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UP News: रोडवेज बस हादसों में 2025-26 में 448 मौतें, नए वित्त वर्ष के तीन महीने में ही 125 की जान गई
UP News: उत्तर प्रदेश रोडवेज की बस दुर्घटनाओं में 2025-26 में 448 मौतें दर्ज हुईं। 2026-27 के अप्रैल से जून के बीच 125 लोगों की जान गई। सड़क सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे।
UP News (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) की बसों से होने वाले हादसों और मौतों के आंकड़े गंभीर तस्वीर पेश कर रहे हैं। निगम की समीक्षा में वित्तीय वर्ष 2025-26 में बस दुर्घटनाओं में 448 लोगों की मौत दर्ज की गई, जो उपलब्ध पांच वर्षों के आंकड़ों में सर्वाधिक बताई गई है। चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 के शुरुआती तीन महीनों यानी अप्रैल से जून के बीच ही 125 लोगों की जान जा चुकी है। अकेले जून में 51 मौतें दर्ज हुईं। इससे पहले अगस्त 2025 में एक महीने में 58 मौतें हुई थीं। आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि सड़क सुरक्षा की चुनौती बनी हुई है, लेकिन हादसों में वृद्धि को केवल ‘रोडवेज की लापरवाही’ का परिणाम मानना तब तक उचित नहीं होगा जब तक प्रत्येक दुर्घटना की जांच में कारण और जिम्मेदारी निर्धारित न हो जाए।
निगम के वित्तीय वर्ष 2021-22 से जून 2026 तक के आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि दुर्घटनाओं में UPSRTC की अपनी बसों की हिस्सेदारी अनुबंधित बसों से काफी अधिक रही। इस अवधि में दर्ज कुल दुर्घटनाओं में करीब 82.66 प्रतिशत निगम की अपनी बसों और 17.34 प्रतिशत अनुबंधित बसों से जुड़ी थीं। दुर्घटनाओं में हुई कुल मौतों में निगम की अपनी बसों की हिस्सेदारी करीब 77 प्रतिशत और अनुबंधित बसों की 23 प्रतिशत रही। घायलों में भी करीब 81.52 प्रतिशत मामले निगम की बसों से संबंधित बताए गए हैं।
हालांकि इन प्रतिशतों से सीधे यह निष्कर्ष निकालना कि निगम की बसें अनुबंधित बसों की तुलना में अधिक खतरनाक हैं, सही नहीं होगा। इसके लिए यह जानना भी जरूरी है कि दोनों श्रेणियों की बसों की संख्या कितनी है, उन्होंने कुल कितने किलोमीटर का संचालन किया और प्रत्येक श्रेणी में प्रति लाख किलोमीटर या प्रति दस लाख किलोमीटर कितनी दुर्घटनाएं और मौतें हुईं। यदि निगम की अपनी बसें कुल संचालन का बहुत बड़ा हिस्सा करती हैं तो दुर्घटनाओं में उनकी संख्या स्वाभाविक रूप से अधिक हो सकती है। जोखिम की वास्तविक तुलना बसों की संख्या के बजाय उनके संचालन और यात्री-किलोमीटर के अनुपात में दुर्घटना दर से ही की जा सकती है।
रोडवेज की सुरक्षा व्यवस्था में चालकों की उपलब्धता भी बड़ा मुद्दा है। लंबी दूरी की सेवाओं में चालक को लगातार कई घंटे वाहन चलाना पड़ता है और पर्याप्त आराम न मिलने पर थकान दुर्घटना का जोखिम बढ़ा सकती है। परिवहन निगम में चालकों की कमी को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। कई लंबे मार्गों पर दो चालकों की व्यवस्था के बजाय एक चालक से बस चलवाए जाने की शिकायतें सामने आती रही हैं। यदि निर्धारित दूरी या ड्यूटी अवधि के बावजूद डबल क्रू की अनिवार्य व्यवस्था का पालन नहीं किया जा रहा है तो यह सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है, लेकिन दुर्घटनाओं की बढ़ती संख्या का प्रमुख कारण यही है, ऐसा साबित करने के लिए दुर्घटना जांच रिपोर्टों का विश्लेषण आवश्यक होगा।
चालकों की भर्ती, वेतन, ड्यूटी के घंटे और पर्याप्त विश्राम भी सड़क सुरक्षा से सीधे जुड़े विषय हैं। लंबे समय तक वाहन चलाने से प्रतिक्रिया का समय प्रभावित हो सकता है और नींद या अत्यधिक थकान गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकती है। इसके साथ तेज रफ्तार, ओवरटेकिंग, सड़क और मौसम की स्थिति, वाहन में तकनीकी खराबी, दूसरे वाहन की गलती और पैदल यात्रियों का व्यवहार भी हादसों के कारण हो सकते हैं। इसलिए प्रत्येक दुर्घटना की जांच में केवल चालक पर जिम्मेदारी डालने के बजाय मानवीय गलती, वाहन की फिटनेस, सड़क की स्थिति और ड्यूटी प्रबंधन सभी पहलुओं की जांच जरूरी है।
UPSRTC प्रबंधन का कहना है कि चालकों को नियमित सुरक्षा प्रशिक्षण दिया जा रहा है और गंभीर दुर्घटनाओं की जांच भी कराई जाती है। प्रबंध निदेशक पीएन सिंह के मुताबिक सड़क सुरक्षा सुधारने के लिए चालकों के प्रशिक्षण और निगरानी पर काम किया जा रहा है। इसके बावजूद 2025-26 में 448 मौतें और अगले वित्तीय वर्ष के शुरुआती तीन महीनों में 125 मौतें यह संकेत देती हैं कि मौजूदा सुरक्षा उपायों के प्रभाव का अधिक गहराई से मूल्यांकन करने की जरूरत है।
इन आंकड़ों की सबसे उपयोगी समीक्षा केवल यह गिनने से नहीं होगी कि कितनी दुर्घटनाएं हुईं। निगम यदि अपनी और अनुबंधित बसों के लिए प्रति दस लाख किलोमीटर दुर्घटना और मृत्यु दर, चालक के ड्यूटी घंटे, दुर्घटना के समय लगातार वाहन चलाने की अवधि, बस की उम्र, फिटनेस रिकॉर्ड और दुर्घटना जांच में सामने आए कारण सार्वजनिक करे तो वास्तविक जोखिम की तस्वीर कहीं अधिक स्पष्ट हो सकती है। फिलहाल 448 मौतों का आंकड़ा इतना जरूर बताता है कि लाखों यात्रियों को प्रतिदिन ढोने वाली उत्तर प्रदेश रोडवेज के लिए सड़क सुरक्षा को केवल चालक प्रशिक्षण तक सीमित रखने के बजाय संचालन और निगरानी की पूरी व्यवस्था के स्तर पर देखने की जरूरत है।


