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ध्वनि प्रदूषण पर सख्त हुआ खाकी का डंडा! यूपी में प्रेशर हॉर्न पर 5 महीने में काटे गए 12 हजार से अधिक चालान
उत्तर प्रदेश में प्रेशर और मल्टी-टोन हॉर्न के खिलाफ अभियान तेज हो गया है और अप्रैल से अगस्त के बीच 12,158 वाहनों के चालान काटे गए।
Lucknow: सड़कों पर कानफाड़ू आवाज निकालने वाले प्रेशर हॉर्न और मल्टी-टोन हॉर्न के खिलाफ उत्तर प्रदेश यातायात निदेशालय की नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का असर धरातल पर दिखने लगा है। प्रदेश भर में चलाए गए विशेष चेकिंग अभियान के तहत वित्तीय वर्ष के शुरुआती पांच महीनों (अप्रैल से अगस्त) में कुल 12,158 वाहनों के चालान काटे गए हैं।
यह कार्रवाई पिछले वर्ष की इसी अवधि में हुई 5,164 कार्यवाहियों की तुलना में दोगुने से भी अधिक (लगभग 135% की बढ़ोतरी) है। परिवहन आयुक्त आशुतोष निरंजन के अनुसार, ध्वनि प्रदूषण और सड़क दुर्घटनाओं पर लगाम कसने के लिए यह अभियान आगे भी लगातार जारी रहेगा।
क्या कहता है कानून और ध्वनि का पैमाना?
सिंगल-टोन ही वैध: केंद्रीय मोटर वाहन नियमावली (CMVR) के नियम 119 के तहत किसी भी वाहन में केवल सिंगल-टोन हॉर्न लगाने की अनुमति है। प्रेशर, सायरन, म्यूजिकल या मल्टी-टोन हॉर्न पूरी तरह गैरकानूनी हैं।
सख्त कानूनी धाराएं: मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 190(2) और 192 के तहत तय सीमा से अधिक ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाले हॉर्न के इस्तेमाल पर भारी जुर्माना, हॉर्न की जब्ती और वाहन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान है।
ध्वनि की सीमा (डेसिबल): वाहनों के लिए अधिकतम स्वीकृत ध्वनि सीमा आमतौर पर 93 से 112 डेसिबल के बीच तय की गई है, लेकिन रिहायशी व सामान्य परिस्थितियों में यह स्तर 100 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए।
राजधानी में सुस्त रवैया: लालबाग में सज रहा अवैध बाजार
पूरे प्रदेश में कार्रवाई का ग्राफ बढ़ने के बावजूद राजधानी लखनऊ के आंकड़े हैरान करने वाले हैं:
कार्रवाई में गिरावट: लखनऊ में पिछले साल अप्रैल से अगस्त के बीच जहां 208 वाहनों पर कार्रवाई हुई थी, वहीं इस वर्ष यह संख्या घटकर मात्र 185 रह गई।
अवैध बिक्री का केंद्र: शहर के पॉश इलाके लालबाग में प्रतिबंधित प्रेशर और मल्टी-टोन हॉर्न का अवैध कारोबार खुलेआम फल-फूल रहा है। स्थानीय पुलिस थाने और प्रशासनिक दफ्तरों के पास होने के बावजूद परिवहन और पुलिस महकमा इन दुकानों पर छापेमारी करने और हॉर्न के स्रोत पर नकेल कसने से बचता नजर आता है।
छोटे जिलों का बुरा हाल: वर्ष 2025 में बांदा, बुलंदशहर, चित्रकूट, झांसी, कासगंज, महराजगंज, पीलीभीत, सिद्धार्थनगर और सोनभद्र जैसे जिलों में कार्रवाई इकाई अंक (10 से कम) में सिमटी थी। इस वर्ष भी भदोही और चित्रकूट जैसे जिले इकाई के आंकड़े से आगे नहीं बढ़ सके हैं।
स्वास्थ्य पर भारी पड़ रहा 'शोर का शौक'
चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, 100 डेसिबल से अधिक तीव्रता वाले प्रेशर हॉर्न का आकस्मिक शोर इंसानी शरीर के लिए बेहद घातक है:
मानसिक तनाव और घबराहट: तेज और कर्कश ध्वनि से दिल के मरीजों, बुजुर्गों और छोटे बच्चों में अचानक दिल की धड़कन तेज होना, मानसिक बेचैनी और घबराहट जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
बहरापन (हियरिंग लॉस): लगातार ऐसे शोर के संपर्क में रहने से सुनने की क्षमता (ऑडिटरी सेंसरी सेल्स) स्थायी रूप से नष्ट हो सकती है।
सड़क हादसे: सड़क पर अचानक पीछे से बजने वाले प्रेशर हॉर्न की तीखी आवाज से आगे चल रहे दोपहिया व चौपहिया चालक चौंककर नियंत्रण खो देते हैं, जिससे जानलेवा सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।


