होटल-रेस्तरां के मेन्यु पर अब कैलोरी से लेकर एलर्जी तक की जानकारी, एक नवंबर से यूपी में जांच अभियान

UP News: उत्तर प्रदेश में 1 नवंबर 2026 से होटल-रेस्तरां और खान-पान प्रतिष्ठानों की विशेष जांच होगी। FSDA लाइसेंस, पानी, स्वच्छता, कर्मचारियों के स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा मानकों की पड़ताल करेगा।

Newstrack Network
Published on: 26 Sept 2026 1:03 AM IST
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UP News (Image Credit-Social Media)

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में होटल, रेस्तरां, कैफे, ढाबों और दूसरी खान-पान इकाइयों की जांच अब केवल रसोई की साफ-सफाई और खाने के नमूने लेने तक सीमित नहीं रहेगी। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन यानी FSDA ने खाद्य सेवा प्रतिष्ठानों की जांच के लिए विस्तृत मानक तय किए हैं और एक नवंबर 2026 से प्रदेश में इनके अनुपालन की जांच के लिए विशेष अभियान शुरू करने की तैयारी है। मेन्यु पर भोजन से जुड़ी जानकारी, खाद्य लाइसेंस, कर्मचारियों के स्वास्थ्य प्रमाणपत्र, इस्तेमाल होने वाले पानी की गुणवत्ता, कच्चे माल की खरीद, स्टॉक, कीट नियंत्रण, साफ-सफाई, खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल होने वाले रंग और स्वीटनर तथा तैयार और अर्ध-तैयार खाद्य सामग्री के भंडारण तक की जांच होगी। FSDA आयुक्त रोशन जैकब के अनुसार विभाग का उद्देश्य खाद्य सुरक्षा, स्वच्छता और उपभोक्ता के सामने पारदर्शिता बढ़ाना है तथा अब विनिर्माण इकाइयों के साथ खाद्य सेवा क्षेत्र पर भी निगरानी बढ़ाई जा रही है।

हालांकि नए निर्देशों में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ‘अब हर होटल-रेस्तरां को हर डिश के सामने कैलोरी लिखनी होगी’ कहना पूरी तरह सही नहीं है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी FSSAI के मौजूदा ‘मेन्यु लेबलिंग’ नियम उन खाद्य सेवा प्रतिष्ठानों पर लागू होते हैं जिनके पास केंद्रीय लाइसेंस है अथवा जिनके 10 या उससे अधिक स्थानों पर आउटलेट हैं। इनमें केंद्रीय लाइसेंस वाले रेस्तरां, पांच सितारा होटल, 10 या उससे अधिक स्थानों वाली रेस्तरां-होटल श्रृंखलाएं, पात्र क्लब-कैंटीन, क्लाउड किचन, ढाबा श्रृंखलाएं तथा कुछ रेलवे और विमानन खान-पान सेवाएं भी शामिल हो सकती हैं। इन प्रतिष्ठानों को मेन्यु कार्ड, बोर्ड या पुस्तिका में खाद्य पदार्थ के सामने प्रति सर्विंग किलो कैलोरी और सर्विंग का आकार बताना होता है।

कैलोरी के साथ ग्राहक को यह भी बताया जाएगा कि कितनी ऊर्जा की जरूरत

FSSAI के नियम के अनुसार पात्र प्रतिष्ठान किसी व्यंजन की कैलोरी केवल संख्या में लिखकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं करते। उन्हें यह संदर्भ सूचना भी प्रमुखता से प्रदर्शित करनी होती है कि एक औसत सक्रिय वयस्क को प्रतिदिन करीब 2,000 किलो कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है, हालांकि व्यक्ति की वास्तविक कैलोरी आवश्यकता अलग-अलग हो सकती है। इसका उद्देश्य ग्राहक को यह समझने का संदर्भ देना है कि उदाहरण के लिए 700 किलो कैलोरी वाली किसी डिश का दैनिक ऊर्जा जरूरत में कितना हिस्सा हो सकता है।

लेकिन 2,000 किलो कैलोरी को प्रत्येक व्यक्ति की आदर्श दैनिक सीमा समझना भी गलत होगा। उम्र, लिंग, शरीर का आकार, गर्भावस्था, स्वास्थ्य और शारीरिक सक्रियता के आधार पर ऊर्जा आवश्यकता बदलती है। इसीलिए नियम में भी इसे औसत सक्रिय वयस्क का संदर्भ मानक बताया गया है।

