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UP Biogas Plant Scheme: यूपी में लगेंगे 1 लाख बायोगैस प्लांट, गोबर से होगी कमाई
UP Biogas Plant Scheme: उत्तर प्रदेश में 1 लाख बायोगैस संयंत्र लगाने की योजना है। जानें गोबर से गैस, जैविक खाद और किसानों की अतिरिक्त कमाई का मॉडल।
UP Biogas Plant Scheme: 1 Lakh Biogas Plants to Boost Farmers’ Income and Soil Health
UP Biogas Plant Scheme: कभी कृषि प्रधान देश भारत में खेती का पूरा आधार जैविक खाद हुआ करती थी। खेतों में पशुओं का गोबर, फसल अवशेष और पत्तियों से तैयार यह खाद अनाज के गुणों में वृद्धि के साथ मिट्टी को पोषण देती थी। खेती के हजारों साल के सफर में खाद का यह प्राकृतिक तरीका धीरे-धीरे यूरिया, डीएपी और दूसरे रासायनिक उर्वरकों तक पहुंचा। 20वीं सदी में बढ़ती आबादी और खाद्यान्न उत्पादन की जरूरत ने रासायनिक खादों के इस्तेमाल को तेजी से बढ़ाया, लेकिन लंबे समय तक इनके अत्यधिक इस्तेमाल ने मिट्टी की सेहत और प्राकृतिक उर्वरता को लेकर नई चिंताएं भी खड़ी कीं। अब एक बार फिर खेती को प्राकृतिक संसाधनों से जोड़ने की कोशिश हो रही है। इसी बदलते दौर में उत्तर प्रदेश में गोबर को सिर्फ कचरा नहीं, बल्कि ऊर्जा, जैविक खाद और ग्रामीण कमाई का जरिया बनाने की तैयारी है।
उत्तर प्रदेश में गोवंश संरक्षण को अब केवल गौशालाओं तक सीमित रखने के बजाय इसे ग्रामीण रोजगार, प्राकृतिक खेती और किसानों की अतिरिक्त आय से जोड़ने की तैयारी है। इसी कड़ी में प्रदेश में एक लाख बायोगैस संयंत्र लगाए जाने की योजना सामने आई है। उत्तर प्रदेश गौसेवा आयोग के उपाध्यक्ष रमाकांत उपाध्याय के मुताबिक, इन संयंत्रों के जरिए गोबर का इस्तेमाल ऊर्जा और जैविक खाद बनाने में किया जाएगा। इससे गांवों में स्थानीय स्तर पर संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ेगा और खेती में रासायनिक खाद पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
गौशालाओं की व्यवस्था सुधारने पर जोर
रमाकांत उपाध्याय ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर गौसेवा आयोग की टीम प्रदेश की विभिन्न गौशालाओं का दौरा कर व्यवस्थाओं का जायजा ले रही है। उनका कहना है कि गौशालाओं में गोवंश के लिए पर्याप्त और पौष्टिक चारा, चोकर, स्वच्छ पानी और साफ-सफाई की व्यवस्था प्राथमिकता में है।
कमजोर और बीमार पशुओं के लिए अलग व्यवस्था बनाने के साथ छोटे बछड़ों के लिए विशेष स्थान, आइसोलेशन वार्ड और घायल गोवंश को उठाने के लिए लिफ्ट जैसी सुविधाओं पर भी जोर दिया जा रहा है। गौशालाओं के संचालन में समाजसेवियों, संतों और सामाजिक संस्थाओं की भागीदारी बढ़ाने की भी कोशिश की जा रही है।
गोबर से बनेगी गैस, खाद और जीवामृत
योजना का अहम हिस्सा गोबर को उपयोगी संसाधन के तौर पर इस्तेमाल करना है। बायोगैस संयंत्र में गोबर से गैस तैयार की जा सकती है, जिसका उपयोग खाना पकाने और अन्य घरेलू जरूरतों के लिए किया जा सकता है। प्रक्रिया के बाद बचने वाला स्लरी पदार्थ जैविक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
आयोग के उपाध्यक्ष के मुताबिक, गोबर से जीवामृत और अन्य जैविक उत्पाद तैयार करने को भी बढ़ावा दिया जाएगा। गोमूत्र और गोबर का इस्तेमाल प्राकृतिक खेती में करने से किसानों को खेत के लिए कुछ इनपुट स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो सकते हैं। हालांकि, रासायनिक खाद की जगह जैविक या प्राकृतिक विकल्पों को बड़े स्तर पर अपनाने के लिए किसानों को सही प्रशिक्षण और वैज्ञानिक मार्गदर्शन देना भी जरूरी होगा।
तकनीकी अध्ययन के बाद तय होगी सब्सिडी की व्यवस्था
एक लाख बायोगैस संयंत्रों को लेकर तकनीकी अध्ययन पूरा किए जाने के बाद अलग-अलग जिलों में किसानों को सब्सिडी के आधार पर संयंत्र उपलब्ध कराने की योजना है। इसका मकसद ऐसे मॉडल को बढ़ावा देना है, जिसमें किसान गोवंश से मिलने वाले संसाधनों का इस्तेमाल ऊर्जा और खेती दोनों में कर सके।
बायोगैस संयंत्र की उपयोगिता स्थानीय स्तर पर उपलब्ध गोबर, पानी, पशुओं की संख्या और संयंत्र के आकार पर निर्भर करती है। इसलिए जिलावार जरूरत और तकनीकी व्यवहार्यता का आकलन योजना को सफल बनाने में महत्वपूर्ण होगा।
दो गाय पालने पर 40 हजार रुपये तक की मदद
सरकार ग्रामीण युवाओं को गोपालन से जोड़ने के लिए जनसहभागिता योजना के तहत आर्थिक सहायता भी दे रही है। रमाकांत उपाध्याय के अनुसार, दो गाय खरीदने पर प्रति गाय 40 हजार रुपये तक की सब्सिडी का प्रावधान है। इसके जरिए युवाओं को गांव में ही आय का साधन विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। दूध से केवल बिक्री के जरिए ही आय नहीं, बल्कि घी, मट्ठा और दूसरे दुग्ध उत्पाद तैयार कर अतिरिक्त कमाई की संभावना भी है। इस मॉडल में पशुपालन के साथ जैविक खाद और बायोगैस जैसे दूसरे आय के स्रोत जोड़ने की कोशिश की जा रही है।
देशी गायों की नस्ल सुधार पर भी फोकस
गोवंश संरक्षण के साथ देशी नस्लों के सुधार पर भी काम किया जा रहा है। आयोग के उपाध्यक्ष ने बताया कि कृत्रिम गर्भाधान के जरिए बेहतर नस्ल विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है। अच्छे सीमन के इस्तेमाल से ऐसी अगली पीढ़ी तैयार करने का लक्ष्य है, जिसमें दूध उत्पादन क्षमता बेहतर हो।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बेहतर नस्ल, उचित पोषण और पशु स्वास्थ्य सेवाओं के साथ डेयरी आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है।
साथ ही उत्तर प्रदेश में प्राकृतिक और जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने के बीच गोबर और गोमूत्र को खेती से जोड़ने की कोशिश किसानों के लिए एक वैकल्पिक मॉडल तैयार कर सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसान पशुपालन, बायोगैस, जैविक खाद और दुग्ध उत्पादों को एक साथ जोड़ पाने में सफल हो पाते हैं, तो एक ही संसाधन से कई स्तरों पर आर्थिक लाभ के स्रोत तैयार होंगे।


