Sonbhadra News: सोनभद्र के बघाड़ू में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या दोगुने से ज्यादा, जानिए पूरा गणित

Sonbhadra News: सोनभद्र के बघाड़ू में 2003 से 2026 के बीच मुस्लिम मतदाता 430 से बढ़कर 902 हुए। पनौरा में 359 से 496 हुए। आंकड़ों और जमीन मामलों की जांच जारी है।

Newstrack Network
Published on: 22 Sept 2026 8:12 PM IST
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Sonbhadra News (Image Credit-Social Media)

सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के जनजाति बहुल सोनभद्र जिले के दो गांवों, दुद्धी तहसील के बघाड़ू और रॉबर्ट्सगंज क्षेत्र के पनौरा में 2003 से 2026 के बीच मतदाताओं की धार्मिक संरचना में उल्लेखनीय बदलाव सामने आया है। विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद उपलब्ध मतदाता सूची के आंकड़ों के अनुसार बघाड़ू में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 430 से बढ़कर 902 हो गई, यानी 23 वर्षों में लगभग 109.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी अवधि में हिंदू मतदाता 2,864 से बढ़कर 3,621 हुए, यानी वृद्धि लगभग 26.4 प्रतिशत बैठती है। यहां मूल खबर में हिंदू मतदाताओं की वृद्धि 29 प्रतिशत बताई गई है, लेकिन उपलब्ध 2003 और 2026 के आंकड़ों से गणना करने पर यह करीब 26.4 प्रतिशत होती है। पनौरा में मुस्लिम मतदाता 359 से बढ़कर 496 हुए, यानी करीब 38.2 प्रतिशत की वृद्धि, जबकि हिंदू मतदाता 380 से बढ़कर 403 हुए, यानी करीब 6.1 प्रतिशत। इसलिए मूल खबर में दिए गए पनौरा के 32.6 प्रतिशत और 8.04 प्रतिशत के आंकड़े भी उपलब्ध संख्या से मेल नहीं खाते। महत्वपूर्ण यह भी है कि ये मतदाता सूची के आंकड़े हैं, जनगणना के धार्मिक आबादी के आंकड़े नहीं। इसलिए इनके आधार पर अकेले यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि गांव की कुल जनसंख्या की धार्मिक संरचना ठीक इसी अनुपात में बदली है।

इस पूरे मामले में एक और आंकड़ा-संबंधी विसंगति सामने आती है। स्थानीय रिपोर्ट में वर्ष 2003 के बघाड़ू के तीन बूथों पर कुल 3,292 मतदाता बताए गए हैं, लेकिन उसी बूथवार विवरण में 2,864 हिंदू और 430 मुस्लिम मतदाता जोड़ने पर संख्या 3,294 होती है। इसी तरह उपलब्ध बूथवार संख्या 1,578, 978 और 736 को जोड़ने पर 3,292 तो आता है, लेकिन बूथवार हिंदू-मुस्लिम संख्या में दो मतदाताओं का अंतर है। वर्ष 2026 में पांच बूथों पर कुल 4,523 मतदाता दर्ज हैं और उपलब्ध धार्मिक वर्गीकरण 3,621 हिंदू तथा 902 मुस्लिम जोड़ने पर ठीक 4,523 होता है। इसलिए 2003 के आधार वर्ष में दो मतदाताओं की विसंगति मूल अभिलेख से सत्यापित की जानी चाहिए। सोनभद्र जिला निर्वाचन कार्यालय ने SIR-2026 की अंतिम मतदाता सूची और विधानसभा क्षेत्रवार निर्वाचन सामग्री अपने पोर्टल पर उपलब्ध कराई है, लेकिन निर्वाचन सूची स्वयं मतदाता का धर्म दर्ज करने वाला सांख्यिकीय जनगणना दस्तावेज नहीं होती।

