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भीगे कोयले से बिजली का सूखा, प्रबंधन की चूक ने बढ़ाया संकट; 10 इकाइयां बंद, 5340 मेगावाट उत्पादन प्रभावित
UP News: सितंबर में पिछले साल से करीब 5000 मेगावाट कम मांग के बावजूद यूपी में बिजली संकट गहराया है। बारिश से कोयला आपूर्ति प्रभावित और 5340 मेगावाट उत्पादन क्षमता बंद है।
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UP News: उत्तर प्रदेश में सितंबर के महीने में बिजली की मांग पिछले साल के मुकाबले करीब पांच हजार मेगावाट कम होने के बावजूद बिजली संकट गहरा गया है। भारी बारिश के कारण कोयला खदानों में जलभराव और परिवहन प्रभावित होने से तापीय बिजलीघरों को कोयले की आपूर्ति पर असर पड़ा है। कई संयंत्रों में पहुंचा कोयला भी नमी से प्रभावित हुआ, जिससे उत्पादन क्षमता घट गई। इसके साथ ही कई उत्पादन इकाइयां तकनीकी कारणों से बंद हैं। उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत निगम के 14 सितंबर के आंकड़ों के अनुसार करीब 5340 मेगावाट उत्पादन क्षमता विभिन्न अवधि के लिए बंद या प्रभावित थी। नतीजा यह है कि शाम और रात के समय मांग बढ़ने पर उपलब्ध बिजली कम पड़ रही है और ग्रामीण इलाकों समेत कुछ क्षेत्रों में कटौती करनी पड़ रही है।
मौजूदा संकट में केवल कोयले की कमी को जिम्मेदार ठहराना पूरी तस्वीर नहीं बताता। बिजली की मांग इस साल सितंबर में अभी पिछले साल के स्तर से काफी नीचे है। 2024 में सितंबर की शुरुआत में प्रदेश की अधिकतम मांग करीब 29,347 मेगावाट तक पहुंची थी, जबकि 2025 में यह 30,255 मेगावाट तक गई। इस साल अब तक अधिकतम मांग करीब 25 हजार मेगावाट के आसपास रही है। इसके बावजूद उत्पादन और उपलब्धता में कमी के कारण व्यवस्था पर दबाव है। यही वजह है कि उपभोक्ता परिषद प्रबंधन की तैयारी पर सवाल उठा रहा है। परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा का कहना है कि पिछले वर्ष की अधिकतम मांग को देखते हुए सितंबर के लिए पहले से पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए थी। हालांकि बिजली निगम का कहना है कि इस बार समस्या केवल मांग की नहीं, बल्कि अचानक प्रभावित हुई कोयला आपूर्ति, बंद उत्पादन इकाइयों और बिजली बाजार में सीमित उपलब्धता की संयुक्त है।
सबसे बड़ी परेशानी शाम से रात के बीच सामने आ रही है। दिन के समय प्रदेश में बिजली आपूर्ति अपेक्षाकृत सामान्य बनाए रखने की कोशिश की जा रही है, लेकिन शाम के समय जब घरेलू खपत बढ़ती है, तब उपलब्धता और मांग के बीच अंतर बढ़ जाता है। बिजली निगम के अनुसार कुछ ग्रामीण क्षेत्रों, बुंदेलखंड, तहसील मुख्यालयों और नगर पंचायतों में रात के समय सीमित रोस्टरिंग करनी पड़ रही है। जिला मुख्यालयों पर निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है। बिजली की अतिरिक्त जरूरत पूरी करने के लिए ऊर्जा विभाग बिजली बाजार से खरीद भी कर रहा है, लेकिन व्यस्त समय में मांग इतनी अधिक है कि बिजली बाजार से मांगी गई पूरी मात्रा उपलब्ध नहीं हो पा रही। एक रिपोर्ट के अनुसार एक सितंबर से बिजली बाजार में अधिकतम 10 रुपये प्रति इकाई की दर वाली बिजली औसतन करीब 16 घंटे ही उपलब्ध हो पा रही है।
प्रदेश की उत्पादन व्यवस्था के सामने दूसरी बड़ी चुनौती बंद पड़ी इकाइयां हैं। 14 सितंबर की उपलब्धता रिपोर्ट में करीब 5340 मेगावाट क्षमता शॉर्ट या लंबे समय के लिए बंद बताई गई। इसमें अनपरा की एक इकाई, घाटमपुर की इकाइयां, रोजा, मेजा, हरदुआगंज, जवाहरपुर और ओबरा की कुछ इकाइयां शामिल हैं। इनमें कुछ इकाइयां तकनीकी कारणों से बंद हैं तो कुछ पर अन्य परिचालन संबंधी समस्याओं का असर है। घाटमपुर की एक इकाई के दोबारा चालू होने से स्थिति में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन बाकी इकाइयों की बहाली में समय लग रहा है। ऊर्जा प्रबंधन का लक्ष्य है कि आने वाले दिनों में बंद इकाइयों को चरणबद्ध ढंग से उत्पादन में वापस लाया जाए।
