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अजय राय को हटाकर कांग्रेस ने एक साथ क्यों आगे किए ये 4 चेहरे? मोना-मसूद के पीछे 2027 का ‘फॉर्मूला’ क्या?
UP Congress 2027: क्या कांग्रेस केवल प्रदेश अध्यक्ष बदल रही है या 2027 के लिए अपनी पूरी रणनीति का गियर बदल रही है?
UP Congress 2027: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने अचानक ऐसा फैसला लिया है, जिसने पार्टी के भीतर ही नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी और भाजपा के खेमे में भी नई सियासी चर्चा छेड़ दी है। करीब तीन साल से उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाल रहे अजय राय की जगह प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से तीन बार की विधायक आराधना मिश्रा ‘मोना’ को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया है। सहारनपुर से सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है, जबकि देवेंद्र निषाद और आलोक प्रसाद को वरिष्ठ उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है।
ऊपर से देखने पर यह कांग्रेस का सामान्य संगठनात्मक फेरबदल लग सकता है, लेकिन चारों नामों को एक साथ रखकर देखिए तो तस्वीर दिलचस्प हो जाती है। ब्राह्मण चेहरा आराधना मिश्रा, मुस्लिम चेहरा इमरान मसूद, OBC समुदाय से देवेंद्र निषाद और दलित-पासी पृष्ठभूमि से आलोक प्रसाद। यानी कांग्रेस ने 2027 की लड़ाई से पहले प्रदेश नेतृत्व में ही अपना सामाजिक समीकरण दिखाने की कोशिश की है। इंडियन एक्सप्रेस ने भी इस बदलाव को ब्राह्मण-मुस्लिम-OBC-दलित प्रतिनिधित्व और SP की PDA राजनीति के संदर्भ में देखा है।
सवाल यही है कि आखिर चुनाव से कुछ महीने पहले अजय राय को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या कांग्रेस केवल प्रदेश अध्यक्ष बदल रही है या 2027 के लिए अपनी पूरी रणनीति का गियर बदल रही है?
अजय राय क्यों हटे? यहां सबसे पहले एक बात समझना जरूरी
अजय राय को हटाए जाने को उनकी ‘नाकामी’ मान लेना जल्दबाजी होगी। कांग्रेस की आधिकारिक प्रेस रिलीज में उनके खिलाफ कोई कारण नहीं बताया गया है। बदलाव के बाद अजय राय ने भी आराधना मिश्रा को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि कुछ भी स्थायी नहीं होता और उन्होंने अपने कार्यकाल में पूरी मेहनत से काम किया। जागरण की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि राय के काम या नेतृत्व पर सवाल नहीं था और बदलाव को चुनावी-सामाजिक संदेश से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि, इस बदलाव से पहले प्रदेश संगठन में सब कुछ सामान्य भी नहीं था। सितंबर में इंडियन एक्सप्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और UP कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बीच कामकाज की शैली को लेकर मतभेद की खबर दी थी। पार्टी सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट में दोनों के अलग-अलग working styles के कारण friction की बात कही गई थी। इसे अजय राय को हटाए जाने का आधिकारिक कारण नहीं कहा गया है, लेकिन यह उस संगठनात्मक पृष्ठभूमि का हिस्सा जरूर है जिसमें नेतृत्व परिवर्तन हुआ।
इसलिए असली कहानी शायद किसी एक वजह में नहीं, बल्कि कांग्रेस की 2027 की जरूरत में छिपी है।
पहला दांव: आराधना मिश्रा से ब्राह्मण वोटर को संदेश?
आराधना मिश्रा ‘मोना’ प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से लगातार तीन बार विधायक हैं। उनके पिता प्रमोद तिवारी इसी सीट से 1980 से 2012 के बीच नौ बार विधायक रहे। 2022 के विधानसभा चुनाव में भी आराधना ने भाजपा प्रत्याशी को 14,741 वोटों से हराकर यह सीट कांग्रेस के पास रखी थी।
यही वजह है कि कांग्रेस का यह फैसला केवल एक महिला नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने तक सीमित नहीं दिखता।
अजय राय भूमिहार समुदाय से आते हैं, जबकि आराधना मिश्रा प्रदेश में कांग्रेस का प्रमुख ब्राह्मण चेहरा हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक उनके चयन को ब्राह्मण मतदाताओं तक कांग्रेस की पहुंच बढ़ाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
UP की राजनीति में कांग्रेस के लिए यह महत्वपूर्ण प्रयोग है। पार्टी लंबे समय से उस पुराने सामाजिक आधार को दोबारा बनाने की कोशिश करती रही है जिसमें सवर्ण, दलित और अल्पसंख्यक मतदाताओं का महत्वपूर्ण हिस्सा उसके साथ हुआ करता था।
लेकिन केवल ब्राह्मण अध्यक्ष बनाने से वह पुराना समीकरण वापस आएगा, ऐसा मान लेना ठीक नहीं होगा। असली परीक्षा यह होगी कि आराधना संगठन और उम्मीदवार चयन में इस संदेश को जमीन तक कितना पहुंचा पाती हैं।
दूसरा दांव: इमरान मसूद को नंबर-2 बनाकर किसे संदेश?
