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खनन पट्टा फर्जीवाड़े का आरोप: इस्तीफा देने के बाद भी पूर्व निदेशक के नाम पर करोड़ों का कारोबार
Sonbhadra News: सोनभद्र में खनन पट्टा आवंटन और कंपनी दस्तावेजों को लेकर बड़े फर्जीवाड़े के आरोप सामने आए हैं। पूर्व निदेशक द्वारा इस्तीफे के बाद भी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर खनन संचालन जारी रखने का मामला जांच के घेरे में है।
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Sonbhadra News: जनपद के खनन क्षेत्र में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने खनन विभाग की कार्यप्रणाली और पट्टा आवंटन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक निजी कंपनी के पूर्व निदेशक ने पद से हटाए जाने के बावजूद खुद को निदेशक बताकर न केवल सरकारी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए, बल्कि करोड़ों रुपये के खनन पट्टों का संचालन भी जारी रखा। शिकायत जिलाधिकारी तक पहुंचने के बाद मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच निष्पक्ष होगी या फिर मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा।
चार साल बाद खुला फर्जीवाड़े का कथित राज
सीएम, डीएम समेत अन्य को भेजी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि मेसर्स ओमैक्स मिनरल्स प्राइवेट लिमिटेड को ग्राम बिल्ली मारकुंडी, तहसील ओबरा में 2.20 हेक्टेयर क्षेत्रफल में डोलोस्टोन खनन का दस वर्षीय पट्टा वर्ष 2022 में स्वीकृत हुआ था। इस पट्टे से जुड़े माइनिंग प्लान, पर्यावरणीय स्वीकृति, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सहमति, डीजीएमएस अनुमति तथा रजिस्ट्री डीड समेत सभी दस्तावेजों पर कंपनी की ओर से तत्कालीन निदेशक सचिन अग्रवाल के हस्ताक्षर दर्ज हैं।शिकायतकर्ता का दावा है कि ऑनलाइन उपलब्ध कंपनी रिकॉर्ड के अनुसार सचिन अग्रवाल ने 14 नवंबर 2022 को कंपनी के निदेशक पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बावजूद उनके नाम से आज तक विभागीय पत्राचार और खनन संबंधी प्रक्रियाएं संचालित की जा रही हैं।
बालू पट्टे की रजिस्ट्री पर भी उठाए जा रहे हैं सवाल
मामले का सबसे गंभीर पहलू खेबंधा क्षेत्र में संचालित बालू-मोरम खनन पट्टा बताया जा रहा है। शिकायत के अनुसार ग्राम खेबंधा में सात हेक्टेयर क्षेत्रफल का पांच वर्षीय बालू-मोरम खनन पट्टा 9 जनवरी 2023 से स्वीकृत हुआ था, जिसकी रजिस्ट्री 23 जनवरी 2023 को हुई।शिकायतकर्ता का आरोप है कि रजिस्ट्री के समय सचिन अग्रवाल कंपनी के निदेशक नहीं थे, फिर भी उन्होंने कंपनी की ओर से निदेशक के रूप में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए। यदि जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है तो रजिस्ट्री डीड की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है और पिछले तीन वर्षों में हुए खनन को लेकर भी गंभीर कानूनी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि कंपनी में निदेशक बदल चुके थे तो इसकी सूचना खनन विभाग, जिला प्रशासन और अन्य संबंधित विभागों को क्यों नहीं दी गई? और यदि सूचना नहीं दी गई तो विभागीय अधिकारियों ने इतने वर्षों तक किस आधार पर पूर्व निदेशक के हस्ताक्षरों वाले दस्तावेज स्वीकार किए? अफसरों के यहां इसकी शिकायत पहुंची तो मामले में अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
कंपनी नियमों का भी बताया जा रहा है उल्लंघन
खनन क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि किसी कंपनी के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता और निदेशक मंडल में बदलाव की जानकारी संबंधित विभागों को देना अनिवार्य प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है। ऐसे में यदि शिकायत में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल कंपनी का मामला नहीं रहेगा बल्कि विभागीय निगरानी व्यवस्था भी कठघरे में खड़ी होगी।शिकायतकर्ता ने जिलाधिकारी से दोनों खनन पट्टों में तत्काल खनन और परिवहन पर रोक लगाने, पिछले वर्षों में हुए कार्यों की जांच कराने, आर्थिक क्षतिपूर्ति निर्धारित करने, पट्टों को निरस्त करने तथा कंपनी, पूर्व निदेशक और कथित रूप से संलिप्त अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है। साथ ही कंपनी को ब्लैकलिस्ट किए जाने की भी मांग उठाई गई है।
जिलाधिकारी ने लिया संज्ञान, खान अधिकारी को सौंपी जांच
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिलाधिकारी ने खान अधिकारी कमलेश कमल को जांच सौंपते हुए 2 जून तक प्रकरण के निस्तारण का निर्देश दिया है। प्रशासनिक स्तर पर यह कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि शिकायत सीधे खनन पट्टों की वैधता और विभागीय कार्यप्रणाली से जुड़ी हुई है।
जांच रिपोर्ट पर टिकी सबकी नजर
खनन कारोबार से जुड़े लोगों और आम नागरिकों के बीच अब इस बात को लेकर चर्चाएं तेज हैं कि क्या जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी या फिर पूरे मामले की तह तक पहुंचकर जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जाएगी। यदि दस्तावेजों में कथित फर्जीवाड़े और गलत जानकारी के आधार पर खनन संचालन की पुष्टि होती है तो यह मामला जिले के सबसे बड़े खनन विवादों में शामिल हो सकता है।
बड़ा सवाल... हट चुके निदेशक के नाम पर कैसे चल रहा कारोबार.. ?
क्या निदेशक पद से हटने के बाद भी किसी व्यक्ति के हस्ताक्षर पर करोड़ों रुपये का खनन कारोबार चलता रहा? यदि हां, तो इसकी जिम्मेदारी केवल कंपनी की होगी या फिर उन अधिकारियों की भी जिन्होंने वर्षों तक आंख मूंदकर दस्तावेजों को स्वीकार किया? अब दो जून को दाखिल की जाने वाली जांच रिपोर्ट अब इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम दस्तावेज साबित हो सकती है। इस मामले में ज्येष्ठ खान अधिकारी और सवालों के घेरे में बताए जा रहे सचिन अग्रवाल से संपर्क का प्रयास किया गया लेकिन वह उपलब्ध नहीं हुए।


