Congress History: यूपी में कांग्रेस की पूरी राजनीतिक यात्रा, 388 विधायकों से 2 तक, 2024 में वापसी

UP Congress History: उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के उत्थान, पतन और वापसी की पूरी राजनीतिक यात्रा। 1952 के 388 विधायकों से 2022 के 2 विधायक और 2024 में सपा गठबंधन के साथ 6 लोकसभा सीटों तक का इतिहास जानिए।

Yogesh Mishra
Published on: 12 Aug 2026 6:16 PM IST
Congress History Wikipedia
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उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की यात्रा किसी सामान्य राजनीतिक दल के उत्थान और पतन की कथा नहीं है। यह उस पार्टी की कहानी है जिसने संयुक्त प्रांत में स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया, जवाहरलाल नेहरू, गोविंद बल्लभ पंत, रफी अहमद किदवई, पुरुषोत्तम दास टंडन, लालबहादुर शास्त्री, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, चंद्रभानु गुप्त और विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे राष्ट्रीय नेता दिए। आजादी के बाद लगभग चार दशकों तक उत्तर प्रदेश की शासन-व्यवस्था पर प्रभुत्व रखा। ब्राह्मण, दलित, मुसलमान, भूमिहीन, किसान और शहरी मध्यवर्ग का ऐसा विशाल सामाजिक गठबंधन बनाया जिसे लंबे समय तक ‘कांग्रेस प्रणाली’ कहा गया। और फिर 1989 के बाद मात्र तीन दशकों में सत्ता से हटते-हटते 2022 में दो विधायकों और 2.33 प्रतिशत मतों तक सिमट गई। यही पार्टी 2024 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके छह लोकसभा सीटें जीतने और लगभग 9.5 प्रतिशत राज्यव्यापी मत प्राप्त करने में सफल हुई, जिससे उसके पूर्ण राजनीतिक अंत की भविष्यवाणियाँ फिलहाल गलत सिद्ध हुईं।

कांग्रेस का पतन किसी एक चुनाव, एक नेता या एक घटना से नहीं हुआ। उसके सामाजिक आधार की चार प्रमुख दीवारें अलग-अलग दिशाओं में ढहीं। सवर्ण और शहरी हिंदू मतदाता पहले जनसंघ और बाद में भाजपा की ओर गया; दलित मतदाता कांशीराम और मायावती की बसपा के साथ स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति बना। पिछड़ी जातियों का बड़ा भाग चरण सिंह, जनता दल और फिर मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी की ओर चला गया। मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद विवाद और भाजपा के उदय के बीच कांग्रेस को कमजोर रक्षक मानकर सपा तथा बसपा जैसे अधिक प्रभावी क्षेत्रीय विकल्प चुने। इसके साथ संगठन का क्षय, केंद्रीय नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भरता, मुख्यमंत्री बदलने की संस्कृति, गुटबाजी, 1967 से बार-बार हुई टूट, 1980 के दशक के अंत में प्रभावशाली नेताओं का पलायन, अयोध्या प्रश्न पर अस्पष्टता और 1990 के बाद मजबूत प्रदेश नेतृत्व न तैयार कर पाना उसके हाशिये पर जाने के प्रमुख कारण बने।

अगस्त 2026 की स्थिति में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस के छह लोकसभा सदस्य हैं—राहुल गांधी, किशोरी लाल शर्मा, इमरान मसूद, राकेश राठौर, तनुज पुनिया और उज्ज्वल रमण सिंह। उत्तर प्रदेश विधानसभा में उसके दो विधायक—आराधना मिश्रा ‘मोना’ और वीरेंद्र चौधरी—हैं। उत्तर प्रदेश से कांग्रेस का कोई वर्तमान राज्यसभा सदस्य नहीं है और विधान परिषद में भी उसका प्रतिनिधित्व समाप्त हो चुका है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय हैं और 2027 के चुनाव से पहले कांग्रेस के सांसदों तथा केंद्रीय नेतृत्व के भीतर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन शीघ्र तय करने की माँग उभरी है।

कांग्रेस उत्तर प्रदेश में कब और कैसे बनी?

