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Lucknow News: राज्य कर विभाग में IAS तैनाती पर बढ़ा विवाद, GST अफसरों ने कहा- विशेषज्ञ संवर्ग को मिले प्राथमिकता
Lucknow News: जीएसटी अफसरों ने वरिष्ठ पदों पर विभागीय विशेषज्ञों को प्राथमिकता देने, कैडर पुनर्गठन और पदोन्नति व्यवस्था में बदलाव की मांग की।
राज्य कर विभाग में IAS तैनाती पर बढ़ा विवाद, GST अफसरों ने कहा- विशेषज्ञ संवर्ग को मिले प्राथमिकता (Photo- Social Media)
Lucknow News: उत्तर प्रदेश के राज्यकर विभाग में वरिष्ठ पदों पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारियों की तैनाती को लेकर विभागीय अधिकारियों में असंतोष बढ़ गया है। जीएसटी ऑफिसर्स सर्विस एसोसिएशन ने अपर आयुक्त ग्रेड-1 के पदों पर आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति पर सवाल उठाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलने का समय मांगने का निर्णय किया है। संगठन की मांग है कि इन पदों को विभागीय संवर्ग से पदोन्नति के जरिए भरा जाए और राज्यकर विभाग के पूरे कैडर का नए सिरे से पुनर्गठन किया जाए।
एसोसिएशन के नवनिर्वाचित अध्यक्ष विजय सिंह विसेन और महासचिव मनोज मिश्र का कहना है कि राज्यकर विभाग में अपर आयुक्त ग्रेड-1 के 22 पद स्वीकृत हैं और विभागीय सेवा नियमावली के अनुसार इन पदों पर विभाग के भीतर से पदोन्नति का प्रावधान है। संगठन का दावा है कि इसके बावजूद तीन आईएएस अधिकारियों को इन पदों पर तैनात किया गया है। इसी आधार पर एसोसिएशन संबंधित नियुक्तियों की समीक्षा और आदेश निरस्त करने की मांग उठा रहा है।
‘20-25 साल का अनुभव रखने वाले अफसरों को क्यों नहीं मौका?’
एसोसिएशन का तर्क है कि राज्यकर विभाग में बड़ी संख्या में ऐसे अधिकारी हैं जिन्हें कर प्रशासन, जांच, अपील, कर चोरी की पहचान और व्यापारी मामलों का 20 से 25 वर्ष तक का अनुभव है। संगठन का कहना है कि लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये के आसपास वार्षिक राजस्व से जुड़े विभाग में शीर्ष पदों पर नियुक्ति करते समय इस विशेषज्ञता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि कर प्रशासन सामान्य प्रशासन से अलग प्रकृति का काम है। इसमें कानून की व्याख्या, कर निर्धारण, अपील, डेटा विश्लेषण, इनपुट टैक्स क्रेडिट, ई-वे बिल, फर्जी फर्मों की पहचान और अंतरराज्यीय लेनदेन जैसी तकनीकी समझ की आवश्यकता होती है। ऐसे में लंबे समय से इसी क्षेत्र में काम कर रहे अधिकारियों की पदोन्नति का रास्ता सीमित होना असंतोष का कारण बन रहा है।
GST के बाद बदल चुका है विभाग का पूरा कामकाज
एक जुलाई 2017 से वस्तु एवं सेवा कर लागू होने के बाद राज्यकर विभाग का चरित्र तेजी से बदला है। पहले जहां विभाग का बड़ा हिस्सा भौतिक निरीक्षण, कागजी रिटर्न और स्थानीय कर निर्धारण पर आधारित था, वहीं अब व्यवस्था बड़े पैमाने पर डिजिटल हो चुकी है।
अधिकारियों को अब ई-वे बिल, ई-इनवॉइस, इनपुट टैक्स क्रेडिट, डेटा एनालिटिक्स, फर्जी फर्मों की पहचान, कर चोरी के डिजिटल पैटर्न और विभिन्न डेटाबेस के मिलान जैसे काम देखने पड़ते हैं। तकनीक ने कर प्रशासन को अधिक पारदर्शी बनाया है, लेकिन इसी के साथ अधिकारियों की जिम्मेदारी और विशेषज्ञता की जरूरत भी बढ़ी है।एसोसिएशन का कहना है कि जब विभाग का काम इतना व्यापक हो चुका है तो उसके पदों और जिम्मेदारियों का भी उसी अनुपात में पुनर्गठन होना चाहिए।
कैडर रीस्ट्रक्चरिंग की मांग क्यों?
