UP Rajya Sabha Election 2026: यूपी में 2027 का सेमीफाइनल या खामोश समझौता?

UP Rajya Sabha Election 2026: यूपी में 16 अक्टूबर 2026 को होने वाले राज्यसभा चुनाव में 10 सीटों पर मुकाबला होगा। जानिए BJP, सपा और बसपा के मौजूदा समीकरण, सीटों का गणित और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले इसकी सियासी अहमियत।

Yogesh Mishra
Published on: 22 Sept 2026 8:17 PM IST
UP Rajya Sabha Election 2026 Fight SP BSP BJP CONGRES
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UP Rajya Sabha Election 2026 Fight SP BSP BJP CONGRES 

UP Rajya Sabha Election 2026: विधानसभा चुनाव से करीब छह माह पहले उत्तर प्रदेश में होने जा रहे राज्यसभा चुनाव ने सियासी रणभेरी बजा दी है। चुनावी गणित के प्रथम दृष्टया आकलन से साफ है कि समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव को इस चुनाव में सीधे तौर पर एक सीट का फायदा मिलता दिख रहा है। वहीं, निर्वाचन आयोग की अधिसूचना यह कड़ा संदेश लेकर आई है कि इस चुनाव के बाद—कभी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा रखने वाली और उत्तर प्रदेश में चार बार सत्ता का स्वाद चखने वाली—मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) आज़ाद भारत के इतिहास में पहली बार देश के किसी भी सदन (लोकसभा व राज्यसभा) में मौजूद नहीं रहेगी।

अखिलेश यादव उच्च सदन में अपनी ताकत बढ़ाने जा रहे हैं, जबकि भाजपा के वर्तमान आठ सदस्यों की संख्या में कोई कमी आने की गुंजाइश नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या भाजपा इस चुनाव को 2027 के विधानसभा चुनाव का 'सेमीफाइनल' मानकर सपा के किले में दोबारा सेंध लगाने की कोशिश करेगी, या फिर अखिलेश अपने विधायकों को एकजुट रख पाएंगे? यदि भाजपा नौवां उम्मीदवार उतारकर आक्रामक दांव चलती है, तभी इस चुनाव में सियासी रोमांच दिखेगा; अन्यथा यह चुनाव बिना किसी शोर-शराबे के निर्विरोध निर्वाचन की औपचारिक मुनादी पीटता हुआ गुजर जाएगा।

बसपा का सूपड़ा साफ, सपा के पास दो सीटें तय

उत्तर प्रदेश कोटे से वर्तमान में बसपा और सपा के एक-एक तथा भाजपा के आठ सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है। विधानसभा में बसपा के एकमात्र विधायक (उमाशंकर सिंह) के असामयिक निधन के बाद अब पार्टी का एक भी विधायक सदन में नहीं है। ऐसे में रामजी गौतम के विदा होते ही संसद के दोनों सदनों से बसपा पूरी तरह बाहर हो जाएगी।


सपा की ओर से केवल प्रो. राम गोपाल यादव का कार्यकाल पूरा हो रहा है। जब 2020 में प्रो. यादव राज्यसभा पहुंचे थे, तब सपा के पास 50 से भी कम विधायक थे। आज सपा के पास तकनीकी रूप से 105 विधायक हैं, लेकिन 7 बागी विधायकों (और एक गैरहाजिर विधायक) को अलग कर दें, तो वफादार विधायकों की प्रभावी संख्या 97 से 98 के आसपास रह जाती है।

राज्यसभा के गणित के मुताबिक एक सीट जीतने के लिए प्रथम वरीयता के 37 वोटों की दरकार होती है। इस लिहाज से सपा अपने दम पर 2 सीटें आसानी से जीत सकती है (37 -times 2 = 74 वोट)। इन दो सीटों में प्रो. राम गोपाल यादव का दोबारा उच्च सदन जाना लगभग तय माना जा रहा है। दूसरे चेहरे के रूप में पूर्व मुख्य सचिव और अखिलेश यादव के रणनीतिकार आलोक रंजन की दावेदारी सबसे मजबूत है। पिछली बार सपा विधायकों की क्रॉस-वोटिंग के चलते आलोक रंजन हार गए थे, लिहाजा पार्टी इस बार उन्हें पहले उम्मीदवार के तौर पर उतारकर संसद भेजने का कर्ज चुका सकती है।

