Samajwadi Party History: सपा का इतिहास... मुलायम से अखिलेश तक, PDA रणनीति और 2027 की तैयारी

Samajwadi Party Political History: जानिए समाजवादी पार्टी की पूरी राजनीतिक यात्रा। मुलायम सिंह यादव के समाजवादी आंदोलन, सपा के गठन, सरकारों, चुनावी प्रदर्शन, गठबंधनों, परिवारिक संघर्ष, PDA रणनीति और 2027 की तैयारी तक का विस्तृत विश्लेषण।

Yogesh Mishra
Published on: 8 Aug 2026 6:20 PM IST
Samajwadi Party History: सपा का इतिहास... मुलायम से अखिलेश तक, PDA रणनीति और 2027 की तैयारी
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Samajwadi Party History in HIndi: समाजवादी पार्टी की यात्रा उत्तर प्रदेश की राजनीति में मंडल आंदोलन, पिछड़ी जातियों की सत्ता में हिस्सेदारी, मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व, किसान राजनीति, क्षेत्रीय दलों के उभार और एक ही राजनीतिक परिवार के भीतर हुए पीढ़ीगत संघर्ष—इन सभी की संयुक्त कहानी है। 1992 में गठित यह पार्टी केवल तीन दशक में उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनाने, दो नेताओं—मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव—को मुख्यमंत्री बनाने, केंद्र में रक्षा मंत्रालय सँभालने, लोकसभा में 36 और फिर 37 सांसदों तक पहुँचने तथा देश की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों में शामिल होने में सफल रही।

पार्टी ने अपने इतिहास में बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल, राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और अनेक छोटे बड़े दलों के साथ चुनावी समझौते किए। कभी उसने कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन दिया। कभी तीसरे मोर्चे की राजनीति की और 2024 में कांग्रेस के साथ इंडिया गठबंधन में चुनाव लड़कर उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को बड़ी चुनौती दी। दूसरी ओर, 1995 में बसपा से हिंसक टकराव, अमर सिंह और आजम खान के निष्कासन, मुलायम–अखिलेश–शिवपाल संघर्ष और 2017 में चुनाव चिह्न तक पहुँचे पारिवारिक विवाद ने पार्टी को कई बार विभाजन के मुहाने पर भी खड़ा किया।

अगस्त 2026 की स्थिति में समाजवादी पार्टी के 37 लोकसभा सांसद हैं। वह 18वीं लोकसभा की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के 2022 के चुनाव में पार्टी ने 111 सीटें जीती थीं। उपचुनावों, इस्तीफों, मृत्यु और राजनीतिक बदलावों के बाद विधानसभा की वर्तमान पार्टी-स्थिति में उसकी संख्या लगभग 100 दर्ज है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद में उसके 10 सदस्य हैं। राज्यसभा में पार्टी के प्रमुख वर्तमान सदस्यों में रामगोपाल यादव, जया बच्चन, जावेद अली खान और रामजीलाल सुमन शामिल हैं।

समाजवादी राजनीति की पृष्ठभूमि; कांग्रेस-विरोधी समाजवाद से समाजवादी पार्टी तक

समाजवादी पार्टी अचानक पैदा हुई संस्था नहीं थी। उसकी वैचारिक और संगठनात्मक जड़ें आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, राजनारायण, चरण सिंह और उत्तर भारत के गैर-कांग्रेसी समाजवादी आंदोलनों में थीं। स्वतंत्रता के बाद समाजवादी दल कई बार बने, टूटे और नए नामों से संगठित हुए—सोशलिस्ट पार्टी, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांति दल, भारतीय लोकदल, जनता पार्टी, लोकदल और जनता दल इसी लंबी राजनीतिक धारा की अलग-अलग कड़ियाँ थीं।

मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत डॉ. लोहिया और राजनारायण से प्रभावित समाजवादी कार्यकर्ता के रूप में की। वे पहली बार 1967 में जसवंतनगर से उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुँचे। बाद के दशकों में वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय क्रांति दल, भारतीय लोकदल, जनता पार्टी, लोकदल और जनता दल से जुड़े। 1989 में जनता दल की सरकार बनने पर वे पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

