यूपी पुलिस प्रमोशन परीक्षा पर हाईकोर्ट की सख्ती: 176 अभ्यर्थियों का पूरा रिजल्ट और सीटिंग प्लान तलब

UP Police News: यूपी पुलिस की मुख्य आरक्षी मोटर परिवहन परीक्षा में नकल के आरोपों पर हाईकोर्ट ने 176 पदों से जुड़ा पूरा परिणाम, सीटिंग प्लान और CCTV फुटेज तलब किया। 115 अभ्यर्थियों पर कार्रवाई के बाद परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठे हैं।

Newstrack Network
Published on: 13 Aug 2026 7:56 PM IST
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UP Police News: उत्तर प्रदेश पुलिस में आरक्षी चालक से मुख्य आरक्षी मोटर परिवहन पद पर प्रोन्नति के लिए हुई विभागीय परीक्षा अब गंभीर न्यायिक जांच के घेरे में है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने 5 अक्टूबर 2025 को हुई परीक्षा में बड़े पैमाने पर नकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के इस्तेमाल के आरोपों पर सख्त रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड से सभी 176 अभ्यर्थियों का पूरा परिणाम और चयनित अभ्यर्थियों का सीटिंग प्लान तलब किया है। मामला इसलिए अधिक गंभीर हो गया है क्योंकि शुरुआत में बोर्ड की ओर से केवल दो अभ्यर्थियों के पास मोबाइल फोन मिलने की बात कही गई थी, लेकिन अदालत के निर्देश पर हुई बाद की जांच में 115 अभ्यर्थी नकल अथवा दूसरी अनियमितताओं में लिप्त पाए गए और उन्हें डिबार कर दिया गया।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजीव सिंह की पीठ कर रही है। याचिका आरक्षी चालक एस.बी. मिश्रा और अन्य की ओर से दाखिल की गई है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि परीक्षा के दौरान इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ और परीक्षा की निष्पक्षता प्रभावित हुई। उन्होंने परीक्षा को रद्द कर कड़ी निगरानी में दोबारा परीक्षा कराने की मांग की है।

176 पदों की परीक्षा, 115 अभ्यर्थी डिबार-यही सबसे बड़ा सवाल

इस मामले का सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा 115 अभ्यर्थियों का है। यदि परीक्षा में कुल 176 अभ्यर्थियों का परिणाम अब न्यायालय के समक्ष रखा जा रहा है और उनमें से 115 को अनियमितता में संलिप्त पाकर डिबार किया गया है, तो यह संख्या कुल का लगभग 65 प्रतिशत बैठती है। यानी हर तीन में लगभग दो अभ्यर्थियों के खिलाफ कार्रवाई हुई। यही तथ्य परीक्षा की विश्वसनीयता पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। हालांकि यहां एक सावधानी जरूरी है। डिबार किया जाना अंतिम आपराधिक दोष सिद्ध होना नहीं है। बोर्ड ने अपनी जांच के आधार पर प्रशासनिक कार्रवाई की है। जिन अभ्यर्थियों को नकल या अनियमितता में शामिल माना गया है, उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति और साक्ष्य अलग-अलग हो सकते हैं। अदालत अब इन्हीं पहलुओं को विस्तार से देख रही है।

पहले कहा-सिर्फ दो मोबाइल मिले; बाद में 115 पर कार्रवाई

याचिका की शुरुआती सुनवाई में अधिकारियों की ओर से बताया गया था कि परीक्षा के दौरान केवल दो अभ्यर्थी मोबाइल फोन के साथ पकड़े गए और अन्य अभ्यर्थियों के पास किसी अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की जानकारी नहीं मिली। लेकिन अदालत ने जब विस्तृत जांच का निर्देश दिया तो तस्वीर पूरी तरह बदल गई। 22 जुलाई को बोर्ड की अपर पुलिस अधीक्षक मोहिनी पाठक ने अदालत को बताया कि जांच में 115 अभ्यर्थी अनियमितताओं में शामिल पाए गए और उन्हें डिबार कर दिया गया है। यही अंतर अब अदालत की जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सवाल यह है कि परीक्षा के दिन जो अनियमितता केवल दो अभ्यर्थियों तक सीमित बताई गई थी, बाद की जांच में वह 115 तक कैसे पहुंच गई? क्या परीक्षा के दौरान निगरानी कमजोर थी, क्या CCTV के विश्लेषण से बाद में अतिरिक्त मामले पकड़े गए या अन्य तकनीकी साक्ष्यों से अनियमितताओं का पता चला-इन सब पर अब स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