बघाड़ू में कुल मतदाता 37% बढ़े, मुस्लिम मतदाताओं का हिस्सा 13% से करीब 20% हुआ

उपलब्ध संख्याओं को अनुपात में देखें तो तस्वीर अधिक स्पष्ट होती है। बघाड़ू में कुल मतदाता 2003 के 3,292 से बढ़कर 2026 में 4,523 हो गए, यानी कुल मतदाता संख्या में लगभग 37.4 प्रतिशत वृद्धि हुई। यदि 2003 के 430 मुस्लिम मतदाताओं को कुल 3,292 के अनुपात में देखें तो उनका हिस्सा करीब 13.1 प्रतिशत था। 2026 में 902 मुस्लिम मतदाता कुल 4,523 मतदाताओं के करीब 19.9 प्रतिशत हैं। यानी 23 वर्षों में मुस्लिम मतदाताओं का हिस्सा लगभग 6.8 प्रतिशत अंक बढ़ा है। इसी अवधि में हिंदू मतदाताओं का हिस्सा लगभग 87 प्रतिशत से घटकर करीब 80 प्रतिशत रह गया। संख्या के लिहाज से हिंदू मतदाता अब भी मुस्लिम मतदाताओं से लगभग चार गुना हैं।

लेकिन यहां ‘110 प्रतिशत वृद्धि’ को गलत अर्थ में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि बघाड़ू के 110 प्रतिशत मतदाता मुस्लिम हो गए हैं, बल्कि इसका अर्थ केवल इतना है कि मुस्लिम मतदाताओं की मूल संख्या दोगुने से कुछ अधिक हुई है—430 से 902। इसी तरह हिंदू मतदाताओं की संख्या घटी नहीं है, बल्कि 757 बढ़ी है। मुस्लिम मतदाताओं की संख्या 472 बढ़ी। इसलिए वास्तविक संख्या में हिंदू मतदाताओं की बढ़ोतरी मुस्लिम मतदाताओं से अधिक है, जबकि प्रतिशत वृद्धि मुस्लिम मतदाताओं में अधिक है क्योंकि उनका शुरुआती आधार काफी छोटा था। यही अंतर ‘संख्या में वृद्धि’ और ‘वृद्धि दर’ के बीच है और जनसांख्यिकीय रिपोर्टिंग में दोनों को अलग रखना जरूरी है।

पनौरा में कुल 160 मतदाता बढ़े, उनमें 137 मुस्लिम और 23 हिंदू

पनौरा की स्थिति अलग है। वर्ष 2003 में यहां कुल 739 मतदाता बताए गए हैं, जिनमें 359 मुस्लिम और 380 हिंदू थे। वर्ष 2026 में कुल मतदाता 899 हो गए, जिनमें 496 मुस्लिम और 403 हिंदू हैं। यानी कुल मतदाता संख्या केवल 160 बढ़ी, लेकिन इसमें 137 की वृद्धि मुस्लिम और 23 की हिंदू मतदाताओं में हुई। 2003 में मुस्लिम मतदाताओं का हिस्सा करीब 48.6 प्रतिशत था, जो 2026 में बढ़कर करीब 55.2 प्रतिशत हो गया। हिंदू मतदाताओं का हिस्सा करीब 51.4 से घटकर 44.8 प्रतिशत रह गया। इस तरह पनौरा में उपलब्ध मतदाता आंकड़ों के अनुसार धार्मिक अनुपात का बदलाव बघाड़ू की तुलना में अधिक स्पष्ट है।

यहां भी प्रकाशित प्रतिशत और वास्तविक गणना में अंतर है। 359 से 496 होने पर वृद्धि 137 है और 137 को 359 से भाग देने पर वृद्धि करीब 38.2 प्रतिशत होती है, न कि 32.6 प्रतिशत। इसी तरह 380 से 403 होने पर 23 की वृद्धि करीब 6.05 प्रतिशत है, न कि 8.04 प्रतिशत। प्रकाशित खबरों में 32.6 और 8.04 प्रतिशत लगातार उद्धृत हुए हैं, लेकिन दिए गए मूल मतदाता आंकड़ों के आधार पर ये प्रतिशत गणितीय रूप से सही नहीं बैठते। यदि प्रशासन के पास कोई अलग आधार संख्या है तो वह अलग बात होगी, लेकिन उपलब्ध 359, 496, 380 और 403 के आधार पर सही वृद्धि क्रमशः लगभग 38.2 और 6.1 प्रतिशत है।

