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एक भी पुराना सांसद Repeat नहीं! BJP ने UP में एक झटके में क्यों बदले सारे चेहरे, 2027 का ‘बिग प्लान’
UP Rajya Sabha Election: BJP ने यूपी राज्यसभा चुनाव के लिए सभी पुराने सांसदों की जगह नए चेहरों को मौका दिया है। 2027 विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की रणनीति पर चर्चा तेज है।
UP Rajya Sabha Election(Photo-Social Media)
UP Rajya Sabha Election: उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों का चुनाव भले ही अब बिना बड़े मुकाबले की तरफ बढ़ गया हो, लेकिन BJP की उम्मीदवार सूची ने 2027 से पहले कई राजनीतिक सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल पार्टी ने अपने पुराने राज्यसभा सांसदों में से किसी को दोबारा मौका क्यों नहीं दिया? यह बदलाव इसलिए भी सामान्य नहीं है क्योंकि बाहर होने वाले चेहरों में केवल ऐसे नेता नहीं हैं जिनकी राजनीतिक सक्रियता कम हो गई हो। केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा जैसे बड़े नाम भी उत्तर प्रदेश से दोबारा राज्यसभा उम्मीदवार नहीं बनाए गए। स्मृति ईरानी का नाम भी टिकट से पहले राजनीतिक चर्चाओं में था, लेकिन अंतिम सूची में वह भी नहीं थीं। इसके बजाय BJP ने धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को मैदान में उतारा है। यानी पुराने चेहरों को दोहराने के बजाय लगभग पूरी तरह नई टीम।
सवाल है कि आखिर क्यों?
राज्यसभा से ही क्यों शुरू हुआ बदलाव? उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव होना है। उससे पहले BJP के सामने संगठन से लेकर सामाजिक समीकरण तक कई स्तरों पर तैयारी का समय है। राज्यसभा की आठ उम्मीदवारी पार्टी को ऐसा मौका देती है जहां वह बिना विधानसभा चुनाव का इंतजार किए अलग-अलग सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को प्रतिनिधित्व दे सकती है। नई सूची को इसी नजरिए से देखें तो एक पैटर्न दिखाई देता है। इसमें तीन OBC, दो अनुसूचित जाति और तीन सवर्ण चेहरे हैं। सवर्ण उम्मीदवारों में दो ब्राह्मण और एक ठाकुर चेहरा शामिल है।
यानी BJP ने अपने पारंपरिक सवर्ण आधार को प्रतिनिधित्व देते हुए OBC और दलित नेताओं के लिए भी पांच स्थान रखे हैं। इसे 2027 से जोड़कर देखा जा रहा है, हालांकि BJP ने आधिकारिक तौर पर यह नहीं कहा है कि उम्मीदवारों का चयन विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर ही किया गया।
OBC पर तीन दांव क्यों?
सबसे ज्यादा ध्यान तीन OBC उम्मीदवारों पर जाता है। धर्मपाल सिंह लोधी समुदाय से आते हैं। प्रकाश पाल पाल समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि श्रुति गंगवार कुर्मी/OBC पृष्ठभूमि से आती हैं। यहां महत्वपूर्ण बात केवल तीन OBC टिकट नहीं, बल्कि तीन अलग-अलग सामाजिक समूह हैं। पिछले एक दशक में BJP के उत्तर प्रदेश वाले सामाजिक गठबंधन में गैर-यादव OBC मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दूसरी तरफ अखिलेश यादव PDA यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक की रणनीति के जरिए पिछड़े और दलित समुदायों में अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में BJP की राज्यसभा सूची में लोधी, पाल और कुर्मी प्रतिनिधित्व को सामाजिक संतुलन की कोशिश के रूप में पढ़ा जा सकता है।
दो दलित चेहरे भी संयोग नहीं?
