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UP 2027 का ट्रेलर! मायावती और चंद्रशेखर आमने-सामने, दलित वोटों पर छिड़ी सबसे बड़ी जंग, कौन मारेगा बाजी?
UP Politics: यूपी 2027 चुनाव से पहले दलित राजनीति में बड़ा संग्राम छिड़ गया है। मायावती के 'मगरमच्छ के आंसू' वाले बयान पर चंद्रशेखर आजाद ने करारा पलटवार किया। जानिए ललिता गौतम केस, दलित वोटबैंक और बसपा-आजाद समाज पार्टी की सियासी जंग का पूरा विश्लेषण।
UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में शुक्रवार को एक ऐसा जबरदस्त सियासी भूचाल देखने को मिला, जिसने आने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात अभी से बिछा दी है। यूपी जैसे देश के सबसे बड़े सूबे में 4 बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुकीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती एक नये-नवेले युवा सांसद के संघर्षों और प्रयासों को 'मगरमच्छ के आंसू' बताती नजर आईं। हालांकि मायावती ने अपने पूरे बयान में कहीं भी आजाद समाज पार्टी के मुखिया और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन जिस तीखे अंदाज और तेवर में उन्होंने हमला बोला, उससे साफ हो गया कि दलित वोटों के खिसकने से बीएसपी सुप्रीमो के भीतर कितनी बड़ी घबराहट और बेचैनी पैदा हो चुकी है।
सड़कों पर उतरने को बताया संकीर्ण राजनीति
इस पूरे विवाद की मुख्य वजह मेरठ की दलित छात्रा ललिता गौतम हत्याकांड है, जिसमें न्याय की मांग को लेकर चंद्रशेखर आजाद अपने हजारों समर्थकों के साथ लगातार सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। इसी आंदोलन को निशाने पर लेते हुए मायावती ने शुक्रवार को लखनऊ में मीडिया से कहा कि किसी भी मामले में अपने ऊपर होने वाले जुल्म या जाति के खिलाफ लड़ाई कानून को हाथ में लेकर नहीं, बल्कि कानूनी दायरे में रहकर ही लड़ी जानी चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यदि निचली अदालत से इंसाफ न मिले, तो सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। देश के संविधान में यही व्यवस्था है, न कि मेरठ, सहारनपुर, प्रयागराज और हरदोई की तरह हर रोज सड़कों पर उतरकर बवाल काटना।
मगरमच्छ के आंसू बहाने का आरोप
मायावती यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने चंद्रशेखर के संगठन का नाम लिए बिना उन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि कुछ संगठन और पार्टियां अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के लिए इन वर्गों के दुखी, लाचार और पीड़ित लोगों को भड़काकर व गुमराह करके सड़कों पर उतारती हैं। पहले ये लोग जानबूझकर हिंसा, हंगामा और चक्का जाम जैसा बड़ा बवाल कराते हैं और फिर इनके मुखिया मगरमच्छ की तरह आंसू बहाने के लिए खुद घटनास्थल पर पहुंच जाते हैं। मायावती के मुताबिक, यह सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का एक जरिया है, जिससे पीड़ितों को कभी न्याय नहीं मिलने वाला, बल्कि वर्तमान हालातों में यह इन गरीब लोगों की मुसीबत और पुलिसिया परेशानी को और ज्यादा बढ़ाने वाला साबित होगा।
चंद्रशेखर का भावुक और करारा पलटवार
मायावती द्वारा 'मगरमच्छ के आंसू' कहे जाने के बाद नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने भी पलटवार करने में जरा भी देर नहीं की। उन्होंने प्रदर्शन स्थल से ही मायावती को बेहद तल्ख लहजे में जवाब देते हुए कहा कि मेरे मन को आज बहुत गहरी ठेस पहुंची है। चंद्रशेखर ने भावुक होते हुए कहा कि जमीन पर उतरकर लड़ाई तो आप लड़ नहीं रहीं, अपनी जान की बाजी लगाकर तो हमारे छोटे-छोटे कार्यकर्ता लड़ रहे हैं। वे पुलिस की लाठियां खा रहे हैं, जेलों में बंद हो रहे हैं, गालियां सह रहे हैं और अपने जेब का पैसा खर्च कर रहे हैं, और आप महलों में बैठकर कह रही हैं कि हम मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं। अगर ऐसा ही है, तो आप भी आइए ना जनता के बीच मगरमच्छ के आंसू बहाने, किसने रोका है आपको?
हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठ सकता
मायावती की 'सुप्रीम कोर्ट जाने' वाली नसीहत पर चंद्रशेखर ने बेहद तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जब हमारी दलित बहनों की अस्मत लूटी जाती है, उन्हें सरेआम नोचा जाता है, उनके शवों पर पेट्रोल और तेजाब छिड़ककर सबूत मिटाए जाते हैं, उन्हें मारकर पेड़ों से लटका दिया जाता है और पैरों में कीलें ठोक दी जाती हैं, तो क्या हम हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएं? क्या हम यह तमाशा देखें कि 10 साल बाद कब अदालत से न्याय मिलेगा? उन्होंने कहा कि मैं आपका सम्मान हमेशा करता रहूंगा, लेकिन आज आपके इस बयान ने मेरा दिल तोड़ दिया है। अब पूरा समाज खुली आंखों से देख रहा है और वही यह फैसला करेगा कि कौन उनके हक के लिए लाठियां खा रहा है और किसका समाज से सिर्फ वोट का रिश्ता है।
2014 के बाद घर में सिमटीं मायावती
अगर उत्तर प्रदेश के पिछले दो दशकों के इतिहास को देखें, तो साल 2007 से 2012 तक मायावती ने यूपी में पूरे रसूख के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार चलाई थी। उस दौरान उन्होंने पार्कों और मूर्तियों के निर्माण में करोड़ों रुपये खर्च किए, जिसकी वजह से वे विवादों में भी रहीं। साल 2012 में सत्ता गंवाने के बाद, खासकर 2014 के लोकसभा चुनाव में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की आंधी आई, तो मायावती की पूरी राजनीति जैसे ठहर सी गई। 2014 में उनकी पार्टी का खाता तक नहीं खुला। इसके बाद 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 312 सीटें जीतकर इतिहास रचा, जबकि बीएसपी महज 19 सीटों पर सिमट गई। इस करारी हार के बाद भी मायावती ने जमीन पर संघर्ष करने के बजाय 2019 में अपनी घोर विरोधी समाजवादी पार्टी से गठबंधन कर लिया।
लगातार गिरता ग्राफ और वोटबैंक
सपा के साथ हुए उस गठबंधन में मायावती के 10 सांसद तो जीत गए, लेकिन उन्होंने चुनाव खत्म होते ही सपा पर वोट ट्रांसफर न करने का आरोप लगाकर गठबंधन तोड़ दिया। इसके बाद बीएसपी का पतन और तेजी से हुआ। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में मायावती की पार्टी का सिर्फ 1 विधायक जीता और 2024 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी एक बार फिर शून्य पर आउट हो गई। कभी कोर वोटर रहा गैर-जाटव दलित समाज मायावती की इसी निष्क्रियता के कारण उनसे पूरी तरह दूर हो गया और पार्टी का कुल वोटबैंक खिसककर मात्र 12 फीसदी के आसपास रह गया। 2024 के चुनाव में उनके भतीजे आकाश आनंद ने आक्रामक रैलियां कर कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश की थी, लेकिन मायावती ने खुद उनके पर कतर दिए और हार का ठीकरा कभी मुस्लिमों पर तो कभी विपक्ष पर फोड़ती रहीं।
जमीन से उठकर सांसद बने चंद्रशेखर
एक तरफ जहां पिछले 10-12 सालों में मायावती ने अपने घर से निकलना और बीजेपी के खिलाफ बोलना लगभग बंद कर दिया है, वहीं दूसरी तरफ चंद्रशेखर आजाद ने बेहद आक्रामक शैली में खुद को दलितों के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में स्थापित कर लिया है। पेशे से वकील चंद्रशेखर ने पहले 'भीम आर्मी' बनाई और साल 2017 में सहारनपुर के शब्बिरपुर में हुई जातीय हिंसा के बाद वे पहली बार राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आए। इस दौरान उन पर रासुका भी लगा और वे 15 महीने जेल में रहे। जेल से बाहर आने के बाद सीएए-एनआरसी आंदोलन से लेकर हाथरस कांड तक, जहां भी दलितों पर अत्याचार हुआ, चंद्रशेखर सबसे पहले वहां पहुंचे। उन्होंने साल 2020 में 'आजाद समाज पार्टी' बनाई और 2024 के लोकसभा चुनाव में बिना किसी बड़े दल के समर्थन के, अपने दम पर नगीना सुरक्षित सीट से बंपर वोटों से जीतकर संसद पहुंच गए।
वर्चस्व की जंग में कौन मारेगा बाजी?
अब असली सवाल यह है कि क्या मायावती वाकई चंद्रशेखर की इस बढ़ती लोकप्रियता और राजनीतिक कद से डर गई हैं? मायावती भले ही 4 बार की मुख्यमंत्री रही हों और उनके पास आज भी एक मजबूत काडर बेस है, लेकिन उनकी लंबी खामोशी और जमीन से दूरी ने दलित राजनीति में जो एक बहुत बड़ा खालीपन पैदा किया था, चंद्रशेखर उसी जगह को भरने का काम कर रहे हैं। चंद्रशेखर की शैली भले ही आक्रामक और सड़कों पर उतरने वाली हो, लेकिन आज वे संसद से लेकर सड़क तक दलितों की सबसे मजबूत आवाज बनकर उभर रहे हैं। अब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि सूबे का दलित समाज मायावती की 'शांतिपूर्ण सत्ता की मास्टर चाबी' वाले रास्ते को चुनता है या चंद्रशेखर के 'सड़क पर संघर्ष' करने वाले जज्बे पर अपनी मुहर लगाता है।


