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BJP के ये ‘सात प्वाइंट’ जो छीन सकते हैं उत्तर प्रदेश की ‘सत्ता’! 2024 में मिल चुकी है पहली चेतावनी
UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 से पहले BJP के सामने 7 बड़ी चुनौतियां हैं। 2024 के लोकसभा नतीजों ने विधायक, रोजगार, OBC-दलित वोट, कार्यकर्ता और सहयोगियों से जुड़े सवाल खड़े किए हैं।
BJP 7 Challenges
UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी 2017 से सत्ता में है। 2022 में तमाम चुनौतियों के बावजूद BJP ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रचा। लेकिन अब 2027 की लड़ाई अलग परिस्थितियों में होने जा रही है। सबसे बड़ी चेतावनी पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में ही मिल चुकी है।
2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 में से 62 सीटें जीतने वाली BJP 2024 में सिर्फ 33 सीटों पर रह गई। समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और कांग्रेस ने भी छह सीटें जीतीं।लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे तथा मतदान व्यवहार एक जैसे नहीं होते, इसलिए 2024 के नतीजों को सीधे 2027 का परिणाम नहीं माना जा सकता। लेकिन उन चुनावों ने BJP के सामने कुछ कमजोरियां जरूर उजागर कर दी थीं। अब सवाल है अगर BJP ने उन कमजोरियों को समय रहते नहीं सुधारा तो कौन-से मुद्दे 2027 की लड़ाई मुश्किल बना सकते हैं?
1. पुराने विधायकों की नाराजगी कहीं पार्टी पर न पड़ जाए भारी
BJP के लिए इस समय सबसे बड़ी अंदरूनी चिंता उसके अपने विधायक बताए जा रहे हैं। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक पार्टी के आंतरिक आकलन में 100 से ज्यादा मौजूदा विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर anti-incumbency की बात सामने आई है। इसी वजह से 2027 में बड़ी संख्या में sitting MLAs के टिकट बदलने की चर्चा है। 2024 में BJP को ऐसा ही अनुभव अपने सांसदों के मामले में हुआ था। पार्टी की समीक्षा में उम्मीदवार चयन और कुछ मौजूदा सांसदों के खिलाफ नाराजगी को खराब प्रदर्शन के कारणों में गिना गया था।
यानी 2027 में BJP के सामने मुश्किल सवाल होगा पुराने विधायक को टिकट दिया तो anti-incumbency का खतरा, टिकट काटा तो बगावत और भीतरघात का डर। गलत उम्मीदवार चयन कई करीबी सीटों का गणित बिगाड़ सकता है।
2. बेरोजगारी और Paper Leak का मुद्दा खत्म नहीं हुआ
युवाओं को लेकर BJP की चिंता नई नहीं है। 2024 की हार के बाद हुई समीक्षा में recruitment examination paper leaks को नुकसान पहुंचाने वाले मुद्दों में गिना गया था। उत्तर प्रदेश में पुलिस भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद करीब 48 लाख अभ्यर्थियों से जुड़ी परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। बाद में सरकार ने दोबारा परीक्षा कराई और भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन उस प्रकरण ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के बीच बड़ा असंतोष पैदा किया था।2026 में भी छात्र और भर्ती से जुड़े मुद्दे राजनीतिक बहस में बने हुए हैं।
2027 में पहली बार वोट देने जा रही नई Gen-Z आबादी के लिए 2012 या 2017 की सरकारों की तुलना से ज्यादा नौकरी, भर्ती और परीक्षा जैसे अपने वर्तमान अनुभव महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अगर BJP युवा मतदाताओं को केवल पुरानी सरकारों की कमियां बताती रही और रोजगार तथा भर्ती पर उनकी मौजूदा चिंताओं का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई तो यह उसके लिए चुनौती बन सकता है।
3. OBC वोट खिसका तो BJP का पुराना फॉर्मूला मुश्किल में
2014 के बाद उत्तर प्रदेश में BJP की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत केवल सवर्ण वोट नहीं रहे। उसने गैर-यादव OBC समुदायों में बड़ी पैठ बनाई। कुर्मी, लोधी, मौर्य, शाक्य, सैनी, पाल, निषाद और राजभर जैसे विभिन्न सामाजिक समूहों को जोड़कर BJP ने ऐसा गठबंधन बनाया जिसने कई चुनावों में उसे फायदा पहुंचाया। लेकिन 2024 में समाजवादी पार्टी ने PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक का प्रयोग किया और टिकट वितरण में भी जातीय समीकरणों पर खास जोर दिया।
अब अखिलेश यादव उसी PDA राजनीति को 2027 तक और मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। BJP भी इस खतरे को समझती दिखाई देती है। उसकी हालिया राज्यसभा उम्मीदवार सूची में लोधी, पाल और कुर्मी समुदायों से आने वाले OBC चेहरों को जगह देना इसी व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सवाल यह है कि क्या सिर्फ प्रतिनिधित्व पर्याप्त होगा या स्थानीय स्तर पर हिस्सेदारी की भावना भी पैदा करनी होगी?
4. दलित वोट पर 2024 जैसी सेंध दोबारा लगी तो?
