मुस्लिम समाज करीब 19% के आस-पास है। इन दोनों को मिला दिया जाए तो यह आंकड़ा लगभग 30% तक पहुंचता है। मगर यूपी की सत्ता पर काबिज होने के लिए किसी भी दल को कम से कम 40% वोटों की दरकार होती है। अखिलेश इस कड़वी सच्चाई को बखूबी जानते हैं, इसीलिए उन्होंने गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को अपने साथ जोड़ने के लिए पीडीए का बड़ा पासा फेंका था। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस फॉर्मूले से उन्हें अच्छी सफलता भी मिली थी।

गांवों का वो पुराना डर

ओम प्रकाश राजभर जमीन से जुड़े एक घाघ नेता हैं, जो अति-पिछड़ी जातियों की नब्ज को बहुत अच्छे से पहचानते हैं। 'पीट देगा अहीर' कहकर उन्होंने ग्रामीण इलाकों के उस पुराने सामाजिक खौफ को दोबारा जिंदा करने की चाल चली है, जिसे अखिलेश भुलाने की हर मुमकिन कोशिश में जुटे हैं। राजभर का सीधा इशारा दलितों और अति-पिछड़ों की तरफ है कि भले ही तुम आज सपा के साथ खड़े हो जाओ, लेकिन जैसे ही उनकी सरकार आएगी, गांवों में दबंग तबके फिर से हावी हो जाएंगे और तुम्हारा शोषण शुरू हो जाएगा।

थानों और तहसीलों का इतिहास

उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में यादव सिर्फ एक पिछड़ी जाति नहीं, बल्कि एक बेहद मजबूत, जमीन-जायदाद से संपन्न और दबंग जाति के रूप में जानी जाती है। दूसरी तरफ राजभर, निषाद, मौर्य, नाई और कुम्हार जैसी अति-पिछड़ी जातियां आर्थिक रूप से कमजोर हैं। पुराने दौर में यह आम धारणा बन गई थी कि सपा राज में थानों और तहसीलों में सिर्फ एक ही खास वर्ग की सुनवाई होती थी। अगर किसी कमजोर वर्ग के व्यक्ति का किसी दबंग से झगड़ा हो जाए, तो पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती थी। कई बार दलितों की जमीनों और तालाबों पर अवैध कब्जों की शिकायतें भी सामने आती थीं, जिसे बीजेपी ने गुंडाराज का नाम देकर इस बड़े वोट बैंक को अपने पाले में कर लिया था।

1995 का वो बदनाम कांड

दलितों के बीच सपा की छवि को झटका देने वाली सबसे बड़ी ऐतिहासिक घटना साल 1995 का लखनऊ का वह बदनाम 'गेस्ट हाउस कांड' है। जब मायावती ने सपा से नाता तोड़ा, तो नाराज सपाइयों ने मीराबाई गेस्ट हाउस में उन पर जानलेवा हमला बोल दिया था। मायावती ने एक कमरे में बंद होकर बमुश्किल अपनी जान बचाई थी। इस खौफनाक घटना ने पूरे देश के दलित समाज को अंदर तक हिला दिया था और यह संदेश गया था कि सपा कभी भी दलित नेतृत्व को बर्दाश्त नहीं कर सकती।

संसद में फाड़ी गई बिल की कॉपी

इसके अलावा, जब देश की संसद में दलित समाज के हक के लिए 'प्रमोशन में आरक्षण' का बिल पेश किया गया था, तब समाजवादी पार्टी ने इसका सबसे मुखर विरोध किया था। यहां तक कि संसद के भीतर ही सपा के सांसदों ने इस बिल की प्रतियों को सरेआम फाड़ दिया था। दलित समाज इस ऐतिहासिक घटना को आज तक नहीं भूला है। इसके साथ ही अखिलेश सरकार के आते ही भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर से दोबारा भदोही कर देना और मायावती द्वारा बनाए गए दलित महापुरुषों के स्मारकों की उपेक्षा करने से भी यह संदेश गया था कि सपा दलित प्रतीकों का आदर नहीं करती। अब राजभर इन्हीं पुरानी कड़वी यादों को हवा देकर अखिलेश के नए वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाने की फिराक में हैं।

Harsh Srivastava
ABOUT THE AUTHOR

Harsh Srivastava

Content Writer Mail ID - harshsri764@gmail.comharshsri764@gmail.com

हर्ष श्रीवास्तव वाराणसी के रहने वाले पत्रकार और डिजिटल कंटेंट प्रोफेशनल हैं। वर्तमान में वे लखनऊ स्थित न्यूज़ट्रैक में डेस्क इंचार्ज के पद पर कार्यरत हैं। यहां वे कंटेंट प्लानिंग, एडिटोरियल कोऑर्डिनेशन, न्यूज़रूम संचालन के साथ-साथ रिसर्च आधारित एक्सप्लेनर, न्यूज़ फीचर और विश्लेषणात्मक लेख तैयार करते हैं। उनके पास मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (MJMC) की डिग्री है। उन्होंने वर्ष 2023 में पत्रकारिता की शुरुआत की और हिन्दुस्तान, टाइम्स इंटरनेट, इंडिया न्यूज़ जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है। वाराणसी, दिल्ली और लखनऊ में काम करने के दौरान उन्हें रिपोर्टिंग, कंटेंट राइटिंग और डिजिटल पत्रकारिता का अनुभव प्राप्त हुआ। हर्ष की विशेष रुचि राजनीति, चुनाव, अपराध, सार्वजनिक नीति, सुशासन और समसामयिक विषयों पर शोध-आधारित पत्रकारिता में है। वे गहन रिसर्च, फैक्ट-चेकिंग और सरल भाषा के माध्यम से जटिल विषयों को पाठकों तक सटीक, विश्वसनीय और प्रभावी ढंग से पहुंचाने का प्रयास करते हैं।

Next Story