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1.19 करोड़ वोट मिले, फिर भी शून्य विधायक! यूपी चुनाव का कैसा गणित, लाखों वोट पाकर भी खाली हाथ
BSP Vote Share: यूपी चुनाव 2022 में मायावती की BSP को करीब 1.19 करोड़ वोट मिले, लेकिन सिर्फ एक सीट जीती। जानिए वोट शेयर और सीटों का पूरा गणित।
UP Election 2027: लोकतंत्र में कहा जाता है कि हर वोट की कीमत होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि किसी राजनीतिक पार्टी को एक करोड़ से ज्यादा लोग वोट दें और फिर भी विधानसभा में उसका सिर्फ एक विधायक पहुंचे? वहीं दूसरी पार्टी को उससे बहुत कम वोट मिलें और वह कई सीटों पर जीत दर्ज कर ले। सुनने में यह गणित अजीब लगता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में ऐसा हो चुका है।
2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) को करीब 1.19 करोड़ वोट मिले थे। पार्टी का वोट शेयर 12.88 प्रतिशत रहा, लेकिन 403 सीटों वाली विधानसभा में BSP सिर्फ एक सीट जीत सकी। हालांकि विधायक के निधन के बाद अब वह भी शून्य हो गई। कांग्रेस को करीब 21.5 लाख वोट मिले और उसके दो विधायक जीते। वहीं असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और आम आदमी पार्टी को लाखों वोट मिलने के बावजूद एक भी सीट नहीं मिली। सवाल यह है कि आखिर इतने सारे वोट जाते कहां हैं? क्या हारने वाले उम्मीदवारों को मिले वोट बेकार हो जाते हैं? और क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में भी ऐसा समीकरण सामने आ सकता है? इसे समझने के लिए पहले भारत की चुनावी व्यवस्था का एक दिलचस्प नियम जानना जरूरी है।
2022 में किस पार्टी को कितने वोट और कितनी सीटें मिलीं?
राजनीतिक दल | वोट शेयर (लगभग) | जीती सीटें |
भारतीय जनता पार्टी | 41.29% | 255 |
समाजवादी पार्टी | 32.06% | 111 |
बहुजन समाज पार्टी | 12.88% | 1(अब रिक्त सीट) |
कांग्रेस | 2.33% | 2 |
AIMIM | 0.49% | 0 |
आम आदमी पार्टी | 0.38% | 0 |
ये आंकड़े 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के हैं, 2027 के किसी संभावित परिणाम का अनुमान नहीं।
आखिर 1.19 करोड़ वोटों से BSP को सिर्फ एक सीट कैसे मिली?
इस सवाल का जवाब चुनाव में वोटों के बंटवारे में छिपा है। मान लीजिए कि किसी विधानसभा क्षेत्र में एक लाख वोट पड़े। इनमें BJP उम्मीदवार को 40 हजार, सपा को 35 हजार और BSP को 25 हजार वोट मिले। इस स्थिति में BJP उम्मीदवार जीत जाएगा। सपा और BSP को मिले कुल 60 हजार वोट विधानसभा में कोई सीट नहीं दिलाएंगे।
अब यही स्थिति प्रदेश की सैकड़ों सीटों पर दोहराई जाए। कोई पार्टी हर सीट पर 15 से 25 हजार वोट हासिल करे, लेकिन कहीं भी सबसे आगे न निकले, तो उसके लाखों वोट जुड़ते जाएंगे, मगर विधायकों की संख्या शून्य भी रह सकती है।
2022 में BSP की स्थिति इसी व्यापक चुनावी समस्या को समझने का उदाहरण बनी। उसे प्रदेशभर में उल्लेखनीय समर्थन मिला, लेकिन अधिकांश सीटों पर वह जीत के लिए आवश्यक पहला स्थान हासिल नहीं कर सकी। पार्टी की एकमात्र जीत बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट पर उमाशंकर सिंह के खाते में गई। यहां एक बात समझना जरूरी है। BSP को मिले वोट गायब नहीं हुए थे। वे चुनावी परिणाम में दर्ज हुए, लेकिन सीटों में नहीं बदल पाए।
क्या हारने वाले उम्मीदवार के वोट बेकार हो जाते हैं?
तकनीकी रूप से नहीं। हर वैध वोट चुनाव परिणाम का हिस्सा होता है। हारने वाले उम्मीदवारों को मिले वोट भी किसी क्षेत्र में पार्टी की ताकत, सामाजिक समर्थन और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं का संकेत देते हैं। हालांकि सीट जीतने के लिहाज से उनका तत्काल लाभ नहीं मिलता। चुनावी विश्लेषण में ऐसे वोटों को कभी-कभी वेस्टेड वोट कहा जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि मतदाता का वोट अमान्य था, बल्कि यह कि वह वोट किसी उम्मीदवार को सीट जिताने में सफल नहीं हुआ।
कम वोट पाकर भी ज्यादा विधायक कैसे जीत सकते हैं?
