UP News: ऑपरेशन कायाकल्प के बावजूद यूपी के हजारों स्कूलों में डेस्क-बेंच नहीं

UP News: उत्तर प्रदेश के 46 हजार से अधिक परिषदीय स्कूलों में डेस्क-बेंच की कमी का दावा है। 45 लाख बच्चों को फर्नीचर का इंतजार है, जबकि लगभग एक हजार करोड़ रुपये के बजट और खरीद प्रक्रिया में देरी पर सवाल उठ रहे हैं।

Newstrack Network
Published on: 11 Oct 2026 10:12 PM IST
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UP News (Image Credit-Social Media)

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सरकारी प्राथमिक शिक्षा की तस्वीर बदलने के लिए वर्षों से चलाए जा रहे ऑपरेशन कायाकल्प के बावजूद लाखों बच्चों को आज भी पढ़ने के लिए डेस्क और बेंच उपलब्ध नहीं हो सकी हैं। प्रदेश के 1,32,735 परिषदीय विद्यालयों में से 46 हजार से अधिक विद्यालय ऐसे बताए जा रहे हैं, जहाँ बच्चों के बैठने के लिए पर्याप्त फर्नीचर की व्यवस्था नहीं है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, 45 लाख से अधिक बच्चों को अब भी जमीन पर टाट-पट्टी बिछाकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। सर्दियों की शुरुआत के साथ इन बच्चों की परेशानी और बढ़ने की आशंका है। चिंता की बात यह है कि इस शैक्षणिक सत्र में सभी बच्चों को फर्नीचर उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किए जाने और इसके लिए लगभग एक हजार करोड़ रुपये का बजट आवंटित होने की जानकारी के बावजूद खरीद प्रक्रिया अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब योजना और बजट दोनों मौजूद हैं, तो बच्चों तक यह बुनियादी सुविधा पहुँचने में इतनी देरी क्यों हो रही है?

प्रदेश में परिषदीय विद्यालयों की दशा सुधारने के लिए ऑपरेशन कायाकल्प के अंतर्गत भवनों की मरम्मत, पेयजल, शौचालय, बिजली, फर्श, रंगाई-पुताई और अन्य आधारभूत सुविधाओं के विकास पर जोर दिया गया है। अनेक विद्यालयों में इन सुविधाओं का विस्तार भी हुआ है। लेकिन बच्चों के बैठने की व्यवस्था अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, प्रदेश के लगभग 65 प्रतिशत परिषदीय विद्यालयों में ही डेस्क-बेंच की व्यवस्था हो सकी है। इसका अर्थ है कि करीब 35 प्रतिशत विद्यालय अब भी इस सुविधा से पूरी तरह या पर्याप्त रूप से वंचित हैं। उच्च प्राथमिक विद्यालयों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बताई जा रही है, जबकि प्राथमिक विद्यालयों में बड़ी संख्या में बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ना पड़ता है।

46 हजार विद्यालयों में फर्नीचर की कमी, प्राथमिक कक्षाओं के बच्चे अधिक प्रभावित

उत्तर प्रदेश में परिषदीय विद्यालय ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में प्राथमिक शिक्षा की महत्वपूर्ण व्यवस्था हैं। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों तथा आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लाखों बच्चों की शिक्षा इन विद्यालयों पर निर्भर करती है। ऐसे में स्कूल में बैठने के लिए उपयुक्त स्थान उपलब्ध होना केवल सुविधा का विषय नहीं, बल्कि बच्चों के लिए सम्मानजनक और अनुकूल शैक्षणिक वातावरण तैयार करने का भी प्रश्न है।

उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर 1,32,735 विद्यालयों में लगभग 65 प्रतिशत फर्नीचर उपलब्धता का अर्थ करीब 86 हजार विद्यालयों में सुविधा होना और शेष लगभग 46 हजार विद्यालयों में उसकी कमी रहना है। हालाँकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी विद्यालय में फर्नीचर उपलब्ध होने और उस विद्यालय के सभी बच्चों के लिए पर्याप्त डेस्क-बेंच होने में अंतर है। संभव है कि कुछ विद्यालयों में आंशिक व्यवस्था हो, लेकिन सभी विद्यार्थियों को उसका लाभ न मिल रहा हो। इसलिए विद्यालयवार उपलब्ध डेस्क-बेंच, नामांकित बच्चों की संख्या और वास्तविक आवश्यकता का मिलान किए बिना पूर्ण उपलब्धता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

