राम मंदिर का CEO बन सकता है कोई पूर्व सैन्य अधिकारी, रेस में चार दिग्गज, एक ब्रिगेडियर का 3 घंटे चला इंटरव्यू

Ram Mandir CEO Interview: राम मंदिर के पहले पूर्णकालिक CEO की नियुक्ति को लेकर रेस अब बेहद दिलचस्प हो गई है। 5,300 से ज्यादा आवेदनों में से चुने गए अंतिम 18 उम्मीदवारों में 4 पूर्व सैन्य अधिकारी शामिल हैं। एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर का इंटरव्यू करीब 3 घंटे तक चला।

Yogesh Mishra
Published on: 12 Aug 2026 9:49 PM IST (Updated on: 12 Aug 2026 9:49 PM IST)
राम मंदिर का CEO बन सकता है कोई पूर्व सैन्य अधिकारी, रेस में चार दिग्गज, एक ब्रिगेडियर का 3 घंटे चला इंटरव्यू
X

Ram Mandir CEO Interview: श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की भावी प्रशासनिक व्यवस्था में पहली बार किसी पूर्व सैन्य अधिकारी को मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी CEO की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिल सकती है। इस संभावना को इसलिए मजबूत माना जा रहा है क्योंकि 5,300 से अधिक आवेदनों में से अंतिम साक्षात्कार के लिए चुने गए 18 उम्मीदवारों में चार पूर्व सैन्य अधिकारी शामिल हैं। मंगलवार को सैन्य पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों ने चयन समिति के सामने अपना विजन रखा और बुधवार को एक सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर का साक्षात्कार करीब तीन घंटे तक चला। हालांकि ट्रस्ट ने सैन्य उम्मीदवारों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं।लेकिन चयन प्रक्रिया में उनकी मजबूत मौजूदगी ने यह संभावना खोल दी है कि राम मंदिर के पहले पूर्णकालिक पेशेवर सीईओ की कमान किसी ऐसे अधिकारी को दी जा सकती है, जिसने सेना में बड़े संगठन, सुरक्षा, मानव संसाधन और अनुशासन का प्रबंधन किया हो।

चयन की दूसरी दिलचस्प बात यह है कि अंतिम 18 उम्मीदवारों में दक्षिण भारत के प्रतिष्ठित मंदिरों में वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर काम कर चुके अधिकारी भी शामिल हैं। इससे साफ है कि ट्रस्ट केवल नौकरशाही या सेना का अनुभव नहीं देख रहा। बल्कि ऐसे लोगों को भी परख रहा है जिन्हें बड़े धार्मिक संस्थान, लाखों श्रद्धालु, दान व्यवस्था और मंदिर प्रशासन संभालने का व्यावहारिक अनुभव हो। फिलहाल दक्षिण भारत से जुड़े सैन्य उम्मीदवार का कोई प्रमाणित नाम सार्वजनिक नहीं हुआ है। इसलिए नामों को लेकर गोपनीयता बनी हुई है।

राम मंदिर में यह प्रशासनिक बदलाव ऐसे समय हो रहा है जब एक तरफ नए पूर्णकालिक सीईओ की तलाश अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। दूसरी तरफ ट्रस्ट के पूर्णकालिक महासचिव के नाम पर अभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के बीच अंतिम सहमति नहीं बन सकी है। दोनों पद अलग-अलग हैं।लेकिन आने वाले समय में राम मंदिर की प्रशासनिक संरचना इन्हीं दो पदों के इर्द-गिर्द काफी हद तक व्यवस्थित होगी। सीईओ रोजमर्रा के प्रशासन, प्रबंधन, सुरक्षा समन्वय, कर्मचारियों और संस्थागत व्यवस्था को संभालेगा, जबकि महासचिव ट्रस्ट के शीर्ष संगठनात्मक और नीतिगत पदों में बना रहेगा। सीईओ को महासचिव के अधीन काम करना होगा।

