TRENDING TAGS :
अखिलेश ने एक पोस्ट से खत्म कर दी राज्यसभा की लड़ाई! अब बिना वोटिंग ही सब 'फिक्स'
Rajya Sabha Election: 'तीन नहीं, 403 पर नजर'... अखिलेश के एक फैसले से बदल गया राज्यसभा चुनाव का गणित, BJP को क्या मिला फायदा?
UP Rajya Sabha Election 2026: उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की 10 सीटों को लेकर कई दिनों से चल रही सियासी हलचल का अंत बिना मतदान के होने जा रहा है। चुनाव की तारीख 16 अक्टूबर तय थी, लेकिन उससे पहले ही उम्मीदवारों की तस्वीर साफ हो गई है। कुल 12 उम्मीदवारों ने नामांकन किया था। इनमें दो निर्दलीय उम्मीदवारों के पर्चे खारिज होने के बाद मैदान में सिर्फ 10 प्रत्याशी बचे हैं। इनमें आठ भारतीय जनता पार्टी और दो समाजवादी पार्टी के हैं। यानी अब मतदान की नौबत नहीं आएगी। हालांकि निर्विरोध निर्वाचन की औपचारिक घोषणा नौ अक्टूबर को नाम वापसी की समयसीमा समाप्त होने के बाद होगी।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प कहानी दो निर्दलीय उम्मीदवारों के पर्चे खारिज होने की नहीं, बल्कि अखिलेश यादव के उस फैसले की है जिसने राज्यसभा की संभावित चुनावी लड़ाई को खत्म कर दिया। सपा पहले तीसरा उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही थी। पार्टी नेताओं की तरफ से इसके संकेत भी दिए गए थे। लेकिन नामांकन के अंतिम दिन अखिलेश ने अचानक अपना रुख बदल दिया। एक सोशल मीडिया पोस्ट ने पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल दी।
'अब हमारी निगाह तीन पर नहीं, चार सौ तीन पर है'
छह अक्टूबर को अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, 'अब हमारी निगाह तीन पर नहीं, चार सौ तीन पर है।' यह संदेश जितना छोटा था, उसके राजनीतिक मायने उतने ही बड़े निकाले गए। तीन का मतलब राज्यसभा में सपा के संभावित तीसरे उम्मीदवार से था, जबकि 403 उत्तर प्रदेश विधानसभा की कुल सीटों की संख्या है।
अखिलेश के इस बयान से स्पष्ट हो गया कि सपा तीसरा प्रत्याशी नहीं उतारेगी। पार्टी ने पहले से नामांकन कर चुके प्रो. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी तक ही अपनी दावेदारी सीमित रखी।
इस फैसले को 2027 के विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, सपा नेतृत्व ने राज्यसभा की अतिरिक्त सीट के लिए जोखिम लेने के बजाय विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर ध्यान केंद्रित करने का रास्ता चुना है। हालांकि सपा ने तीसरा उम्मीदवार न उतारने की वजह के तौर पर विधायकों की संभावित क्रॉस वोटिंग को आधिकारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है।
तीसरी सीट पर क्यों उलझ रहा था अखिलेश का गणित?
राज्यसभा चुनाव में विधायक मतदान करते हैं और जीत के लिए निर्धारित संख्या में प्रथम वरीयता वोट हासिल करना जरूरी होता है। इस चुनाव में एक उम्मीदवार के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता वोटों का गणित सामने था। सपा और कांग्रेस गठबंधन के पास दो उम्मीदवारों को जिताने के लिए पर्याप्त समर्थन था, लेकिन तीसरे उम्मीदवार के लिए अतिरिक्त विधायकों के वोट जुटाने पड़ते।
दूसरी ओर BJP के पास अपने सात उम्मीदवारों को जिताने का स्पष्ट संख्याबल था। आठवें उम्मीदवार के लिए उसे सहयोगियों और उपलब्ध अतिरिक्त समर्थन के गणित पर भरोसा करना था। ऐसे में अगर सपा तीसरा उम्मीदवार उतारती तो दसवीं सीट पर मुकाबला होता। इस स्थिति में दोनों पक्षों को अपने विधायकों के साथ अतिरिक्त समर्थन जुटाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता था। लेकिन अखिलेश के फैसले के बाद यह मुकाबला शुरू होने से पहले ही समाप्त हो गया।
2024 की क्रॉस वोटिंग की याद क्यों आई?
