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Sonbhadra News: पीएसपी परियोजनाओं का विरोध, 3,147 हेक्टेयर जमीन और लाखों पेड़ों पर मंडराया संकट
Sonbhadra News: सोनभद्र में प्रस्तावित पीएसपी परियोजनाओं को लेकर ग्रामीणों का विरोध तेज हो गया है। स्थानीय लोगों का दावा है कि 3,147 हेक्टेयर भूमि और लाखों पेड़ों पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे पर्यावरण और आजीविका प्रभावित हो सकती है।
Sonbhadra News(Photo-Social Media)
Sonbhadra News: जिले में प्रस्तावित पंप्ड स्टोरेज पावर (पीएसपी) परियोजनाओं को लेकर विरोध की आवाज अब गांवों की चौपालों से निकलकर बड़े जनआंदोलन का रूप लेने लगी है। हजारों हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण और बड़े पैमाने पर संभावित वन कटान को लेकर ग्रामीणों, किसानों और आदिवासी समुदायों में गहरी बेचैनी है। गुरुवार को किसान नौजवान संघर्ष मोर्चा के संयोजक संदीप मिश्रा ने प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर ग्रामीणों से संवाद किया और परियोजनाओं को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
संदीप मिश्रा ने कहा कि एक ओर देशभर में पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण को बढ़ावा देने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सोनभद्र की पहाड़ियों और जंगलों में हजारों-लाखों पेड़ों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। उनका कहना है कि यदि इन परियोजनाओं को मौजूदा स्वरूप में लागू किया गया तो इसका प्रभाव केवल जमीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र और स्थानीय जीवन पर पड़ेगा।
उन्होंने बताया कि जिले में विभिन्न निजी और सरकारी कंपनियों द्वारा प्रस्तावित पीएसपी परियोजनाओं के लिए कुल 3,147 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की गई है। इनमें ग्रीनको के लिए 700 हेक्टेयर, जेएसडब्ल्यू के लिए 575 हेक्टेयर, अडानी के लिए 237 हेक्टेयर, अबाडा के लिए 275 हेक्टेयर, अमुनोरा के लिए 334 हेक्टेयर, टोरेंट सशनई के लिए 375 हेक्टेयर, टोरेंट शोमा के लिए 350 हेक्टेयर तथा टीएचडीसी के लिए 301 हेक्टेयर भूमि प्रस्तावित है।
ग्रामीणों का आरोप है कि इन परियोजनाओं की जद में आने वाली भूमि केवल कागजों पर दर्ज रकबा नहीं, बल्कि उनकी पीढ़ियों की आजीविका, खेती-किसानी, पशुपालन और वन आधारित जीवन का आधार है। उनका कहना है कि पहाड़, जंगल और जलस्रोत नष्ट हुए तो हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा।
प्रभावित क्षेत्रों में आयोजित बैठकों और प्रदर्शनों में ग्रामीणों ने एक स्वर में कहा कि विकास का विरोध नहीं है, लेकिन ऐसा विकास स्वीकार्य नहीं हो सकता जो स्थानीय लोगों को विस्थापन, बेरोजगारी और पर्यावरणीय संकट की ओर धकेल दे। लोगों ने मांग की कि परियोजनाओं पर आगे बढ़ने से पहले स्थानीय जनता की सहमति, पर्यावरणीय प्रभाव और सामाजिक परिणामों का निष्पक्ष आकलन किया जाए। संदीप मिश्रा ने कहा कि यह लड़ाई केवल जमीन बचाने की नहीं, बल्कि सोनभद्र की प्राकृतिक पहचान, जल-जंगल-जमीन और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बचाने की लड़ाई है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि ग्रामीणों की चिंताओं को नजरअंदाज किया गया तो आंदोलन को जिला मुख्यालय से लेकर लखनऊ और दिल्ली तक ले जाया जाएगा।
उन्होंने कहा, “किसी भी गरीब का आशियाना उजड़ने नहीं दिया जाएगा। जनता के हितों की कीमत पर होने वाले किसी भी निर्णय का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जाएगा। विकास तभी सार्थक है जब उसमें स्थानीय लोगों की भागीदारी और सहमति शामिल हो।” कार्यक्रम में रामसूरत खरवार, लक्षन खरवार, योगेन्द्र, बिन्दू खरवार, मुखलाल चेरो, राधा पनिका, गीता, मनोज निषाद, राजू पासवान सहित बड़ी संख्या में आदिवासी एवं वनवासी परिवारों के लोग मौजूद रहे। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि ऊर्जा उत्पादन और विकास की महत्वाकांक्षी योजनाओं के बीच क्या सोनभद्र के जंगल, जलस्रोत और हजारों ग्रामीण परिवारों के हित सुरक्षित रह पाएंगे, या फिर विकास की कीमत उन्हें अपने अस्तित्व से चुकानी पड़ेगी?