लेकिन जनता दल के भीतर विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर, चौधरी देवीलाल और अन्य नेताओं के बीच संघर्ष, मंडल और मंदिर की राजनीति तथा राष्ट्रीय स्तर पर जनता परिवार के विघटन ने नए क्षेत्रीय दलों के लिए रास्ता खोला। इसी प्रक्रिया से बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यूनाइटेड, ओडिशा में बीजू जनता दल, कर्नाटक में जनता दल सेक्युलर तथा उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी जैसी शक्तियाँ उभरीं।

समाजवादी पार्टी का गठन; 4 अक्टूबर 1992: नई पार्टी की घोषणा


मुलायम सिंह यादव ने 4 अक्टूबर, 1992 को लखनऊ में समाजवादी पार्टी की स्थापना की। इसके बाद नवंबर 1992 में पार्टी का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। पार्टी ने साइकिल को अपना चुनाव चिह्न और लाल-हरे झंडे को अपनी पहचान बनाया। लाल रंग समाजवादी संघर्ष और हरा रंग किसान तथा ग्रामीण जीवन का प्रतीक माना गया। पार्टी स्वयं को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समाजवादी व्यवस्था के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध बताती है।

समाजवादी पार्टी के आरंभिक सामाजिक आधार में मुख्यतः तीन समूह शामिल थे—

पहला, उत्तर प्रदेश की अन्य पिछड़ा वर्ग की जातियाँ, विशेषकर यादव समुदाय।

दूसरा, बाबरी मस्जिद आंदोलन और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बीच सुरक्षा और प्रतिनिधित्व की तलाश कर रहा मुस्लिम समुदाय।

तीसरा, लोहियावादी और चरण सिंह परंपरा से जुड़े किसान, समाजवादी कार्यकर्ता और गैर-कांग्रेसी नेता।

मुलायम सिंह यादव ने 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर पुलिस गोलीबारी के बाद भाजपा और राम मंदिर आंदोलन का खुलकर विरोध किया था। इस कारण भाजपा समर्थकों के बीच उनकी तीखी आलोचना हुई। लेकिन मुस्लिम मतदाताओं के एक बड़े हिस्से में वे धर्मनिरपेक्ष राजनीति और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में उभरे। यही मुस्लिम–यादव या ‘एमवाई’ सामाजिक समीकरण आगे चलकर समाजवादी पार्टी की सबसे स्थायी चुनावी शक्ति बना।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन


विधानसभा चुनाव लड़ी सीटें जीती सीटें सपा का मत-प्रतिशत

1993 256 109 17.94%

1996 281 110 21.80%

2002 390 143 25.37%

2007 393 97 25.43%

2012 401 224 29.15%

2017 311 47 21.82%

2022 347 111 32.06%

2022 में सपा ने स्वयं 111 सीटें जीतीं, जबकि उसके नेतृत्व वाले गठबंधन ने कुल 125 सीटें प्राप्त कीं।

1993: सपा–बसपा गठबंधन और सत्ता की पहली परीक्षा

समाजवादी पार्टी गठन के कुछ ही सप्ताह बाद 6 दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। भाजपा सरकार बर्खास्त हुई और 1993 में विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा को रोकने के उद्देश्य से मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने ऐतिहासिक सपा–बसपा गठबंधन बनाया।

उस समय प्रसिद्ध नारा चला— “मिले मुलायम–कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम।”

समाजवादी पार्टी ने 256 सीटों पर चुनाव लड़कर 109 सीटें और 17.94 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। बसपा ने 67 सीटें जीतीं। भाजपा 177 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी, पर बहुमत से दूर रही। सपा–बसपा को कांग्रेस और वाम दलों के समर्थन से सरकार बनाने का अवसर मिला। मुलायम सिंह यादव दूसरी बार मुख्यमंत्री बने।