भाजपा का कुनबा और सोशल इंजीनियरिंग का दांव

भाजपा की ओर से केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, अरुण सिंह, बृजलाल, नीरज शेखर, बी. एल. वर्मा, गीता शाक्य और सीमा द्विवेदी का कार्यकाल पूरा हो रहा है। डॉ. दिनेश शर्मा को अंडमान-निकोबार का उपराज्यपाल बनाए जाने के बाद उनकी जगह भी नई नियुक्ति तय है।

मोदी मंत्रिमंडल में शामिल होने के कारण हरदीप सिंह पुरी और बी. एल. वर्मा की वापसी की संभावनाएं बेहद मजबूत मानी जा रही हैं। वहीं, सांगठनिक फेरबदल और नए चेहरों को मौका देने की रणनीति के तहत बाकी कुछ पुराने चेहरों का टिकट कट सकता है। इन दिनों उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की कथित नाराजगी की चर्चाओं के बीच, दिनेश शर्मा और सीमा द्विवेदी की जगह पार्टी नए ब्राह्मण चेहरों पर दांव लगाकर सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश कर सकती है। यदि भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला देखें, तो दो सवर्ण (ब्राह्मण/ठाकुर), दो ओबीसी और एक-दो दलित चेहरों को मौका मिलना तय माना जा रहा है।

299 का एनडीए चक्रव्यूह: क्या अखिलेश लेंगे जोखिम?

विधानसभा के चुनावी चौसर पर नजर डालें तो भाजपा के पास अपने 257 विधायक हैं। एनडीए के सहयोगी दलों को जोड़ लें तो यह संख्या 290 तक पहुंच जाती है:


अपना दल (एस): 13

राष्ट्रीय लोक दल (रालोद): 9

सुभासपा (राजभर): 6

निषाद पार्टी: 5

गौरतलब है कि 2022 के विधानसभा चुनाव में जयंत चौधरी और ओम प्रकाश राजभर दोनों ही अखिलेश यादव के गठबंधन का हिस्सा थे।

इसके अलावा जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के रघुराज प्रताप सिंह उर्फ 'राजा भैया' और विनोद सरोज के 2 वोट तथा फरवरी 2024 में क्रॉस-वोटिंग करने वाले सपा के 7 बागी विधायक (मनोज कुमार पांडे, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, राकेश पांडे, विनोद चतुर्वेदी, पूजा पाल और आशुतोष मौर्य) भाजपा के खेमे में खड़े हैं। यानी भाजपा गठबंधन के पास प्रभावी संख्याबल 299 विधायकों का है, जबकि अपने 8 उम्मीदवारों को जिताने के लिए उसे केवल 296 वोटों (37 -time 8 की जरूरत है।

यह समूचा गणित साफ संकेत देता है कि यदि अखिलेश यादव दो उम्मीदवारों तक सीमित रहते हैं, तो दोनों सीटें निर्विरोध निकल जाएंगी। लेकिन यदि उन्होंने तीसरे उम्मीदवार को उतारने का दांव चला, तो वह सीधे तौर पर भाजपा को अपने किले में एक बार फिर सेंध लगाने का खुला आमंत्रण देंगे। फिलहाल अखिलेश के लिए समझदारी इसी में है कि वह इस चुनाव को बिना किसी टकराव के शांति से गुजर जाने दें और अपनी बची हुई ऊर्जा 2027 के महासमर के लिए बचाकर रखें। देखना यह होगा कि यह चुनाव खामोशी से संपन्न होता है या फिर विधानसभा चुनाव से पहले सेंधमारी का कोई नया सियासी अध्याय लिख जाता है।

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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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