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Prayagraj News: तुलसीदास ने सुलझाया था टोडरमल के परिवार का संपत्ति विवाद, अवधी में लिखा था समझौता
Prayagraj News: प्रयागराज में तुलसीदास से जुड़ा दुर्लभ संधिपत्र आज भी सुरक्षित है, जिसे टोडरमल के परिवार का विवाद सुलझाने और उनकी हस्तलिपि के प्रमाण का आधार माना जाता है भी है।
तुलसीदास ने सुलझाया था टोडरमल के परिवार का संपत्ति विवाद, अवधी में लिखा था समझौता पत्र (Photo- Social Media)
Prayagraj News: सनातन धर्म और हिंदी साहित्य के अमर महाकाव्य 'श्रीरामचरितमानस' के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास को पूरी दुनिया एक महान संत, भक्त और कवि के रूप में जानती है। लेकिन उनका व्यक्तित्व केवल धर्म और अध्यात्म तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वे व्यावहारिक जीवन और सामाजिक मामलों में भी अत्यंत निपुण और न्यायप्रिय मार्गदर्शक थे। मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल के दौरान उन्होंने उस समय के सबसे प्रतिष्ठित परिवारों में से एक—अकबर के नवरत्नों में शामिल राजा टोडरमल—के पारिवारिक संपत्ति विवाद को न केवल सुलझाया, बल्कि स्वयं अपने हाथों से अवधी भाषा में समझौता पत्र (संधि-पत्र) भी तैयार किया था।
इस ऐतिहासिक और विधिक दस्तावेज पर तत्कालीन काजी ने फारसी भाषा में मुहर और हस्ताक्षर कर इसे कानूनी मान्यता प्रदान की थी। बतौर एक दुर्लभ न्यायिक रिकॉर्ड (Judicial Record), इस संधिपत्र की छाया प्रति (Photocopy/Replica) आज भी इलाहाबाद हाईकोर्ट के विधि संग्रहालय (Law Museum) में संरक्षित और प्रदर्शित है।
टोडरमल के बुलावे पर बने मध्यस्थ, अवधी में लिखा संधिपत्र
गोस्वामी तुलसीदास का अधिकांश जीवन काशी (वाराणसी), प्रयाग (प्रयागराज) और अयोध्या में व्यतीत हुआ। मुगल काल में जब अकबर के वित्त मंत्री (दीवान) और नवरत्न राजा टोडरमल के परिवार में संपत्ति के बंटवारे को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हुआ, तो उन्होंने तुलसीदास को एक निष्पक्ष और सम्मानित बुजुर्ग मध्यस्थ के रूप में आमंत्रित किया:
तुलसीदास और टोडरमल के संबंध: दोनों के बीच अत्यंत आत्मीय और गहरे संबंध थे।
अवधी और फारसी का संगम: तुलसीदास ने दोनों पक्षों की बात सुनकर संपत्ति का न्यायसंगत बंटवारा किया और पूरे समझौते का मसौदा अपनी हस्तलिपि में तत्कालीन लोकभाषा अवधी में लिखा।
काजी की मुहर और कानूनी मान्यता: उस दौर में न्यायालयीन और प्रशासनिक भाषा फारसी थी। इसलिए तुलसीदास द्वारा लिखे गए इस संधिपत्र को कानूनी वैधता देने के लिए तत्कालीन काजी ने उस पर फारसी में अपना आदेश दर्ज कर विधिवत मुहर लगाई और हस्ताक्षर किए।
दस्तावेजों का संरक्षण: इस संधिपत्र की मूल हस्तलिखित प्रति वाराणसी स्थित ऐतिहासिक 'रामनगर किला संग्रहालय' (Ramnagar Fort Museum) में सुरक्षित रखी गई है, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के संग्रहालय में इसे विधिक इतिहास के महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में सहेजा गया है।
हस्तलिपि (Handwriting) मिलान का एकमात्र प्रामाणिक आधार
यह दस्तावेज केवल एक कानूनी रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि साहित्यिक और ऐतिहासिक शोध के क्षेत्र में तुलसीदास की प्रामाणिक लिखावट का एकमात्र 'गोल्ड स्टैंडर्ड' (मानक आधार) माना जाता है:
हस्तलेख प्रमाणीकरण का पैमाना: देश के पूर्व अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल और वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक मेहता के अनुसार, भारत में कई स्थानों पर तुलसीदास द्वारा लिखी गई पांडुलिपियों या ग्रंथों के होने का दावा किया जाता है। जब भी तुलसीदास की वास्तविक हस्तलिपि को लेकर कोई अकादमिक या कानूनी विवाद उठता है, तो इसी संधिपत्र की लिखावट को आधार बनाकर मिलान (Handwriting Verification) किया जाता है।
विद्वानों का शोध: पूर्व में राजस्थान के एक प्रख्यात इतिहासकार और शोधकर्ता ने भी तुलसीदास की कृतियों की प्रामाणिकता जांचने के लिए इसी दस्तावेज का सहारा लिया था।
प्रयागराज से प्रगाढ़ हुई थी रामभक्ति, भरद्वाज आश्रम में सुनी थी कथा
तुलसीदास के आध्यात्मिक जीवन के निर्माण में तीर्थराज प्रयाग का अत्यंत केंद्रीय स्थान रहा है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. डी.पी. दुबे के अनुसार:
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥
माघ मेले का प्रभाव: तुलसीदास ने प्रयागराज में माघ मेले के दौरान महर्षि भरद्वाज के आश्रम में बैठकर ही विधिवत रामकथा का श्रवण और मनन किया था। यहीं से उनकी रामभक्ति को नई गहराई और दिशा मिली।
मानस की यात्रा: इसके पश्चात उन्होंने अयोध्या जाकर संवत 1631 (1574 ई.) में 'श्रीरामचरितमानस' के लेखन का शुभारंभ किया और काशी (वाराणसी) के गंगा घाट पर इसका समापन किया। उनकी स्मृति और साधना के सम्मान में बाद में उस घाट का नामकरण 'तुलसी घाट' किया गया।
यह ऐतिहासिक संधिपत्र सिद्ध करता है कि तुलसीदास जितने उच्च कोटि के संत और कवि थे, उतने ही कुशल, व्यावहारिक और न्यायप्रिय समाज-सुधारक भी थे।


