UP Election Analysis: अपने-अपने समीकरण

UP Election Analysis: उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति पर विशेष लेख। अखिलेश यादव, मायावती, कांग्रेस और बीजेपी के बदलते समीकरणों के बीच यूपी चुनावी राजनीति का नया चेहरा और रणनीतियों का विश्लेषण।

Newstrack Network
Published on: 7 Jun 2026 3:56 PM IST
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UP Election Analysis: देश बदल रहा है। अपने-अपने तरीके से देश बदल रहा है। शायद उत्तर प्रदेश भी बदल रहा है। अपने विशिष्ट तरीके से बदल रहा है, खासकर जमीनी राजनीति में बदलाव के अंकुर फूट रहे हैं। लोग उत्साहित हैं, सिर्फ इतनी-सी बात को लेकर कि बंजर से कुछ निकलने की कोशिश तो हो रही है, नहीं तो अब तक वही ढाक था और उसी ढाक के तीन पात थे। समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ है। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हैं। पिछले दो महीनों में उन्होंने अपनी ही पार्टी में जमकर संघर्ष किया है। पार्टी के प्रमुख और अपने पिता मुलायम सिंह यादव, चाचा शिवपाल यादव और उनके गहरे दोस्तों की चुनावी रणनीति को उन्होंने अस्वीकार कर दिया। पार्टी और परिवार में घमासान हुआ और अंततः अखिलेश ने वर्चस्व छीन लिया। चुनाव आयोग ने भी उनको समाजवादी पार्टी का नेता घोषित कर दिया।

भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहली घटना है, जिसमें पिता और पुत्र के बीच ऐसा घोषित राजनीतिक संग्राम हुआ हो। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर कई घातक हमले किए—कुछ ऐसे भी, जो अमूमन सार्वजनिक मंचों से अभी तक नहीं होते थे। पिता ने बेटे को कई बार धोबीपाट देने की कोशिश की, पर अखिलेश दांव से बच निकले।


लोगों को अखिलेश का यह रूप जंच रहा है। वे मानते हैं कि लड़ाई के पीछे पारिवारिक कलह या कोई भी कारण रहा हो, पर अखिलेश का पार्टी में अपराधियों के खिलाफ स्टैंड एकदम सही है। मुलायम सिंह लंबे समय से उत्तर प्रदेश में लोकप्रिय नेता रहे हैं, जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर रहे हैं, पर उनके बेटे ने उनकी सारी परिपाटी एक झटके में किनारे कर दी। मुलायम के यादव-मुसलमान वोट बैंक फार्मूले से आगे उन्होंने बढ़ने की कोशिश की है। इसीलिए विकास और राजनीति में अपराधीकरण के मुद्दे को लेकर वे अपने पिता-चाचा से जूझ गए थे।

इस सारी कश्मकश का नतीजा है कि अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी से आगे निकल गए हैं। वे खुद एक ब्रांड बन गए हैं, जिनकी वजह से पार्टी का समाजवाद और राजनीतिक विचार-पद्धति निर्धारित होगी। वे अभी युवा हैं, देश के सबसे कम उम्र वाले मुख्यमंत्रियों में से हैं, और इसलिए भी उत्तर प्रदेश के युवाओं को काफी आकर्षित कर रहे हैं। प्रदेश बदल रहा है, इसका सबसे बड़ा संकेत अखिलेश यादव खुद ही हैं।

कांग्रेस भी बदल रही है। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को चुनावी समर में उतारने के बाद उसने अपने इतिहास में सबसे बड़ा यू-टर्न लिया। पूरी पार्टी से वह एकाएक एक चौथाई पार्टी में तब्दील हो गई। पच्चीस साल में पहली बार कांग्रेस ने अपनी हैसियत पहचानी और झटपट समाजवादी पार्टी का पुछल्ला बनने को तैयार हो गई है। उत्तर प्रदेश में अपने यथार्थ को स्वीकार करना शायद कांग्रेस की नई सोच और रणनीति का प्रमाण है।