एलर्जी पैदा करने वाली सामग्री की जानकारी भी जरूरी

FSSAI के मेन्यु लेबलिंग नियम में कैलोरी के साथ एक और महत्वपूर्ण प्रावधान एलर्जन यानी एलर्जी पैदा कर सकने वाली सामग्री से जुड़ा है। पात्र खाद्य सेवा प्रतिष्ठानों को मेन्यु कार्ड या बोर्ड पर संबंधित खाद्य पदार्थ के सामने निर्धारित एलर्जन की जानकारी देनी होती है। इसे आसानी से समझ में आने वाले प्रतीकों के माध्यम से भी प्रदर्शित किया जा सकता है। साथ ही शाकाहारी या मांसाहारी होने का निर्धारित चिह्न भी प्रदर्शित करना होता है।

यह जानकारी केवल खान-पान संबंधी पसंद का मामला नहीं है। कुछ लोगों में मूंगफली, दूध, अंडा, सोया, गेहूं, मछली या दूसरे खाद्य पदार्थों से गंभीर एलर्जी हो सकती है। ऐसे व्यक्ति के लिए भोजन में संबंधित पदार्थ मौजूद है या नहीं, इसकी जानकारी स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी होती है।

क्या हर डिश के सभी ‘इंग्रेडिएंट्स’ मेन्यु पर लिखने होंगे?

FSDA के नए निरीक्षण निर्देशों की रिपोर्ट में व्यंजन में इस्तेमाल सामग्री, तेल, कृत्रिम रंग, स्वीटनर और एडिटिव के बारे में पारदर्शिता पर जोर दिया गया है, लेकिन इसे FSSAI के राष्ट्रीय मेन्यु-लेबलिंग नियम से अलग-अलग समझना जरूरी है। मौजूदा केंद्रीय नियम पात्र प्रतिष्ठानों के मेन्यु पर कैलोरी, सर्विंग आकार, निर्धारित एलर्जन और शाकाहारी-मांसाहारी चिह्न को स्पष्ट रूप से अनिवार्य करते हैं। दूसरी पोषण संबंधी जानकारी तथा लागू होने पर जैविक सामग्री से जुड़ी जानकारी ग्राहक के अनुरोध पर पुस्तिका, हैंडआउट या वेबसाइट के माध्यम से भी दी जा सकती है।

इसलिए ‘हर छोटे-बड़े होटल को प्रत्येक डिश की पूरी रेसिपी और हर सामग्री मेन्यु पर लिखनी होगी’ जैसी व्याख्या अभी उपलब्ध केंद्रीय नियमों से नहीं निकलती। उत्तर प्रदेश में FSDA का नया निरीक्षण प्रारूप यदि इससे अतिरिक्त जानकारी अनिवार्य करता है तो उसकी सीमा विभाग के लिखित आदेश और निरीक्षण चेकलिस्ट से निर्धारित होगी। खास तौर पर तेल, कृत्रिम रंग, स्वीटनर और दूसरे खाद्य योजकों की जानकारी की जांच इसी विस्तृत अनुपालन व्यवस्था का हिस्सा होगी।

ऑनलाइन खाना मंगाने पर भी कैलोरी और एलर्जन की जानकारी

यह व्यवस्था केवल रेस्तरां में बैठकर खाना खाने वाले ग्राहकों तक सीमित नहीं है। FSSAI के स्पष्टीकरण के अनुसार जिन खाद्य प्रतिष्ठानों पर मेन्यु लेबलिंग लागू होती है, उनके भोजन को ऑनलाइन बेचने वाले मंच पर भी संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। यानी पात्र रेस्तरां की डिश ऑनलाइन सूचीबद्ध होने पर कैलोरी, शाकाहारी-मांसाहारी चिह्न, एलर्जन और लागू पोषण संबंधी जानकारी डिजिटल माध्यम में भी उपलब्ध होनी चाहिए।

यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खाद्य सेवा बाजार का बड़ा हिस्सा अब घर पहुंचाने वाली सेवाओं और क्लाउड किचन से जुड़ चुका है। ग्राहक यदि रेस्तरां की मेज पर बैठने के बजाय मोबाइल से भोजन चुन रहा है तो खाद्य जानकारी तक उसकी पहुंच कम नहीं होनी चाहिए।

MSG, कृत्रिम रंग और स्वीटनर पर भी निगरानी

FSDA के निर्देशों में खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल किए जाने वाले मोनोसोडियम ग्लूटामेट यानी MSG, कृत्रिम रंग और कृत्रिम स्वीटनर को लेकर भी पारदर्शिता पर जोर दिया गया है। निरीक्षण में यह देखा जाएगा कि जहां किसी एडिटिव के इस्तेमाल की घोषणा नियमों के तहत आवश्यक है, वहां उपभोक्ता को सही जानकारी दी गई है या नहीं।