बहराइच, बाराबंकी, लखीमपुर खीरी और अयोध्या सहित कई जिलों के परिषदीय विद्यालयों में फर्नीचर की कमी बताई गई है। दूसरी ओर लखनऊ, गोरखपुर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों की स्थिति तुलनात्मक रूप से बेहतर बताई जा रही है। हालाँकि, उपलब्ध विवरण में प्रत्येक जिले के कुल विद्यालयों, फर्नीचरविहीन विद्यालयों और प्रभावित विद्यार्थियों की अलग-अलग संख्या नहीं दी गई है। इसलिए जिलों के बीच सटीक तुलना के लिए विस्तृत आधिकारिक आँकड़ों की आवश्यकता होगी।

सर्दियों में जमीन पर बैठकर पढ़ना बच्चों के लिए अधिक कठिन

फर्नीचर के अभाव में बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ना और लिखना पड़ता है। छोटे बच्चों के लिए यह व्यवस्था विशेष रूप से असुविधाजनक हो सकती है, क्योंकि उन्हें किताब और कॉपी रखने के लिए स्थिर तथा उपयुक्त ऊँचाई वाली सतह नहीं मिलती। जमीन पर बैठकर लिखते समय कई बच्चों को लंबे समय तक आगे झुकना पड़ सकता है। इससे गर्दन, पीठ और कंधों में असुविधा तथा थकान की शिकायत हो सकती है।

सर्दियों में यह समस्या और बढ़ सकती है। ठंडे फर्श पर लंबे समय तक बैठना बच्चों के लिए असहज होता है, विशेष रूप से तब जब कक्षा में पर्याप्त तापीय सुविधा न हो। हालाँकि, केवल जमीन पर बैठने से किसी विशेष बीमारी के विकसित होने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। स्वास्थ्य पर प्रभाव बैठने की मुद्रा, अवधि, फर्श की स्थिति, कमरे के तापमान और बच्चे की व्यक्तिगत स्वास्थ्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

शिक्षा की दृष्टि से भी उपयुक्त फर्नीचर महत्वपूर्ण है। बच्चों को पढ़ने और लिखने के लिए उनकी उम्र तथा शारीरिक बनावट के अनुरूप बैठने की व्यवस्था मिलने से कक्षा में काम करना अधिक सुविधाजनक हो सकता है। छोटे बच्चों के लिए डेस्क की ऊँचाई, बैठने की जगह और कक्षा में आने-जाने का पर्याप्त स्थान भी ध्यान में रखना आवश्यक है। इसलिए फर्नीचर उपलब्ध कराने का लक्ष्य केवल किसी भी आकार की मेज-बेंच खरीद लेना नहीं होना चाहिए, बल्कि बच्चों की उम्र के अनुसार सुरक्षित और उपयोगी व्यवस्था सुनिश्चित करना होना चाहिए।

लगभग एक हजार करोड़ का बजट, फिर भी खरीद प्रक्रिया अधूरी

फर्नीचर की कमी दूर करने के लिए समग्र शिक्षा परियोजना निदेशालय के स्तर से लगभग एक हजार करोड़ रुपये का बजट आवंटित होने की जानकारी सामने आई है। योजना के अंतर्गत विद्यालयों के लिए डेस्क-बेंच की खरीद सरकारी ई-मार्केटप्लेस यानी जेम पोर्टल के माध्यम से की जानी है। इसके अतिरिक्त गुणवत्ता की निगरानी के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में छह सदस्यीय समिति की व्यवस्था बताई गई है।

इतनी बड़ी राशि का प्रावधान होने के बावजूद विद्यालयों में फर्नीचर पहुँचने की प्रक्रिया में देरी सामने आई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पहले खरीद की व्यवस्था केंद्रीयकृत रखी गई थी। बाद में इसे बदलकर जिलास्तर पर खरीद कराने का निर्णय लिया गया। इस बदलाव के बाद कई स्थानों पर प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी और विद्यालयों तक फर्नीचर की आपूर्ति शुरू होने में विलंब हुआ।

हालाँकि, बजट आवंटित होने का अर्थ यह नहीं है कि पूरी राशि खर्च हो चुकी है या सभी जिलों को धनराशि जारी कर दी गई है। बजट स्वीकृति, धनराशि जारी होना, निविदा प्रक्रिया, आपूर्ति आदेश, सामग्री की प्राप्ति और भुगतान अलग-अलग प्रशासनिक चरण हैं। उपलब्ध विवरण में यह स्पष्ट नहीं है कि लगभग एक हजार करोड़ रुपये में से कितनी राशि जिलों को जारी हुई, कितनी खर्च की गई और कितने डेस्क-बेंच के आदेश दिए जा चुके हैं। इन आँकड़ों के बिना वित्तीय प्रगति का अंतिम आकलन संभव नहीं है।

केंद्रीयकृत खरीद से जिलास्तरीय व्यवस्था में बदलाव क्यों बना चुनौती?

