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20 लाख से कम के होम लोन पर सरफेसी कानून से वसूली पर सवाल, हाई कोर्ट ने लौटाया मकान का कब्जा
Prayagraj: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 17.67 लाख रुपये के गृह ऋण की वसूली में सरफेसी कानून के इस्तेमाल पर सवाल उठाते हुए आगरा के ऋणधारकों को मकान का कब्जा लौटाने का आदेश दिया।
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Prayagraj: गृह ऋण की किस्तें नहीं चुकाने पर वित्तीय संस्थानों द्वारा मकान का कब्जा लेने की कानूनी प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आगरा के ऋणधारकों को अंतरिम राहत दी है। अदालत ने 17 लाख 67 हजार 718 रुपये के गृह ऋण की वसूली के लिए सरफेसी अधिनियम के अंतर्गत की गई कार्रवाई को प्रथम दृष्टया अधिकार क्षेत्र से बाहर मानते हुए संबंधित मकान का कब्जा याचिकाकर्ताओं को तत्काल लौटाने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति विवेक सरन की खंडपीठ ने आगरा के अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) द्वारा कब्जा दिलाने के लिए पारित आदेश के प्रभाव पर भी अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। इस निर्णय का महत्व केवल एक परिवार को मिली राहत तक सीमित नहीं है। इससे यह कानूनी प्रश्न भी सामने आया है कि गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियाँ और आवास वित्त कंपनियाँ कितनी राशि के सुरक्षित ऋण की वसूली के लिए सरफेसी कानून की विशेष शक्तियों का उपयोग कर सकती हैं और किन परिस्थितियों में संपत्ति पर कब्जा लेने की कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर मानी जा सकती है।
यह मामला आगरा निवासी नुसरत खान और अन्य याचिकाकर्ताओं से संबंधित है। उन्होंने 23 सितंबर 2021 को इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड, जिसका वर्तमान नाम सम्मान कैपिटल लिमिटेड है, से 17,67,718 रुपये का गृह ऋण लिया था। ऋण की वसूली को लेकर वित्तीय संस्था ने सरफेसी अधिनियम, 2002 के अंतर्गत कार्रवाई शुरू की। इस प्रक्रिया में आगरा के अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) ने 18 नवंबर 2023 को संपत्ति का कब्जा दिलाने से संबंधित आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। उनका मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि निर्धारित न्यूनतम सीमा से कम राशि वाले ऋण की वसूली के लिए संबंधित वित्तीय संस्था को सरफेसी कानून के अंतर्गत संपत्ति का कब्जा लेने का अधिकार था या नहीं।
सरफेसी कानून क्या है और वित्तीय संस्थानों को कौन-सी शक्तियाँ देता है?
सरफेसी अधिनियम का पूरा नाम वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 है। इसे सामान्यतः सरफेसी कानून कहा जाता है। इस कानून का उद्देश्य बैंकों और पात्र वित्तीय संस्थानों को कुछ निर्धारित परिस्थितियों में सुरक्षित ऋण की वसूली के लिए न्यायालय में सामान्य दीवानी मुकदमा दायर किए बिना गिरवी रखी संपत्ति के विरुद्ध कार्रवाई करने की व्यवस्था उपलब्ध कराना है। जब कोई व्यक्ति मकान, जमीन या दूसरी संपत्ति को ऋण की सुरक्षा के रूप में गिरवी रखता है और निर्धारित शर्तों के अनुसार ऋण चुकाने में चूक करता है, तो पात्र ऋणदाता कानून में निर्धारित प्रक्रिया अपनाकर उस संपत्ति पर अपने प्रतिभूति हित का प्रवर्तन कर सकता है। लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है। ऋणदाता की कानूनी पात्रता, ऋण खाते की स्थिति, बकाया राशि, नोटिस और संपत्ति पर कब्जा लेने की प्रक्रिया सभी वैधानिक शर्तों के अधीन हैं।
सरफेसी अधिनियम की धारा 13 के अंतर्गत पात्र सुरक्षित ऋणदाता निर्धारित शर्तें पूरी होने पर ऋणधारक को बकाया चुकाने के लिए 60 दिन का नोटिस जारी कर सकता है। निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं होने और अन्य कानूनी आवश्यकताएँ पूरी होने पर वह धारा 13(4) के अंतर्गत संपत्ति पर कब्जा लेने सहित कुछ उपाय अपना सकता है। धारा 14 के अंतर्गत मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट से संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने में सहायता माँगी जा सकती है। यह प्रक्रिया ऋणदाता को विशेष अधिकार देती है, इसलिए उसका उपयोग केवल उन्हीं परिस्थितियों में किया जा सकता है जिनकी कानून अनुमति देता है। यदि किसी संस्था को संबंधित ऋण के लिए यह विशेष अधिकार प्राप्त ही नहीं है, तो केवल ऋण बकाया होने के आधार पर सरफेसी कार्रवाई को वैध नहीं माना जा सकता।
20 लाख रुपये की सीमा कहाँ से आई?