सेना के अधिकारी की संभावना क्यों हुई मजबूत

राम मंदिर सामान्य धार्मिक स्थल से बहुत आगे बढ़कर एक विशाल धार्मिक-प्रशासनिक परिसर बन चुका है। प्रतिदिन हजारों श्रद्धालुओं की आवाजाही, बड़े पर्वों पर लाखों लोगों की भीड़, सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय, कर्मचारियों का प्रबंधन, दान और संपत्ति की निगरानी, तकनीकी व्यवस्था, तीर्थयात्री सुविधाएं और केंद्र तथा राज्य सरकार की अनेक एजेंसियों से तालमेल—इन सबके लिए ऐसा व्यक्ति चाहिए जिसे बड़े और संवेदनशील संस्थान के संचालन का अनुभव हो।

यही कारण है कि पूर्व सैन्य अधिकारियों की मौजूदगी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सेना में वरिष्ठ अधिकारी बड़े मानव संसाधन, जटिल लॉजिस्टिक्स, सुरक्षा, संसाधन प्रबंधन, संकट नियंत्रण और अनुशासित प्रशासन का अनुभव रखते हैं। राम मंदिर जैसे संस्थान में इन्हीं क्षमताओं की बड़ी जरूरत है।चार पूर्व सैन्य अधिकारियों का अंतिम 18 में पहुंचना अपने आप में संकेत है कि चयन समिति सैन्य अनुभव को गंभीरता से देख रही है।

एक ब्रिगेडियर से तीन घंटे सवाल-जवाब

बुधवार को एक पूर्व ब्रिगेडियर सुबह करीब 10:32 बजे राम मंदिर के आद्य शंकराचार्य द्वार से परिसर में दाखिल हुए। वह महत्वपूर्ण दस्तावेजों के साथ पहुंचे थे। उनका साक्षात्कार करीब तीन घंटे तक चला। बाहर आने के बाद उन्होंने मीडिया से कोई बातचीत नहीं की। ट्रस्ट की ओर से भी उनका नाम सार्वजनिक नहीं किया गया।

सामान्य तौर पर पहले दिन उम्मीदवारों के साक्षात्कार 25 से 50 मिनट तक चलने की खबरें सामने आई थीं। ऐसे में एक पूर्व ब्रिगेडियर से लगभग तीन घंटे तक बातचीत होना स्वाभाविक रूप से ध्यान खींचता है। हालांकि केवल इंटरव्यू की अवधि से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उनका चयन लगभग तय है।लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि उनकी उम्मीदवारी पर चयन समिति ने विस्तार से विचार किया।

दक्षिण भारत के मंदिरों का अनुभव भी ट्रस्ट की नजर में

18 उम्मीदवारों में दक्षिण भारत के बड़े मंदिरों में वरिष्ठ जिम्मेदारी निभा चुके कुछ लोग भी शामिल हैं। उनके नाम फिलहाल सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। यह पहलू बेहद महत्वपूर्ण है। दक्षिण भारत के कई बड़े मंदिर प्रतिदिन भारी संख्या में श्रद्धालुओं, बड़े दान, प्रसाद वितरण, कतार प्रबंधन, आवास, सुरक्षा और विशाल कर्मचारी तंत्र का संचालन करते हैं। ऐसे संस्थानों के प्रशासन का अनुभव राम मंदिर के लिए उपयोगी हो सकता है।इसलिए सीईओ पद की असली प्रतिस्पर्धा मोटे तौर पर तीन तरह के अनुभवों के बीच दिखाई देती है—सिविल प्रशासन, सुरक्षा एवं सैन्य प्रबंधन और बड़े धार्मिक संस्थानों का प्रत्यक्ष संचालन।

रेस में पूर्व डीएम, पूर्व IPS और सेना के अधिकारी

सार्वजनिक रूप से जिन उम्मीदवारों के नाम सामने आए हैं उनमें पूर्व IPS अधिकारी राजेश पांडेय, जौनपुर के पूर्व जिलाधिकारी दिनेश चंद्र, अयोध्या के पूर्व जिलाधिकारी योगेश्वर राम मिश्रा और समीर पांड्या शामिल हैं। राजेश पांडेय अपने लंबे पुलिस करियर और संगठित अपराध के खिलाफ अभियानों के कारण ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के रूप में चर्चित रहे हैं।

