TRENDING TAGS :
UP Newsअयोध्या-काशी से गांवों तक पहुंचा यूपी का पर्यटन, 234 गांवों में विकसित हो रहा ग्रामीण टूरिज्म
UP News: उत्तर प्रदेश में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 234 गांवों को पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। होमस्टे, हस्तशिल्प, स्थानीय खानपान और लोक संस्कृति से ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने की कोशिश है।
UP News (Image Credit-Social Media)
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पर्यटन की तस्वीर अब अयोध्या, काशी, मथुरा-वृंदावन और प्रयागराज जैसे बड़े धार्मिक केंद्रों तक सीमित नहीं रह गई है। सरकार गांवों के रहन-सहन, खानपान, लोक परंपराओं, खेती, हस्तशिल्प और प्राकृतिक परिवेश को भी पर्यटन से जोड़ रही है। विश्व पर्यटन दिवस के मौके पर सामने आए पर्यटन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक एग्री-रूरल और गंगा ग्राम ग्रामीण पर्यटन परियोजना के तहत प्रदेश के 234 गांवों को ग्रामीण पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की प्रक्रिया चल रही है, जिनमें 52 गांवों में विकास कार्य पूरा हो चुका है। चयनित गांवों और पर्यटन स्थलों तक पर्यटकों को पहुंचाने के लिए 1,060 संकेतक बोर्ड लगाए गए हैं और करीब 1,920 संभावित होमस्टे चिह्नित किए गए हैं। इसके पीछे उद्देश्य केवल पर्यटकों को गांव दिखाना नहीं, बल्कि पर्यटन पर होने वाले खर्च का एक हिस्सा सीधे स्थानीय परिवारों तक पहुंचाना है। घर में ठहरने की व्यवस्था, स्थानीय भोजन, हस्तशिल्प, लोककला, खेती और गांव आधारित गतिविधियों को पर्यटन उत्पाद के रूप में विकसित कर ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आय पैदा करने की कोशिश की जा रही है। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ने अपनी ग्रामीण पर्यटन नीति में भी स्थानीय समुदाय की भागीदारी, रोजगार सृजन और गांवों से पलायन कम करने को इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल किया है।
ग्रामीण पर्यटन के इस मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण आधार होमस्टे हैं। पर्यटन विभाग के मुताबिक केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के NIDHI पोर्टल पर उत्तर प्रदेश के करीब 970 होमस्टे पंजीकृत हैं, जिनमें लगभग 920 संचालित बताए गए हैं, जबकि करीब एक हजार अन्य होमस्टे विकास के विभिन्न चरणों में हैं। उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग के अपने नए पोर्टल पर भी 195 होमस्टे पंजीकृत किए जा चुके हैं। यहां आंकड़ों को समझने में एक सावधानी जरूरी है। 1,920 चिह्नित होमस्टे, NIDHI पोर्टल के 970 पंजीकृत होमस्टे और प्रदेश के पोर्टल पर दर्ज 195 होमस्टे को जोड़कर कुल संख्या निकालना सही नहीं होगा, क्योंकि इनमें एक ही इकाई के एक से अधिक सूचियों में शामिल होने की संभावना हो सकती है। इसी तरह चिह्नित होमस्टे का अर्थ यह नहीं कि वह पर्यटकों के लिए तत्काल उपलब्ध भी है। चिह्नित, पंजीकृत, विकासाधीन और संचालित होमस्टे अलग-अलग अवस्थाएं हैं। पर्यटन मंत्रालय की NIDHI व्यवस्था आवास इकाइयों के पंजीकरण और पर्यटन क्षेत्र की इकाइयों का राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने के लिए बनाई गई है।