प्रियंका गांधी और डिंपल यादव में परस्पर स्नेह का पनपना, राहुल गांधी और अखिलेश यादव के दोस्ताना भाव को इस चुनाव में मदद करेगा। उम्रदराज मुलायम सिंह और पुराने कांग्रेसियों के होते यह मुमकिन नहीं था। दोनों ही पार्टियां अनुभवी नेताओं की जकड़बंदी में थीं, जो नए नेतृत्व को अपने मकड़जाल में फंसाकर रखना चाहते थे। अखिलेश और राहुल ने अपने पार्टी संगठन से इन जालों की सफाई बड़ी सफाई से की है। ऐसा किसी भी राज्य में पहले कभी नहीं हुआ है। अब अखिलेश यादव अपने नाम पर चुनाव लड़ेंगे। उनका अपना बल-बूता होगा, अपना विजन होगा और अपना कार्य करने का तरीका, जिसका विरासत से कोई लेना-देना नहीं होगा।

उत्तर प्रदेश में समाजवादी और कांग्रेस ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली बहुजन समाज पार्टी भी बदल रही है। बहुजन सुप्रीमो मायावती उत्तर प्रदेश की 1995 से पांच बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, हालांकि पूरे पांच साल मुख्यमंत्री वे सिर्फ एक बार (2007-12) ही बन पाई हैं। 2007 में मायावती ने दलित और ब्राह्मणों का गठजोड़ किया और पूर्ण बहुमत पाया। उनके शासनकाल की एक बड़ी उपलब्धि कड़ी कानून-व्यवस्था थी।


पर मायावती बदल रही हैं। इस बार उन्होंने दलित-मुसलमान की सोशल इंजीनियरिंग की है। ब्राह्मण पिछड़ गया है। अन्य वर्ग सिर्फ दिखावे के लिए चुनाव सूची में शामिल किए गए हैं। कुल मिलाकर अगर कहा जाए, तो मायावती अगले महीने होने वाला चुनाव मुसलमानों के बूते पर लड़ रही हैं, जो उनकी पुरानी सोच से एकदम अलग है। माफिया सरगनाओं से भी अब उन्हें परहेज नहीं रहा है। वे सिर्फ गणित भिड़ाने में जुटी हैं, यानी समाजवादी पार्टी और कांग्रेस से टूटे मुसलमान वोटों को बटोरना चाहती हैं। दूसरे शब्दों में, दलित-प्रधान पार्टी बदलकर मुसलमान-प्रधान पार्टी बन रही है।

पर अगर मायावती के मनसूबे पूरे होते हैं, तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक और बड़ा बदलाव होगा, जिससे समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपनी पुश्तैनी राजनीतिक जमीन से बेदखल हो जाएंगे। वास्तव में मायावती ने बड़ा जुआ खेला है—अर्श या फर्श का दांव लगाया है।

भारतीय जनता पार्टी भी बदल रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद वह आश्वस्त थी कि विधानसभा भी उसकी झोली में पके आम की तरह गिर जाएगी। उसकी आश्वस्ति चुनाव आते-आते ऊहापोह में बदल गई है। नेता से लेकर कार्यकर्ता तक सभी अपना-अपना ब्रह्म पाले हुए हैं। किसी के लिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ब्रह्म हैं, तो कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चमत्कार की तलाश में है।


उत्तर प्रदेश पांच सौ साल पहले तुलसी, सूर और कबीर के भक्तिकाल के लिए प्रसिद्ध था। भक्तिकाल फिर जन्मा है और फल-फूल रहा है। भाजपाइयों को मोदी-शाह पर उतना ही भरोसा है, जितना तुलसी को राम-लक्ष्मण पर था। यह अच्छी बात है, क्योंकि प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश में नोटबंदी के बाद भी बहुत लोकप्रिय हैं। उनसे लोगों को आस है। पर क्या उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता विधानसभा के प्रत्याशियों की झोली वोटों से भर पाएगी?

भारतीय जनता पार्टी भी बदल रही है। पिछले कई दशकों में पार्टी कैडर ने कड़ा परिश्रम किया है, पर अब वे मानने लगे हैं कि एक बहुत बड़ा नेता चार सौ तीन प्रत्याशियों का भाग्य उनके घर बैठे बदल सकता है। वे आश्वस्त हैं कि राजनीति में भी जादू की छड़ी होती है। बस, उसको फिराने की देर है।

(साभार ‘जनसत्ता’ समाचार पत्र।)

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