CCTV फुटेज अदालत ने अपने कब्जे में लिया

हाईकोर्ट ने परीक्षा केंद्र के सभी आठ परीक्षा ब्लॉकों की CCTV फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश दिया था। 10 अगस्त को संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड अदालत के सामने पेश किए गए और न्यायालय ने उन्हें अपने कब्जे में ले लिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वीडियो और फोटो रिकॉर्ड का निरीक्षण विवाद के निस्तारण में किया जाएगा। यह कदम महत्वपूर्ण है क्योंकि परीक्षा में नकल के आरोप अक्सर केवल मौखिक शिकायत या निरीक्षण रिपोर्ट पर टिके रहते हैं। CCTV रिकॉर्ड से यह देखा जा सकता है कि अभ्यर्थियों के बैठने की वास्तविक व्यवस्था क्या थी, कौन किस सीट पर था, किसी ने मोबाइल या दूसरा उपकरण इस्तेमाल किया या नहीं, परीक्षकों और पर्यवेक्षकों की गतिविधियां क्या थीं और परीक्षा कक्ष में किसी संदिग्ध गतिविधि को उसी समय रोका गया या नहीं।

सीटिंग प्लान क्यों मांगा गया

हाईकोर्ट ने सिर्फ परिणाम नहीं बल्कि चयनित अभ्यर्थियों का सीटिंग प्लान भी मांगा है। इसका महत्व केवल यह जानना नहीं है कि कौन कहां बैठा था। यदि नकल के आरोप सामूहिक या संगठित हैं तो सीटिंग प्लान और CCTV फुटेज को साथ मिलाकर देखा जा सकता है कि संदिग्ध अभ्यर्थी एक-दूसरे के निकट बैठे थे या अलग-अलग ब्लॉकों में फैले हुए थे।यदि किसी विशेष कमरे, पंक्ति या क्षेत्र में असामान्य संख्या में अभ्यर्थी अनियमितता में पकड़े गए हों तो वह परीक्षा केंद्र की निगरानी व्यवस्था की कमजोरी की ओर संकेत कर सकता है। इसी तरह यदि अभ्यर्थी अलग-अलग ब्लॉकों में थे लेकिन एक जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम का इस्तेमाल हुआ, तो संगठित नकल की आशंका अलग तरीके से जांची जा सकती है।

पूरा रिजल्ट वेबसाइट पर क्यों नहीं था

बोर्ड की अधिकारी ने अदालत को बताया कि परीक्षा का परिणाम घोषित कर दिया गया था, लेकिन वह वेबसाइट पर पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं था। प्रत्येक अभ्यर्थी अपना व्यक्तिगत परिणाम देख सकता था, लेकिन सभी 176 अभ्यर्थियों का समेकित परिणाम सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं था। यही कारण है कि अदालत ने अब पूरा परिणाम तलब किया है।यहां पारदर्शिता का सवाल भी उठता है। विभागीय प्रोन्नति परीक्षा में सभी अभ्यर्थियों के अंक और चयन प्रक्रिया किस सीमा तक सार्वजनिक की जानी चाहिए, यह सेवा नियमों पर निर्भर करता है, लेकिन जब परीक्षा स्वयं न्यायिक विवाद में हो और नकल का गंभीर आरोप लगे तो पूरा परिणाम अदालत के सामने होना आवश्यक हो जाता है।

परीक्षा रद्द होगी या 115 को हटाकर प्रक्रिया चलेगी?

अब इस मामले का सबसे बड़ा कानूनी सवाल यही है।यदि अदालत यह पाती है कि नकल केवल कुछ पहचाने गए अभ्यर्थियों तक सीमित थी और उन्हें विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर अलग किया जा सकता है, तो संभव है कि शेष परीक्षा प्रक्रिया को बचाया जा सके। लेकिन यदि CCTV, सीटिंग प्लान और अन्य रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि परीक्षा की शुचिता इतने बड़े स्तर पर प्रभावित हुई कि ईमानदार और नकल करने वाले अभ्यर्थियों को विश्वसनीय रूप से अलग करना मुश्किल है, तो पूरी परीक्षा रद्द कर नए सिरे से परीक्षा कराने का प्रश्न उठ सकता है।

