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2027 में छोटे दल छोटे नहीं रहेंगे! निषाद-राजभर से अनुप्रिया तक, BJP के सामने सीटों की चुनौती क्यों?
UP Election 2027: छोटे दलों की बढ़ी ताकत, निषाद-राजभर की सीटों पर BJP से सौदेबाजी क्यों?
Seat Sharing in UP Election: उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनाव अभी दूर है, लेकिन सीटों का हिसाब-किताब अभी से शुरू हो गया है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BJP के सहयोगी दलों ने अपने-अपने हिस्से की जमीन तलाशनी शुरू कर दी है। निषाद पार्टी सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग कर रही है, सुभासपा भी पहले से सीट बंटवारे पर स्पष्टता चाहती रही है और अपना दल (एस) तथा RLD भी NDA के भीतर अपने राजनीतिक आधार के हिसाब से हिस्सेदारी की उम्मीद रखेंगे।
सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि किसे कितनी सीट मिलेगी? असली सवाल यह है कि 403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में सहयोगी दलों की बढ़ती मांग BJP की चुनावी रणनीति को किस तरह प्रभावित कर सकती है?
सीटों की सौदेबाजी इतनी जल्दी क्यों?
आम तौर पर गठबंधन में सीट बंटवारे की बातचीत चुनाव के काफी करीब तेज होती है। लेकिन 2027 के लिए सहयोगी दल अभी से अपना दावा मजबूत करने में जुटे हैं।
जून में निषाद पार्टी और सुभासपा के नेताओं ने BJP नेतृत्व से सीट बंटवारे पर जल्द बातचीत शुरू करने की मांग की थी। दोनों दलों ने अपनी चुनावी तैयारी और संभावित सीटों को लेकर समय से पहले स्पष्टता चाही थी।
इसके पीछे एक सीधा राजनीतिक गणित है जो दल जितनी जल्दी अपनी उपयोगिता साबित करेगा, बातचीत की मेज पर उसका दावा उतना ही स्पष्ट रहेगा।
निषाद पार्टी ने क्यों बढ़ाया दबाव?
सबसे ज्यादा चर्चा फिलहाल संजय निषाद की है। निषाद पार्टी के अध्यक्ष और यूपी सरकार में मंत्री संजय निषाद ने 2027 के लिए पिछली बार से ज्यादा सीटों की मांग की है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर BJP उनके लिए दरवाजा बंद करती है तो उनकी पार्टी दूसरे विकल्पों पर विचार कर सकती है। हालांकि बाद में उन्होंने BJP से अलग होने की अटकलों को खारिज करते हुए निषाद समुदाय के लिए अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाने की मांग पर BJP को ही सक्षम बताया। यानी संदेश दोहरा है गठबंधन भी कायम रहे और बातचीत में दबाव भी बना रहे।
इसी बीच संजय निषाद का सपा नेता माता प्रसाद पांडेय से मिलना भी राजनीतिक चर्चा का विषय बना। निषाद ने इसे शिष्टाचार भेंट बताया, लेकिन ऐसे समय में जब सीट बंटवारे और समुदाय से जुड़े मुद्दों पर बयानबाजी तेज हो, ऐसी मुलाकातें स्वाभाविक रूप से राजनीतिक नजरों में आ जाती हैं।
निषाद वोट की अहमियत क्यों बढ़ी?
निषाद समुदाय को लेकर BJP और विपक्ष दोनों सक्रिय हैं। हालिया घटनाक्रमों में निषाद समुदाय से जुड़े एक हत्या मामले पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की सक्रियता ने भी इस समुदाय के राजनीतिक महत्व को सामने ला दिया है।
यही वजह है कि निषाद पार्टी का तर्क सिर्फ सीटों तक सीमित नहीं है। उसके लिए मुद्दा है समुदाय का प्रतिनिधित्व, राजनीतिक हिस्सेदारी और संगठन की चुनावी भूमिका। यहां से सीटों का गणित सीधे सामाजिक समीकरण से जुड़ जाता है।
राजभर की भी अपनी जमीन
दूसरी तरफ ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा भी NDA का हिस्सा है और 2027 के लिए अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी चाहती है। जून में राजभर ने कहा था कि उनकी पार्टी सभी 43 सीटों पर तैयारी कर रही है और सीट बंटवारे पर आगे बातचीत होगी। यानी सहयोगी दलों की राजनीति का मूल संदेश साफ है पहले संगठन को जमीन पर तैयार करो, फिर गठबंधन की बातचीत में अपनी ताकत दिखाओ।
सुभासपा का पूर्वांचल में सामाजिक आधार है। ऐसे में पूर्वांचल की कई सीटों पर निषाद पार्टी, सुभासपा, अपना दल (एस) और BJP के बीच सीटों का तालमेल महत्वपूर्ण हो सकता है। 2022 में भी सहयोगी दलों के बीच सीट बंटवारा हुआ था और 2027 में गठबंधन में सहयोगियों की संख्या बढ़ने से यह प्रक्रिया और जटिल हो सकती है।
सबसे बड़ा पेंच: एक सीट, कई दावेदार
यही 2027 के गठबंधन गणित की सबसे दिलचस्प कहानी है। मान लीजिए किसी क्षेत्र में BJP का अपना संगठन मजबूत है, लेकिन वहां निषाद पार्टी भी अपने सामाजिक आधार का दावा करती है। उसी इलाके में सुभासपा या अपना दल (एस) भी राजनीतिक दावेदारी रखता है।
तो सवाल होगा टिकट किसे मिले?