मतदाता सूची धार्मिक जनगणना नहीं, सबसे महत्वपूर्ण सावधानी यही

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत की मतदाता सूची में धर्म का अलग कॉलम नहीं होता। मतदाता सूची नाम, आयु, लिंग, संबंध और निवास जैसी निर्वाचन संबंधी सूचनाएं रखती है, लेकिन वह हिंदू-मुस्लिम आबादी की आधिकारिक गणना नहीं है। इसलिए 902 या 496 मुस्लिम मतदाताओं जैसे आंकड़े यदि प्रशासनिक स्तर पर नामों, स्थानीय सत्यापन या किसी अलग सर्वे के आधार पर वर्गीकृत किए गए हैं तो उस वर्गीकरण की पद्धति भी स्पष्ट होनी चाहिए। आधिकारिक धार्मिक जनसंख्या की तुलना सामान्यतः जनगणना से की जाती है। मतदाता सूची से धार्मिक पहचान निकालकर उसे जनसांख्यिकी का पूर्ण विकल्प मानना पद्धतिगत रूप से कमजोर होगा।

दूसरा कारण उम्र है। मतदाता सूची में केवल 18 वर्ष या उससे अधिक आयु के पात्र नागरिक आते हैं। किसी समुदाय में बच्चों की संख्या अधिक या कम हो सकती है, इसलिए मतदाता अनुपात और कुल आबादी का अनुपात अलग हो सकता है। तीसरा कारण मृत्यु, विवाह, प्रवासन, नए मतदाताओं का 18 वर्ष की आयु पूरी करना, नाम काटे जाना, दूसरी जगह से नाम स्थानांतरित होना और SIR में पुराने रिकॉर्ड की सफाई है। इसलिए 2003 और 2026 की मतदाता सूची के अंतर को केवल जन्म दर या बाहरी लोगों की बसावट का परिणाम मानना तब तक उचित नहीं होगा जब तक प्रशासन प्रत्येक नए मतदाता के निवास, पुराने निर्वाचन क्षेत्र, आयु और पंजीकरण इतिहास का मिलान नहीं करता।

डीएम ने कहा, मतदाता बढ़ने के कारणों की जांच हो रही

सोनभद्र के जिलाधिकारी चर्चित गौड़ ने कहा है कि मतदाता संख्या में हुए बदलाव के कारणों की जांच कराई जा रही है। उनके अनुसार बघाड़ू में अनुसूचित जनजाति की जमीन गलत तरीके से बैनामा कराने के मामलों में प्रशासन ने कार्रवाई की है और पनौरा में भी भूमि से जुड़े मामले चल रहे हैं। भाजपा जिलाध्यक्ष नंदलाल गुप्ता ने मुख्यमंत्री और जिला प्रशासन से राजस्व अभिलेखों, जमीन के हस्तांतरण, कब्जे और मतदाता सूची का आपस में मिलान कराकर जांच कराने की मांग की है। यह राजनीतिक मांग है, जबकि मतदाता वृद्धि और भूमि हस्तांतरण के बीच कोई प्रत्यक्ष कारणात्मक संबंध स्थापित करना जांच का विषय है।

यही अंतर इस मामले में बेहद महत्वपूर्ण है। बघाड़ू में जनजातीय जमीन के कुछ हस्तांतरण गलत पाए जाने और मुस्लिम मतदाताओं की वृद्धि दर अधिक होने के दोनों तथ्य मौजूद हो सकते हैं, लेकिन एक तथ्य अपने आप दूसरे का कारण सिद्ध नहीं करता। यह स्थापित करने के लिए देखना होगा कि 2003 के बाद जुड़े 472 अतिरिक्त मुस्लिम मतदाताओं में कितने गांव में जन्म लेकर वयस्क हुए, कितने विवाह के बाद आए, कितने दूसरे गांवों या राज्यों से वैध रूप से निवास बदलकर आए और कितनों के पंजीकरण या निवास दस्तावेजों में गड़बड़ी है। यही परीक्षण पनौरा के 137 अतिरिक्त मुस्लिम मतदाताओं पर भी लागू होगा। यदि सभी पंजीकरण वैधानिक निवास और भारतीय नागरिकता की शर्तें पूरी करते हैं तो केवल किसी धार्मिक समुदाय की संख्या बढ़ना अपने आप निर्वाचन अनियमितता नहीं है।