योगेश्वर राम मिश्रा की दावेदारी अलग कारण से महत्वपूर्ण है। वह अयोध्या के जिलाधिकारी रह चुके हैं, इसलिए शहर की धार्मिक संवेदनशीलता, बड़े आयोजनों, सुरक्षा, प्रशासन और स्थानीय संस्थाओं के साथ समन्वय का प्रत्यक्ष अनुभव उनके पास है।

दूसरी तरफ सेना के उम्मीदवार सुरक्षा, संगठन और अनुशासन का अनुभव लेकर आए हैं। इसलिए अंतिम चयन में केवल पद और वरिष्ठता नहीं।बल्कि ट्रस्ट यह देखेगा कि किस उम्मीदवार का अनुभव भविष्य के राम मंदिर प्रशासन के लिए सबसे बेहतर बैठता है।

भगवान राम में आस्था से लेकर शराब और भोजन तक सवाल

सीईओ के इंटरव्यू केवल प्रशासनिक ज्ञान तक सीमित नहीं हैं। उम्मीदवारों से यह भी पूछा गया कि भगवान राम में उनकी आस्था कैसी है।वे जनेऊ पहनते हैं या नहीं। शाकाहारी हैं या मांसाहारी। शराब का सेवन करते हैं या नहीं और हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों की उनकी समझ कितनी है।

इसके साथ नेतृत्व क्षमता, धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं से जुड़ाव, कर्मचारियों का प्रबंधन, श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और राम मंदिर के भविष्य को लेकर उनकी कार्ययोजना भी पूछी जा रही है।इससे साफ है कि ट्रस्ट एक सामान्य कॉरपोरेट सीईओ नहीं खोज रहा। पद के लिए पेशेवर प्रशासनिक क्षमता के साथ धार्मिक संस्था के चरित्र के अनुरूप जीवनशैली और दृष्टिकोण को भी महत्व दिया जा रहा है।

चयन समिति में भी सेना का प्रतिनिधित्व

सीईओ का चयन करने वाली तीन सदस्यीय समिति में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस प्रमोद कोहली, पूर्व परमाणु वैज्ञानिक और शिरडी साईं बाबा संस्थान के पूर्व अध्यक्ष सुरेश हवारे तथा सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल विष्णुकांत चतुर्वेदी शामिल हैं। यानी चयन समिति में न्यायिक अनुभव, धार्मिक संस्था के प्रबंधन का अनुभव और सैन्य प्रशासन—तीनों मौजूद हैं। यही मिश्रण इस चयन की प्रकृति को भी स्पष्ट करता है।

समिति सभी 18 उम्मीदवारों में से तीन नाम अंतिम पैनल के रूप में ट्रस्ट को देगी। इसके बाद ट्रस्ट किसी एक को सीईओ नियुक्त करेगा। दो सितंबर की प्रस्तावित ट्रस्ट बैठक में अंतिम फैसला और नाम की घोषणा होने की संभावना है।

CEO के साथ महासचिव का सवाल भी अनसुलझा

राम मंदिर प्रशासन की दूसरी बड़ी नियुक्ति पूर्णकालिक महासचिव की है। पूर्व महासचिव चंपत राय के इस्तीफे के बाद संघ पृष्ठभूमि वाले पूर्व भारतीय विदेश सेवा अधिकारी कृष्णमोहन को अंतरिम जिम्मेदारी दी गई है। अब स्थायी महासचिव के नाम पर मंथन चल रहा है।इस पद के लिए चंपत राय की सम्मानजनक वापसी की चर्चा के साथ कृष्णमोहन और विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री बजरंग लाल बागड़ा सहित कुछ दूसरे नाम भी चर्चा में बताए जा रहे हैं।हालांकि अभी किसी नाम पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।