यूपी में ग्रामीण पर्यटन को केवल ठहरने की सुविधा तक सीमित रखने के बजाय गांव के पूरे अनुभव से जोड़ने की योजना है। पर्यटक गांव में पहुंचकर स्थानीय भोजन खाए, आसपास के धार्मिक और प्राकृतिक स्थल देखे, खेत और बागवानी से परिचित हो, स्थानीय कारीगरों से मिले और गांव में तैयार उत्पाद खरीदे, इस मॉडल में आय के कई छोटे स्रोत एक साथ विकसित हो सकते हैं। इसी उद्देश्य से महिलाओं को पारंपरिक हुनर और स्थानीय खानपान से जोड़ने पर विशेष जोर दिया गया है। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह के मुताबिक अब तक करीब 2,200 महिलाओं को मूंज शिल्प, जरी-जरदोजी, चिकनकारी, चितेरी कला, बांस शिल्प, मिट्टी के बर्तन, टेराकोटा, हथकरघा और कालीन निर्माण जैसी पारंपरिक कलाओं में प्रशिक्षण दिया गया है। इसके अलावा लगभग 300 महिलाओं को स्थानीय पाक कला से जुड़े प्रशिक्षण में शामिल किया गया। इसका उद्देश्य यह है कि गांव में आने वाला पर्यटक केवल रात बिताकर वापस न लौटे, बल्कि स्थानीय भोजन, शिल्प और उत्पादों पर भी खर्च करे और पर्यटन से पैदा होने वाली आमदनी गांव के अधिक से अधिक परिवारों के बीच पहुंचे।
इस मॉडल के छोटे लेकिन दिलचस्प उदाहरण भी सामने आने लगे हैं। इटहिया की रंजीता देवी धार्मिक स्थलों पर चढ़ाए गए फूलों को बेकार जाने देने के बजाय उनसे अगरबत्ती तैयार कर रही हैं। इसी तरह जैत के संजय सिंह ने तुलसी आधारित उत्पादों को स्थानीय उद्यम से जोड़ने का प्रयास किया है। ऐसे प्रयोग ग्रामीण पर्यटन को केवल होटल या होमस्टे व्यवसाय से अलग करते हैं। किसी गांव में पर्यटक के आने से यदि एक परिवार को होमस्टे से, दूसरे को भोजन से, तीसरे को हस्तशिल्प बेचने से, किसी स्थानीय युवक को गाइड या परिवहन से और महिला स्वयं सहायता समूह को स्थानीय उत्पादों की बिक्री से आय होती है तो पर्यटन का आर्थिक प्रभाव अपेक्षाकृत व्यापक हो सकता है। उत्तर प्रदेश की एक जिला-एक उत्पाद योजना के कारण भी कई जिलों में पहले से मौजूद पारंपरिक शिल्प को पर्यटन से जोड़ने की संभावना है। बनारसी बुनकरी, लखनऊ की चिकनकारी, भदोही के कालीन, गोरखपुर का टेराकोटा, प्रयागराज और आसपास की मूंज कला तथा विभिन्न क्षेत्रों के बांस और मिट्टी के उत्पाद ग्रामीण पर्यटन के अनुभव का हिस्सा बन सकते हैं।
प्रदेश के कुछ गांवों को राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान ने इस अभियान को और बल दिया है। वाराणसी के कुरौना गांव, जिसे रामेश्वर ग्रामीण पर्यटन क्षेत्र से भी जोड़ा जाता है, को केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय की बेस्ट टूरिज्म विलेज प्रतियोगिता 2023 में सम्मानित किया गया था। इस प्रतियोगिता का उद्देश्य ऐसे गांवों की पहचान करना है जहां सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को संरक्षित रखते हुए समुदाय आधारित पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके बाद बागपत के पुरा महादेव को 2024 की बेस्ट टूरिज्म विलेज प्रतियोगिता में मान्यता मिली। पुरा महादेव अपने प्राचीन परशुरामेश्वर महादेव मंदिर और कांवड़ यात्रा के कारण पहले से धार्मिक महत्व रखता है, लेकिन ग्रामीण पर्यटन की अवधारणा के तहत मंदिर के आसपास के गांव, स्थानीय जीवन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी पर्यटन से जोड़ने की कोशिश की गई है। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने 2023 से बेस्ट टूरिज्म विलेज प्रतियोगिता शुरू की थी, जिसमें गांवों का मूल्यांकन सांस्कृतिक और प्राकृतिक संसाधनों, आर्थिक-सामाजिक स्थिरता, पर्यावरण, पर्यटन विकास, बुनियादी ढांचे और समुदाय की भागीदारी जैसे मानकों पर किया जाता है।
