UP में होने वाला है बड़ा बदलाव! अचानक दिल्ली पहुंचे योगी, मोदी से मुलाकात ने बढ़ाई सियासी हलचल

UP Election 2027: UP Election 2027 से पहले CM योगी आदित्यनाथ की PM मोदी से दिल्ली में मुलाकात ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। जानिए मुलाकात की टाइमिंग और 2024 के नतीजों के बाद BJP की रणनीति।

Snigdha Singh
Published on: 26 Sept 2026 4:40 PM IST (Updated on: 26 Sept 2026 7:59 PM IST)
UP में होने वाला है बड़ा बदलाव! अचानक दिल्ली पहुंचे योगी, मोदी से मुलाकात ने बढ़ाई सियासी हलचल
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UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही 2027 में होने हैं लेकिन सियासी तैयारियां अभी से तेज हो चुकी हैं। इसी बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात ने राजनीतिक हलकों में दिलचस्पी बढ़ा दी है। सामान्य तौर पर प्रधानमंत्री और किसी मुख्यमंत्री की मुलाकात में विकास योजनाओं से लेकर प्रशासनिक मुद्दों तक कई विषय होते हैं, इसलिए इसे अपने आप चुनावी बैठक नहीं माना जा सकता। लेकिन यूपी में चुनावी तैयारियों के मौजूदा दौर के कारण इसके राजनीतिक मायने भी तलाशे जा रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है 2027 से पहले दिल्ली और लखनऊ के बीच क्या रणनीति तैयार हो रही है?

मुलाकात का वक्त क्यों है महत्वपूर्ण?

राजनीति में मुलाकात से ज्यादा कई बार उसकी टाइमिंग चर्चा पैदा करती है।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की तैयारी में है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ करीब साढ़े नौ साल से सत्ता में हैं और 2027 तक उनकी सरकार के दो लगातार कार्यकाल पूरे हो जाएंगे। ऐसे में बीजेपी के सामने विपक्ष से मुकाबले के साथ दो कार्यकाल की एंटी-इनकंबेंसी से निपटने की चुनौती भी होगी।

इसके अलावा उम्मीदवारों के चयन और मौजूदा विधायकों के प्रदर्शन को लेकर भी चर्चा तेज है। मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि बीजेपी इस बार बड़ी संख्या में सीटों पर नए चेहरों पर विचार कर सकती है। ऐसे में मोदी-योगी की मुलाकात को 2027 की तैयारियों से जोड़कर भी देखा जाना स्वाभाविक है।

2024 का नतीजा BJP के सामने सबसे बड़ा सबक

2027 की रणनीति समझने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव को देखना जरूरी है।

उत्तर प्रदेश में बीजेपी 2019 के लोकसभा चुनाव में जीती 62 सीटों से घटकर 2024 में 33 सीटों पर आ गई थी। समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनी थी।

विधानसभा और लोकसभा चुनाव के मुद्दे तथा मतदान व्यवहार एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं है। फिर भी 2024 के नतीजों ने बीजेपी के सामने यह सवाल जरूर रखा कि 2027 में किन सामाजिक और स्थानीय समीकरणों पर ज्यादा काम करने की जरूरत होगी।

यही कारण है कि पार्टी अब विधानसभा स्तर पर संगठन और उम्मीदवार दोनों की मजबूती पर जोर देती दिखाई दे रही है।

क्या बदलेंगे बड़ी संख्या में चेहरे?

2027 से पहले बीजेपी के मौजूदा विधायकों के टिकट भी चर्चा में हैं।

हालिया मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि पार्टी बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों की जगह नए चेहरे उतारने पर विचार कर सकती है। हालांकि बीजेपी ने अभी ऐसी कोई आधिकारिक सूची जारी नहीं की है और न ही यह घोषित किया है कि कितने मौजूदा विधायकों के टिकट काटे जाएंगे।

अगर पार्टी वास्तव में बड़े पैमाने पर उम्मीदवार बदलती है तो इसके पीछे एक संभावित रणनीति स्थानीय स्तर की नाराजगी को उम्मीदवार बदलकर कम करने की हो सकती है।

ऐसे में सवाल यह भी है कि 2027 का टिकट तय करने में दिल्ली का सर्वे, लखनऊ का फीडबैक और स्थानीय संगठन की रिपोर्ट इन तीनों में किसे कितना महत्व मिलेगा?