यह गठबंधन चुनावी दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली था। पिछड़ी जातियों, दलितों और मुसलमानों का साझा मोर्चा उत्तर प्रदेश की आबादी के बड़े हिस्से को राजनीतिक रूप से एक मंच पर ला सकता था। लेकिन सरकार में भागीदारी, प्रशासनिक नियुक्तियों, जिला स्तर की प्रतिस्पर्धा, जमीन और स्थानीय वर्चस्व के प्रश्नों पर दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में तनाव बढ़ने लगा।

1995: गेस्ट हाउस कांड और गठबंधन का अंत

2 जून , 1995 को बसपा ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। उसी दिन लखनऊ के राज्य अतिथि गृह में मायावती और बसपा विधायकों को समाजवादी पार्टी समर्थक बताए गए लोगों ने घेर लिया। मायावती ने अपने साथ हिंसा और अपमान का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने मौके पर पहुँचकर उनकी सहायता की और अगले दिन भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं।

इस घटना ने सपा और बसपा को लगभग ढाई दशक तक कट्टर विरोधी बना दिया। बसपा ने इसे दलित नेतृत्व पर हमला बताया, जबकि समाजवादी पार्टी ने आधिकारिक रूप से हिंसा से दूरी बनाई। फिर भी ‘गेस्ट हाउस कांड’ दोनों दलों के सामाजिक आधारों के बीच गहरे अविश्वास का स्थायी प्रतीक बन गया।

1996: 110 विधायक, लेकिन सरकार नहीं

1996 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 281 सीटों पर चुनाव लड़कर 110 सीटें और 21.80 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। भाजपा 174 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी और बसपा को फिर 67 सीटें मिलीं। स्पष्ट बहुमत न होने के कारण लंबे समय तक राष्ट्रपति शासन रहा। बाद में भाजपा–बसपा के बीच सत्ता-साझेदारी का प्रयोग हुआ।

सपा सत्ता में नहीं आ सकी। लेकिन 110 विधायकों के साथ उसने साबित किया कि 1993 का प्रदर्शन केवल गठबंधन का परिणाम नहीं था। उसका स्वतंत्र मुस्लिम–पिछड़ा आधार मजबूत हो चुका था।

2002: 143 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल

2002 में सपा ने 390 सीटें लड़ीं, 143 जीतीं और 25.37 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। वह विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनी। लेकिन तत्काल सरकार नहीं बना सकी। बसपा ने 98 सीटें जीतीं और भाजपा के समर्थन से मायावती मुख्यमंत्री बनीं।

अगस्त, 2003 में भाजपा–बसपा गठबंधन टूटने के बाद मुलायम सिंह यादव ने बसपा के बागी विधायकों, निर्दलीयों, राष्ट्रीय लोकदल और अन्य छोटे समूहों के समर्थन से सरकार बनाई। इस प्रकार वे तीसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

तीसरा मुलायम शासन: 2003–2007

मुलायम सरकार के इस दौर में अमर सिंह की भूमिका बहुत प्रभावशाली हुई। औद्योगिक निवेश, फिल्म उद्योग, बड़े कारोबारी समूहों और महानगरीय अभिजात वर्ग से संपर्क बढ़ाया गया। अमिताभ बच्चन को उत्तर प्रदेश का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया। कई बड़े निवेश सम्मेलनों का आयोजन हुआ।


इसके साथ ही सरकार पर कानून-व्यवस्था, आपराधिक छवि वाले नेताओं को संरक्षण, पुलिस और प्रशासन में राजनीतिक हस्तक्षेप तथा यादव समुदाय को अनुपात से अधिक लाभ देने के आरोप भी लगे। सपा समर्थकों ने इन आरोपों को सामाजिक सत्ता-संतुलन बदलने के विरोध से प्रेरित बताया। लेकिन पार्टी की ‘कानून-व्यवस्था’ संबंधी छवि आगे के चुनावों में एक स्थायी कमजोरी बनी।