बहराइच के कतर्नियाघाट वन्यजीव क्षेत्र के पास स्थित कारीकोट ने ग्रामीण पर्यटन को प्रकृति और स्थानीय समुदाय से जोड़ने का एक अलग मॉडल प्रस्तुत किया है। गांव को 2025 में अंतरराष्ट्रीय स्तर की ग्रामीण पर्यटन पुरस्कार व्यवस्था में सिल्वर श्रेणी की पहचान मिलने की जानकारी सामने आई है। नेपाल सीमा और कतर्नियाघाट के निकट होने के कारण यहां जंगल, वन्यजीव, थारू संस्कृति और स्थानीय जीवन को एक साथ पर्यटन से जोड़ने की संभावना है। यही ग्रामीण पर्यटन की विशेषता भी है, हर गांव को एक ही ढांचे में विकसित करने के बजाय उसकी अपनी पहचान को पर्यटन का आधार बनाया जा सकता है। कहीं धार्मिक विरासत, कहीं हस्तशिल्प, कहीं खेती, कहीं जंगल और जैव विविधता तो कहीं नदी और स्थानीय खानपान मुख्य आकर्षण बन सकते हैं। प्रयागराज का बायोवेड एग्री फार्म भी कृषि आधारित पर्यटन के अभिनव व्यावसायिक मॉडल के रूप में पहचान बना चुका है, जहां खेती और ग्रामीण गतिविधियों को पर्यटन अनुभव के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है।
उत्तर प्रदेश के लिए ग्रामीण पर्यटन की संभावनाएं इसलिए भी बड़ी हैं क्योंकि प्रदेश पहले ही देश के सबसे अधिक पर्यटक यात्राओं वाले राज्यों में शामिल हो चुका है। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय की India Tourism Data Compendium 2025 के अनुसार वर्ष 2024 में उत्तर प्रदेश में करीब 64.9 करोड़ घरेलू पर्यटक यात्राएं दर्ज की गईं और घरेलू पर्यटन यात्राओं के मामले में प्रदेश की हिस्सेदारी देश में सबसे अधिक रही। यह संख्या किसी राज्य में आने वाले अलग-अलग व्यक्तियों की नहीं बल्कि दर्ज की गई पर्यटक यात्राओं की होती है, इसलिए इसे 64.9 करोड़ अलग पर्यटक नहीं समझना चाहिए। फिर भी इतना बड़ा पर्यटन प्रवाह ग्रामीण क्षेत्रों के लिए आर्थिक अवसर बन सकता है। यदि अयोध्या, वाराणसी, मथुरा-वृंदावन, प्रयागराज, आगरा और दूसरे प्रमुख केंद्रों पर आने वाले पर्यटकों का एक छोटा हिस्सा भी आसपास के गांवों में एक दिन या एक रात बिताता है तो पर्यटन का लाभ बड़े होटल और शहरी बाजारों से निकलकर गांवों तक पहुंच सकता है।
ग्रामीण पर्यटन के सामने चुनौती भी कम नहीं है। केवल गांव का चयन कर देना, संकेतक बोर्ड लगा देना या किसी घर को होमस्टे के लिए चिह्नित कर देना पर्यटक लाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। साफ-सफाई, सुरक्षित और स्वच्छ आवास, शौचालय, पेयजल, सड़क संपर्क, इंटरनेट, प्रशिक्षित स्थानीय गाइड, ऑनलाइन बुकिंग, भोजन की गुणवत्ता और आपात स्थिति में स्वास्थ्य सुविधा जैसे बुनियादी मानक जरूरी होंगे। होमस्टे संचालकों को आतिथ्य, स्वच्छता और डिजिटल भुगतान का प्रशिक्षण भी देना होगा। दूसरी चुनौती यह है कि ग्रामीण पर्यटन के नाम पर गांवों की मौलिकता ही समाप्त न हो जाए। जिस लोक संस्कृति, पारंपरिक भोजन और ग्रामीण जीवन को देखने पर्यटक आएं, व्यावसायीकरण के दबाव में वही कृत्रिम न बन जाए। दुनिया भर में सफल ग्रामीण पर्यटन की बुनियाद स्थानीय समुदाय के स्वामित्व और भागीदारी को माना जाता है, क्योंकि बाहरी निवेशक यदि पूरी पर्यटन अर्थव्यवस्था अपने हाथ में ले लें तो गांव पर्यटन स्थल तो बन जाता है लेकिन स्थानीय लोगों की आय अपेक्षित अनुपात में नहीं बढ़ती।
उत्तर प्रदेश में 234 गांवों को पर्यटन से जोड़ने की मौजूदा कोशिश का असली पैमाना भी अंततः यही होगा कि इससे ग्रामीण परिवारों की आमदनी कितनी बढ़ती है। 52 गांवों में विकास कार्य पूरा होना, 1,060 संकेतक लगना, करीब 1,920 संभावित होमस्टे चिह्नित होना और हजारों महिलाओं को स्थानीय हुनर से जोड़ना शुरुआती ढांचा तैयार होने का संकेत है, लेकिन अगले चरण में यह देखना अधिक महत्वपूर्ण होगा कि इन गांवों में वास्तव में कितने पर्यटक पहुंचे, कितनी रातें होमस्टे में बिताईं और स्थानीय परिवारों को कितनी अतिरिक्त आय हुई। पुरा महादेव, कुरौना और कारीकोट जैसे गांव यदि इस मॉडल को टिकाऊ ढंग से आगे बढ़ाते हैं तो उत्तर प्रदेश के पर्यटन का अगला विस्तार केवल बड़े मंदिरों और शहरों में नहीं, बल्कि उन गांवों में भी हो सकता है जहां पर्यटक को रहने के लिए घर, खाने के लिए स्थानीय रसोई और देखने के लिए उत्तर प्रदेश का वह जीवन मिलेगा जो बड़े पर्यटन केंद्रों की भीड़ में अक्सर दिखाई नहीं देता।