यहां MSG को अपने आप ‘जहरीला पदार्थ’ समझना भी वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। खाद्य सुरक्षा का सवाल यह है कि कोई खाद्य योजक संबंधित खाद्य श्रेणी में अनुमत है या नहीं, निर्धारित सीमा और शर्तों के अनुसार इस्तेमाल हुआ या नहीं तथा जहां घोषणा आवश्यक है वहां ग्राहक को इसकी जानकारी दी गई या नहीं। यही सिद्धांत खाद्य रंग और स्वीटनर पर भी लागू होता है।

होटल को तैयार रखने होंगे कम से कम सात महत्वपूर्ण रिकॉर्ड

एक नवंबर से शुरू होने वाले अभियान में प्रतिष्ठानों के कागजात की जांच भी महत्वपूर्ण हिस्सा होगी। उपलब्ध निर्देशों के अनुसार निरीक्षण के समय कम से कम सात प्रमुख प्रकार के दस्तावेज और रिकॉर्ड मांगे जा सकते हैं—खाद्य लाइसेंस अथवा पंजीकरण, खाद्य कर्मियों के स्वास्थ्य संबंधी प्रमाणपत्र, पानी की जांच का रिकॉर्ड, कीट नियंत्रण से संबंधित प्रमाणपत्र, कच्चे माल की खरीद के बिल, स्टॉक रजिस्टर तथा साफ-सफाई के रिकॉर्ड।

FSSAI की स्वच्छता व्यवस्था पहले से खाद्य कारोबारियों को लाइसेंस की शर्तों के साथ निर्धारित Good Hygiene Practices और Good Manufacturing Practices का पालन करने के लिए बाध्य करती है। खाद्य सेवा प्रतिष्ठानों के लिए Schedule 4 में अलग स्वच्छता आवश्यकताएं निर्धारित हैं। इसलिए उत्तर प्रदेश का अभियान कई मामलों में नए खाद्य कानून बनाने के बजाय पहले से लागू केंद्रीय मानकों को अधिक व्यवस्थित ढंग से जांचने और लागू कराने की दिशा में भी देखा जाना चाहिए।

पानी की जांच पर नियम में एक महत्वपूर्ण अपवाद

खान-पान प्रतिष्ठान में इस्तेमाल होने वाला पानी खाद्य सुरक्षा का बुनियादी हिस्सा है। FSSAI की स्वच्छता जांच व्यवस्था में भोजन के घटक या खाद्य पदार्थ तथा खाद्य-संपर्क सतह के संपर्क में आने वाला पानी IS 10500 के अनुरूप पीने योग्य होना चाहिए। खाद्य व्यवसाय में पानी को सामग्री के रूप में इस्तेमाल करने पर जांच का रिकॉर्ड रखने की व्यवस्था है और संबंधित मानकों में छह महीने के अंतर से परीक्षण की अपेक्षा की गई है।

लेकिन यहां भी एक महत्वपूर्ण अपवाद है। यदि प्रतिष्ठान नगर निगम अथवा किसी सरकारी निकाय द्वारा उपलब्ध कराए गए पीने योग्य पानी का इस्तेमाल करता है और उसका बिल रिकॉर्ड में रखता है तो उसके लिए अपनी अलग पानी जांच रिपोर्ट की वही अनिवार्यता लागू नहीं होती। मॉल, वाणिज्यिक परिसर या निजी प्राधिकरण से पानी लेने वाले प्रतिष्ठान संबंधित आपूर्तिकर्ता से निर्धारित अवधि की जांच रिपोर्ट प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए ‘हर रेस्तरां को हर छह महीने अपनी निजी लैब रिपोर्ट बनवानी ही होगी’ कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा।

कर्मचारी स्वस्थ है या नहीं, यह भी खाद्य सुरक्षा का हिस्सा

खाना बनाने और संभालने वाले कर्मचारियों की व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वास्थ्य भी जांच का हिस्सा होगा। इसकी वजह स्पष्ट है—भोजन सुरक्षित सामग्री से बना होने के बावजूद यदि उसे संभालने वाले व्यक्ति की स्वच्छता खराब है या खाद्य जनित संक्रमण फैलाने वाली स्थिति है तो तैयार भोजन दूषित हो सकता है।

इसी तरह प्रतिष्ठान में कीट नियंत्रण व्यवस्था भी देखी जाएगी। कॉकरोच, चूहे, मक्खियां और दूसरे कीट खाद्य पदार्थों तथा सतहों को दूषित कर सकते हैं। FSSAI की स्वच्छता व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि खाद्य कारोबारी केवल अंतिम तैयार भोजन की गुणवत्ता के लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि कच्चा माल आने से लेकर ग्राहक तक भोजन पहुंचने तक पूरी प्रक्रिया में संभावित खतरे नियंत्रित करे।