BJP ने प्रियंका सिंह रावत और विद्यासागर सोनकर को भी राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है। प्रियंका सिंह रावत बाराबंकी से सांसद रह चुकी हैं। 2019 में उनका लोकसभा टिकट काट दिया गया था, लेकिन उन्होंने पार्टी नहीं छोड़ी और संगठन में सक्रिय रहीं। अब करीब सात साल बाद उनके लिए संसद वापसी का रास्ता खुला है। दूसरी तरफ विद्यासागर सोनकर पूर्व सांसद और BJP संगठन के पुराने चेहरे हैं। दोनों अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं। यह उस समय महत्वपूर्ण है जब उत्तर प्रदेश में दलित मतदाताओं को लेकर BSP अपना आधार फिर मजबूत करने की कोशिश कर रही है और SP भी PDA के जरिए दलित हिस्सेदारी पर जोर दे रही है। इसलिए BJP की सूची में दो दलित उम्मीदवारों को जगह मिलना प्रतिनिधित्व का स्पष्ट राजनीतिक संकेत है।
ब्राह्मण और ठाकुर को भी साथ रखा
BJP ने OBC और दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाते हुए सवर्ण समीकरण को छोड़ा नहीं है। राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडेय ब्राह्मण चेहरे हैं, जबकि राम प्रताप सिंह चौहान ठाकुर समुदाय से आते हैं। यहां भी दिलचस्प बात नामों की है। पार्टी ने केवल राष्ट्रीय स्तर के बड़े चेहरे चुनने के बजाय संगठन, पेशेवर क्षेत्र और प्रदेश की राजनीति में सक्रिय लोगों को आगे बढ़ाया है। इससे सूची में दो स्तर का संतुलन दिखाई देता है एक तरफ सामाजिक प्रतिनिधित्व और दूसरी तरफ संगठन से जुड़े नेताओं को मौका।
हरदीप पुरी और बीएल वर्मा का क्या होगा?
यही सूची का अगला बड़ा सवाल है। हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा दोनों केंद्र सरकार में मंत्री हैं। उत्तर प्रदेश से उनका राज्यसभा कार्यकाल समाप्त हो रहा है, लेकिन दोनों को यहां से दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाया गया। इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि उनकी केंद्रीय राजनीति खत्म हो रही है। राज्यसभा के लिए दूसरे राज्यों से चुनाव, सरकार या संगठन में दूसरी व्यवस्था जैसे विकल्प राजनीतिक दलों के पास रहते हैं। इसलिए दोनों के भविष्य को लेकर BJP के अगले फैसले का इंतजार करना होगा। लेकिन UP की सीटों के लिहाज से इतना जरूर स्पष्ट है कि पार्टी ने इस बार पुराने नाम दोहराने के बजाय नई सामाजिक-संगठनात्मक टीम को जगह दी है।
स्मृति ईरानी भी क्यों रह गईं बाहर?
उम्मीदवार घोषित होने से पहले स्मृति ईरानी का नाम भी चर्चा में था। 2024 में अमेठी लोकसभा चुनाव हारने के बाद उनके राज्यसभा के रास्ते संसद में लौटने की संभावना को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन BJP ने उन्हें भी इन आठ सीटों में जगह नहीं दी। यह फैसला सूची के व्यापक पैटर्न से मेल खाता है राष्ट्रीय स्तर के चर्चित नामों के बजाय UP के भीतर सामाजिक और संगठनात्मक पहचान रखने वाले चेहरों पर जोर।हालांकि स्मृति ईरानी को उम्मीदवार न बनाने की कोई विशेष वजह BJP ने सार्वजनिक तौर पर नहीं बताई है।
क्या 2027 से पहले BJP का ‘Reset Button’ है?
यही इस पूरी सूची की राजनीतिक कहानी है। राज्यसभा के लिए BJP चाहती तो कई पुराने सांसदों को दोबारा मौका दे सकती थी। बड़े राष्ट्रीय चेहरों को भी भेजा जा सकता था। लेकिन पार्टी ने आठ नए नाम चुने। इनमें OBC हैं, दलित हैं, ब्राह्मण हैं, ठाकुर हैं, दो महिला उम्मीदवार हैं और अलग-अलग क्षेत्रों तथा संगठन से जुड़े चेहरे हैं। इसे सीधे 2027 का अंतिम चुनावी फॉर्मूला मानना जल्दबाजी होगी। राज्यसभा उम्मीदवारों का सामाजिक प्रतिनिधित्व और विधानसभा में टिकट वितरण दो अलग प्रक्रियाएं हैं। फिर भी सूची यह संकेत जरूर देती है कि BJP उत्तर प्रदेश में अपने पुराने सवर्ण आधार के साथ गैर-यादव OBC और दलित प्रतिनिधित्व को बनाए रखने और नए चेहरों को आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है। इसलिए इन आठ टिकटों की सबसे बड़ी खबर यह नहीं कि राज्यसभा कौन जा रहा है। बड़ी खबर यह है कि पुराने चेहरों की जगह BJP ने किन लोगों को चुना और उनके जरिए किन सामाजिक समूहों तक संदेश पहुंचाने की कोशिश की। 2027 से पहले अगर यही पैटर्न संगठन और विधानसभा टिकटों में भी दिखाई देता है, तभी साफ होगा कि राज्यसभा की यह सूची सामान्य फेरबदल थी या BJP के बड़े राजनीतिक बदलाव की पहली झलक।


