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राहुल ने बढ़ाई अखिलेश की टेंशन? कांग्रेस ने रख दी बड़ी डिमांड, अब फंस गया 403 का गणित
UP Election 2027: कांग्रेस को चाहिए 150 सीटें, अखिलेश कैसे सुलझाएंगे SP-Congress का सीट बंटवारा?
UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 की चुनावी लड़ाई अभी शुरू भी नहीं हुई है और समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठबंधन के सामने पहला बड़ा सवाल खड़ा हो गया है 403 विधानसभा सीटों में कौन कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगा?
लोकसभा चुनाव 2024 में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को बड़ा झटका दिया था। उसी सफलता के बाद माना जा रहा था कि 2027 में भी दोनों पार्टियां साथ उतरेंगी। दोनों दल गठबंधन जारी रखने के संकेत भी दे चुके हैं। लेकिन लोकसभा की 80 सीटें बांटना एक बात थी और विधानसभा की 403 सीटों का बंटवारा दूसरी। अब कांग्रेस ने अपना शुरुआती दांव चल दिया है।
उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने कहा है कि कांग्रेस के पास सभी 403 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवार हैं और गठबंधन में पार्टी 150 से कम सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी। इतना ही नहीं, उन्होंने कांग्रेस को गठबंधन में 50 प्रतिशत सीटों का हकदार भी बताया है। सीट बंटवारे की प्रक्रिया अक्टूबर में पूरी होने की उम्मीद जताई गई है। अगर कांग्रेस अपने इस दावे पर कायम रहती है तो अखिलेश यादव के सामने चुनाव से पहले सबसे मुश्किल राजनीतिक मोलभाव शुरू हो सकता है।
403 का केक, कांग्रेस मांग रही कम से कम 150
पहले संख्या समझिए, उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं। कांग्रेस अगर इनमें से कम से कम 150 सीटें चाहती है तो बाकी बचती हैं 253 सीटें।लेकिन ये सभी सीटें समाजवादी पार्टी के खाते में भी नहीं जा सकतीं। अखिलेश यादव को अपने दूसरे सहयोगियों और संभावित सहयोगियों के लिए भी जगह रखनी होगी। यानी कांग्रेस को 150 सीटें देने की स्थिति में SP के अपने उम्मीदवारों के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या और घट सकती है। यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा पेच है।
समाजवादी पार्टी फिलहाल उत्तर प्रदेश में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत है। 2022 के विधानसभा चुनाव में SP ने 111 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस केवल दो सीटें जीत सकी थी। ऐसे में कांग्रेस का कम से कम 150 सीटों का दावा स्वाभाविक रूप से सीट-बंटवारे की बातचीत को कठिन बना सकता है।
लेकिन कांग्रेस के पास भी है 2024 का रिपोर्ट कार्ड
अगर समाजवादी पार्टी 2022 का विधानसभा चुनाव दिखाएगी तो कांग्रेस के पास जवाब में 2024 का लोकसभा चुनाव है। 2024 में SP और कांग्रेस ने मिलकर उत्तर प्रदेश की 80 में से 43 लोकसभा सीटें जीती थीं। इनमें SP को 37 और कांग्रेस को छह सीटें मिली थीं। बीजेपी 33 सीटों पर सिमट गई थी। कांग्रेस ने रायबरेली, अमेठी, सहारनपुर, सीतापुर, इलाहाबाद और बाराबंकी जैसी सीटें जीती थीं। यही नतीजा कांग्रेस की bargaining power का सबसे मजबूत आधार बन सकता है।
कांग्रेस का तर्क हो सकता है कि 2022 की स्थिति और 2027 की स्थिति को एक जैसा नहीं माना जा सकता। लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी का मनोबल बढ़ा है और संगठन को भी नए सिरे से तैयार किया जा रहा है। यानी कांग्रेस खुद को गठबंधन में केवल SP की छोटी सहयोगी के रूप में सीमित नहीं रखना चाहती।
2017 का नतीजा अखिलेश क्यों नहीं भूलेंगे?
