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BAMS रजिस्ट्रेशन में बड़ा फर्जीवाड़ा: 50 से ज्यादा संदिग्ध, 15 महीने में सिर्फ एक एफआईआर
AYUSH Registration Scam: उत्तर प्रदेश में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर BAMS डॉक्टरों के पंजीकरण का मामला सामने आया है। 41 संदिग्ध रजिस्ट्रेशन चिन्हित होने के बाद भी अब तक सिर्फ एक FIR दर्ज हुई है।
Medical Scam
AYUSH Registration Scam: उत्तर प्रदेश में आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति से जुड़े डॉक्टरों के पंजीकरण में गंभीर गड़बड़ी का मामला सामने आया है। आरोप है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर BAMS डिग्रीधारी बताकर 50 से अधिक लोगों ने रजिस्ट्रेशन हासिल कर लिया, लेकिन मामला सामने आने के करीब 15 महीने बाद भी कार्रवाई बेहद धीमी है। राष्ट्रीय स्तर की जांच टीम द्वारा 41 संदिग्ध रजिस्ट्रेशन चिन्हित किए जाने के बावजूद अब तक केवल प्रतापगढ़ में एक एफआईआर दर्ज हुई है।
करीब एक वर्ष तीन महीने पहले नेशनल कमिशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन की एक टीम ने जांच के दौरान 41 ऐसे पंजीकरण चिन्हित किए थे, जिनमें दस्तावेज संदिग्ध पाए गए। इसके बाद राज्य के लगभग 40 जिलों के क्षेत्रीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी अधिकारियों को संबंधित लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने के निर्देश दिए गए, लेकिन अधिकांश जिलों में मामला आगे नहीं बढ़ा।
अब यह प्रकरण दोबारा सामने आने के बाद आयुष विभाग ने जिलों से रिपोर्ट तलब की है। आयुष मंत्री दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ने भी निदेशक से लेकर प्रमुख सचिव स्तर तक अधिकारियों से जवाब मांगा है।
फर्जी दस्तावेजों से रजिस्ट्रेशन का आरोप
आयुर्वेदिक एवं यूनानी तिब्बी चिकित्सा पद्धति बोर्ड के उपाध्यक्ष डॉ. शैलेश कुमार राय ने दावा किया है कि पिछले वर्ष पकड़े गए 41 मामलों के अलावा भी कई पंजीकरण संदेह के दायरे में हैं। उनका कहना है कि यदि व्यापक जांच कराई जाए तो और गड़बड़ियां सामने आ सकती हैं।
इस पूरे मामले में विभागीय प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। नियमों के अनुसार यदि किसी डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर पाया जाता है तो उसे निरस्त करने का मामला बोर्ड के समक्ष रखा जाना चाहिए। आरोप है कि कुछ मामलों में अधिकारियों ने अपने स्तर पर ही रजिस्ट्रेशन निरस्त कर दिए और बोर्ड पदाधिकारियों को इसकी जानकारी तक नहीं दी।
जब फर्जीवाड़ा लखनऊ में हुआ तो FIR जिलों में क्यों?
डॉ. राय का कहना है कि संदिग्ध दस्तावेज लखनऊ कार्यालय में जमा हुए, सत्यापन प्रक्रिया यहीं हुई और पोर्टल पर सूचनाएं भी यहीं से अपलोड की गईं। ऐसे में उनके मुताबिक सभी आरोपितों के खिलाफ एक ही स्थान पर मुकदमा दर्ज कर विस्तृत जांच कराई जानी चाहिए थी।
उनका आरोप है कि इसके बजाय मुख्यालय ने अलग-अलग जिलों को पत्र भेजकर कार्रवाई की जिम्मेदारी वहां के अधिकारियों पर डाल दी, जिससे जांच बिखर गई और मामलों में प्रभावी प्रगति नहीं हो सकी। उन्होंने इसे प्रशासनिक लापरवाही बताया है।
एक ही पत्र पर 40 अभ्यर्थियों का सत्यापन कैसे?
जांच में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि 41 संदिग्धों में से 40 का सत्यापन कथित रूप से एक ही पत्र के आधार पर किया गया था। इस तथ्य ने पूरे रजिस्ट्रेशन सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
यदि अलग-अलग अभ्यर्थियों की शैक्षणिक पात्रता और दस्तावेज अलग-अलग थे, तो एक ही पत्र में इतने लोगों का सत्यापन किस प्रक्रिया के तहत हुआ, यह अब जांच का विषय है। यह भी देखा जा रहा है कि क्या किसी स्तर पर जानबूझकर नियमों को दरकिनार किया गया या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही थी।
सिर्फ पंजीकरण का मामला नहीं, मरीजों की सुरक्षा भी जुड़ी
BAMS डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन केवल शैक्षणिक पात्रता का प्रमाण नहीं होता, बल्कि इसके आधार पर व्यक्ति चिकित्सा अभ्यास करता है और मरीजों का इलाज करता है। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति फर्जी दस्तावेजों के आधार पर डॉक्टर के रूप में पंजीकृत हो जाए तो यह सीधे मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा मामला बन जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में केवल रजिस्ट्रेशन निरस्त करना पर्याप्त नहीं है। यह भी जांच होनी चाहिए कि संबंधित व्यक्ति ने कितने समय तक चिकित्सा अभ्यास किया, किन संस्थानों से जुड़ा रहा और क्या उसके इलाज से किसी मरीज को नुकसान पहुंचा।
अब मंत्री ने मांगा जवाब
आयुष मंत्री ने पुराने मामलों में एफआईआर न होने, जांच की धीमी गति और संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर रिपोर्ट मांगी है। विभागीय स्तर पर यह भी देखा जा रहा है कि जिन जिलों को कार्रवाई के निर्देश दिए गए थे, वहां किन कारणों से मुकदमे दर्ज नहीं हुए।
अब निगाह इस बात पर है कि मामला केवल विभागीय स्पष्टीकरण तक सीमित रहता है या फर्जी रजिस्ट्रेशन कराने वालों के साथ-साथ उन्हें पंजीकरण दिलाने में मदद करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी तय की जाती है।
यह प्रकरण उत्तर प्रदेश में आयुष चिकित्सा पंजीकरण व्यवस्था की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। यदि इतने बड़े पैमाने पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर रजिस्ट्रेशन संभव हुआ, तो सबसे बड़ा सवाल यही है—गड़बड़ी केवल कागजों में थी या सिस्टम के भीतर भी कोई संगठित चूक मौजूद थी?