कोयले की स्थिति ने इस संकट को और गंभीर बनाया है। देश के कई कोयला क्षेत्रों में लगातार बारिश और जलभराव के कारण खनन और परिवहन प्रभावित हुआ। उत्तर प्रदेश के तापीय बिजलीघर भी इसी आपूर्ति शृंखला पर निर्भर हैं। सोनभद्र क्षेत्र के बिजलीघरों में सितंबर के मध्य तक कोयले का भंडार निर्धारित मानक की तुलना में काफी नीचे आने की रिपोर्ट सामने आई थी। कुछ रिपोर्टों में उत्पादन निगम के छह तापीय बिजलीघरों में औसत कोयला भंडार निर्धारित मानक का करीब 34 प्रतिशत रहने की बात कही गई। इसका मतलब यह है कि बिजलीघरों में कोयला बिल्कुल खत्म नहीं हुआ था, लेकिन सामान्य स्तर की तुलना में उपलब्ध भंडार काफी कम था और लगातार आपूर्ति बनाए रखना चुनौती बन गया था।
भीगा हुआ कोयला भी तापीय बिजलीघरों के लिए अलग समस्या पैदा करता है। कोयले में अधिक नमी होने पर उसकी प्रभावी ऊष्मा क्षमता घटती है और समान मात्रा में बिजली पैदा करने के लिए अधिक ईंधन की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा अत्यधिक नमी से कोयले की हैंडलिंग और मिलिंग की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसलिए खदान से बिजलीघर तक कोयले की मात्रा के साथ उसकी गुणवत्ता और नमी भी महत्वपूर्ण होती है। इस बार भारी बारिश ने इसी पूरी व्यवस्था को प्रभावित किया है। हालांकि किसी विशेष संयंत्र में उत्पादन में कितनी कमी केवल भीगे कोयले के कारण हुई, इसे बिना संयंत्र-स्तरीय तकनीकी आंकड़ों के निश्चित रूप से प्रबंधन की चूक कहना उचित नहीं होगा। संकट में बारिश से बाधित आपूर्ति और कई इकाइयों की तकनीकी बंदी दोनों की भूमिका है।
कोयला आपूर्ति में व्यवधान का असर केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है। देश के कई हिस्सों में भारी बारिश के कारण खदानों से कोयला निकालने और बिजलीघरों तक पहुंचाने में समस्या आई है। उत्तर प्रदेश के लिए उत्तरी कोलफील्ड्स लिमिटेड का उत्पादन और प्रेषण विशेष महत्व रखता है। बारिश कम होने के बाद सितंबर के दूसरे सप्ताह में एनसीएल ने उत्पादन और कोयला भेजने की गति बढ़ाई है। आठ सितंबर को कंपनी का कोयला उत्पादन एक से तीन सितंबर के औसत की तुलना में 67 प्रतिशत बढ़ा और आपूर्ति में 75 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई। कंपनी की कुल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा बिजली क्षेत्र को जाता है। इससे संकेत मिलता है कि आपूर्ति सुधारने की कोशिश शुरू हो चुकी है, लेकिन बिजलीघरों तक पर्याप्त और समय पर कोयला पहुंचने में कुछ समय लग सकता है।
इस बीच ऊर्जा विभाग ने उपलब्ध सभी स्रोतों से बिजली जुटाने की कोशिश तेज कर दी है। 14 सितंबर को अपर मुख्य सचिव ऊर्जा आशीष कुमार गोयल की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में उत्पादन इकाइयों को जल्द से जल्द चालू करने, कोयले की आपूर्ति बढ़ाने और बिजली खरीद के उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल करने पर चर्चा हुई। अधिकारियों को आपूर्ति सामान्य करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने के निर्देश दिए गए। प्रबंधन के सामने तत्काल चुनौती रात के समय मांग और उपलब्धता के बीच पैदा हो रहे अंतर को कम करना है। इसके लिए एक तरफ बंद इकाइयों को जल्द उत्पादन में लाना होगा, वहीं दूसरी तरफ कोयला आपूर्ति को सामान्य करना और बिजली बाजार से पर्याप्त बिजली हासिल करना होगा।