भारतीय न्यायालय भर्ती और परीक्षा मामलों में सामान्यतः यही कसौटी देखते हैं कि क्या दोषी अभ्यर्थियों को निर्दोष अभ्यर्थियों से अलग किया जा सकता है या पूरी चयन प्रक्रिया इतनी दूषित हो चुकी है कि उसे बचाना संभव नहीं।इस मामले में 115 अभ्यर्थियों पर कार्रवाई की संख्या इतनी बड़ी है कि अदालत के लिए यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण हो गया है।

यह सीधी भर्ती नहीं, विभागीय प्रोन्नति परीक्षा है

इस खबर में एक और जरूरी स्पष्टता है। यह उत्तर प्रदेश पुलिस की सामान्य सिपाही भर्ती परीक्षा नहीं है। यह पहले से पुलिस विभाग में कार्यरत आरक्षी चालकों को मुख्य आरक्षी मोटर परिवहन पद पर प्रोन्नत करने की विभागीय परीक्षा है। उत्तर प्रदेश पुलिस मोटर परिवहन शाखा में आरक्षी चालक से मुख्य आरक्षी मोटर परिवहन और आगे उप निरीक्षक मोटर परिवहन तक विभागीय प्रोन्नति परीक्षाओं की व्यवस्था मौजूद है। इसी कारण इस मामले का प्रशासनिक महत्व अलग है। यहां बाहरी अभ्यर्थी नहीं बल्कि पहले से पुलिस सेवा में कार्यरत कर्मचारी परीक्षा दे रहे थे। यदि इतने बड़े स्तर पर नकल के आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला केवल परीक्षा की निष्पक्षता नहीं बल्कि पुलिस बल के आंतरिक अनुशासन से भी जुड़ जाता है।

बोर्ड ने 7 अगस्त को 176 पदों का चयन परिणाम जारी किया

उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट पर 7 अगस्त 2026 को मुख्य आरक्षी मोटर परिवहन के कुल 176 रिक्त पदों के चयन परिणाम से संबंधित सूचना जारी की गई है। बोर्ड ने परिणाम देखने का अलग लिंक भी उपलब्ध कराया है। यही समयक्रम महत्वपूर्ण है-एक तरफ परीक्षा और नकल के आरोप पर हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही है, दूसरी तरफ बोर्ड ने चयन परिणाम जारी किया है। अब न्यायालय यह देख रहा है कि इस परिणाम की पूरी संरचना क्या है और अनियमितता में पाए गए 115 अभ्यर्थियों का चयन प्रक्रिया पर क्या प्रभाव पड़ा।

176 ‘अभ्यर्थी’ और 176 ‘रिक्त पद’-दोनों आंकड़ों को न मिलाएं

उपलब्ध खबरों में 176 संख्या दो संदर्भों में दिखाई देती है। हाईकोर्ट संबंधी रिपोर्ट में इसे उन अभ्यर्थियों के पूरे परिणाम के संदर्भ में लिखा गया है जिन्हें अदालत ने तलब किया है, जबकि बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट 176 को रिक्त पदों की कुल संख्या बताती है। इसलिए प्रकाशन में बेहतर होगा कि लिखा जाए-“मुख्य आरक्षी मोटर परिवहन के 176 रिक्त पदों से जुड़ी चयन प्रक्रिया का पूरा परिणाम अदालत ने तलब किया है।” इससे यह भ्रम नहीं होगा कि परीक्षा में कुल केवल 176 लोग ही शामिल हुए थे।

नकल में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का आरोप ज्यादा गंभीर क्यों

सामान्य नकल और इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से संगठित नकल में बड़ा अंतर होता है। यदि कोई अभ्यर्थी मोबाइल, ब्लूटूथ, माइक्रो ईयरपीस या बाहर बैठे किसी व्यक्ति की सहायता से परीक्षा देता है तो समस्या केवल एक उम्मीदवार तक सीमित नहीं रहती। इसके पीछे उपकरण उपलब्ध कराने वाला, प्रश्न भेजने वाला और उत्तर पहुंचाने वाला नेटवर्क भी हो सकता है।याचिकाकर्ताओं ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के जरिए बड़े पैमाने पर नकल का आरोप लगाया है। लेकिन अभी यह आरोप है; हर डिबार अभ्यर्थी के खिलाफ किस तरह का साक्ष्य मिला, इसका विस्तृत विवरण सार्वजनिक नहीं है। इसलिए ‘115 अभ्यर्थी इलेक्ट्रॉनिक नकल करते पकड़े गए’ लिखना तब तक उचित नहीं होगा जब तक बोर्ड या कोर्ट के रिकॉर्ड से यही स्पष्ट न हो।