संगठन का कहना है कि राज्यकर विभाग का मौजूदा कैडर ढांचा उस दौर की जरूरतों के अनुसार बना था जब कर प्रशासन आज जितना डिजिटल और डेटा आधारित नहीं था। GST के बाद काम का स्वरूप बदलने के बावजूद पदों की संख्या और पदोन्नति की संरचना उसी अनुपात में नहीं बदली।
एसोसिएशन चाहता है कि पूरे विभाग में यह अध्ययन कराया जाए कि किस स्तर पर कितने अधिकारियों की वास्तविक जरूरत है। इसके आधार पर नए पद सृजित हों, वरिष्ठ पदों की संख्या बढ़ाई जाए और पदोन्नति की समयबद्ध व्यवस्था बने। संगठन का तर्क है कि लंबी अवधि तक एक ही पद पर काम करने से न केवल अधिकारियों का मनोबल प्रभावित होता है, बल्कि विभाग में नेतृत्व की अगली पीढ़ी भी तैयार नहीं हो पाती।
PRS कैडर का दर्जा देने की मांग
एसोसिएशन ने राज्यकर अधिकारियों को प्रांतीय राजस्व सेवा (PRS) कैडर का दर्जा देने की मांग भी उठाई है। संगठन का मानना है कि राज्य की राजस्व व्यवस्था में उनकी भूमिका को देखते हुए एक स्पष्ट और सशक्त सेवा कैडर की आवश्यकता है। यदि ऐसा कैडर बनाया जाता है तो भर्ती, पदोन्नति, वरिष्ठता और उच्च पदों पर नियुक्ति की संरचना अधिक स्पष्ट हो सकती है। हालांकि इस मांग पर अंतिम निर्णय सरकार और कार्मिक विभाग के स्तर पर ही संभव होगा।
कार्यालयों में कंप्यूटर से लेकर वाहनों तक की कमी का मुद्दा
एसोसिएशन ने केवल पदोन्नति की बात नहीं उठाई है। उसका कहना है कि कई कार्यालयों और फील्ड इकाइयों में पर्याप्त कार्यस्थल, वाहन, कंप्यूटर, इंटरनेट और अन्य डिजिटल संसाधनों की कमी है।जब कर प्रशासन का बड़ा हिस्सा डिजिटल निगरानी और डेटा विश्लेषण पर निर्भर हो चुका है, तब धीमा इंटरनेट, पुराने कंप्यूटर या तकनीकी स्टाफ की कमी सीधे विभाग की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है।
फील्ड अधिकारियों के लिए वाहन और जांच से जुड़े संसाधनों की जरूरत भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि कर चोरी और फर्जी फर्मों की जांच केवल ऑनलाइन डेटा देखकर पूरी नहीं होती; कई मामलों में भौतिक सत्यापन भी जरूरी होता है।
दंडात्मक कार्रवाई और प्रतिकूल प्रविष्टियों की समीक्षा भी मांगी
संगठन ने वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 में कुछ अधिकारियों के खिलाफ हुई कथित दंडात्मक कार्रवाई और प्रतिकूल प्रविष्टियों की भी समीक्षा की मांग की है। एसोसिएशन का आरोप है कि कुछ मामलों में कार्रवाई परिस्थितियों और उपलब्ध संसाधनों के अनुपात में कठोर रही।
हालांकि इन मामलों की वास्तविक स्थिति विभागीय रिकॉर्ड और जांच से ही स्पष्ट होगी। संगठन चाहता है कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष समीक्षा कर यह देखा जाए कि कार्रवाई तथ्य और नियमों के अनुरूप थी या नहीं।
मुख्यमंत्री के सामने रखेंगे पूरा एजेंडा
एसोसिएशन अब मुख्यमंत्री से समय लेकर एक व्यापक ज्ञापन सौंपने की तैयारी में है। इसमें आईएएस तैनाती, कैडर पुनर्गठन, पदोन्नति, संसाधन, PRS कैडर और अनुशासनात्मक मामलों की समीक्षा जैसी मांगें शामिल होंगी। संगठन की रणनीति यह है कि विवाद को केवल किसी एक नियुक्ति तक सीमित न रखा जाए, बल्कि राज्यकर विभाग की पूरी सेवा संरचना पर सरकार से निर्णय कराया जाए।
मामला केवल पद का नहीं, विशेषज्ञता बनाम सामान्य प्रशासन का भी
यह विवाद एक बड़े प्रशासनिक प्रश्न को भी सामने लाता है—क्या अत्यधिक तकनीकी और विशेषज्ञ विभागों के शीर्ष पदों पर सामान्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की तैनाती अधिक उपयोगी है या लंबे समय से उसी क्षेत्र में काम कर रहे विभागीय अधिकारियों को नेतृत्व का अवसर मिलना चाहिए?
आईएएस अधिकारियों के पक्ष में तर्क यह होता है कि वे विभिन्न विभागों में काम करने का व्यापक प्रशासनिक अनुभव लेकर आते हैं और बड़े स्तर पर समन्वय, नीति निर्माण और शासन से जुड़ी जिम्मेदारियां संभाल सकते हैं। दूसरी ओर विभागीय अधिकारी विशेषज्ञता, निरंतरता और कर कानून की गहरी समझ को अपनी ताकत बताते हैं।
इसलिए यह बहस केवल व्यक्ति या कैडर की नहीं, बल्कि प्रशासनिक नेतृत्व और तकनीकी विशेषज्ञता के बीच सही संतुलन की भी है।
GST व्यवस्था जितनी डिजिटल हुई, मानव विशेषज्ञता उतनी ही अहम
तकनीक ने कर प्रशासन को तेजी से बदला है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा एनालिटिक्स और विभिन्न डेटाबेस से संदिग्ध लेनदेन पहचानना आसान हुआ है, लेकिन अंतिम निर्णय अब भी प्रशिक्षित अधिकारियों को ही लेना पड़ता है।फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट, बोगस फर्म, शेल कंपनियों और जटिल कारोबारी लेनदेन की जांच में कानून, अकाउंटिंग और डेटा—तीनों की समझ चाहिए। इसलिए विभागीय अधिकारी मानते हैं कि भविष्य के राज्यकर प्रशासन में तकनीक और विशेषज्ञ मानव संसाधन दोनों समान रूप से महत्वपूर्ण होंगे।