आने वाले कुछ दिनों में बंद इकाइयों के चालू होने से स्थिति में राहत मिलने की उम्मीद है। ऊर्जा प्रबंधन के अनुसार अनपरा डी, हरदुआगंज-ई और जवाहरपुर जैसी इकाइयों के दोबारा उत्पादन में आने से करीब 1500 मेगावाट अतिरिक्त बिजली उपलब्ध हो सकती है। यदि अन्य बंद इकाइयां भी निर्धारित समय में चालू होती हैं और कोयला आपूर्ति में सुधार जारी रहता है तो उत्पादन का दबाव कम होगा। लेकिन इसके लिए केवल मशीनों की मरम्मत पर्याप्त नहीं होगी। बारिश के दौरान कोयले की गुणवत्ता, भंडारण, परिवहन और बिजलीघर तक समय पर आपूर्ति की पूरी शृंखला को अधिक मजबूत करना होगा।
इस संकट ने उत्तर प्रदेश की बिजली व्यवस्था की एक पुरानी कमजोरी फिर सामने ला दी है। राज्य की बिजली जरूरत का बड़ा हिस्सा तापीय बिजलीघरों से पूरा होता है और इन संयंत्रों के लिए कोयले की नियमित आपूर्ति अनिवार्य है। जब एक साथ खदानों में बारिश, परिवहन में बाधा, कोयले में नमी और बिजलीघरों में तकनीकी खराबी जैसी समस्याएं पैदा होती हैं तो उपलब्ध क्षमता तेजी से घट जाती है। इसके बाद बिजली बाजार से खरीद पर निर्भरता बढ़ती है, लेकिन जब राष्ट्रीय स्तर पर कई राज्य एक साथ अतिरिक्त बिजली खरीदना चाहें तो बाजार में उपलब्धता सीमित हो सकती है और कीमत भी बढ़ सकती है। मौजूदा स्थिति में यही समस्या दिखाई दे रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब इस साल सितंबर में बिजली की अधिकतम मांग पिछले वर्ष की तुलना में करीब पांच हजार मेगावाट कम है, तब भी उपभोक्ताओं को कटौती क्यों झेलनी पड़ रही है। इसका जवाब किसी एक कारण में नहीं है। बारिश और जलभराव से कोयले की आपूर्ति प्रभावित हुई है, भीगे कोयले ने कुछ संयंत्रों की क्षमता पर असर डाला है, कई उत्पादन इकाइयां तकनीकी कारणों से बंद हैं और व्यस्त समय में बाजार से अतिरिक्त बिजली खरीदना भी आसान नहीं है। इन सभी कारणों ने मिलकर उपलब्ध बिजली का अंतर बढ़ाया है। इसलिए मौजूदा संकट को केवल ‘भीगे कोयले का संकट’ कहना भी अधूरा होगा और केवल ‘प्रबंधन की विफलता’ कहना भी। असली चुनौती यह है कि मौसम जैसी बाहरी परिस्थितियों के बावजूद बिजली व्यवस्था के पास पर्याप्त सुरक्षित भंडार, वैकल्पिक ईंधन व्यवस्था, चालू उत्पादन क्षमता और बाजार से बिजली खरीद की विश्वसनीय योजना कितनी है।
उत्तर प्रदेश के लिए इस संकट का सबक साफ है। बिजली की मांग भले ही किसी एक समय कम हो, लेकिन उत्पादन की उपलब्ध क्षमता में अचानक कमी आने पर पूरा तंत्र दबाव में आ सकता है। इसलिए तापीय बिजलीघरों की मशीनों का समय पर रखरखाव, कोयले का पर्याप्त भंडार, बारिश के मौसम के लिए अतिरिक्त ईंधन प्रबंधन, खदान से बिजलीघर तक परिवहन की वैकल्पिक व्यवस्था और बंद इकाइयों को जल्द बहाल करने की क्षमता भविष्य की बिजली सुरक्षा के लिए जरूरी है। फिलहाल राहत की उम्मीद बंद इकाइयों के दोबारा चालू होने और कोयला आपूर्ति सुधरने से है। लेकिन मौजूदा संकट ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि जब मांग पिछले साल से काफी कम थी, तब भी अगर 5340 मेगावाट उत्पादन क्षमता एक साथ उपलब्ध नहीं रही और रात में 1500 से 2000 मेगावाट तक का अंतर पैदा हो गया, तो भविष्य में 30 हजार मेगावाट या उससे अधिक की मांग वाले दिनों के लिए प्रदेश की तैयारी कितनी मजबूत है। यही सवाल इस बिजली संकट को केवल कुछ दिनों की कटौती से आगे ले जाकर दीर्घकालीन ऊर्जा प्रबंधन का विषय बनाता है।