बड़े पैमाने पर सरकारी खरीद के लिए केंद्रीयकृत और विकेंद्रीकृत, दोनों प्रकार की व्यवस्थाओं के अपने लाभ और चुनौतियाँ होती हैं। केंद्रीयकृत खरीद में एक समान तकनीकी मानक और बड़ी मात्रा में खरीद के आधार पर कीमत तय करने की संभावना रहती है। लेकिन इसमें स्थानीय जरूरतों, परिवहन और वितरण के स्तर पर कठिनाइयाँ भी सामने आ सकती हैं।

दूसरी ओर जिलास्तरीय खरीद में स्थानीय विद्यालयों की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार सामग्री मँगाने की सुविधा हो सकती है। इससे विद्यालयवार माँग और आपूर्ति का बेहतर मिलान संभव है। लेकिन इसके लिए प्रत्येक जिले में समय पर आवश्यकता का आकलन, तकनीकी मानक तय करना, निविदा प्रक्रिया पूरी करना और गुणवत्ता की जाँच सुनिश्चित करना आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश की इस योजना में खरीद व्यवस्था बदलने के बाद प्रक्रिया धीमी होने की बात सामने आई है। हालाँकि, देरी का पूरा कारण केवल इसी बदलाव को मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि उपलब्ध विवरण में विभागीय स्तर पर समयसीमा, निविदाओं की स्थिति और आपूर्ति आदेशों का विस्तृत ब्योरा नहीं है। यह भी देखना आवश्यक होगा कि क्या सभी जिलों को एक समान तकनीकी निर्देश मिले हैं और क्या विद्यालयवार आवश्यकता का आकलन पूरा हो चुका है।

जेम पोर्टल से खरीद और गुणवत्ता जाँच की व्यवस्था

सरकारी ई-मार्केटप्लेस, जिसे जेम कहा जाता है, सरकारी विभागों और संस्थाओं की वस्तुओं तथा सेवाओं की खरीद के लिए विकसित डिजिटल मंच है। इसका उद्देश्य सरकारी खरीद में पारदर्शिता, प्रतिस्पर्धा और प्रक्रियागत दक्षता बढ़ाना है। लेकिन किसी वस्तु की खरीद जेम पोर्टल से होने मात्र से उसकी गुणवत्ता अपने आप सुनिश्चित नहीं हो जाती।

विद्यालयों के लिए खरीदे जाने वाले डेस्क-बेंच में सामग्री की मजबूती, किनारों की सुरक्षा, बैठने की ऊँचाई, स्थिरता और उपयोग की अवधि जैसे पहलुओं का महत्व है। छोटे बच्चों के लिए अनुपयुक्त आकार का फर्नीचर उपलब्ध करा देने से समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं होगी। इसी प्रकार कमजोर सामग्री से बने फर्नीचर की मरम्मत या बदलाव पर भविष्य में अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है।

जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति को गुणवत्ता निगरानी की जिम्मेदारी दिए जाने की जानकारी है। इस व्यवस्था का वास्तविक लाभ तभी होगा जब आपूर्ति के समय निर्धारित मानकों के अनुसार सामग्री का परीक्षण हो और विद्यालयों को प्राप्त फर्नीचर की संख्या तथा गुणवत्ता का सही अभिलेख रखा जाए।

सीएसआर से कुछ विद्यालयों को मदद, लेकिन स्थायी समाधान सरकारी व्यवस्था से ही

प्रदेश के कुछ जिलों में कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व यानी सीएसआर के अंतर्गत भी विद्यालयों को फर्नीचर उपलब्ध कराया गया है। इस प्रकार की सहायता से स्थानीय स्तर पर विद्यालयों की आवश्यकताएँ पूरी करने में मदद मिल सकती है। लेकिन पूरे प्रदेश के लाखों बच्चों के लिए फर्नीचर की व्यवस्था केवल स्वैच्छिक कॉरपोरेट सहयोग के आधार पर नहीं की जा सकती।