2007: वोट लगभग बरकरार, सीटें घटीं

2007 में सपा ने 393 सीटों पर चुनाव लड़कर 97 सीटें और 25.43 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। उसका मत-प्रतिशत 2002 से थोड़ा बढ़ा। लेकिन सीटें 143 से घटकर 97 रह गईं। मायावती के दलित–ब्राह्मण सामाजिक इंजीनियरिंग मॉडल ने बसपा को 206 सीटों का स्पष्ट बहुमत दिलाया।

यह चुनाव दिखाता है कि प्रथम-पास-द-पोस्ट प्रणाली में वोट का भौगोलिक वितरण निर्णायक होता है। सपा का लगभग एक-चौथाई वोट बना रहा। लेकिन बसपा के अधिक प्रभावी सामाजिक और क्षेत्रीय संयोजन ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया।

अखिलेश यादव का उदय

मुलायम सिंह यादव ने 2000 में कन्नौज लोकसभा उपचुनाव से अखिलेश यादव को सक्रिय संसदीय राजनीति में उतारा। अखिलेश ने इंजीनियरिंग और पर्यावरण इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की थी और युवा, शिक्षित तथा अपेक्षाकृत आधुनिक चेहरे के रूप में सामने आए। उन्होंने 2009 के बाद प्रदेश संगठन और युवा संपर्क में अधिक सक्रिय भूमिका निभाई।

2012 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने पूरे प्रदेश में ‘क्रांति रथ यात्रा’ की। उन्होंने पार्टी की पारंपरिक मुस्लिम–यादव छवि से आगे बढ़कर युवाओं, छात्रों, किसानों, अन्य पिछड़ी जातियों और विकास की आकांक्षा रखने वाले शहरी मतदाताओं तक पहुँच बनाने की कोशिश की। डी.पी. यादव जैसे विवादित नेता को पार्टी में शामिल करने का विरोध कर उन्होंने अपनी अलग राजनीतिक शैली का संकेत दिया।

2012: सपा का पहला स्पष्ट बहुमत


2012 में समाजवादी पार्टी ने 401 सीटों पर चुनाव लड़कर 224 सीटें जीतीं और 29.15 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। यह पार्टी के इतिहास का पहला स्पष्ट बहुमत था। मुलायम सिंह यादव के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की संभावना थी। लेकिन उन्होंने अखिलेश यादव को नेता चुना। 15 मार्च, 2012 को 38 वर्ष की आयु में अखिलेश उत्तर प्रदेश के सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री बने।

अखिलेश सरकार की प्रमुख परियोजनाएँ

अखिलेश सरकार ने विकास और तकनीक की आधुनिक छवि बनाने का प्रयास किया। उसके प्रमुख कार्यों में—


आगरा–लखनऊ एक्सप्रेसवे;

लखनऊ मेट्रो की शुरुआत;

गोमती रिवरफ्रंट परियोजना;

लखनऊ में जनेश्वर मिश्र पार्क;

समाजवादी पेंशन योजना;

छात्र-छात्राओं को लैपटॉप वितरण;

डायल 100 पुलिस सेवा;

108 और 102 एंबुलेंस सेवाओं का विस्तार;

आईटी सिटी और शहरी आधारभूत ढाँचा परियोजनाएँ शामिल थीं।

इसके बावजूद सरकार पर मुजफ्फरनगर दंगों, कानून-व्यवस्था की घटनाओं, खनन, भर्ती विवादों, प्रशासन में कथित परिवारवाद और पार्टी के कई शक्ति केंद्रों के कारण निर्णयहीनता के आरोप लगे। अखिलेश मुख्यमंत्री थे। लेकिन मुलायम सिंह, शिवपाल यादव, रामगोपाल यादव और आजम खान जैसे वरिष्ठ नेताओं की अलग-अलग शक्ति-व्यवस्थाएँ बनी रहीं। यही द्वंद्व 2016 में खुले पारिवारिक संघर्ष में बदल गया।