इस विवाद को समझने के लिए केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं का महत्व है। वित्त मंत्रालय ने 24 फरवरी 2020 की अधिसूचना में निर्धारित पात्रता वाली गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को 50 लाख रुपये और उससे अधिक के सुरक्षित ऋणों के लिए सरफेसी कानून के अंतर्गत कार्रवाई की अनुमति देने का प्रावधान किया था। बाद में 12 फरवरी 2021 की अधिसूचना संख्या एस.ओ. 652(ई) द्वारा इस सीमा को घटाकर 20 लाख रुपये कर दिया गया। यह प्रावधान सभी बैंकों और प्रत्येक प्रकार की वित्तीय संस्था पर समान रूप से लागू होने वाला सार्वभौमिक नियम नहीं है। इसकी प्रयोज्यता संबंधित संस्था की कानूनी श्रेणी, अधिसूचना और अन्य लागू प्रावधानों पर निर्भर करती है।
आवास वित्त कंपनियों के संबंध में 17 जून 2021 की एक अन्य सरकारी अधिसूचना भी महत्वपूर्ण है। इसके अंतर्गत राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत पंजीकृत और कम से कम 100 करोड़ रुपये की परिसंपत्ति वाली आवास वित्त कंपनियों को सरफेसी कानून के उद्देश्य से वित्तीय संस्थान के रूप में अधिसूचित किया गया था। भारतीय रिजर्व बैंक ने 25 अगस्त 2021 के निर्देश में इस व्यवस्था का उल्लेख किया था। इन अधिसूचनाओं के परस्पर संबंध और आवास वित्त कंपनियों पर 20 लाख रुपये की न्यूनतम सीमा लागू होने का प्रश्न विभिन्न उच्च न्यायालयों के सामने भी आया है। इसलिए यह कहना कि भारत में किसी भी बैंक या वित्तीय संस्था द्वारा 20 लाख रुपये से कम के प्रत्येक गृह ऋण पर सरफेसी कानून लागू नहीं हो सकता, कानूनी स्थिति का अत्यधिक सरलीकरण होगा।
हाई कोर्ट ने आगरा के मामले में क्या पाया?
नुसरत खान और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि संबंधित गृह ऋण की राशि और लागू अधिसूचना के संदर्भ में सरफेसी कानून के अंतर्गत की गई कार्रवाई अधिकार क्षेत्र से बाहर प्रतीत होती है। इसी आधार पर अदालत ने मकान का कब्जा याचिकाकर्ताओं को लौटाने और अपर जिलाधिकारी के आदेश के प्रभाव को अगली सुनवाई तक निलंबित रखने का निर्देश दिया। यह अंतरिम आदेश है, इसलिए इसे पूरे विवाद का अंतिम न्यायिक निपटारा नहीं माना जाना चाहिए। अंतिम सुनवाई में संबंधित संस्था की कानूनी स्थिति, अधिसूचनाओं की प्रयोज्यता, ऋण की प्रकृति और पक्षकारों के तर्कों पर आगे विचार किया जा सकता है।
इस मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण अंतर भी समझना आवश्यक है। ऋण की मूल स्वीकृत राशि और कार्रवाई के समय बकाया सुरक्षित ऋण की राशि हमेशा समान नहीं होतीं। समय के साथ ब्याज, भुगतान, शुल्क और अन्य वैध समायोजन के कारण बकाया राशि बदल सकती है। इसलिए किसी मामले में 20 लाख रुपये की सीमा लागू होती है या नहीं, इसका निर्धारण करते समय संबंधित अधिसूचना में प्रयुक्त कानूनी शब्दों और कार्रवाई की प्रासंगिक तिथि पर देय राशि का परीक्षण आवश्यक हो सकता है। उपलब्ध समाचार में मूल गृह ऋण 17,67,718 रुपये बताया गया है, लेकिन कार्रवाई की प्रासंगिक तिथि पर कुल सुरक्षित बकाया और उसके न्यायिक परीक्षण का पूरा विवरण उपलब्ध नहीं है।
क्या कब्जा वापस मिलने से गृह ऋण माफ हो जाएगा?