राज्यसभा चुनाव का जिक्र होते ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में फरवरी 2024 की घटना भी याद आती है। उस समय BJP ने आठवां उम्मीदवार उतारकर चुनाव को दिलचस्प बना दिया था। मतदान के दौरान सपा के सात विधायकों ने BJP उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी। नतीजा यह हुआ कि BJP ने आठ सीटें जीत लीं, जबकि सपा को दो सीटों से संतोष करना पड़ा। सपा के तीसरे उम्मीदवार आलोक रंजन चुनाव हार गए थे।
इस बार भी सपा के तीसरे उम्मीदवार की चर्चा के साथ क्रॉस वोटिंग की संभावना पर राजनीतिक बहस शुरू हो गई थी। कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि 2027 से पहले ऐसा मुकाबला सपा के लिए अनावश्यक संगठनात्मक परीक्षा बन सकता था। हालांकि यह विश्लेषण है, अखिलेश यादव के फैसले का घोषित कारण नहीं।
BJP ने आठ उम्मीदवारों के नामांकन को बनाया शक्ति प्रदर्शन
दूसरी तरफ BJP ने अपने आठ उम्मीदवारों का नामांकन बड़े राजनीतिक आयोजन के रूप में किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी तथा पार्टी के कई वरिष्ठ नेता नामांकन के दौरान मौजूद रहे। BJP ने धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडेय, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप सिंह चौहान और श्रुति गंगवार को उम्मीदवार बनाया है। इन नामों में OBC, दलित, ब्राह्मण और ठाकुर समुदायों के नेताओं को प्रतिनिधित्व मिला है। दो महिला उम्मीदवार भी शामिल हैं। BJP की सूची को 2027 से पहले सामाजिक और संगठनात्मक संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
दो निर्दलीयों के पर्चे क्यों खारिज हुए?
राज्यसभा की 10 सीटों के लिए कुल 12 नामांकन दाखिल हुए थे। इनमें BJP के आठ, सपा के दो और दो निर्दलीय उम्मीदवार शामिल थे। सात अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच के दौरान निर्वाचन अधिकारी अजीत कुमार वर्मा ने निर्दलीय प्रत्याशी कांते सायन्ना और ओमकार नाथ चौरसिया के पर्चे खारिज कर दिए। दोनों उम्मीदवार नामांकन के लिए जरूरी 10 विधायक प्रस्तावकों की अनिवार्य शर्त पूरी नहीं कर सके थे। इसके बाद मैदान में उम्मीदवारों की संख्या घटकर ठीक 10 रह गई। अब जितनी सीटें हैं, उतने ही वैध उम्मीदवार हैं। यही वजह है कि मतदान की जरूरत नहीं पड़ेगी।
नौ अक्टूबर को पूरी होगी औपचारिक प्रक्रिया
उत्तर प्रदेश की इन 10 राज्यसभा सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है। निर्वाचन आयोग ने 16 अक्टूबर को मतदान का कार्यक्रम निर्धारित किया था। नामांकन की अंतिम तारीख छह अक्टूबर और जांच की तारीख सात अक्टूबर थी। अब नौ अक्टूबर तक उम्मीदवारों के पास नाम वापस लेने का समय है। इस समयसीमा के बाद निर्वाचन अधिकारी शेष उम्मीदवारों के निर्विरोध निर्वाचन की औपचारिक घोषणा कर सकते हैं और उन्हें निर्वाचन प्रमाणपत्र जारी किए जाएंगे।
राज्यसभा में मुकाबला खत्म, 2027 की सियासत जारी
इस पूरे घटनाक्रम में BJP और सपा दोनों की राजनीतिक प्राथमिकताएं सामने आई हैं। BJP ने आठ उम्मीदवार उतारे और नामांकन के दौरान अपने संगठन तथा सहयोगियों की मौजूदगी दिखाई। दूसरी ओर सपा ने तीसरी सीट के लिए मुकाबला करने के बजाय अपने दो उम्मीदवारों तक सीमित रहने का फैसला किया।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस घटनाक्रम को लेकर NDA और PDA के बीच राजनीतिक तुलना की है। वहीं अखिलेश यादव ने अपने संदेश से साफ कर दिया कि उनकी नजर राज्यसभा की तीसरी सीट के बजाय 2027 के विधानसभा चुनाव पर है। हालांकि राज्यसभा के इस निर्विरोध निर्वाचन से विधानसभा चुनाव का परिणाम तय नहीं होता। दोनों चुनावों की प्रक्रिया, मतदाता और राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं।
फिलहाल उत्तर प्रदेश में राज्यसभा का 8-2 का गणित साफ है। लेकिन सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही बना हुआ है अखिलेश ने तीसरी सीट के लिए मुकाबला करने के बजाय 403 विधानसभा सीटों की बात क्यों चुनी? इस सवाल का जवाब आने वाले महीनों में सपा और BJP की विधानसभा चुनाव तैयारियों में अधिक स्पष्ट हो सकता है।