सीएसआर से प्राप्त सामग्री की गुणवत्ता, विद्यालय की वास्तविक आवश्यकता और उसके रखरखाव की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। यदि किसी विद्यालय में एक संस्था द्वारा फर्नीचर उपलब्ध करा दिया गया है, तो सरकारी खरीद के दौरान उसकी वास्तविक शेष आवश्यकता का आकलन किया जाना चाहिए। इससे दोहरी खरीद और संसाधनों के असमान वितरण से बचा जा सकता है।

इसी तरह जिन विद्यालयों में बच्चों की संख्या अधिक है, वहाँ आवश्यकता भी अधिक होगी। केवल प्रत्येक विद्यालय को समान संख्या में डेस्क-बेंच उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं होगा। प्राथमिकता का निर्धारण विद्यार्थियों की वास्तविक संख्या, पहले से उपलब्ध फर्नीचर और विद्यालय की कक्षावार जरूरत के आधार पर होना चाहिए।

ऑपरेशन कायाकल्प के बावजूद क्यों अधूरी है बैठने की व्यवस्था?

ऑपरेशन कायाकल्प के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार का प्रयास किया गया है। विद्यालयों में शौचालय, पेयजल, बिजली, भवन मरम्मत और अन्य व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने पर जोर दिया गया। लेकिन किसी विद्यालय की बाहरी स्थिति सुधरने और उसके भीतर बच्चों को सभी आवश्यक सुविधाएँ मिलने के बीच अंतर हो सकता है।

फर्नीचर की कमी इसी अंतर को सामने लाती है। विद्यालय की रंगाई-पुताई, दीवारों पर शैक्षणिक चित्र और भवन की मरम्मत उपयोगी हैं, लेकिन यदि बच्चों को लिखने-पढ़ने के लिए उपयुक्त डेस्क-बेंच उपलब्ध नहीं हैं, तो बुनियादी शैक्षणिक वातावरण अधूरा रह जाता है।

इस समस्या का समाधान केवल एक बार बड़े पैमाने पर खरीद करने से भी नहीं होगा। समय के साथ फर्नीचर टूटता है, बच्चों की संख्या बदलती है और विद्यालयों की जरूरतें बढ़ती हैं। इसलिए फर्नीचर की उपलब्धता, रखरखाव और समय पर बदलाव के लिए नियमित व्यवस्था आवश्यक है।

खरीद प्रक्रिया की प्रगति सार्वजनिक होने से बढ़ सकती है जवाबदेही

इतनी बड़ी योजना की प्रगति का आकलन करने के लिए जिलावार जानकारी महत्वपूर्ण होगी। प्रत्येक जिले में कितने विद्यालयों को फर्नीचर की आवश्यकता है, कितने विद्यार्थियों के लिए व्यवस्था की जानी है, कितनी धनराशि स्वीकृत और जारी हुई है तथा कितने विद्यालयों तक सामग्री पहुँच चुकी है, इन सूचनाओं के आधार पर वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

इसके अतिरिक्त खरीद आदेश जारी होने की तारीख, आपूर्ति की निर्धारित समयसीमा और गुणवत्ता जाँच की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। यदि ये आँकड़े नियमित रूप से सार्वजनिक किए जाएँ, तो विद्यालय प्रबंधन समितियाँ, अभिभावक और स्थानीय प्रशासन भी प्रगति पर नजर रख सकेंगे।

इससे यह समझना आसान होगा कि समस्या बजट की कमी से संबंधित है, खरीद प्रक्रिया में देरी से, आपूर्ति संबंधी कठिनाइयों से या किसी अन्य प्रशासनिक कारण से। फिलहाल उपलब्ध विवरण यह संकेत देता है कि बजट और योजना होने के बावजूद कार्यान्वयन में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई है।

बच्चों की पढ़ाई के लिए बुनियादी सुविधाएँ भी उतनी ही जरूरी

किसी विद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता का आकलन केवल भवन, फर्नीचर या अन्य भौतिक सुविधाओं से नहीं किया जा सकता। शिक्षकों की उपलब्धता, नियमित पढ़ाई, पाठ्य सामग्री और बच्चों की सीखने की क्षमता भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बुनियादी सुविधाओं की कमी को सामान्य मान लिया जाए।

