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Anukampa Niyukti: अनुकंपा नियुक्ति में मनमानी नहीं चलेगी! इलाहाबाद HC ने सरकारी शर्त पर उठाए सवाल
Anukampa Niyukti: अनुकंपा नियुक्ति पर इलाहाबाद और झारखंड हाईकोर्ट के अहम फैसले सामने आए हैं। इलाहाबाद HC ने नियुक्ति को मनमाने ढंग से अस्थायी बनाने वाली शर्त पर सवाल उठाए, जबकि झारखंड HC ने विवाहित बेटी के दावे को सिर्फ विवाह के आधार पर खारिज करने से इनकार किया।
Anukampa Niyukti (Image Credit-Social Media)
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी विभागों में मृतक आश्रित कोटे के तहत मिलने वाली नियुक्तियों को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने दो टूक स्पष्ट किया है कि अनुकंपा के आधार पर दी जाने वाली नौकरियां हमेशा स्वीकृत पदों पर नियमित और स्थायी प्रकृति की होती हैं। लिहाजा, नियुक्ति पत्र में यह लिखना कि ‘सेवा पूर्णतः अस्थायी है और इसे कभी भी समाप्त किया जा सकता है’, पूरी तरह गैरकानूनी और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ है।
यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने आगरा निवासी सपना सारस्वत की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया।
क्या था मामला: नियुक्ति पत्र में जोड़ी थी विवादित शर्त
याचिका पर कार्रवाई: हाईकोर्ट के 13 अगस्त के आदेश के बाद प्रशासन ने हलफनामा दाखिल कर बताया कि याची सपना सारस्वत को 27 अगस्त को नियुक्ति पत्र जारी कर दिया गया है।
अधिवक्ता की आपत्ति: याची के वरिष्ठ अधिवक्ता कमल कुमार केशरवानी ने अदालत के संज्ञान में लाया कि नियुक्ति पत्र की शर्त संख्या-1 में लिखा गया है—'यह नियुक्ति पूर्णतः अस्थायी है, जिसे बिना कोई कारण बताए या एक माह के नोटिस पर किसी भी समय समाप्त किया जा सकता है।'
अदालत की नाराजगी: कोर्ट ने इस पर गहरी हैरानी जताते हुए कहा कि पीठ यह समझने में असमर्थ है कि स्वीकृत पद पर मृतक आश्रित के रूप में दी गई सेवा में ऐसी मनमानी शर्त कैसे जोड़ी जा सकती है।
सरकारी 'फॉर्मेट' की खामी, शासन स्तर पर सुधरेगी व्यवस्था
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के अपर महाधिवक्ता अमित सक्सेना ने अदालत को बताया कि लगभग सभी सरकारी महकमों में नियुक्ति पत्र का एक पुराना और तयशुदा फॉर्मेट (ड्राफ्ट) चल रहा है, जिसके चलते यह शर्त स्वतः जुड़ गई।
संशोधित पत्र का वादा: सरकार ने अदालत को भरोसा दिलाया कि सपना सारस्वत के नियुक्ति पत्र से इस गैरकानूनी शर्त को फौरन हटाकर नया 'संशोधित नियुक्ति पत्र' जारी किया जाएगा।
नीतिगत बदलाव: अपर महाधिवक्ता ने आश्वासन दिया कि यह विसंगति मुख्य सचिव और शासन स्तर पर उठाई जाएगी, ताकि भविष्य में प्रदेश के किसी भी विभाग द्वारा जारी अनुकंपा नियुक्ति पत्र में ऐसी अवैध शर्त न जोड़ी जाए।
जिम्मेदार अधिकारी से मांगा व्यक्तिगत हलफनामा
अदालत ने सरकार के रुख को दर्ज करते हुए संबंधित सक्षम प्राधिकारी को अगली सुनवाई तक अपना व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि नियमित व स्वीकृत पद होने के बावजूद मृतक आश्रित की आजीविका पर ऐसी अस्थायी तलवार लटकाने वाली शर्त किस आधार पर लगाई गई थी।
दूसरी खबर: झारखंड हाईकोर्ट का शादीशुदा बेटियों के हक में फैसला
शादीशुदा बेटी भी अनुकंपा नियुक्ति की हकदार: झारखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला, 8 हफ्ते में नौकरी देने का आदेश
अदालत ने सीएमपीएफओ का आदेश किया रद्द; कहा—अगर बेटी दिवंगत कर्मचारी पर आर्थिक रूप से आश्रित थी, तो केवल विवाह के आधार पर नहीं छीना जा सकता अधिकार।
रांची:
झारखंड हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में लैंगिक समानता और मानवीय दृष्टिकोण को मजबूती देते हुए फैसला दिया है कि विवाहित बेटी को भी पिता की जगह नौकरी पाने का पूरा कानूनी अधिकार है। जस्टिस दीपक रोशन की एकल पीठ ने कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन (CMPFO) को निर्देश दिया है कि वह दिवंगत कर्मचारी की विवाहित बेटी को आठ सप्ताह के भीतर अनुकंपा पर नियुक्ति पत्र जारी करे।
वैवाहिक स्थिति आजीविका के अधिकार में बाधा नहीं
अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि अनुकंपा नियुक्ति का मूल उद्देश्य किसी कर्मचारी के निधन के बाद उसके परिवार को भुखमरी और तात्कालिक आर्थिक संकट से बचाना है।
अदालत ने टिप्पणी की कि यदि कोई बेटी अपने पिता के जीवनकाल में उन पर आर्थिक रूप से आश्रित थी या संकट के समय परिवार का सहारा बनने की स्थिति में है, तो केवल 'विवाहित' होने के आधार पर उसका दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
संस्थाओं द्वारा शादीशुदा बेटी को आश्रितों की सूची से बाहर रखना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 16 (अवसर की समानता) के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। इस आदेश के बाद कोयला क्षेत्र व अन्य उपक्रमों में आश्रित कोटे की राह देख रहीं विवाहित बेटियों को बड़ा संबल मिला है।