मोदी का चेहरा और योगी का यूपी मॉडल

बीजेपी की उत्तर प्रदेश की चुनावी रणनीति में नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ दो सबसे प्रमुख चेहरे हैं।

मोदी के नाम पर केंद्र सरकार की योजनाएं, राष्ट्रीय राजनीति और बीजेपी का व्यापक संगठनात्मक आधार है, जबकि योगी के नेतृत्व में पार्टी कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचा, निवेश और हिंदुत्व से जुड़े अपने राजनीतिक संदेश को आगे रखती रही है।

एक दिन पहले ग्रेटर नोएडा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी उत्तर प्रदेश में हुए बदलाव का श्रेय “मोदी-योगी” की डबल इंजन सरकार को दिया। उन्होंने कानून-व्यवस्था, निवेश और डिफेंस कॉरिडोर जैसे विषयों को सरकार की उपलब्धियों के तौर पर पेश किया।

इसलिए 2027 में बीजेपी का प्रचार केवल किसी एक चेहरे के बजाय केंद्र और राज्य सरकार के कामों को जोड़कर आगे बढ़े, इसकी राजनीतिक जमीन पहले से दिखाई देती है।

जातीय समीकरण की परीक्षा भी आसान नहीं

उत्तर प्रदेश में केवल सरकार के काम या चेहरे से चुनावी गणित पूरा नहीं होता। जातीय और सामाजिक समीकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

समाजवादी पार्टी PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की रणनीति पर लगातार जोर दे रही है। दूसरी तरफ बीजेपी के लिए अपने गैर-यादव OBC, गैर-जाटव दलित और सवर्ण समर्थक समूहों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। यही संतुलन टिकट वितरण में भी दिखाई दे सकता है।

अगर बड़ी संख्या में उम्मीदवार बदले जाते हैं तो पार्टी के सामने केवल यह सवाल नहीं होगा कि किस विधायक का प्रदर्शन कमजोर है। यह भी देखना होगा कि उसकी जगह आने वाला उम्मीदवार उस विधानसभा सीट के सामाजिक समीकरण में कितना फिट बैठता है।

संगठन और सरकार के बीच तालमेल भी बड़ा फैक्टर

2027 की लड़ाई में एक और महत्वपूर्ण पहलू संगठन और सरकार के बीच तालमेल है।

उत्तर प्रदेश बीजेपी पहले ही अपने नेताओं को जाति आधारित अलग-अलग बैठकों को लेकर आगाह कर चुकी है। दिसंबर 2025 में प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने पार्टी विधायकों और विधान परिषद सदस्यों की जाति आधारित बैठकों को पार्टी की व्यवस्था और मूल्यों के खिलाफ बताया था। इसे चुनाव से पहले संगठन के भीतर जातीय खेमेबंदी रोकने की कोशिश के रूप में देखा गया।

इसलिए चुनाव नजदीक आने के साथ टिकट वितरण से लेकर सामाजिक समीकरण तक दिल्ली और लखनऊ के बीच समन्वय महत्वपूर्ण होगा।

दिल्ली की बैठक से क्या-क्या निकल सकता है?

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की मुलाकात में वास्तव में किन विषयों पर चर्चा हुई, इसका आधिकारिक विवरण सामने आए बिना किसी खास चुनावी फैसले का दावा करना जल्दबाजी होगी।

फिर भी राजनीतिक संदर्भ में तीन मुद्दों पर नजर रहेगी 2027 के लिए संगठन की तैयारी, उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया और केंद्र-राज्य सरकार की उपलब्धियों को लेकर तैयार होने वाला चुनावी नैरेटिव।

योगी और मोदी की मुलाकातें असामान्य नहीं हैं। इसी साल 8 अगस्त को भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की थी। (PM India⁠) इससे साफ है कि हर मुलाकात को अपने आप किसी बड़े राजनीतिक फैसले का संकेत मानना उचित नहीं होगा।

लेकिन इस बार राजनीतिक दिलचस्पी की वजह उत्तर प्रदेश का चुनावी कैलेंडर है।

असली कहानी अभी टिकटों में दिखाई देगी

मोदी-योगी की मुलाकात का असली राजनीतिक अर्थ आने वाले महीनों में बीजेपी के फैसलों से ज्यादा स्पष्ट होगा।

अगर पार्टी बड़ी संख्या में विधायकों के टिकट बदलती है, सामाजिक समीकरण के हिसाब से नए चेहरों को आगे करती है और संगठन में भी बदलाव करती है तो यह संकेत होगा कि बीजेपी 2027 में दो कार्यकाल की एंटी-इनकंबेंसी से निपटने के लिए बड़े बदलाव की रणनीति अपना रही है।

फिलहाल दिल्ली की एक मुलाकात से कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना जरूर है कि 2027 की लड़ाई अब केवल लखनऊ में नहीं लड़ी जा रही उसकी रणनीति में दिल्ली की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण रहने वाली है।

Snigdha Singh
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