बघाड़ू का जमीन मामला वास्तविक, प्रशासन ने कई हस्तांतरण किए निरस्त

मतदाता आंकड़ों से अलग बघाड़ू में जनजातीय भूमि के हस्तांतरण को लेकर गंभीर प्रशासनिक और न्यायिक मामला जरूर मौजूद है। प्रशासन की जांच में आरोप सामने आया था कि बाहरी व्यक्तियों ने स्थानीय अनुसूचित जनजाति की महिलाओं से विवाह अथवा उनके नाम का उपयोग करके ऐसी जमीनों के बैनामे कराए जिनका हस्तांतरण कानून द्वारा संरक्षित है। दिसंबर 2025 में प्रशासन ने बघाड़ू में आदिवासियों की जमीन से जुड़े 48 बैनामों को निरस्त करने की कार्रवाई शुरू की थी। बाद की कार्रवाई में बहादुर अली और रजिया उर्फ दुलरिया से जुड़े भूमि हस्तांतरण भी जांच के दायरे में आए।

प्रशासन के अनुसार बहादुर अली ने 1986 के आसपास पनिका जनजातीय पृष्ठभूमि वाली दुलरिया उर्फ रजिया से विवाह किया था और 2011 से 2023 के बीच रजिया के नाम से जमीन के कई बैनामे कराए गए। उपलब्ध प्रशासनिक विवरण के अनुसार इस प्रकरण में 40 गाटों की लगभग 5.7142 हेक्टेयर भूमि से जुड़े हस्तांतरण शून्य घोषित कर जमीन सरकार या ग्रामसभा में निहित करने की कार्रवाई हुई। प्रशासनिक कार्रवाई को चुनौती देते हुए याचिकाएं इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचीं, लेकिन हाईकोर्ट ने दुद्धी के डिप्टी कलेक्टर के 22 जनवरी 2026 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण सिद्धांत—दूसरे धर्म में विवाह से अपने आप ST दर्जा खत्म नहीं

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी सुधार जरूरी है। इस प्रकरण को इस रूप में प्रस्तुत करना कि ‘मुस्लिम से शादी करते ही महिला का अनुसूचित जनजाति दर्जा समाप्त हो गया’, कानून की सही स्थिति नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल के फैसले में स्पष्ट किया है कि अंतरधार्मिक विवाह या धर्म परिवर्तन मात्र से किसी व्यक्ति का जन्म से प्राप्त अनुसूचित जनजाति दर्जा अपने आप समाप्त नहीं होता। अदालत ने कहा कि प्रत्येक मामले में यह देखा जाना चाहिए कि व्यक्ति का अपने मूल जनजातीय समुदाय, उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं और सामुदायिक पहचान से संबंध बना रहा या उसने लंबे समय तक उस पहचान से पूर्ण विच्छेद कर लिया।

हाईकोर्ट के सामने आए सोनभद्र के एक संबंधित भूमि मामले में अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि केवल जाति प्रमाणपत्र होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संरक्षित जनजातीय भूमि खरीदने के लिए ST पहचान का वास्तविक और निरंतर संबंध भी महत्वपूर्ण हो सकता है। अदालत ने उस मामले के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर जमीन हस्तांतरण शून्य करने की प्रशासनिक कार्रवाई में हस्तक्षेप नहीं किया। इसलिए इस फैसले को सभी अंतरधार्मिक विवाहों पर लागू होने वाला सामान्य नियम नहीं समझा जाना चाहिए। निर्णय तथ्य-विशिष्ट है और उसका मूल सिद्धांत यह है कि धर्म परिवर्तन अपने आप ST दर्जा नहीं मिटाता, लेकिन लंबे समय तक जनजातीय समुदाय से पूर्ण विच्छेद का साक्ष्य कानूनी मूल्यांकन में महत्वपूर्ण हो सकता है।