CCTV अब तय कर सकता है परीक्षा की किस्मत

इस मामले में सबसे मजबूत स्वतंत्र साक्ष्य CCTV रिकॉर्ड बन सकता है। यदि सभी आठ परीक्षा ब्लॉकों की फुटेज पर्याप्त गुणवत्ता में सुरक्षित है तो अदालत परीक्षा के दिन की वास्तविक गतिविधि का प्रत्यक्ष आकलन कर सकेगी।यही कारण है कि फुटेज को सिर्फ बोर्ड के पास छोड़ने के बजाय अदालत ने उसे अपने कब्जे में लिया है।

अब बोर्ड द्वारा पेश पूरा परिणाम, सीटिंग प्लान और CCTV फुटेज तीनों को एक साथ पढ़ा जाएगा। इससे यह पता चल सकता है कि जिन अभ्यर्थियों को डिबार किया गया, उनके खिलाफ दृश्य साक्ष्य क्या हैं और क्या चयनित अभ्यर्थियों में कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं है जिसकी गतिविधि सवालों के घेरे में आती हो।

115 पर कार्रवाई के बाद भी सवाल-बाकी 61 का क्या?

यदि 176 की उपलब्ध संख्या को आधार मानकर देखें तो 115 के डिबार होने के बाद 61 अभ्यर्थी बचते हैं। लेकिन चूंकि आधिकारिक वेबसाइट 176 को रिक्त पदों की संख्या भी बताती है, इस गणित को अंतिम अभ्यर्थी संख्या मानना अभी उचित नहीं होगा। अदालत के सामने पूरा परिणाम आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि परीक्षा में कुल कितने उम्मीदवार थे, कितनों ने लिखित परीक्षा पास की, कितनों को तकनीकी दक्षता परीक्षण में बुलाया गया और 115 डिबार अभ्यर्थी चयन प्रक्रिया के किस चरण में थे।

यही विवरण यह तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि परीक्षा को आंशिक रूप से बचाया जा सकता है या नहीं।

पुलिस की अपनी परीक्षा में ऐसी शिकायत अधिक गंभीर

किसी भी सरकारी परीक्षा में नकल गंभीर मामला है, लेकिन पुलिस विभाग की आंतरिक पदोन्नति परीक्षा में इसका अलग महत्व है।मुख्य आरक्षी पद पर पहुंचने वाला कर्मचारी भविष्य में अधीनस्थ कर्मियों की निगरानी, सरकारी वाहनों और संसाधनों की जिम्मेदारी तथा अनुशासनात्मक व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है। यदि पदोन्नति की पहली सीढ़ी ही संदिग्ध परीक्षा से तय हो तो विभागीय विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

इसीलिए इस मामले का समाधान केवल अदालत में याचिका खत्म करने भर से नहीं होना चाहिए। यदि जांच में परीक्षा संचालन में व्यवस्थागत कमी साबित होती है तो यह भी पता किया जाना चाहिए कि केंद्र प्रभारी, पर्यवेक्षक और परीक्षा सुरक्षा व्यवस्था किस स्तर पर विफल हुई।

अब अदालत के सामने तीन केंद्रीय प्रश्न

मामला अंततः तीन प्रश्नों पर टिकता दिखाई देता है-परीक्षा में अनियमितता कितने बड़े स्तर पर हुई, दोषी और निर्दोष अभ्यर्थियों को क्या स्पष्ट रूप से अलग किया जा सकता है, और बोर्ड द्वारा जारी चयन परिणाम उस अनियमितता से कितना प्रभावित हुआ।अगर अदालत को इन तीनों का संतोषजनक उत्तर मिलता है तो चयन प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। लेकिन यदि CCTV और रिकॉर्ड से सामूहिक नकल की तस्वीर उभरती है तो दोबारा परीक्षा की मांग मजबूत हो सकती है।

इस मामले की सबसे असामान्य बात यही है कि शुरुआत दो मोबाइल फोन से हुई थी और जांच 115 अभ्यर्थियों तक पहुंच गई। अब हाईकोर्ट ने परिणाम से लेकर सीटिंग प्लान और CCTV तक अपने सामने मंगवा लिया है। इसलिए अगला फैसला केवल सात याचिकाकर्ताओं की पदोन्नति का नहीं होगा; वह यह तय कर सकता है कि उत्तर प्रदेश पुलिस की इस पूरी विभागीय परीक्षा पर भरोसा किया जा सकता है या उसे फिर से कराना पड़ेगा।

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