अदालत द्वारा मकान का कब्जा लौटाने का आदेश दिए जाने का अर्थ यह नहीं है कि ऋणधारक का बकाया कर्ज समाप्त हो गया है। ऋण की वैधानिक देनदारी और उसकी वसूली के लिए अपनाई गई प्रक्रिया की वैधता दो अलग कानूनी प्रश्न हैं। यदि किसी वित्तीय संस्था ने गलत कानूनी प्रक्रिया अपनाई है, तो अदालत उस कार्रवाई को रोक सकती है या उसे अवैध घोषित कर सकती है। लेकिन इससे ऋण अनुबंध के अंतर्गत देय राशि स्वतः समाप्त नहीं होती। संबंधित संस्था अन्य उपलब्ध वैधानिक उपायों के माध्यम से वसूली का प्रयास कर सकती है, बशर्ते वह लागू कानून और न्यायिक आदेशों का पालन करे।
इसी प्रकार इस अंतरिम आदेश से यह निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा कि 20 लाख रुपये से कम के सभी गृह ऋणधारकों को किसी भी परिस्थिति में अपनी गिरवी संपत्ति खोने का जोखिम नहीं है। ऋण की वसूली के लिए विभिन्न कानूनों में अलग-अलग प्रक्रियाएँ उपलब्ध हो सकती हैं। ऋणदाता की प्रकृति और कानूनी पात्रता के अनुसार इन प्रक्रियाओं की प्रयोज्यता बदल सकती है। सरफेसी कानून के अंतर्गत की गई कार्रवाई पर रोक और ऋण की मूल देनदारी से मुक्ति को एक समान नहीं समझना चाहिए।
ऋणधारकों के अधिकार और वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही
सरफेसी कानून के अंतर्गत कार्रवाई होने पर ऋणधारकों के लिए कानूनी उपचार की व्यवस्था भी मौजूद है। सामान्यतः धारा 13(4) के अंतर्गत की गई कार्रवाई से प्रभावित व्यक्ति धारा 17 के अंतर्गत ऋण वसूली अधिकरण के समक्ष आवेदन कर सकता है। इसके लिए कानून में निर्धारित समयसीमा और प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। कुछ परिस्थितियों में उच्च न्यायालय का संवैधानिक अधिकार क्षेत्र भी विचारणीय हो सकता है, लेकिन वैकल्पिक वैधानिक उपचार उपलब्ध होने पर उच्च न्यायालय सामान्यतः उसके उपयोग को महत्व देते हैं। इसलिए किसी ऋणधारक के लिए उचित कानूनी मंच का निर्धारण उसके मामले की परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है।
इस मामले का व्यापक महत्व यह है कि वित्तीय संस्थानों को ऋण वसूली की शक्तियाँ देते समय कानून ने उनकी सीमाएँ भी निर्धारित की हैं। ऋणधारक की चूक से संस्था को वसूली का अधिकार मिल सकता है, लेकिन उस अधिकार का प्रयोग निर्धारित प्रक्रिया के भीतर ही होना चाहिए। दूसरी ओर, ऋणधारकों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे ऋण अनुबंध की शर्तों का पालन करें और भुगतान में कठिनाई होने पर संबंधित संस्था से समय रहते संपर्क करें। कानून का उद्देश्य ऋण वसूली को असंभव बनाना नहीं, बल्कि उसे वैधानिक और जवाबदेह प्रक्रिया के अंतर्गत संचालित करना है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का अंतरिम आदेश इसी सिद्धांत को रेखांकित करता है। अदालत ने फिलहाल आगरा के ऋणधारकों को उनके मकान का कब्जा लौटाने की राहत दी है और प्रशासनिक आदेश के प्रभाव पर रोक लगाई है। लेकिन अंतिम निर्णय के लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों और वित्तीय संस्था की पात्रता का विस्तृत परीक्षण महत्वपूर्ण रहेगा। इस प्रकरण से यह स्पष्ट होता है कि गृह ऋण की वसूली में केवल बकाया राशि ही नहीं, बल्कि ऋणदाता की कानूनी स्थिति और कार्रवाई की प्रक्रिया भी निर्णायक महत्व रखती है।