लेकिन अखिलेश यादव के पास भी इतिहास का एक पन्ना है, जिसे सीट-बंटवारे की मेज पर जरूर याद किया जाएगा। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी राहुल गांधी और अखिलेश यादव साथ आए थे। तब 'UP के लड़के' का नारा काफी चर्चा में रहा था। कांग्रेस ने उस चुनाव में 114 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन जीत सिर्फ सात सीटों पर मिली। समाजवादी पार्टी भी सत्ता से बाहर हो गई।
इसलिए 2027 में SP की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ गठबंधन बचाना नहीं होगी। पार्टी यह भी देखना चाहेगी कि कांग्रेस को ऐसी कितनी सीटें दी जाएं जहां वह वास्तव में बीजेपी को चुनौती देने की स्थिति में है। यहीं से एक नया फॉर्मूला निकल सकता है सीटों की संख्या नहीं, सीट जीतने की क्षमता।
कांग्रेस 150 क्यों मांग रही है?
राजनीति में सीट बंटवारे की बातचीत अक्सर अंतिम संख्या से काफी ऊपर की मांग से शुरू होती है। लेकिन इस बार कांग्रेस का दावा सिर्फ बंद कमरे की चर्चा नहीं रहा। पार्टी के प्रदेश प्रभारी ने सार्वजनिक रूप से न्यूनतम 150 सीटों की बात कर दी है। दूसरी रिपोर्टों में कांग्रेस के 150 से 200 सीटों तक की तैयारी का दावा भी सामने आया है।
इसके पीछे एक राजनीतिक रणनीति समझी जा सकती है। अगर कांग्रेस शुरुआत ही 70-80 सीटों की मांग से करती है तो बातचीत में उसका दायरा और सिकुड़ सकता है। 150 का आंकड़ा सामने रखकर पार्टी ने negotiation का शुरुआती बिंदु काफी ऊपर तय कर दिया है। लेकिन यह एक विश्लेषण है; कांग्रेस ने सार्वजनिक रूप से इसे bargaining tactic नहीं कहा है।
अखिलेश की मुश्किल केवल कांग्रेस नहीं
अखिलेश यादव के सामने दूसरा सवाल अपने PDA समीकरण का भी है। SP पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA की राजनीति को 2027 के अपने मुख्य सामाजिक गठबंधन के रूप में आगे बढ़ा रही है। इसके साथ पार्टी को टिकट वितरण में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन भी बनाना होगा। ऐसे में जितनी ज्यादा सीटें कांग्रेस के खाते में जाएंगी, उतनी ही कम सीटों पर SP अपने हिसाब से उम्मीदवार चुन पाएगी।
यही कारण है कि विधानसभा चुनाव में सीटों का बंटवारा केवल यह तय नहीं करता कि कौन-सी पार्टी कितनी सीटों पर लड़ेगी। इससे यह भी तय होता है कि गठबंधन के भीतर किस पार्टी के पास अपना सामाजिक समीकरण बनाने की कितनी गुंजाइश होगी।
राहुल-अखिलेश की दोस्ती की असली परीक्षा अब
2024 में राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच राजनीतिक तालमेल विपक्ष के लिए फायदेमंद साबित हुआ। लेकिन उस समय सीटों का गणित अपेक्षाकृत आसान था। विधानसभा चुनाव में समस्या यह है कि लगभग हर जिले में दोनों पार्टियों के अपने दावेदार होंगे। जहां कांग्रेस किसी पुराने नेता या संगठन के आधार पर सीट मांगेगी, वहीं उसी सीट पर SP का भी कोई मजबूत दावेदार हो सकता है। यानी दिल्ली में राहुल-अखिलेश की सहमति हो जाने के बाद भी जमीन पर टिकट का फैसला असंतोष पैदा कर सकता है।
इसीलिए कांग्रेस जल्दी सीट-बंटवारा चाहती दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी चाहती है कि उम्मीदवारों को तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिले, जबकि SP फिलहाल इतनी जल्दबाजी में नहीं दिखाई देती। अंतिम समझौते के लिए दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व राहुल गांधी और अखिलेश यादव की मंजूरी जरूरी होगी।
क्या कांग्रेस को वास्तव में मिल सकती हैं 150 सीटें?
