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राम मंदिर से पहले काशी विश्वनाथ में हुआ था बड़ा कांड! 43 साल पुराना वो वाकया, जब एक चोरी ने बदल दिया था पूरा सिस्टम
Kashi Vishwanath Theft: राम मंदिर में दान विवाद के बीच 1983 में काशी विश्वनाथ मंदिर में हुई ऐतिहासिक चोरी फिर चर्चा में है। जानिए कैसे उस घटना के बाद मंदिर प्रबंधन पूरी तरह बदल गया और अब अयोध्या में भी सीईओ मॉडल लागू करने की तैयारी हो रही है।
Kashi Vishwanath Theft: अयोध्या का भव्य राम मंदिर इन दिनों दान राशि में हुई कथित हेराफेरी के चलते खबरों में बना हुआ है। 'राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट' पर लगे इन आरोपों ने मंदिर के दैनिक रिकॉर्ड, नए कर्मचारियों की भर्ती और सुरक्षा प्रबंधों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस प्रशासनिक अव्यवस्था से निपटने के लिए अब ट्रस्ट ने एक बहुत बड़ा और ठोस फैसला लिया है। मंदिर के रोजमर्रा के कामकाज को पूरी तरह पेशेवर और पारदर्शी बनाने के लिए अब एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ की नियुक्ति की जाएगी, जिसके लिए 3 सदस्यों की एक विशेष समिति का गठन भी कर दिया गया है।
काशी की वो ऐतिहासिक चोरी
दिलचस्प बात यह है कि देश के कुछ अन्य विख्यात धर्मस्थलों जैसे ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर या जम्मू के वैष्णो देवी मंदिर के विपरीत, अयोध्या के इस मंदिर की व्यवस्था कोई सरकारी बोर्ड नहीं संभालता है। लेकिन हालिया विवाद ने लोगों को 43 साल पुरानी एक ऐसी सनसनीखेज घटना की याद दिला दी है, जिसने उत्तर प्रदेश के ही एक और बेहद प्रतिष्ठित मंदिर का पूरा इतिहास और उसका प्रबंधन हमेशा के लिए बदलकर रख दिया था। यह कहानी वाराणसी के विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी है, जहां हुई एक रहस्यमयी घटना ने पूरे देश को चौंका दिया था।
बिना ताला टूटे गायब हुआ था सोना
बात 5 जनवरी 1983 की है जब काशी विश्वनाथ मंदिर के भीतर एक ऐसी चोरी हुई जिसने सबको हिला दिया। शातिर चोरों ने मंदिर के पवित्र गर्भगृह में सेंध लगाकर वहां से करीब 2.55 किलोग्राम खरा सोना, 6 से 9 किलोग्राम चांदी के कीमती आभूषण और अन्य बहुमूल्य सामान साफ कर दिया था। इस पूरी घटना में सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह थी कि मंदिर के लोहे के भारी ग्रिल वाले दरवाजे पूरी तरह खुले हुए थे।
जांच और दोषियों को कड़ा दंड
घटनास्थल की जांच के दौरान पुलिस को कहीं भी ताला टूटने या मुख्य किवाड़ को जबरन काटने के कोई निशान नहीं मिले थे। उस रात वहां मुस्तैद दो पुजारियों ने पुलिस को बताया कि वे गहरी नींद में सो रहे थे और उन्हें भनक तक नहीं लगी। हालांकि, पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए कुछ ही समय में चोरी की गई सारी संपत्ति बरामद कर ली और इस अपराध में शामिल 11 आरोपियों को धर दबोचा। इसके बाद साल 2000 में एक स्थानीय अदालत ने सभी दोषियों को सख्त सजा सुनाई।
अध्यादेश से बदला सदियों पुराना नियम
इस सुरक्षा चूक ने तत्कालीन राज्य सरकार के भीतर खलबली मचा दी थी। घटना के कुछ ही हफ्तों के भीतर, उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने एक विशेष अध्यादेश जारी कर दिया। यही सरकारी अध्यादेश आगे चलकर 'उत्तर प्रदेश काशी विश्वनाथ मंदिर अधिनियम, 1983' के नाम से एक मजबूत कानून बना। इस ऐतिहासिक कानून के लागू होते ही काशी विश्वनाथ मंदिर का पूरा प्रबंधन वहां के पारंपरिक महंतों के हाथों से हमेशा के लिए छीन लिया गया और उसे एक सरकारी ट्रस्ट के अधीन कर दिया गया।
सरकारी अधिकारी के हाथ में कमान
मौजूदा दौर में इस पावन धाम का पूरा संचालन 'श्री काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट' के जिम्मे है। इस नियम के तहत किसी आईएएस या पीसीएस स्तर के वरिष्ठ अधिकारी को ही मंदिर का मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी सीईओ नियुक्त किया जाता है। वर्तमान समय में इस पद की जिम्मेदारी विश्वभूषण मिश्रा संभाल रहे हैं। मंदिर परिसर की सुरक्षा व्यवस्था, बड़े त्योहारों का आयोजन, वित्तीय निर्णय और पूरा ढांचा इसी सीईओ के आस पास घूमता है, जो हर छोटे बड़े खर्च का पूरा लेखा जोखा मुख्य बोर्ड के सामने पेश करता है।
अयोध्या का नया कॉर्पोरेट मॉडल
दूसरी तरफ, फरवरी 2020 में अस्तित्व में आए अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट का ढांचा बिल्कुल अलग है। इसके प्रमुख महंत नृत्य गोपाल दास हैं, जबकि मुख्य चेहरों में पूर्व महासचिव चंपत राय शामिल थे, जिन्होंने हालिया विवाद के बाद इस्तीफा दे दिया। इस ट्रस्ट में कभी कोई फुल टाइम सीईओ तैनात नहीं रहा। मंदिर के प्रशासनिक काम ट्रस्टी खुद आपस में बांटकर संभालते आए हैं, जिनमें से बहुत से लोग संघ और विश्व हिंदू परिषद से जुड़े हैं। लेकिन अब दान में हुई गड़बड़ी के बाद, राम मंदिर ट्रस्ट भी काशी की तरह एक प्रोफेशनल एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम अपनाने की राह पर चल पड़ा है, ताकि भविष्य में ऐसी किसी भी लापरवाही को हमेशा के लिए रोका जा सके।


