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सरधना में किसका बजेगा डंका? संगीत सोम की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनी मायावती, BJP के लिए ट्रिपल टेंशन!
UP Sardhana Election 2027: सरधना विधानसभा में 2027 का चुनाव बेहद रोमांचक होता दिख रहा है। संगीत सोम के सामने सपा के अतुल प्रधान और बसपा के विनीत भराला की चुनौती से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। मायावती के जाट उम्मीदवार वाले दांव से बीजेपी का वोट बैंक कितना प्रभावित होगा?
UP Sardhana Election 2027: पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सबसे हॉट और चर्चित सीटों में शुमार मेरठ की सरधना विधानसभा में अचानक सियासी भूचाल आ गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के फायरब्रांड और बेबाक नेता संगीत सोम एक बार फिर इस सीट से विधायक बनने का ताना-बाना बुन रहे हैं। लेकिन चुनावी बिगुल बजने से ठीक पहले विपक्ष ने उनके चारों तरफ ऐसा मजबूत राजनीतिक चक्रव्यूह रच दिया है, जिसने बीजेपी खेमे की नींद उड़ा दी है। समाजवादी पार्टी (SP) से मौजूदा विधायक अतुल प्रधान का मैदान में उतरना लगभग तय है, वहीं बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती ने विनीत भराला को अपना उम्मीदवार घोषित कर ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है कि पूरी सरधना सीट का गणित ही बदल गया है।
बसपा के 'जाट दांव' से चुनावी मैदान में खलबली
बहुजन समाज पार्टी ने वलीदपुर इलाके में एक विशाल जनसभा का आयोजन कर विनीत भराला को सरधना से अपना आधिकारिक प्रत्याशी घोषित किया। मंच संभालते ही विनीत भराला ने हुंकार भरी कि उन्हें क्षेत्र के हर वर्ग और हर समाज का भरपूर आशीर्वाद मिल रहा है। विनीत का मूल नाम विनीत चौधरी है और वे प्रसिद्ध भराला गांव के निवासी हैं। उनके पिता सत्यप्रकाश भराला सपा के कद्दावर नेता थे और 2008 में उनकी हत्या कर दी गई थी। पिता के जाने के बाद विनीत सपा से जुड़े, लेकिन वर्तमान विधायक अतुल प्रधान के चलते टिकट न मिलने पर उन्होंने हाथी का दामन थाम लिया। बसपा का यह कदम विरोधियों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है।
2027 का सियासी गणित: कौन मारेगा बाजी?
सरधना विधानसभा क्षेत्र में हमेशा से चुनावी गणित बेहद पेचीदा रहा है। यहां हार और जीत का फैसला मुख्य रूप से 5 बड़ी बिरादरियों के हाथ में होता है। आंकड़ों की बात करें तो इस सीट पर लगभग 1 लाख मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि ठाकुर समुदाय की संख्या करीब 60 हजार है। इसके साथ ही 50 हजार जाट, 40 हजार गुर्जर और लगभग 45 हजार से 50 हजार दलित वोटर्स इस चुनाव की दिशा तय करते हैं। 2012 और 2017 में संगीत सोम ने राजपूत और जाट वोटों के अटूट तालमेल और हिंदू ध्रुवीकरण के दम पर बड़ी जीत दर्ज की थी। लेकिन 2022 के चुनाव में सपा के मुस्लिम-गुर्जर-दलित गठजोड़ ने संगीत सोम का किला ढहा दिया और अतुल प्रधान ने शानदार जीत हासिल की।
क्या बिगड़ जाएगा संगीत सोम का खेल?
संगीत सोम के लिए सबसे बड़ी चुनौती जाट मतदाताओं को अपने पाले में बनाए रखना है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के वरिष्ठ नेता संजीव बालियान की हार का ठीकरा जब संगीत सोम पर फोड़ा गया, तब से जाट बनाम ठाकुर की राजनीति काफी गर्मा गई थी। हालांकि, रालोद (RLD) के बीजेपी के साथ आने से संगीत सोम को उम्मीद थी कि जाट वोट उन्हें ही मिलेगा, लेकिन जयंत चौधरी के साथ उनके पुराने मतभेद किसी से छिपे नहीं हैं। अब बसपा द्वारा विनीत भराला के रूप में एक मजबूत जाट उम्मीदवार उतारने से यह जाट वोटबैंक बंट सकता है। अगर जाट वोट बसपा की तरफ खिसकते हैं, तो संगीत सोम की राह में सबसे बड़ा रोड़ा अटक जाएगा।
दलित, मुस्लिम और जाट गठजोड़ की नई रणनीति
मायावती की नजर हमेशा से अपने पुराने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर रही है। बसपा का मुख्य मकसद दलित, मुस्लिम और जाट मतदाताओं को एक मंच पर लाकर इतिहास दोहराना है। इससे पहले भी बसपा के चंद्रवीर सिंह यहां से विधायक रह चुके हैं। विनीत भराला की अपने समाज में अच्छी पकड़ मानी जाती है, जिससे जाट वोटर्स उनके पक्ष में एक जुट हो सकते हैं। अगर बसपा का यह दांव पूरी तरह सटीक बैठा, तो यह न केवल बीजेपी के लिए बल्कि सपा के अतुल प्रधान के लिए भी एक बड़ी कड़ी चुनौती बन सकता है।
संगीत सोम के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती
वर्तमान स्थिति को देखा जाए तो सरधना की लड़ाई अब त्रिकोणीय और बेहद रोमांचक हो चुकी है। एक तरफ जहां अतुल प्रधान दलितों को अपने साथ जोड़ने में दिन-रात एक कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के अंदरूनी विरोध और जाट बिरादरी की नाराजगी ने संगीत सोम के लिए मुश्किलें काफी बढ़ा दी हैं। 'ठाकुर चौबीसी' के दबदबे वाले इस इलाके में बिना जाट समर्थन के किसी भी प्रत्याशी का पार पाना नामुमकिन सा दिखता है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या फायरब्रांड नेता संगीत सोम अपने विरोधियों के इस बिछाए गए चक्रव्यूह को भेद पाते हैं या सरधना में सत्ता का नया समीकरण लिखा जाएगा।