मान लीजिए दो काल्पनिक पार्टियां हैं। पहली पार्टी को पूरे प्रदेश में 30 लाख वोट मिले, लेकिन ये वोट बहुत सारे विधानसभा क्षेत्रों में बिखरे हुए हैं। उसके उम्मीदवार हर जगह दूसरे या तीसरे स्थान पर रहे। दूसरी पार्टी को केवल 10 लाख वोट मिले, लेकिन उसका समर्थन कुछ चुनिंदा सीटों पर केंद्रित था। उन सीटों पर उसके उम्मीदवार सबसे आगे निकल गए। नतीजा यह हो सकता है कि 30 लाख वोट वाली पार्टी को एक भी सीट न मिले, जबकि 10 लाख वोट वाली पार्टी कई विधायक विधानसभा भेज दे।
यही वजह है कि चुनाव में केवल कुल वोट प्रतिशत देखकर किसी दल की विधानसभा में ताकत तय नहीं की जा सकती। वोट कहां मिले, कितने अंतर से मिले और विरोधी उम्मीदवारों के बीच कैसे बंटे ये तीनों बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं।
छोटी पार्टियों ने कैसे बदला वोट और सीट का रिश्ता?
2022 के चुनाव में एक और दिलचस्प उदाहरण सामने आया। राष्ट्रीय लोकदल (RLD) को करीब 26.30 लाख वोट मिले और उसके आठ विधायक जीते। अपना दल (सोनेलाल) को करीब 14.93 लाख वोट मिले, लेकिन उसने 12 सीटें जीत लीं। वहीं निषाद पार्टी ने करीब 8.40 लाख वोट हासिल करके छह सीटों पर जीत दर्ज की।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कुल वोट ज्यादा होने का मतलब ज्यादा सीटें मिलना नहीं है। हालांकि यहां गठबंधन की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। RLD ने समाजवादी पार्टी के साथ चुनाव लड़ा था, जबकि अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी BJP के सहयोगी थे। गठबंधन में दल चुनिंदा सीटों पर चुनाव लड़ते हैं, जिससे उनका समर्थन कुछ क्षेत्रों में केंद्रित हो सकता है।
इसीलिए किसी छोटे दल की चुनावी सफलता समझने के लिए उसके कुल वोटों के साथ यह देखना जरूरी है कि उसने कितनी सीटों पर उम्मीदवार उतारे और कितनी सीटों पर जीत हासिल की।
क्या ज्यादा वोट शेयर होने से ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए?
यह सवाल भारत की चुनाव प्रणाली से जुड़ा है। देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) प्रणाली से होते हैं। इसमें हर निर्वाचन क्षेत्र से एक उम्मीदवार चुना जाता है। जिस उम्मीदवार को सबसे अधिक वैध वोट मिलते हैं, वही विजेता होता है।
उसे कुल पड़े वोटों का 50 प्रतिशत से अधिक हासिल करना अनिवार्य नहीं है। उदाहरण के लिए किसी सीट पर पांच उम्मीदवार मैदान में हैं। पहले उम्मीदवार को 35 प्रतिशत, दूसरे को 30 प्रतिशत और बाकी तीनों को मिलाकर 35 प्रतिशत वोट मिले। तब भी पहला उम्मीदवार जीत जाएगा।
इस प्रणाली की एक खासियत यह है कि मतदाता सीधे अपने निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधि चुनते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि किसी पार्टी का विधानसभा में प्रतिनिधित्व हमेशा उसके प्रदेशव्यापी वोट शेयर के अनुपात में नहीं होता। दुनिया के कुछ देशों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था भी अपनाई जाती है, जिसमें पार्टियों को मिले वोट प्रतिशत के आधार पर सीटें आवंटित की जाती हैं। भारत की विधानसभा चुनाव प्रणाली इससे अलग है।
BSP का वोट शेयर और सीट शेयर कितना अलग था?
2022 के चुनाव में BSP को 12.88 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन विधानसभा की 403 सीटों में उसका हिस्सा महज एक सीट रहा। यानी करीब 0.25 प्रतिशत सीटें। इसके उलट BJP को 41.29 प्रतिशत वोट मिले और उसने 255 सीटें जीतीं। विधानसभा में उसकी सीटों की हिस्सेदारी करीब 63.28 प्रतिशत रही। समाजवादी पार्टी को 32.06 प्रतिशत वोट मिले और उसने 111 सीटें हासिल कीं।
यही चुनावी व्यवस्था का सबसे दिलचस्प अंतर है। किसी दल के वोट व्यापक रूप से फैले हों तो उसका वोट शेयर अच्छा हो सकता है, लेकिन सीटें कम मिल सकती हैं। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में मजबूत समर्थन रखने वाला दल अपेक्षाकृत कम वोटों के साथ ज्यादा सीटें जीत सकता है।
2027 में पार्टियों के सामने क्या होगा असली सवाल?
उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए केवल प्रदेशभर में समर्थन बढ़ाना ही नहीं, बल्कि अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत उम्मीदवार, संगठन और स्थानीय चुनावी रणनीति तैयार करना भी महत्वपूर्ण होगा। 2022 के परिणाम बताते हैं कि वोट शेयर और सीटों की संख्या को एक ही पैमाने से नहीं समझा जा सकता। हालांकि पिछले चुनाव के आंकड़ों से अगले चुनाव के नतीजे तय नहीं किए जा सकते। उम्मीदवार, गठबंधन, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं की प्राथमिकताएं बदल सकती हैं।
सौ बात की एक बात यह है कि चुनाव में हर वोट गिना जाता है, लेकिन हर वोट सीधे किसी सीट में नहीं बदलता। BSP के करीब 1.19 करोड़ वोट और सिर्फ एक विधायक का उदाहरण इसी चुनावी गणित को सबसे आसानी से समझाता है। और यही वह सवाल है, जो 2027 के चुनाव में भी दिलचस्प रहेगा किस पार्टी को कितने वोट मिलेंगे, उससे कहीं ज्यादा अहम यह होगा कि वे वोट किन सीटों पर मिलेंगे।