2016–17 का यादव परिवार संघर्ष

अखिलेश बनाम शिवपाल

2016 में अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव के बीच सरकार तथा संगठन पर नियंत्रण को लेकर संघर्ष खुलकर सामने आया। मुलायम सिंह यादव आरंभ में शिवपाल और अमर सिंह के अधिक निकट दिखाई दिए, जबकि रामगोपाल यादव ने अखिलेश का समर्थन किया।

घटनाक्रम तेजी से बदला—

शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया;

अखिलेश ने शिवपाल से महत्वपूर्ण मंत्रालय वापस लिए;

दोनों पक्षों के समर्थक नेताओं को संगठन और सरकार से हटाया गया;

रामगोपाल यादव को पार्टी से निष्कासित किया गया और बाद में वापस लिया गया;

दिसंबर 2016 में मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव को छह वर्ष के लिए पार्टी से निष्कासित किया;

व्यापक विरोध के बाद निष्कासन अगले ही दिन वापस लेना पड़ा।

1 जनवरी, 2017: अखिलेश बने राष्ट्रीय अध्यक्ष

रामगोपाल यादव द्वारा बुलाए गए विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश यादव को समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। मुलायम सिंह यादव को संरक्षक और शिवपाल यादव को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने की घोषणा हुई। मुलायम गुट ने इस अधिवेशन को अवैध बताया और दोनों पक्ष निर्वाचन आयोग पहुँच गए।

निर्वाचन आयोग ने विधायकों, सांसदों, विधान परिषद सदस्यों और संगठन के अधिकांश प्रतिनिधियों के समर्थन को देखते हुए अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गुट को असली समाजवादी पार्टी माना और ‘साइकिल’ चुनाव चिह्न उसी को दिया। यह औपचारिक विभाजन की स्थिति थी। लेकिन मुलायम सिंह ने अलग पार्टी नहीं बनाई।

इस विवाद के बाद पार्टी का वास्तविक नेतृत्व मुलायम सिंह से अखिलेश यादव के हाथों में चला गया। सितंबर, 2017 और फिर सितंबर, 2022 के राष्ट्रीय अधिवेशनों में अखिलेश को दोबारा अध्यक्ष चुना गया।

2017: कांग्रेस से गठबंधन और बड़ी पराजय

2017 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ गठबंधन किया। नारा दिया गया—


“यूपी को यह साथ पसंद है।”

समझौते में समाजवादी पार्टी ने 311 और कांग्रेस ने 114 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। कुछ सीटों पर नामांकन और स्थानीय विवाद के कारण दोनों दलों के उम्मीदवार आमने-सामने भी रहे।

सपा ने 21.82 प्रतिशत वोट और 47 सीटें प्राप्त कीं। कांग्रेस को 6.25 प्रतिशत वोट और केवल सात सीटें मिलीं। भाजपा ने 312 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया।

हार के प्रमुख कारण

पारिवारिक संघर्ष ने पार्टी की एकता और प्रशासनिक विश्वसनीयता को कमजोर किया। अनेक निर्वाचन क्षेत्रों में शिवपाल और अखिलेश समर्थक गुट एक-दूसरे के विरुद्ध काम करते दिखाई दिए। भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलितों को अपने पक्ष में बड़े पैमाने पर संगठित किया। कानून-व्यवस्था, परिवारवाद और कथित तुष्टीकरण भी भाजपा के प्रमुख चुनावी मुद्दे बने।

कांग्रेस गठबंधन से मुस्लिम मतों का कुछ एकीकरण हुआ। लेकिन कांग्रेस की कमजोर संगठनात्मक स्थिति के कारण सीटों का हस्तांतरण प्रभावी नहीं रहा। 2012 में 224 सीटों वाली पार्टी केवल 47 सीटों पर सिमट गई।

शिवपाल यादव की अलग पार्टी

अखिलेश के हाथों संगठन जाने के बाद शिवपाल सिंह यादव लंबे समय तक असंतुष्ट रहे। अगस्त, 2018 में उन्होंने समाजवादी सेक्युलर मोर्चा बनाया, जिसका बाद में नाम प्रगतिशील समाजवादी पार्टी–लोहिया रखा गया। यह समाजवादी पार्टी से निकली अब तक की सबसे संगठित अलग राजनीतिक इकाई थी।