2024 में BJP के लिए दूसरा बड़ा झटका दलित मतदाताओं के एक हिस्से में विपक्ष की बढ़ी पकड़ थी।चुनाव के दौरान विपक्ष ने संविधान और आरक्षण को बड़ा मुद्दा बनाया। BJP नेतृत्व ने बार-बार साफ किया कि संविधान और आरक्षण खत्म करने की कोई योजना नहीं है, लेकिन पार्टी की चुनाव बाद समीक्षा में भी माना गया कि विपक्ष के इस अभियान का OBC और दलित मतदाताओं के एक हिस्से पर असर पड़ा। अब 2027 में यह लड़ाई और दिलचस्प है।
एक तरफ मायावती BSP के पुराने दलित आधार को वापस मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं। दूसरी तरफ अखिलेश यादव PDA के जरिए दलितों को अपने साथ जोड़ना चाहते हैं। BJP के सामने चुनौती है कि वह गैर-जाटव दलितों के बीच पिछले एक दशक में बनाई अपनी पकड़ को बरकरार रखे। यहां छोटी-सी सेंध भी कई सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों का गणित बदल सकती है।
5. कार्यकर्ता नाराज हुआ तो ऊपर का प्रचार भी नहीं बचाएगा
2024 के बाद BJP की समीक्षा में एक बेहद महत्वपूर्ण बात सामने आई थी स्थानीय कार्यकर्ताओं की नाराजगी।पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने शिकायत की थी कि थाने और तहसील जैसे स्तरों पर उनकी सुनवाई नहीं होती और प्रशासनिक अधिकारियों को जरूरत से ज्यादा स्वतंत्रता मिली हुई है। चुनाव केवल बड़ी रैलियों से नहीं जीते जाते।
बूथ पर मतदाता निकालने से लेकर घर-घर संपर्क तक असली काम संगठन और स्थानीय कार्यकर्ता करता है।अगर उसे लगता है कि सरकार होने के बावजूद उसकी सुनवाई नहीं हो रही तो चुनाव में उसका उत्साह कम हो सकता है। 2027 में BJP के लिए सबसे जरूरी कामों में से एक अपने cadre को दोबारा पूरी तरह सक्रिय रखना होगा।
6. सहयोगी दलों को छोटा समझना पड़ सकता है महंगा
उत्तर प्रदेश में कुछ समुदाय ऐसे हैं जिनका वोट पूरे प्रदेश में बहुत बड़ा नहीं है लेकिन कुछ खास सीटों पर निर्णायक प्रभाव डाल सकता है। इसी वजह से अपना दल (एस), निषाद पार्टी और RLD जैसे सहयोगियों का महत्व सीटों की संख्या से ज्यादा उनके सामाजिक आधार में है। समस्या तब पैदा होती है जब टिकट बंटवारे, सीटों की संख्या या सरकार में हिस्सेदारी को लेकर सहयोगी असहज होने लगते हैं।
2027 में BJP को सिर्फ अपने संगठन का समीकरण नहीं बनाना है बल्कि NDA के भीतर सहयोगियों के सामाजिक आधार को भी साथ रखना होगा। किसी छोटे सहयोगी की नाराजगी पूरे प्रदेश में असर न डाले, लेकिन 10-15 करीबी सीटों पर उसका असर महत्वपूर्ण हो सकता है।
7. सबसे बड़ी गलती होगी, 2024 को सिर्फ एक दुर्घटना मान लेना
BJP के लिए शायद सबसे बड़ा राजनीतिक जोखिम यही होगा। अगर पार्टी यह मान ले कि लोकसभा चुनाव का परिणाम केवल राष्ट्रीय चुनाव की परिस्थितियों का नतीजा था और विधानसभा चुनाव में सब अपने आप बदल जाएगा तो वह कई जमीनी संकेतों को नजरअंदाज कर सकती है।2024 में BJP को अयोध्या वाली फैजाबाद लोकसभा सीट तक गंवानी पड़ी थी। यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि कुछ महीने पहले ही राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी।
इससे कम-से-कम इतना संकेत जरूर मिला कि मजबूत धार्मिक और राष्ट्रीय मुद्दों के साथ मतदाता स्थानीय उम्मीदवार, जातीय समीकरण, रोजगार और अपने रोजमर्रा के अनुभव को भी महत्व दे सकता है। यही 2027 की सबसे बड़ी सीख हो सकती है। लेकिन BJP के पास जवाब देने का समय भी है तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 2027 का चुनाव अभी हुआ नहीं है और 2024 के लोकसभा परिणाम को विधानसभा चुनाव का भविष्य मान लेना गलत होगा।
BJP लगातार उम्मीदवारों का फीडबैक ले रही है। रिपोर्टों के मुताबिक खराब जनस्वीकृति वाले मौजूदा विधायकों के टिकट काटने पर विचार हो रहा है। राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन में भी OBC, दलित, महिला और सवर्ण प्रतिनिधित्व का संतुलन दिखाई दिया है। इसके अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ BJP के लिए प्रदेश में एक प्रमुख राजनीतिक चेहरा बने हुए हैं और पार्टी का बूथ स्तर तक बड़ा संगठनात्मक नेटवर्क मौजूद है। इसलिए 2027 का सवाल यह नहीं है कि BJP सत्ता खोएगी या बचाएगी।
क्या BJP 2024 में मिले संकेतों को समय रहते पढ़ पाएगी?
क्योंकि उसके सामने चुनौती किसी एक मुद्दे की नहीं है।एक तरफ पुराने विधायकों की anti-incumbency है, दूसरी तरफ युवा रोजगार और भर्ती पूछ रहा है। अखिलेश PDA के जरिए OBC-दलित समीकरण में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं, मायावती दलित आधार को वापस पाने के प्रयास में हैं और BJP को अपने कार्यकर्ताओं तथा सहयोगी दलों को भी संतुष्ट रखना है।
2027 में BJP की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा शायद यही होगी। क्या वह अपने पुराने सफल फॉर्मूले को दोहराएगी, या 2024 की चेतावनी के बाद उसे समय रहते बदल पाएगी?


