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UP Panchayat Chunav में देरी पर HC सख्त! EC को दिया अल्टीमेटम, कहा- 'तारीख बताओ'
UP Panchayat Election 2026 Dates: उत्तर प्रदेश में 57 हजार से अधिक ग्राम प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्हें ही प्रशासक बनाने के योगी सरकार के फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग से चुनाव की तारीख और ओबीसी आरक्षण रिपोर्ट 10 जुलाई तक तलब की है।
UP Panchayat Election 2026 Dates: उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों की राजनीति में इस समय एक बहुत बड़ा भूचाल आया हुआ है। सूबे की 57 हजार 694 ग्राम पंचायतों के मुखिया, यानी ग्राम प्रधानों का तय कार्यकाल बीते 26 मई 2026 को पूरी तरह समाप्त हो चुका है। इस स्थिति से निपटने के लिए प्रदेश सरकार ने 25 मई को ही एक बड़ा आदेश जारी करते हुए मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही नए पंचायत चुनाव होने तक गांवों का प्रशासक नियुक्त कर दिया था। सरकार के इस फैसले के मुताबिक, बतौर प्रशासक इन प्रधानों की नियुक्ति ज्यादा से ज्यादा छह महीने के लिए ही मान्य होगी। लेकिन अब यह पूरा मामला देश की प्रतिष्ठित इलाहाबाद हाईकोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है, जिससे गांवों की सत्ता को लेकर कानूनी जंग छिड़ गई है।
हाईकोर्ट का सख्त रुख
ग्राम प्रधानों को ही दोबारा प्रशासक बनाने के सरकार के इस फैसले के खिलाफ अदालत में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब बेहद कड़ा रुख अपना लिया है। जस्टिस शेखर बी सर्राफ और जस्टिस अवधेश कुमार चौधरी की विशेष बेंच ने उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव समय पर न कराने को लेकर अपनी गहरी नाराजगी जताई है। माननीय अदालत ने राज्य निर्वाचन आयोग को आड़े हाथों लेते हुए बेहद तीखे सवाल पूछे हैं। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से सीधे तौर पर जवाब मांगा है कि आखिर प्रदेश में पंचायत चुनाव कब तक कराए जाएंगे और इसके लिए आयोग को चुनाव की एक संभावित और पक्की तारीख कोर्ट के सामने पेश करनी होगी।
नियमों के उल्लंघन का आरोप
अदालत में याचिकाकर्ता ओमप्रकाश प्रजापति की तरफ से पैरवी कर रहे वकीलों ने बेहद दमदार दलीलें पेश कीं। उन्होंने कोर्ट को बताया कि पंचायती राज कानून के अनुसार किसी भी ग्राम प्रधान का कार्यकाल पांच साल से ज्यादा नहीं हो सकता। समय पर चुनाव न कराकर उन्हीं प्रधानों को प्रशासक की कुर्सी पर बैठा देना, एक तरह से पिछले दरवाजे से उनके कार्यकाल को आगे बढ़ाने जैसा है, जो पूरी तरह नियमों के खिलाफ है। याचिकाकर्ता के वकीलों ने याद दिलाया कि साल 2000 और 2021 में भी जब पंचायत चुनावों में देरी हुई थी, तब सरकारी अधिकारियों जैसे बीडीओ या एडीओ पंचायत को गांवों का प्रशासक बनाया गया था। लेकिन इस बार सरकार ने मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की नकल करते हुए प्रधानों को ही यह बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी।
10 जुलाई को होगा बड़ा फैसला
दूसरी तरफ, राज्य सरकार ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि ग्राम प्रधान गांवों में विकास कार्यों को जमीन पर उतारने और सरकारी योजनाओं को चलाने के लिए सबसे जरूरी माध्यम होते हैं। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए और प्रधान संगठनों की मांग पर ही उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई है। सरकार ने यह भी तर्क दिया कि ओबीसी आरक्षण तय करने वाले आयोग की रिपोर्ट आने में तीन से छह महीने का समय लग सकता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया और सख्त आदेश दिया कि पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट और चुनाव की संभावित तारीख, दोनों ही आगामी 10 जुलाई को कोर्ट में पेश की जाएं। अब पूरे उत्तर प्रदेश की नजरें 10 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं।


