Avimukteshwaranand Case में नया मोड़! इलाहाबाद HC ने आशुतोष ब्रह्मचारी को दिया बड़ा झटका, अवमानना याचिका खारिज

Avimukteshwaranand Case: अविमुक्तेश्वरानंद केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! आशुतोष ब्रह्मचारी की अवमानना याचिका खारिज, शंकराचार्य को मिली राहत। जानिए कोर्ट ने किन कानूनी आधारों पर सुनाया अहम फैसला और क्यों बढ़ा इस मामले का सस्पेंस।

Harsh Srivastava
Published on: 15 May 2026 4:50 PM IST
Avimukteshwaranand Case में नया मोड़! इलाहाबाद HC ने आशुतोष ब्रह्मचारी को दिया बड़ा झटका, अवमानना याचिका खारिज
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Avimukteshwaranand Case: उत्तर प्रदेश की न्यायिक और धार्मिक गलियारों में उस वक्त हलचल मच गई जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ दायर अवमानना याचिका पर अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। जस्टिस दिनेश पाठक की एकल पीठ ने शंकराचार्य और उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दायर अवमानना याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना का कोई ठोस मामला नहीं बनता है। इस फैसले के बाद शंकराचार्य के समर्थकों में खुशी की लहर है, जबकि याचिकाकर्ता को कानून की शरण में जाने की नई सलाह मिली है।

क्या था विवाद और क्यों पहुंची अदालत में अर्जी?

पूरा मामला नाबालिगों के साथ यौन शोषण और गंभीर लैंगिक अपराधों (POCSO) के आरोपों से जुड़ा है। यह अवमानना याचिका आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज द्वारा दायर की गई थी, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि शंकराचार्य और उनके शिष्य को फरवरी और मार्च 2026 में हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत मिली थी। जमानत देते समय कोर्ट ने सख्त निर्देश दिए थे कि आरोपी न्यायिक प्रक्रिया में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे और न ही गवाहों या पीड़ितों को प्रभावित करने की कोशिश करेंगे। हालांकि, याचिकाकर्ता का दावा था कि जमानत मिलने के तुरंत बाद दोनों धार्मिक नेताओं ने पीड़ितों के गृह जिलों में सार्वजनिक रैलियां और सभाएं शुरू कर दीं, जो सीधे तौर पर अदालती शर्तों का उल्लंघन है।

धमकी, साजिश और 'नाक काटने' पर इनाम का सनसनीखेज आरोप

याचिका में केवल अवमानना की बात ही नहीं थी, बल्कि इसमें कई रोंगटे खड़े कर देने वाले आरोप भी लगाए गए थे। आशुतोष महाराज ने कोर्ट को बताया कि सोशल मीडिया और मीडिया बयानों के जरिए यह प्रचार किया जा रहा है कि उनके खिलाफ मामले “सरकार के इशारे” पर दर्ज किए गए हैं। सबसे चौंकाने वाला दावा यह था कि आशुतोष महाराज की नाक काटने पर 21 लाख रुपये का इनाम घोषित किया गया और मार्च 2026 में उन पर चलती ट्रेन में जानलेवा हमला भी हुआ। इतना ही नहीं, याचिकाकर्ता ने पाकिस्तान के एक मोबाइल नंबर से बम विस्फोट में उड़ाने की धमकी मिलने की बात भी कोर्ट के सामने रखी, जिससे मामले में सुरक्षा और साजिश के एंगल ने सुर्खियां बटोरीं।

हाईकोर्ट का कड़ा रुख और न्याय की कानूनी व्याख्या

इन तमाम भारी-भरकम आरोपों और दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस दिनेश पाठक की पीठ ने कानून की बारीकियों पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के लिए जो आधार चाहिए, वे इस याचिका में नजर नहीं आते। कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि किसी पक्ष को लगता है कि जमानत की शर्तों का उल्लंघन किया जा रहा है, तो उसके लिए 'अवमानना याचिका' सही रास्ता नहीं है। इसके बजाय, संबंधित पक्ष को 'जमानत निरस्तीकरण' (Bail Cancellation) की याचिका दायर करनी चाहिए। इसी के साथ अदालत ने मामले को खत्म करते हुए याचिकाकर्ता को कानून के दायरे में अन्य विकल्पों का उपयोग करने की स्वतंत्रता दे दी।

धार्मिक और न्यायिक क्षेत्र में फैसले के मायने

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला धार्मिक जगत में शंकराचार्य की प्रतिष्ठा के नजरिए से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से चल रहे इस कानूनी विवाद ने समाज में भ्रम और निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए थे, जिसे कोर्ट ने फिलहाल विराम दे दिया है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया है कि न्यायिक प्रक्रिया अपनी जगह है और जमानत की शर्तों का पालन करना अनिवार्य है।

Harsh Srivastava

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