BJP के लिए समस्या सिर्फ सीट छोड़ने की नहीं होगी। उसे यह भी देखना होगा कि सहयोगी को सीट देने से क्या गठबंधन का सामाजिक लाभ बढ़ता है और क्या उस सीट पर सहयोगी वास्तव में चुनावी प्रदर्शन कर सकता है।
दूसरी तरफ सहयोगी दलों के लिए चुनौती यह होगी कि वे सिर्फ अपने पारंपरिक प्रभाव वाली सीटें मांगें या ऐसी सीटों पर भी दावा करें जहां BJP पिछली बार कमजोर रही थी। पूर्वांचल में BJP की पिछली विधानसभा स्थिति वाली कई सीटों को सहयोगी दल 2027 के लिए अवसर की तरह देख रहे हैं।
BJP के लिए सहयोगी जरूरी क्यों हैं?
यहां तस्वीर का दूसरा पहलू भी समझना जरूरी है। सहयोगी दलों को सीटें देना सिर्फ गठबंधन धर्म का सवाल नहीं है। गठबंधन का एक उद्देश्य अलग-अलग सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाना भी होता है।
BJP इस समय 2027 के लिए अलग-अलग सामाजिक वर्गों के बीच संपर्क बढ़ा रही है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक सरकार और पार्टी स्तर पर मछुआरों, छोटे किसानों, पूर्व सैनिकों समेत विभिन्न समूहों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर है। ऐसे में निषाद, राजभर, कुर्मी-पटेल और जाट जैसे विभिन्न सामाजिक समूहों से जुड़े सहयोगी दलों की भूमिका गठबंधन की सामाजिक संरचना का हिस्सा बनती है।
लेकिन सहयोगियों की ताकत और सीमा दोनों हैं यह भी जरूरी है कि सहयोगी दलों की मांग को उनके पूरे चुनावी प्रभाव के बराबर न माना जाए। किसी पार्टी का किसी समुदाय में प्रभाव होना और उस प्रभाव को विधानसभा सीटों में बदल पाना दो अलग चीजें हैं।
इसीलिए सीट बंटवारे के समय केवल जातीय आधार नहीं, बल्कि पिछला चुनावी प्रदर्शन, स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, क्षेत्रीय प्रभाव और गठबंधन के संयुक्त वोटों का प्रदर्शन जैसे कई कारक सामने आएंगे। यानी 'हमारे पास वोट हैं, इसलिए हमें इतनी सीट चाहिए' और वास्तव में उस वोट को सीट में बदल पाना दो अलग राजनीतिक गणित हैं। 2027 की असली लड़ाई सीटों से पहले ‘सौदेबाजी की ताकत’ की है
इस पूरे घटनाक्रम को अगर एक लाइन में समझना हो तो तस्वीर यह है BJP को सहयोगियों की जरूरत है, लेकिन सहयोगियों को भी BJP के साथ रहने से मिलने वाली चुनावी ताकत की जरूरत है। यही पारस्परिक निर्भरता सीट बंटवारे की बातचीत को दिलचस्प बनाती है।
निषाद पार्टी ज्यादा सीट चाहती है। सुभासपा अपनी राजनीतिक जमीन के हिसाब से हिस्सेदारी चाहती है। अपना दल (एस) अपने सामाजिक आधार वाली सीटों पर दावा रखेगा। RLD भी पश्चिमी यूपी में अपनी राजनीतिक उपयोगिता के आधार पर हिस्सेदारी चाहेगा। अगस्त की एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में इन चारों सहयोगियों के संभावित सीट-शेयरिंग दावों को 2027 की NDA रणनीति की प्रमुख चुनौती के रूप में रेखांकित किया गया था।
आगे क्या होगा?
आने वाले महीनों में तीन चीजें खास तौर पर देखने लायक होंगी। पहली कि BJP सहयोगियों को कितनी सीटों का संकेत देती है। दूसरी ये कि कौन-सा सहयोगी किन सीटों पर अपना दावा मजबूत करता है। तीसरी अगर एक ही सीट पर दो सहयोगियों की दावेदारी हुई तो समाधान का फार्मूला क्या होगा। क्योंकि 2027 का गठबंधन सिर्फ यह तय नहीं करेगा कि कौन किसके साथ है। वह यह भी तय करेगा कि कौन कितनी सीट पर लड़ रहा है और किस सामाजिक समीकरण के साथ मैदान में उतर रहा है।
यही कारण है कि अभी से शुरू हुई सीटों की बातचीत आने वाले महीनों में यूपी की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है। चुनाव की तारीख भले अभी दूर हो, लेकिन गठबंधन की असली राजनीति में टिकट की लड़ाई का पहला राउंड शुरू हो चुका है।