डेस्क-बेंच की उपलब्धता बच्चों को कक्षा में व्यवस्थित ढंग से बैठने, किताब-कॉपी रखने और लिखने-पढ़ने में सहायता कर सकती है। विशेष रूप से छोटे बच्चों के लिए उनकी उम्र के अनुरूप बैठने की व्यवस्था महत्वपूर्ण है। इसके साथ दिव्यांग विद्यार्थियों की आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी आवश्यक है, ताकि कक्षा की व्यवस्था सभी बच्चों के लिए उपयोगी हो।

शिक्षा के अधिकार से जुड़ी व्यवस्थाओं में विद्यालयों के लिए बुनियादी सुविधाओं और अनुकूल शिक्षण वातावरण को महत्व दिया गया है। हालाँकि, प्रत्येक विद्यालय में एक विशेष प्रकार की डेस्क-बेंच उपलब्ध होना शिक्षा के अधिकार अधिनियम की सभी परिस्थितियों में अलग से निर्धारित अनिवार्य शर्त नहीं है। इसलिए फर्नीचर की कमी को सीधे किसी एक कानूनी प्रावधान का उल्लंघन घोषित करने के बजाय विद्यालय की वास्तविक सुविधा और लागू मानकों के आधार पर देखना चाहिए।

सर्दियों से पहले व्यवस्था पूरी करना बड़ी चुनौती

अक्टूबर में मौसम बदलने के साथ उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में आने वाले सप्ताहों में तापमान गिरने लगेगा। ऐसे में जिन विद्यालयों में बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ना पड़ता है, वहाँ उनकी असुविधा बढ़ सकती है। विशेष रूप से प्राथमिक कक्षाओं के छोटे बच्चों के लिए ठंडे फर्श पर लंबे समय तक बैठना कठिन हो सकता है।

यही कारण है कि फर्नीचर उपलब्ध कराने की योजना में समयसीमा का विशेष महत्व है। यदि खरीद और आपूर्ति में कई महीने लगते हैं, तो बच्चों को इस शैक्षणिक सत्र का बड़ा हिस्सा बिना उपयुक्त बैठने की व्यवस्था के बिताना पड़ सकता है। सर्दियों के दौरान अस्थायी रूप से साफ और उपयुक्त बैठने की व्यवस्था करना कुछ विद्यालयों में उपयोगी हो सकता है, लेकिन इसे स्थायी डेस्क-बेंच उपलब्ध कराने का विकल्प नहीं माना जा सकता।

बजट से अधिक महत्वपूर्ण है बच्चों तक सुविधा पहुँचना

उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में फर्नीचर की कमी केवल प्रशासनिक खरीद का मामला नहीं है। यह लाखों बच्चों के रोजमर्रा के शैक्षणिक अनुभव से जुड़ा प्रश्न है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, प्रदेश के 46 हजार से अधिक विद्यालयों और 45 लाख से अधिक विद्यार्थियों को अभी भी पर्याप्त डेस्क-बेंच का इंतजार है। लगभग एक हजार करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान होने के बावजूद खरीद प्रक्रिया में देरी की बात सामने आ रही है।

इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि स्वीकृत संसाधनों को वास्तविक सुविधाओं में बदलने की प्रक्रिया कितनी तेजी और पारदर्शिता से पूरी की जाती है। बजट आवंटन, खरीद आदेश और आपूर्ति के आँकड़े अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन योजना का अंतिम लाभ तभी माना जा सकेगा जब विद्यालयों में बच्चों के लिए सुरक्षित, उपयुक्त और पर्याप्त फर्नीचर वास्तव में उपलब्ध हो जाए।

ऑपरेशन कायाकल्प की सफलता का आकलन केवल विद्यालयों के भवनों की बदली हुई तस्वीर से नहीं, बल्कि उन बच्चों की वास्तविक परिस्थितियों से भी किया जाना चाहिए जो प्रतिदिन वहाँ पढ़ने आते हैं। यदि लाखों बच्चे अब भी जमीन पर बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं, तो बुनियादी सुविधाओं के विस्तार का काम अभी अधूरा है। आने वाली सर्दियों में यह कमी और स्पष्ट दिखाई दे सकती है। ऐसे में फर्नीचर की खरीद और वितरण की समयबद्ध व्यवस्था सुनिश्चित करना प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

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