शिवपाल ने 2019 में फिरोजाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ा। वे जीत नहीं सके। लेकिन उनके मतों ने समाजवादी पार्टी प्रत्याशी अक्षय यादव की हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे स्पष्ट हुआ कि अलग पार्टी के रूप में शिवपाल की राज्यव्यापी शक्ति सीमित थी। पर यादव परिवार के प्रभाव वाले क्षेत्रों में वे सपा को नुकसान पहुँचा सकते थे।

2022 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश और शिवपाल में समझौता हुआ। शिवपाल जसवंतनगर से समाजवादी पार्टी के चुनाव चिह्न पर लड़े और जीते। दिसंबर 2022 में मैनपुरी लोकसभा उपचुनाव के बाद प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का समाजवादी पार्टी में विलय घोषित किया गया। इस प्रकार 2018 की सबसे बड़ी सांगठनिक टूट चार वर्ष बाद समाप्त हुई।

2022 का चुनाव: गठबंधन के सहारे बड़ी वापसी

2022 में अखिलेश यादव ने कांग्रेस या बसपा के बजाय छोटे और मध्यम जाति-आधारित दलों के साथ गठबंधन बनाया। इसमें प्रमुख रूप से—


राष्ट्रीय लोकदल;

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी;

अपना दल–कमेरावादी;

प्रगतिशील समाजवादी पार्टी–लोहिया;

महान दल;

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी;

जनवादी पार्टी सोशलिस्ट शामिल थे।

समाजवादी पार्टी ने स्वयं 347 सीटें लड़कर 111 सीटें और 32.06 प्रतिशत वोट प्राप्त किए। रालोद ने आठ और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने छह सीटें जीतीं। अपना दल–कमेरावादी की पल्लवी पटेल ने सपा के चुनाव चिह्न पर सिराथू से उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को हराया। गठबंधन ने कुल 125 सीटें और लगभग 36.6 प्रतिशत वोट हासिल किए।

सपा की सीटें 47 से बढ़कर 111 और वोट 21.82 से बढ़कर 32.06 प्रतिशत हो गया। यह पार्टी के इतिहास का अब तक का सबसे ऊँचा विधानसभा मत-प्रतिशत था। फिर भी भाजपा और सहयोगियों ने 273 सीटें जीतकर सरकार दोबारा बना ली।

सत्ता क्यों नहीं मिली?

सपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पूर्वांचल और कुछ मध्य उत्तर प्रदेश क्षेत्रों में बड़ी सफलता मिली। लेकिन बुंदेलखंड, अवध के कई हिस्सों और शहरी क्षेत्रों में भाजपा की बढ़त बनी रही। रालोद से जाट–मुस्लिम समीकरण कुछ हद तक पुनर्जीवित हुआ, पर भाजपा का गैर-यादव ओबीसी, लाभार्थी और महिला वोट मजबूत बना रहा।

सपा का वोट कई सीटों पर तेजी से बढ़ा। लेकिन भाजपा के विरुद्ध आवश्यक अतिरिक्त तीन से चार प्रतिशत मत और व्यापक क्षेत्रीय वितरण हासिल नहीं हो सका।

लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी

लोकसभा चुनाव लड़ी सीटें जीती सीटें अखिल भारतीय मत-प्रतिशत


1996 111 17 3.28%

1998 166 20 4.93%

1999 151 26 3.76%

2004 237 36 4.32%

2009 193 23 3.42%

2014 197 5 3.37%

2019 49 5 2.55%

2024 71* 37 4.62%

2024 में उत्तर प्रदेश में सपा ने 62 सीटें लड़ीं। देश के अन्य राज्यों में उतारे गए प्रत्याशियों को जोड़कर कुल संख्या 71 दर्ज होती है। निर्वाचन आयोग आधारित परिणाम-संकलन में 2024 का राष्ट्रीय मत-प्रतिशत 4.62 और उत्तर प्रदेश में मत-प्रतिशत 33.60 दर्ज है।