नई टीम में सबसे ज्यादा राजनीतिक चर्चा शायद इमरान मसूद की होगी। सहारनपुर से लोकसभा सांसद मसूद को प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी अपनी राजनीतिक पहचान है और 2024 में उन्होंने सहारनपुर लोकसभा सीट कांग्रेस के लिए जीती थी। इस नियुक्ति के दो संभावित राजनीतिक संदेश हैं।
पहला: मुस्लिम मतदाताओं को कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि प्रदेश नेतृत्व में उन्हें महत्वपूर्ण हिस्सेदारी दी जा रही है।
दूसरा: यह समाजवादी पार्टी के साथ भविष्य की सीट-बंटवारे की बातचीत में भी कांग्रेस की स्थिति से जुड़ा हो सकता है। Hindustan Times ने इस नियुक्ति को SP के लिए एक संभावित संकेत के रूप में भी विश्लेषित किया है और उल्लेख किया है कि मसूद गठबंधन की राजनीति में SP के कथित ‘बड़े भाई’ वाले रवैये की आलोचना करते रहे हैं।
यहीं 2027 का एक बड़ा सवाल खड़ा होता है क्या कांग्रेस सिर्फ SP के सहारे चुनाव लड़ना चाहती है या गठबंधन में अपनी अलग राजनीतिक ताकत भी दिखाना चाहती है?
मोना और मसूद की जोड़ी इस सवाल को और दिलचस्प बना देती है।
तीसरा चेहरा: देवेंद्र निषाद और OBC की लड़ाई
प्रदेश अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष के बड़े नामों के बीच देवेंद्र निषाद की नियुक्ति को नजरअंदाज करना गलती होगी।
कांग्रेस ने उन्हें वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाया है। निषाद समुदाय उत्तर प्रदेश की OBC राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और खास तौर पर नदी किनारे के कई इलाकों तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश में इस सामाजिक समूह को लेकर BJP, SP और छोटे क्षेत्रीय दलों के बीच लगातार राजनीतिक प्रतिस्पर्धा रही है।
यानी कांग्रेस का संदेश यह हो सकता है कि उसकी रणनीति केवल ब्राह्मण-मुस्लिम समीकरण तक सीमित नहीं रहेगी।
चौथा चेहरा: आलोक प्रसाद के जरिए दलित वोट पर नजर
दूसरे वरिष्ठ उपाध्यक्ष आलोक प्रसाद पासी समुदाय से आते हैं और कांग्रेस में अनुसूचित जाति से जुड़े संगठनात्मक दायित्व भी संभाल चुके हैं। उनकी नियुक्ति को दलित मतदाताओं तक पार्टी की पहुंच बढ़ाने की रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।
यहीं चारों नामों को एक साथ रखिए—
आराधना मिश्रा—ब्राह्मण
इमरान मसूद—मुस्लिम
देवेंद्र निषाद—OBC
आलोक प्रसाद—दलित-पासी
यानी कांग्रेस ने अपने प्रदेश संगठन के शीर्ष पर ही 2027 का संभावित social coalition पेश कर दिया है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि इन समुदायों के मतदाता स्वतः कांग्रेस की तरफ चले जाएंगे। नेतृत्व में प्रतिनिधित्व और वास्तविक वोट ट्रांसफर दो अलग चीजें हैं। चुनाव तक संगठन, उम्मीदवार, गठबंधन और स्थानीय समीकरण तय करेंगे कि इस प्रयोग का कितना असर पड़ता है।
अखिलेश के PDA के बीच कांग्रेस का अपना ‘फॉर्मूला’ क्यों?