तेल की जानकारी क्यों महत्वपूर्ण

FSDA के निर्देशों में ग्राहक को व्यंजन में इस्तेमाल होने वाले तेल की जानकारी देने पर भी जोर है। इसका एक कारण यह है कि ‘वेजिटेबल ऑयल’ जैसा सामान्य विवरण उपभोक्ता को यह नहीं बताता कि खाना सरसों, सोयाबीन, सूरजमुखी, पाम या किसी दूसरे तेल में तैयार किया गया है। खाद्य लेबलिंग के नियम पहले से पैक खाद्य पदार्थों में सामग्री की घोषणा और खाद्य तेल या वसा के विवरण के लिए प्रावधान करते हैं।

रेस्तरां के मामले में FSDA की नई जांच उपभोक्ता पारदर्शिता को सेवा क्षेत्र तक आगे बढ़ाने का प्रयास है। लेकिन यह भी देखना होगा कि विभाग अंतिम चेकलिस्ट में तेल की जानकारी को किस स्वरूप में अनिवार्य करता है—मेन्यु की प्रत्येक डिश के सामने, प्रतिष्ठान में सामान्य सूचना के रूप में या ग्राहक के पूछने पर उपलब्ध कराए जाने वाले विवरण के रूप में।

सेमी-कुक्ड और रेडी-टू-कुक भोजन के लिए भी नियम

अर्ध-पका और रेडी-टू-कुक भोजन भी नए निरीक्षण अभियान के दायरे में रहेगा। ऐसी सामग्री के पैकेज पर उसके घटकों और भंडारण की शर्तों का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए और परिवहन के दौरान भी आवश्यक तापमान तथा दूसरी भंडारण परिस्थितियां बनाए रखनी होंगी। यह विशेष रूप से उन रेस्तरां श्रृंखलाओं और केंद्रीय रसोइयों के लिए महत्वपूर्ण है जहां एक स्थान पर तैयार या अर्ध-तैयार भोजन दूसरे आउटलेट तक भेजा जाता है।

यदि किसी उत्पाद को ठंडा या जमे हुए तापमान पर रखना आवश्यक है और परिवहन के दौरान उसकी शीत-श्रृंखला टूट जाती है तो पैकेज सही दिखने के बावजूद सूक्ष्मजीवी जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए नए निरीक्षण में केवल पैकेज पर लिखी तारीख नहीं बल्कि भंडारण और परिवहन की वास्तविक स्थिति भी महत्वपूर्ण होगी।

पैकिंग में इस्तेमाल एल्युमिनियम फॉयल भी खाद्य-ग्रेड होना चाहिए

तैयार भोजन पैक करने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है। FSDA ने स्पष्ट किया है कि एल्युमिनियम फॉयल सहित खाद्य पदार्थ के सीधे संपर्क में आने वाली पैकेजिंग निर्धारित खाद्य सुरक्षा मानकों के अनुरूप होनी चाहिए। FSSAI ने पैकेजिंग सामग्री के लिए अलग मानक निर्धारित किए हुए हैं और 2026 में भी पैकेजिंग नियमों में संशोधन अधिसूचित किए गए हैं।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि खाद्य सुरक्षा केवल इस बात पर समाप्त नहीं होती कि खाना सही तरीके से पकाया गया। जिस पैकेज में गर्म, तैलीय या अम्लीय भोजन रखा जाता है, वह सामग्री भी भोजन के सीधे संपर्क में आती है।

छोटे ढाबे और बड़े रेस्तरां में फर्क समझना जरूरी

नए अभियान की खबर का सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक पहलू यही है कि अलग-अलग नियमों का दायरा अलग है। साफ-सफाई, सुरक्षित पानी, लाइसेंस या पंजीकरण, सुरक्षित कच्चा माल, उचित भंडारण और खाद्य स्वच्छता जैसे बुनियादी मानक छोटे खाद्य कारोबारियों पर भी लागू होते हैं, लेकिन मेन्यु पर प्रति सर्विंग कैलोरी लिखने वाला केंद्रीय नियम हर सड़क किनारे ढाबे या एकल छोटे रेस्तरां पर लागू नहीं होता।