1996: पहली लोकसभा परीक्षा और 17 सांसद

1996 में समाजवादी पार्टी ने पहली बार लोकसभा का आम चुनाव लड़ा। पार्टी ने 111 प्रत्याशी उतारे और 17 सीटें जीतीं—16 उत्तर प्रदेश और एक बिहार में। उसे देशभर में 3.28 प्रतिशत वोट मिले।

इस चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला। भाजपा की अल्पकालिक सरकार गिरने के बाद संयुक्त मोर्चा सरकार बनी। मुलायम सिंह यादव एच.डी. देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल सरकारों में जून 1996 से मार्च 1998 तक भारत के रक्षा मंत्री रहे। यह समाजवादी पार्टी की राष्ट्रीय राजनीति में पहली बड़ी भूमिका थी। पार्टी का इतिहास भी 1996–98 के रक्षा मंत्री कार्यकाल को प्रमुख उपलब्धि के रूप में दर्ज करता है।

1998: 20 सांसद और लगभग पाँच प्रतिशत राष्ट्रीय वोट

1998 में सपा ने 166 सीटों पर चुनाव लड़ा, 20 जीतीं और 4.93 प्रतिशत राष्ट्रीय वोट प्राप्त किया। यह राष्ट्रीय मत-प्रतिशत के लिहाज से उसके प्रारंभिक दौर की बड़ी छलाँग थी।

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा गठबंधन सरकार बनी। समाजवादी पार्टी विपक्ष में रही और उसने भाजपा तथा कांग्रेस दोनों से समान दूरी रखते हुए तीसरे मोर्चे की राजनीति जारी रखी।

1999: 26 सांसद

1999 के लोकसभा चुनाव में पार्टी 151 सीटें लड़ीं और 26 जीतीं। राष्ट्रीय वोट 3.76 प्रतिशत रहा। उस समय की 85 लोकसभा सीटों वाले अविभाजित उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रभाव विशेष रूप से मजबूत था। कारगिल युद्ध के बाद हुए चुनाव में भाजपा गठबंधन सत्ता में लौटा। लेकिन सपा उत्तर प्रदेश की प्रमुख विपक्षी शक्ति बनी रही।

2004: 36 सांसद—पहला संसदीय शिखर

2004 में समाजवादी पार्टी ने 237 सीटों पर चुनाव लड़कर 36 लोकसभा सीटें जीतीं—35 उत्तर प्रदेश और एक उत्तराखंड में। उसे 4.32 प्रतिशत राष्ट्रीय वोट प्राप्त हुआ। 2024 से पहले यही उसका सर्वश्रेष्ठ लोकसभा प्रदर्शन था। कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी। समाजवादी पार्टी औपचारिक रूप से यूपीए में शामिल नहीं हुई। लेकिन उसने कई अवसरों पर केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन दिया।

2008 का परमाणु समझौता

भारत–अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के विरोध में वाम दलों ने मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस लिया। इसके बाद समाजवादी पार्टी ने सरकार को समर्थन देकर उसे विश्वास मत में बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अमर सिंह इस समझौते और कांग्रेस से निकटता के प्रमुख सूत्रधार थे।यह निर्णय पार्टी की पूर्व कांग्रेस-विरोधी राजनीति से बड़ा बदलाव था। इसके बदले समाजवादी पार्टी को तत्काल केंद्र सरकार में भागीदारी नहीं मिली। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसकी निर्णायक शक्ति सामने आई।

2009: राजद–लोजपा के साथ चौथा मोर्चा

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल और रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के साथ एक वैकल्पिक मोर्चा बनाया। इसे कभी-कभी ‘चौथा मोर्चा’ कहा गया। यह कांग्रेस और भाजपा दोनों से अलग चुनावी प्रयोग था...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें

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Yogesh Mishra

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Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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