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UP Assembly Election 2027: समय से पहले मतदान या जनगणना के चक्रव्यूह में फंसेगी तारीखें?
UP Assembly Election 2027: क्या उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव समय से पहले होंगे? या फिर चुनाव अपने तय समय पर ही कराए जाएंगे?
UP Assembly Election 2027 Early Polls or Census Impact
UP Assembly Election 2027: क्या उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव समय से पहले होंगे? या फिर चुनाव अपने तय समय पर ही कराए जाएंगे? यह सवाल इन दिनों देश और प्रदेश के सियासी गलियारों में सबसे बड़ा जेर-ए-बहस (चर्चा का विषय) बना हुआ है। राजनीतिक हलकों में इस बात की प्रबल उम्मीद और गुंजाइश दिखाई दे रही है कि चुनाव समय से पहले, यानी दिसंबर 2026 या जनवरी 2027 में ही करा लिए जाएं। परंतु, सवाल यह उठता है कि इस तरह की अटकलों और गुंजाइशों के पीछे का असल सच और तकनीकी तथ्य क्या हैं? आज हम इसी की पूरी तरह से पड़ताल करते हैं।
संवैधानिक स्थिति और तय समय-सीमा
उत्तर प्रदेश में 18वीं विधानसभा के गठन के लिए पिछला चुनाव साल 2022 में 10 फरवरी से 7 मार्च के बीच कुल 7 चरणों में कराया गया था, जिसके नतीजे 10 मार्च 2022 को घोषित हुए थे। वर्तमान विधानसभा की पहली बैठक यानी इसका आधिकारिक गठन 23 मई, 2022 को हुआ था।
संवैधानिक नियम: संविधान के अनुसार, किसी भी राज्य की विधानसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक से अधिकतम 5 वर्ष का होता है। इस हिसाब से मौजूदा यूपी विधानसभा का कार्यकाल 22 मई, 2027 को समाप्त हो जाएगा। चुनाव आयोग की जिम्मेदारी: निर्वाचन आयोग का यह दायित्व है कि वह मियाद के खत्म होने से पहले ही चुनावी प्रक्रिया पूरी कर नई विधानसभा का गठन सुनिश्चित करे। पारंपरिक चुनावी शेड्यूल: यूपी जैसे विशाल राज्य में चुनाव कराने में कम से कम 1 से 1.5 महीने का समय लगता है। इस लिहाज से सामान्य परिस्थितियों में चुनाव आयोग को फरवरी 2027 के शुरुआती हफ्तों से मार्च 2027 के मध्य तक मतदान और परिणाम की प्रक्रिया पूरी कर लेनी चाहिए, ताकि मई में समय रहते नई सरकार का शपथ ग्रहण हो सके।
सबसे बड़ा व्यावहारिक पेंच: 2027 की महा-जनगणना इस पूरे सामान्य चुनावी चक्रव्यूह में सबसे बड़ा पेंच है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के फैसले के मुताबिक साल 2027 की शुरुआत में जनगणना के दूसरे चरण का काम तय किया गया है। इस चरण को तकनीकी भाषा में 'जनसंख्या गणना' कहा जाता है।
उत्तर प्रदेश सहित देश के अधिकांश राज्यों में जनगणना का यह मुख्य चरण फरवरी 2027 में शुरू होगा। जनगणना के मुख्य क्षण (Census Moment): यह काम 1 मार्च 2027 को ठीक 00:00 बजे समाप्त माना जाएगा, जिसे आधिकारिक तौर पर 'जनगणना का मुख्य क्षण' कहा जाता है। इसके बाद छूटे हुए लोगों को गिनने के लिए 1 से 5 मार्च 2027 तक एक छोटा सा 'रिवीजन राउंड' चलाया जाता है।
दोहरी चुनौती यानी जातीय जनगणना: इस बार की जनगणना दो कारणों से ऐतिहासिक है। पहला, कोरोना महामारी के कारण यह अपने तय समय (2021) से पांच साल के विलंब से हो रही है। दूसरा, इस बार केंद्र सरकार इसमें जातीय जनगणना का इनपुट भी शामिल कर रही है।
सिर्फ एक बार ही टली है गिनती: भारत के आधुनिक इतिहास में साल 1881 से शुरू हुई नियमित दशकीय जनगणना को पूरी तरह रोकने या टालने का उदाहरण केवल एक ही बार सामने आया है, जिसे अब आगे बढ़ाकर 2026-2027 में कराया जा रहा है। इससे पहले, द्वितीय विश्वयुद्ध (1941) के दौरान भारी वित्तीय संकट और अनिश्चितता के बावजूद ब्रिटिश सरकार ने जनगणना को टाला नहीं था, बल्कि सीमित संसाधनों के साथ पूरा किया था।
कानूनी मजबूरियाँ: यदि गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग जनगणना की इन तारीखों में कोई बड़ा फेरबदल नहीं करते हैं, तो फरवरी-मार्च 2027 के दौरान यूपी में चुनाव कराना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाएगा। भारत में चुनाव प्रक्रिया जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के कड़े कानूनी प्रावधानों के तहत संचालित होती है।
तय नियमों के मुताबिक, चुनाव की घोषणा से लेकर नतीजों तक कम से कम 45 से 60 दिन (लगभग 2 महीने) का समय अनिवार्य रूप से लगता है।
चुनावी शेड्यूल का गणित: अधिसूचना के बाद चुनावी चरण तय कानूनी समय-सीमा में शुरू हो जाते हैं। गजट अधिसूचना चुनाव की घोषणा के 1 से 2 सप्ताह बाद जारी होती है। नामांकन की आख़िरी तारीख, अधिसूचना जारी होने के सात दिन बाद यानी आठवें दिन होती है। नामांकन पत्रों की जांच नौवें दिन होती है और नाम वापसी की अंतिम तिथि ग्यारहवें दिन होती है। इसके बाद मतदान की तारीख कम से कम चौदह दिनों का अनिवार्य गैप देकर तय की जाती है।