FSSAI के आधिकारिक मार्गदर्शन के अनुसार मेन्यु लेबलिंग के दायरे में केंद्रीय लाइसेंस वाले प्रतिष्ठान या 10 अथवा अधिक स्थानों पर आउटलेट संचालित करने वाले खाद्य सेवा कारोबारी आते हैं। पांच सितारा होटल, केंद्रीय लाइसेंस वाले रेस्तरां, बड़ी श्रृंखलाएं, पात्र कैंटीन और कुछ क्लाउड किचन इसके उदाहरण हैं। इसलिए किसी छोटे एकल रेस्तरां पर केवल इसलिए कार्रवाई नहीं की जा सकती कि उसने प्रत्येक समोसे, चाय या थाली के सामने कैलोरी नहीं लिखी, जब तक वह उस विशेष नियामक श्रेणी में न आता हो।

कैलोरी में भी 100 प्रतिशत गणितीय सटीकता अपेक्षित नहीं

रेस्तरां के भोजन की कैलोरी पैकेटबंद औद्योगिक उत्पाद की तरह हर बार बिल्कुल समान होना व्यावहारिक रूप से कठिन है। शेफ द्वारा इस्तेमाल सामग्री की मात्रा, तेल और सर्विंग आकार में मामूली अंतर हो सकता है। इसी वजह से FSSAI के नियम खाद्य सेवा प्रतिष्ठानों की घोषित पोषण जानकारी में 25 प्रतिशत तक विचलन की गुंजाइश देते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि रेस्तरां कोई भी अनुमान लिख सकता है। कैलोरी और पोषण संबंधी घोषणा का उचित आधार होना चाहिए, लेकिन नियामक व्यवस्था वास्तविक रसोई संचालन में होने वाले स्वाभाविक अंतर को भी स्वीकार करती है।

खाद्य सुरक्षा के साथ ग्राहक के ‘जानने के अधिकार’ पर जोर

FSDA के इस अभियान में एक बड़ा बदलाव निरीक्षण की सोच में दिखाई देता है। परंपरागत खाद्य सुरक्षा व्यवस्था मुख्यतः इस प्रश्न पर केंद्रित रही कि भोजन खाने योग्य और मिलावट से मुक्त है या नहीं। नई व्यवस्था इसमें दूसरा प्रश्न जोड़ रही है—ग्राहक को पता कितना है कि वह खा क्या रहा है? किसी डिश में कितनी कैलोरी है, उसमें एलर्जी पैदा करने वाला पदार्थ है या नहीं, शाकाहारी है या मांसाहारी, कौन से एडिटिव इस्तेमाल हुए हैं और बड़े प्रतिष्ठान उसकी पोषण जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं या नहीं—ये सभी उपभोक्ता के सूचित निर्णय से जुड़े सवाल हैं।

इसी कारण FSSAI ने फरवरी 2022 में खाद्य सेवा प्रतिष्ठानों के लिए मेन्यु लेबलिंग पर अलग मार्गदर्शिका जारी की थी और बाद में इसके अनुपालन को लेकर विस्तृत प्रश्नोत्तर भी जारी किए। नवीनतम आधिकारिक स्पष्टीकरण में रेस्तरां, कैफे और दूसरे पात्र प्रतिष्ठानों के साथ ऑनलाइन बिक्री में भी कैलोरी, एलर्जन और शाकाहारी-मांसाहारी जानकारी उपलब्ध कराने की आवश्यकता दोहराई गई है।

उत्तर प्रदेश में एक नवंबर से शुरू होने वाला FSDA अभियान इसलिए केवल ‘मेन्यु पर कैलोरी लिखने’ की कार्रवाई नहीं है। इसके दायरे में लाइसेंस, रसोई और भंडारण की स्वच्छता, कर्मचारियों का स्वास्थ्य, पानी की गुणवत्ता, कच्चे माल के बिल, स्टॉक और सफाई के रिकॉर्ड, कीट नियंत्रण, खाद्य योजकों की घोषणा, पैकेजिंग और अर्ध-तैयार भोजन की शीत-श्रृंखला तक आएगी। सबसे महत्वपूर्ण सुधार यह समझना है कि कैलोरी वाला नियम हर छोटे होटल-ढाबे पर समान रूप से लागू नहीं है—FSSAI के केंद्रीय नियम के अनुसार यह केंद्रीय लाइसेंस वाले अथवा 10 या उससे अधिक स्थानों पर आउटलेट वाले पात्र खाद्य सेवा प्रतिष्ठानों के लिए है। इस अंतर को स्पष्ट रखते हुए यदि प्रदेश में नियमों का प्रभावी अनुपालन कराया जाता है तो ग्राहक के सामने केवल यह विकल्प नहीं रहेगा कि उसे क्या खाना है, बल्कि उसे यह जानने का बेहतर अवसर भी मिलेगा कि उसकी प्लेट में वास्तव में क्या परोसा जा रहा है।

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