दुलारी उर्फ रजिया का 2012 का ST प्रमाणपत्र निरस्त

बघाड़ू के इसी विवाद से जुड़े एक अन्य मामले में जिला स्तरीय जाति प्रमाणपत्र सत्यापन समिति ने दुलारी उर्फ रजिया का 14 दिसंबर 2012 को जारी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र निरस्त कर दिया है। समिति में जिलाधिकारी अध्यक्ष, जिला समाज कल्याण अधिकारी सदस्य सचिव तथा एडीएम, एसडीएम रॉबर्ट्सगंज, जिला अल्पसंख्यक अधिकारी और तहसीलदार दुद्धी सदस्य थे। जांच में रजिया ने दावा किया कि बहादुर अली के साथ रहने के बावजूद उसने अपना धर्म और जाति नहीं छोड़ी, न निकाह किया, न नमाज पढ़ी और न मस्जिद गई। दूसरी ओर ग्राम प्रधान अब्दुल्ला अंसारी, बीडीसी और ग्राम पंचायत सदस्यों सहित 11 लोगों के बयानों में उसके मुस्लिम धार्मिक रीति-रिवाजों से जुड़े होने और पनिका समाज से अलगाव की बात कही गई। समिति ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रमाणपत्र निरस्त करने का निर्णय लिया।

मूल खबर में ‘40 साल पहले दुलारी बनी रजिया’ लिखा गया है, जबकि प्रकाशित जांच विवरण में अलग-अलग समय-संदर्भ दिखाई देते हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार समिति ने माना कि दुलारी लगभग 1980 में रजिया के रूप में रहने लगी थी, जबकि बहादुर अली के साथ कोर्ट मैरिज लगभग 1986 में हुई। इस हिसाब से 2026 तक पहचान परिवर्तन को करीब 46 वर्ष और कोर्ट मैरिज को करीब 40 वर्ष होते हैं। इसलिए ‘40 साल पहले रजिया बनी’ और ‘1986 में कोर्ट मैरिज’ को एक ही घटना मानना सही नहीं है।

जमीन की सुरक्षा का सवाल धर्म से अधिक कानून का है

सोनभद्र में अनुसूचित जनजातियों की जमीन का संरक्षण एक गंभीर कानूनी और सामाजिक प्रश्न है। यदि किसी व्यक्ति ने विवाह, फर्जी दस्तावेज, गलत जाति प्रमाणपत्र, बेनामी व्यवस्था अथवा किसी दूसरे माध्यम से संरक्षित जनजातीय भूमि हस्तांतरण के कानून को दरकिनार किया है तो उसकी जांच और कार्रवाई जरूरी है, चाहे संबंधित व्यक्ति किसी भी धर्म या समुदाय का हो। बघाड़ू में प्रशासन द्वारा भूमि हस्तांतरण निरस्त करना और हाईकोर्ट द्वारा कुछ आदेशों में हस्तक्षेप से इनकार करना बताता है कि कम से कम कुछ लेन-देन में वास्तविक कानूनी अनियमितताएं पाई गई हैं।

लेकिन इसे पूरे मुस्लिम समुदाय या हर अंतरधार्मिक विवाह से जोड़ देना उपलब्ध साक्ष्यों से आगे निकलना होगा। ‘लैंड जिहाद’ जैसे राजनीतिक या मीडिया में प्रयुक्त शब्द किसी भारतीय भूमि कानून की कानूनी श्रेणी नहीं हैं। जांच का वास्तविक प्रश्न यह है कि अनुसूचित जनजाति की संरक्षित जमीन किसके नाम थी, किस कानून के तहत उसका हस्तांतरण प्रतिबंधित था, खरीदने वाले की पात्रता क्या थी, दस्तावेज सही थे या नहीं और जमीन का वास्तविक लाभार्थी कौन था। इन्हीं ठोस सवालों पर प्रशासनिक और न्यायिक कार्रवाई टिकेगी।