फिलहाल इसका जवाब किसी के पास नहीं है। कांग्रेस ने अपनी मांग बता दी है, लेकिन समाजवादी पार्टी ने 150 सीटें देने पर सहमति नहीं जताई है। दिलचस्प बात यह है कि सीटों की संभावित संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें भी सामने आई हैं। 25 सितंबर की एक रिपोर्ट में कांग्रेस की संभावित मांग 125-135 सीट बताई गई थी, जबकि SP के अपने सहयोगियों के लिए लगभग 65 सीटें छोड़ने की योजना की चर्चा थी। अब कांग्रेस प्रभारी ने सार्वजनिक रूप से '150 से कम नहीं' कहकर बातचीत का पैमाना और ऊपर कर दिया है। इसलिए अभी 150 को सीट-बंटवारे का फैसला नहीं बल्कि कांग्रेस की घोषित शुरुआती स्थिति समझना ज्यादा सही होगा।
असली मुकाबला सीटों की संख्या नहीं, मजबूत सीटों का
यहां एक और खेल है। मान लीजिए कांग्रेस को 120 सीटें मिल जाती हैं। सवाल फिर भी रहेगा कि कौन-सी 120? राजनीति में हर विधानसभा सीट की कीमत समान नहीं होती। कांग्रेस पश्चिमी यूपी में सहारनपुर जैसे अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों, रायबरेली-अमेठी के पुराने गढ़, बुंदेलखंड और पूर्वांचल की कुछ सीटों पर ज्यादा दावा कर सकती है। SP भी इन्हीं क्षेत्रों में अपनी मजबूत सीटें आसानी से छोड़ना नहीं चाहेगी। इसलिए असली लड़ाई शायद 150 बनाम 100 की नहीं होगी।
असली लड़ाई होगी, जीतने लायक सीट किसके खाते में जाएगी?
BJP के लिए क्यों अच्छी खबर हो सकती है खींचतान? BJP स्वाभाविक रूप से विपक्षी गठबंधन के भीतर किसी भी मतभेद को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करेगी। 2024 में SP-कांग्रेस के साथ आने का फायदा विपक्ष को मिला था। इसलिए 2027 में बीजेपी के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होगा कि वह दोनों दलों के बीच सीटों, नेतृत्व और उम्मीदवारों को लेकर पैदा होने वाले विरोधाभासों को उजागर करे।
हाल के दिनों में SP और कांग्रेस के कुछ नेताओं के बीच बयानबाजी बढ़ने के बाद दोनों दलों के नेतृत्व ने अपने नेताओं को संयम बरतने की सलाह भी दी है।इसलिए गठबंधन के लिए चुनौती केवल सीटों का फॉर्मूला निकालना नहीं, बल्कि बातचीत के दौरान सार्वजनिक टकराव से बचना भी होगी।
150 सीटें या दबाव की राजनीति, अक्टूबर में खुलेगा राज
फिलहाल कांग्रेस ने अपना पहला बड़ा कार्ड टेबल पर रख दिया है 150 से कम नहीं। अब गेंद अखिलेश यादव के पाले में है। अगर SP इस मांग के करीब जाती है तो उसे अपनी सीटों और दूसरे सहयोगियों की हिस्सेदारी में बड़ा समायोजन करना पड़ेगा। अगर वह कांग्रेस को काफी कम सीटें देने पर अड़ती है तो गठबंधन के भीतर खींचतान बढ़ सकती है।
अगर दोनों पार्टियां 2024 वाला तालमेल बरकरार रखते हुए बीच का रास्ता निकाल लेती हैं तो 2027 में BJP के सामने फिर संयुक्त विपक्ष की चुनौती होगी। इसलिए आने वाले दिनों में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की तस्वीरों से ज्यादा नजर कैलकुलेटर पर रखिए। क्योंकि उत्तर प्रदेश में अगली बड़ी राजनीतिक लड़ाई फिलहाल चुनावी मैदान में नहीं, 403 सीटों के बंटवारे की मेज पर शुरू होती दिखाई दे रही है।


