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MLC चुनाव में कांग्रेस ने डाले हथियार! 11 सीटों पर एक भी प्रत्याशी नहीं, आस लगाए बैठे नेताओं को झटका, बोले- आखिरी व्यक्त पर धोखा मिला
UP MLC Election 2026 में कांग्रेस ने 11 सीटों पर एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा। पार्टी के घोषित उम्मीदवारों में नाराजगी, कई ने निर्दलीय नामांकन किया।
UP MLC Election 2026: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में बराबर हिस्सेदारी का दावा कर रही कांग्रेस ने विधान परिषद (MLC) चुनाव से खुद को पूरी तरह बाहर कर लिया है। 11 MLC सीटों के लिए नामांकन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कांग्रेस ने एक भी सीट पर अपना आधिकारिक प्रत्याशी नहीं उतारा। पार्टी के इस फैसले से उन नेताओं और दावेदारों में नाराजगी बढ़ गई है, जो पिछले करीब 10 महीने से कांग्रेस के झंडे के साथ चुनाव की तैयारी कर रहे थे और मतदाता जोड़ने में जुटे थे।
कांग्रेस ने पिछले साल इन चुनावों के लिए अपने कई उम्मीदवारों के नाम घोषित किए थे। इन नेताओं ने अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में प्रचार अभियान चलाने के साथ मतदाता सूची में नाम जुड़वाने का काम भी किया। पार्टी ने खुद दावा किया था कि उसके अभियान के जरिए 8 लाख से ज्यादा मतदाता जोड़े गए। लेकिन नामांकन की अंतिम तारीख तक कांग्रेस ने चुनाव मैदान में उतरने का फैसला नहीं किया।
कांग्रेस ने घोषित किए थे 8 उम्मीदवार
कांग्रेस ने शुरुआत में पांच स्नातक और तीन शिक्षक MLC सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की थी। इनमें मेरठ-सहारनपुर स्नातक सीट से विक्रांत वशिष्ठ, आगरा स्नातक सीट से रघुराज सिंह पाल, लखनऊ स्नातक सीट से डॉ. देवमणि तिवारी, वाराणसी शिक्षक सीट से संजय राय प्रियदर्शी और वाराणसी स्नातक सीट से अरविंद सिंह पटेल शामिल थे।
बाद में डॉ. देवमणि तिवारी के लखनऊ स्नातक सीट से पीछे हटने के बाद कांग्रेस ने उनकी जगह सरिता मिश्रा को उम्मीदवार बनाया। इसके अलावा गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से देव भास्कर तिवारी, प्रयागराज-झांसी स्नातक सीट से अजय कुमार सिंह और आगरा अनएडेड शिक्षक सीट से आकाश अग्रवाल के नाम की घोषणा की गई थी।
कांग्रेस ने इन उम्मीदवारों को अधिक से अधिक मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने का लक्ष्य दिया था। उम्मीदवारों ने महीनों तक अपने-अपने क्षेत्रों में दौरे किए और चुनाव की तैयारी की। लेकिन नामांकन के अंतिम चरण में पार्टी ने चुनाव से पीछे हटने का फैसला कर लिया।
'एक साल तक कांग्रेस का झंडा लेकर घूमे, आखिरी वक्त पर धोखा मिला'
आगरा स्नातक सीट से कांग्रेस के घोषित उम्मीदवार रहे रघुराज सिंह पाल ने पार्टी के फैसले पर नाराजगी जताई। धांगर समुदाय से आने वाले पाल के मुताबिक, उन्होंने करीब एक साल तक पूरे क्षेत्र में घूमकर कांग्रेस के लिए मतदाता तैयार किए।
उन्होंने कहा कि जब उन्होंने काम शुरू किया था, तब आगरा MLC चुनाव में कांग्रेस का नाम तक चर्चा में नहीं था। लेकिन लगातार मेहनत के बाद उन्होंने पार्टी का आधार तैयार किया और कांग्रेस के झंडे के साथ चुनाव अभियान चलाया।
पाल के मुताबिक, 2 अक्टूबर को अराधना मिश्रा 'मोना' को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इसके अगले ही दिन यानी 3 अक्टूबर को उन्हें बताया गया कि कांग्रेस MLC चुनाव नहीं लड़ेगी।
उनका आरोप है कि पार्टी प्रभारी की ओर से नामांकन खत्म होने से कुछ दिन पहले तक चुनाव लड़ने का भरोसा दिया जाता रहा। इसके बाद अचानक पार्टी ने मैदान छोड़ दिया।
अरविंद पटेल बोले- पार्टी नहीं लड़ना चाहती तो कम से कम समर्थन करती
वाराणसी स्नातक सीट से कांग्रेस के घोषित उम्मीदवार अरविंद सिंह पटेल ने भी पार्टी के फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस खुद चुनाव नहीं लड़ना चाहती थी तो कम से कम उन नेताओं का समर्थन करना चाहिए था, जिन्हें पार्टी ने पहले उम्मीदवार घोषित किया था।
पटेल के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष अराधना मिश्रा ने उन्हें वरिष्ठ नेताओं से इस संबंध में बात करने का भरोसा दिया था। उन्होंने बताया कि नामांकन के अंतिम दिन 6 अक्टूबर को सुबह करीब 9 बजे उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष को फोन किया।
पटेल के मुताबिक, फोन पर उन्हें जवाब मिला- 'इतनी सुबह किससे बात करूं?' उनका कहना है कि प्रदेश अध्यक्ष इससे एक दिन पहले ही दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान से मुलाकात कर चुकी थीं।
कांग्रेस के पीछे हटते ही उम्मीदवारों के सामने राजनीतिक संकट
कांग्रेस के चुनाव से बाहर होने के बाद पार्टी के घोषित उम्मीदवारों के सामने अपनी राजनीतिक साख बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। कई उम्मीदवारों ने पार्टी के फैसले के बावजूद नामांकन दाखिल कर दिया है और अब वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं।