संघ और विहिप दोनों साध रहे संतों की राय

महासचिव के चयन को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष पदाधिकारियों की अयोध्या में सक्रियता बढ़ी है। विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार, संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्णगोपाल और विहिप के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री बजरंग लाल बागड़ा की अयोध्या में मौजूदगी तथा संतों से बातचीत को इसी प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि महासचिव का नाम केवल ट्रस्ट की प्रशासनिक सुविधा के आधार पर नहीं बल्कि संतों, संघ और विहिप के बीच व्यापक सहमति से तय किया जाएगा।यहां सीईओ और महासचिव चयन की प्रक्रिया का फर्क भी साफ दिखाई देता है। सीईओ का चुनाव आवेदन, शॉर्टलिस्टिंग और पेशेवर इंटरव्यू से हो रहा है, जबकि महासचिव का पद संगठनात्मक सहमति और ट्रस्ट के भीतर निर्णय से भरा जाएगा।

चंपत राय की वापसी की चर्चा क्यों

चंपत राय लंबे समय तक राम मंदिर आंदोलन और फिर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के प्रमुख संगठनात्मक चेहरों में रहे हैं। मंदिर निर्माण से लेकर संतों, विहिप और संघ के साथ उनके लंबे संबंध हैं।दान-चढ़ावा प्रकरण के बाद उन्होंने महासचिव पद से इस्तीफा दिया था और छह जुलाई को ट्रस्ट ने इस्तीफा स्वीकार कर लिया। लेकिन अब संतों के एक हिस्से में उनकी सम्मानपूर्वक वापसी की चर्चा है।

इसके पीछे तर्क यह बताया जा रहा है कि मंदिर आंदोलन और ट्रस्ट की संस्थागत स्मृति से उनका जुड़ाव बहुत गहरा है। दूसरी तरफ प्रशासन को नए और अधिक पारदर्शी ढांचे में ले जाने की जरूरत के कारण नया चेहरा लाने का मत भी मौजूद है।यही खींचतान फैसले में देरी की एक वजह मानी जा रही है।

कृष्णमोहन ने संभाली अंतरिम व्यवस्था

पूर्व IFS अधिकारी कृष्णमोहन को अंतरिम महासचिव बनाए जाने के बाद ट्रस्ट की संपत्ति और दान व्यवस्था की समीक्षा में उनकी सक्रिय भूमिका सामने आई है। वह बैंक लॉकर में रखे रामलला को दान में मिले स्वर्ण और आभूषणों के सत्यापन सहित प्रशासनिक कामों में सक्रिय रहे हैं।उनकी कार्यशैली और वर्तमान जिम्मेदारी के कारण स्थायी महासचिव पद के लिए उनका नाम भी मजबूत दावेदारों में गिना जा रहा है।

दान प्रकरण ने बदल दी मंदिर प्रशासन की पूरी दिशा

राम मंदिर में दान-चढ़ावे से जुड़ी कथित गड़बड़ियों की जांच ने ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे पर बड़ा असर डाला है। पूर्व महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र ने इस्तीफा दिया और मंदिर व्यवस्थापक गोपाल राव को हटाया गया। मामले की जांच विशेष जांच दल कर रहा है। हाल में ट्रस्ट कार्यालय में भी अभिलेखों और काउंटर से जुड़े रिकॉर्ड की जांच किए जाने की जानकारी सामने आई है।यह ध्यान रखना जरूरी है कि जांच चल रही है और किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप या प्रशासनिक इस्तीफा अपने आप आपराधिक दोष सिद्ध नहीं करता।लेकिन इस पूरे प्रकरण ने एक सवाल जरूर खड़ा किया—इतने बड़े धार्मिक संस्थान की रोजमर्रा की व्यवस्था क्या केवल परंपरागत ट्रस्ट ढांचे से चलाई जानी चाहिए या इसके साथ पेशेवर प्रबंधन भी होना चाहिए?इसी सवाल का उत्तर नया पूर्णकालिक सीईओ पद है।