यहीं कहानी का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू सामने आता है। समाजवादी पार्टी पहले से PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक राजनीति पर जोर दे रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस की नई UP टीम में ब्राह्मण के साथ मुस्लिम, OBC और दलित प्रतिनिधित्व दिखाई देता है। इंडियन एक्सप्रेस ने इस बदलाव को SP की PDA रणनीति के साथ तालमेल वाले सामाजिक प्रतिनिधित्व के रूप में विश्लेषित किया है।
इसका एक अर्थ गठबंधन के भीतर complementary politics हो सकता है दोनों दल अलग-अलग सामाजिक हिस्सों तक पहुंच बढ़ाएं। लेकिन दूसरा सवाल सीट शेयरिंग का है।
अगर कांग्रेस 2027 में ज्यादा सीटों की दावेदारी करती है तो उसे SP के सामने यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ सहयोगी नहीं बल्कि अपने दम पर भी कुछ सामाजिक समूहों और क्षेत्रों में वोट जोड़ सकती है। ऐसे में नई प्रदेश टीम कांग्रेस के लिए संगठनात्मक बदलाव के साथ negotiating strength बनाने की कोशिश भी साबित हो सकती है। यह फिलहाल राजनीतिक विश्लेषण है, कांग्रेस का घोषित उद्देश्य नहीं।
मोना की नियुक्ति से SP से रिश्ते आसान होंगे या कांग्रेस का दावा मजबूत?
आराधना मिश्रा का एक और पहलू कांग्रेस के लिए उपयोगी हो सकता है। उनके और उनके पिता प्रमोद तिवारी के SP नेतृत्व के साथ सहज संबंधों की चर्चा राजनीतिक हलकों में रही है। मीडिया ने पार्टी रणनीतिकारों के हवाले से लिखा है कि उनकी नियुक्ति SP के साथ coordination में मददगार हो सकती है।इसलिए कांग्रेस ने दिलचस्प संतुलन बनाया है।
एक तरफ मोना हैं, जिन्हें SP से बेहतर coordination के लिहाज से देखा जा रहा है। दूसरी तरफ इमरान मसूद हैं, जो गठबंधन में कांग्रेस की मजबूत हिस्सेदारी की आवाज उठाते रहे हैं। यानी एक चेहरा गठबंधन को जोड़ने में मदद कर सकता है, दूसरा कांग्रेस की bargaining position को मुखर बना सकता है।
फिर अजय राय के लिए आगे क्या?
अजय राय अगस्त 2023 से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष थे। उनके कार्यकाल में 2024 का लोकसभा चुनाव हुआ, जिसमें उत्तर प्रदेश में कांग्रेस-SP गठबंधन ने भाजपा को बड़ा चुनावी झटका दिया था। ऐसे में उन्हें हटाया जाना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करता है। लेकिन अभी तक न तो कांग्रेस ने उनके खिलाफ कोई सार्वजनिक नाराजगी जताई है और न राय ने नेतृत्व परिवर्तन के बाद बगावती संकेत दिए हैं।
उन्होंने नई प्रदेश अध्यक्ष को शुभकामनाएं दी हैं और कहा है कि उनकी “लड़ाई अभी भी जारी है।” इसलिए आगे यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस अजय राय को राष्ट्रीय संगठन, चुनाव अभियान या किसी दूसरे महत्वपूर्ण दायित्व में जगह देती है या नहीं।
असली परीक्षा 4 चेहरों की नहीं, चार वोट-बैंकों की है
कांग्रेस के इस फेरबदल को केवल “अजय राय हटे, आराधना मिश्रा आईं” के रूप में पढ़ना अधूरी तस्वीर होगी। पार्टी ने एक साथ चार सामाजिक संकेत देने की कोशिश की है ब्राह्मण, मुस्लिम, OBC और दलित। साथ ही नेतृत्व में पूर्वांचल/मध्य UP और पश्चिमी UP के बीच क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है। लेकिन उत्तर प्रदेश में राजनीतिक समीकरण कागज पर जितने आसान दिखते हैं, मतदान केंद्र पर उतने होते नहीं हैं।
कांग्रेस के सामने अब तीन बड़ी कसौटियां होंगी नई टीम संगठन में कितनी जान डालती है, SP के साथ सीट-बंटवारे में पार्टी कितनी हिस्सेदारी हासिल करती है और जिन सामाजिक समूहों को नेतृत्व में जगह दी गई है, उनमें कांग्रेस वास्तविक चुनावी समर्थन कितना बढ़ा पाती है।
इसीलिए 2 अक्टूबर का यह संगठनात्मक बदलाव सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष बदलने की खबर नहीं है। 2027 से पहले कांग्रेस ने अपने पत्ते दोबारा फेंटे हैं अब देखना यह है कि मोना-मसूद-निषाद-प्रसाद का यह सामाजिक प्रयोग संगठन और वोट, दोनों स्तरों पर कितना असर पैदा करता है।