अब जांच में 2003 से 2026 तक प्रत्येक नए मतदाता की प्रकृति स्पष्ट करनी होगी

बघाड़ू और पनौरा के मतदाता आंकड़े निश्चित रूप से जांच योग्य हैं क्योंकि दोनों गांवों में अलग-अलग समुदायों की वृद्धि दर में बड़ा अंतर दिखाई देता है। लेकिन सही जांच केवल धर्म के आधार पर संख्या गिनने से पूरी नहीं होगी। प्रशासन को 2003 की मतदाता सूची और SIR-2026 की अंतिम सूची का मतदाता-दर-मतदाता मिलान करना होगा। इससे पता चल सकता है कि कितने मतदाता 2003 में बच्चे थे और अब स्वाभाविक रूप से मतदाता बने, कितने विवाह के बाद आए, कितने गांव छोड़कर गए, कितनों की मृत्यु हुई, कितने दूसरे निर्वाचन क्षेत्रों से स्थानांतरित हुए और कितने नए नाम ऐसे हैं जिनके निवास दस्तावेजों की दोबारा जांच आवश्यक है। सोनभद्र जिला निर्वाचन कार्यालय के पास SIR-2026 की अंतिम सूची के साथ ‘नो मैपिंग और तार्किक विसंगति वाले मतदाताओं’ की अलग सूची भी उपलब्ध है, इसलिए प्रशासन के पास इस तरह के सत्यापन का संस्थागत आधार मौजूद है।

इसी तरह भूमि रिकॉर्ड को मतदाता सूची से जोड़कर देखने पर यह पता लगाया जा सकता है कि जिन बाहरी लोगों के बसने की शिकायत है, वे कब गांव में आए, किस जमीन पर रह रहे हैं, जमीन का हस्तांतरण वैध था या नहीं और मतदाता के रूप में पंजीकरण के समय उनका सामान्य निवास क्या था। केवल यह तथ्य कि कोई व्यक्ति दूसरे राज्य से आया है, मतदाता बनने को अवैध नहीं बनाता। भारतीय नागरिक अपने सामान्य निवास वाले निर्वाचन क्षेत्र में निर्धारित शर्तों के अनुसार मतदाता पंजीकरण करा सकता है। इसलिए जांच का प्रश्न व्यक्ति का मूल राज्य या धर्म नहीं बल्कि नागरिकता, सामान्य निवास और मतदाता पंजीकरण की वैधानिकता होना चाहिए।

बघाड़ू और पनौरा के आंकड़े इस अर्थ में महत्वपूर्ण हैं कि 23 वर्षों में दोनों गांवों की मतदाता संरचना में मापने योग्य बदलाव हुआ है। बघाड़ू में मुस्लिम मतदाता 430 से 902 और पनौरा में 359 से 496 हुए हैं, जबकि जनजातीय जमीन के कुछ हस्तांतरणों में प्रशासन ने वास्तविक अनियमितताएं भी पाई हैं। लेकिन इन दोनों तथ्यों के बीच सीधा कारण संबंध अभी जांच से स्थापित होना बाकी है। सही तस्वीर तभी सामने आएगी जब प्रशासन 2003 और 2026 की मतदाता सूचियों, जन्म-मृत्यु और प्रवासन, निवास प्रमाण, जमीन के बैनामों और SIR में जुड़े प्रत्येक नए मतदाता का मिलान करे—क्योंकि मतदाता संख्या में किसी समुदाय की तेज वृद्धि अपने आप न तो अवैध बसावट का प्रमाण है और न ही जनसांख्यिकीय साजिश का, जबकि फर्जी दस्तावेज, अवैध भूमि हस्तांतरण या गलत मतदाता पंजीकरण यदि प्रमाणित होते हैं तो वे धर्म से परे स्पष्ट कानूनी कार्रवाई के विषय हैं।

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