सुभाष के खाते में मिले पांच लाख पर नई जानकारी

चढ़ावा मामले में जांच का एक पहलू आरोपित पूर्व बैंककर्मी सुभाषचंद्र श्रीवास्तव के पेंशन खाते में आई पांच लाख रुपये की राशि से जुड़ा था। पुलिस की पड़ताल में सामने आया है कि छह मार्च को पेंशन खाते में पहुंचे पांच लाख रुपये किसी बाहरी व्यक्ति ने नहीं बल्कि सुभाष के ही दूसरे बैंक खाते से स्थानांतरित किए थे।एक दूसरे पांच लाख रुपये के चेक के संबंध में भी बताया गया कि वह बैंक में प्रस्तुत हुआ लेकिन वापस हो गया और रकम खाते में जमा नहीं हुई।यदि बैंक रिकॉर्ड से यही स्थिति अंतिम रूप से पुष्ट होती है तो इन दो लेनदेन को संदिग्ध बाहरी भुगतान के रूप में देखने का आधार कमजोर हो सकता है। हालांकि पूरे प्रकरण में उनकी भूमिका का अंतिम निर्धारण जांच के बाकी साक्ष्यों से होगा।

राम मंदिर में अब दोहरी व्यवस्था

राम मंदिर का नया प्रशासनिक मॉडल बनने के बाद ट्रस्ट नीति, धार्मिक दिशा और बड़े फैसले करेगा, जबकि पूर्णकालिक सीईओ रोजमर्रा के संचालन को पेशेवर ढंग से संभालेगा। सीईओ महासचिव के अधीन काम करेगा। यही वजह है कि दो सितंबर की बैठक सामान्य बैठक नहीं होगी। इसमें यदि सीईओ और महासचिव दोनों पदों पर तस्वीर स्पष्ट होती है तो राम मंदिर के प्रशासन का एक नया अध्याय शुरू होगा।

एक तरफ महासचिव के लिए संघ, विहिप और संतों के बीच स्वीकार्य व्यक्ति की तलाश है। दूसरी तरफ सीईओ के लिए पूर्व IAS, IPS, सेना और बड़े मंदिरों के अनुभवी प्रशासकों के बीच बाकायदा पेशेवर चयन हो रहा है।

क्या किसी जनरल या ब्रिगेडियर के हाथ जाएगी कमान?

फिलहाल इसका निश्चित उत्तर नहीं है, लेकिन पहली बार यह संभावना गंभीर दिखाई दे रही है। चार पूर्व सैन्य अधिकारियों का अंतिम दौर में पहुंचना, चयन समिति में पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल का होना और एक पूर्व ब्रिगेडियर से करीब तीन घंटे तक विस्तृत साक्षात्कार—ये संकेत बताते हैं कि सैन्य पृष्ठभूमि को केवल औपचारिक प्रतिनिधित्व नहीं माना जा रहा।यदि किसी पूर्व सैन्य अधिकारी का चयन होता है तो यह राम मंदिर प्रशासन में दिलचस्प बदलाव होगा। धार्मिक और नीतिगत नेतृत्व ट्रस्ट तथा महासचिव के हाथ रहेगा, लेकिन प्रतिदिन लाखों लोगों से जुड़ने वाली व्यवस्था में सेना जैसा अनुशासन, सुरक्षा प्रबंधन और कमांड प्रणाली लाने का प्रयोग किया जा सकता है।

दूसरी तरफ यदि दक्षिण भारत के किसी बड़े मंदिर के अनुभवी प्रशासक को चुना जाता है तो ट्रस्ट तिरुपति जैसे विशाल धार्मिक परिसरों के प्रबंधन अनुभव से लाभ लेने की दिशा चुन सकता है। और यदि किसी पूर्व IAS या IPS को चुना जाता है तो सरकारी प्रशासन और कानून-व्यवस्था का लंबा अनुभव निर्णायक माना जाएगा।

इसलिए राम मंदिर के पहले सीईओ की दौड़ अब केवल ‘कौन अधिकारी’ की नहीं है। असली मुकाबला तीन प्रशासनिक मॉडलों के बीच है—नौकरशाही का अनुभव, सेना का अनुशासन या बड़े मंदिर का प्रत्यक्ष प्रबंधन। दो सितंबर को ट्रस्ट इनमें से किस मॉडल पर भरोसा करता है, उससे आने वाले वर्षों के राम मंदिर प्रशासन की दिशा तय हो सकती है।

Yogesh Mishra
ABOUT THE AUTHOR

Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

Next Story