आगरा अनएडेड शिक्षक सीट से कांग्रेस के घोषित उम्मीदवार आकाश अग्रवाल ने हालांकि अलग रास्ता चुना। वह पहले इस सीट से निर्दलीय MLC रह चुके हैं। कांग्रेस के पीछे हटने के बाद उन्होंने समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष से संपर्क किया और बाद में SP ने उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया।
वहीं बाकी कई घोषित उम्मीदवारों ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया है।
संजय राय प्रियदर्शी: 'कांग्रेस ने आखिरी समय पर धोखा दिया'
वाराणसी शिक्षक सीट से अब निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे संजय राय प्रियदर्शी ने भी कांग्रेस पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने बताया कि वह शुरुआत से ही समाजवादी पार्टी की राजनीति से जुड़े रहे थे। लेकिन वाराणसी शिक्षक सीट पर SP ने लाल बिहारी यादव को उम्मीदवार बनाया, जिसके कारण उन्हें SP का टिकट मिलना मुश्किल था।
इसके बाद उन्होंने कांग्रेस का रुख किया। प्रियदर्शी के अनुसार, उन्होंने करीब एक साल तक वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के तहत आने वाले आठ जिलों में दौरा किया और अपना मतदाता आधार तैयार किया। उनका दावा है कि सोशल ग्रुप्स के जरिए करीब 16 हजार मतदाता सीधे उनके संपर्क में हैं।
प्रियदर्शी का आरोप है कि जब चुनाव का निर्णायक समय आया तो कांग्रेस ने उन्हें आखिरी वक्त पर अकेला छोड़ दिया।
रघुराज पाल और देव भास्कर तिवारी ने भी निर्दलीय नामांकन किया
कांग्रेस के घोषित उम्मीदवार रहे रघुराज सिंह पाल ने आगरा स्नातक सीट से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नामांकन दाखिल किया है। इसी तरह मऊ DAV कॉलेज के प्राचार्य देव भास्कर तिवारी ने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन किया है।
यानी कांग्रेस के चुनाव से हटने के बाद उसके कई पुराने उम्मीदवार अब पार्टी के आधिकारिक समर्थन के बिना चुनावी मैदान में हैं।
2027 से पहले MLC चुनाव कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश
उत्तर प्रदेश की 11 विधान परिषद सीटों के चुनाव को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बेहद अहम माना जा रहा है। इन चुनावों में पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान होना है। भाजपा और समाजवादी पार्टी ने अपने उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं, जबकि कांग्रेस ने पूरी तरह चुनाव से दूरी बना ली है।
इन चुनावों को राजनीतिक दलों के लिए एक तरह का लिटमस टेस्ट माना जा रहा है। हालांकि MLC चुनाव का मतदाता आधार आम विधानसभा चुनाव से अलग होता है, फिर भी इन नतीजों से राजनीतिक दलों को अपने संगठन, उम्मीदवारों और जमीनी पकड़ का अंदाजा मिल सकता है।
खास तौर पर कांग्रेस का चुनाव से हटना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को लेकर सीटों में बराबर हिस्सेदारी की मांग कर रही है। ऐसे में MLC चुनाव में एक भी उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला उसके संगठन और गठबंधन रणनीति पर सवाल खड़े कर सकता है।
23 अक्टूबर को होगा मतदान
उत्तर प्रदेश विधान परिषद के द्विवार्षिक निर्वाचन-2026 के तहत पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में 23 अक्टूबर को मतदान होगा। इन सीटों पर केवल संबंधित स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के पात्र मतदाता ही वोट डाल सकेंगे।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा के मुताबिक मतदान के लिए मतदाता फोटो पहचान पत्र दिखाना जरूरी होगा। हालांकि किसी कारण से EPIC यानी वोटर फोटो पहचान पत्र उपलब्ध नहीं होने पर निर्वाचन आयोग की ओर से निर्धारित वैकल्पिक फोटोयुक्त पहचान पत्रों में से किसी एक का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
वोट डालने के लिए ये दस्तावेज मान्य होंगे
आधार कार्ड
ड्राइविंग लाइसेंस
पैन कार्ड
पासपोर्ट
केंद्र या राज्य सरकार का सेवा पहचान पत्र
सार्वजनिक उपक्रम का सेवा पहचान पत्र
स्थानीय निकाय का सेवा पहचान पत्र
निजी संस्थान का सेवा पहचान पत्र
सांसद, विधायक और पार्षद को जारी सरकारी पहचान पत्र
संबंधित शिक्षक या स्नातक निर्वाचन क्षेत्र की शैक्षणिक संस्था का सेवा पहचान पत्र
विश्वविद्यालय की डिग्री या डिप्लोमा का मूल प्रमाणपत्र
सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी दिव्यांगता प्रमाणपत्र
UDID कार्ड
इस तरह MLC चुनाव में कांग्रेस के मैदान से बाहर होने के बाद अब मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा, समाजवादी पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच दिखाई दे रहा है। कांग्रेस के घोषित उम्मीदवारों का पार्टी से अलग होकर चुनाव लड़ना आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की सियासत में नया समीकरण भी बना सकता है।