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना दिसंबर 1885 में हुई थी। लेकिन उत्तर प्रदेश में उसकी संगठनात्मक जड़ें तत्कालीन संयुक्त प्रांत—यूनाइटेड प्रोविंसेज ऑफ आगरा एंड अवध—के नगरों, विश्वविद्यालयों, वकीलों, शिक्षकों, जमींदार-विरोधी किसान आंदोलनों और नवजागरण संस्थाओं में फैलीं। इलाहाबाद, लखनऊ, बनारस, कानपुर और बाद में फैजाबाद, प्रतापगढ़, रायबरेली, गोरखपुर तथा बरेली कांग्रेस गतिविधियों के महत्वपूर्ण केंद्र बने। इलाहाबाद के आनंद भवन और नेहरू परिवार ने कांग्रेस को राष्ट्रीय नेतृत्व दिया।लेकिन प्रदेश संगठन केवल नेहरू परिवार तक सीमित नहीं था। मदन मोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, पुरुषोत्तम दास टंडन, गोविंद बल्लभ पंत, रफी अहमद किदवई, आचार्य नरेंद्र देव, लालबहादुर शास्त्री और अनेक जिला स्तरीय नेता संयुक्त प्रांत की राजनीति में सक्रिय थे।


1920 के असहयोग आंदोलन और गांधी के जन-आंदोलनकारी तरीके ने कांग्रेस को शिक्षित अभिजात वर्ग की संस्था से गाँवों तक पहुँचने वाला संगठन बनाया। अवध किसान आंदोलन, बाबा रामचंद्र की गतिविधियाँ, प्रतापगढ़–रायबरेली के किसान संघर्ष, विदेशी वस्त्र बहिष्कार, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन ने कांग्रेस को ग्रामीण समाज में प्रवेश दिया। जवाहरलाल नेहरू ने किसान आंदोलनों से संपर्क बनाकर कांग्रेस की आधुनिक, समाजवादी और औपनिवेशिक-विरोधी छवि मजबूत की। जबकि पंत, टंडन और किदवई ने प्रांतीय संगठन, हिंदी क्षेत्र के नेतृत्व और प्रशासनिक विकल्प के रूप में पार्टी को विकसित किया।

1937 में भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत हुए प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस ने संयुक्त प्रांत में बहुमत प्राप्त किया और गोविंद बल्लभ पंत प्रीमियर बने। 1939 में ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीयों की सहमति के बिना भारत को द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल किए जाने के विरोध में कांग्रेस मंत्रालयों ने इस्तीफा दे दिया। 1946 के चुनाव में कांग्रेस फिर बहुमत में आई। पंत दोबारा प्रीमियर बने। स्वतंत्रता के बाद संयुक्त प्रांत का नाम उत्तर प्रदेश हुआ और पंत उसके प्रथम मुख्यमंत्री बने।

कांग्रेस का सामाजिक गठबंधन कैसे बना?

स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस किसी एक जाति, वर्ग या धार्मिक समूह की पार्टी नहीं थी। उसका वास्तविक बल एक विशाल सामाजिक गठबंधन था। प्रदेश संगठन और मुख्यमंत्री पद पर ब्राह्मण, कायस्थ और दूसरे उच्च जाति नेताओं का प्रभाव था। दलित समुदाय को आरक्षित सीटों, जगजीवन राम जैसे राष्ट्रीय नेतृत्व और कांग्रेस की कल्याणकारी भाषा के माध्यम से प्रतिनिधित्व मिलता था। मुस्लिम समाज विभाजन और सांप्रदायिक हिंसा के बाद कांग्रेस को सुरक्षा और धर्मनिरपेक्षता की सबसे विश्वसनीय शक्ति मानता था।

किसान वर्ग को जमींदारी उन्मूलन, सिंचाई, सहकारिता तथा ग्रामीण विकास से जोड़ा गया। और स्वतंत्रता आंदोलन की वैधता ने पार्टी को लगभग प्रत्येक जिले में कार्यकर्ता और प्रभावशाली स्थानीय नेता दिए।

इस गठबंधन को कभी-कभी ब्राह्मण–दलित–मुस्लिम सामाजिक समीकरण के रूप में संक्षेपित किया जाता है। लेकिन आरंभिक कांग्रेस इससे भी अधिक व्यापक थी। उसमें ठाकुर, कायस्थ, बनिया, कुर्मी, यादव, जाट, लोध, भूमिहार और अन्य समूहों के नेता भी थे। कांग्रेस के भीतर ही विभिन्न जातियों, क्षेत्रों और विचारधाराओं के गुट प्रतिस्पर्धा करते थे। यह आंतरिक विविधता उसकी शक्ति भी थी और भविष्य की कमजोरी भी। जब तक पार्टी चुनाव जिताती और सत्ता बाँटती रही, मतभेद उसी के भीतर समाहित रहे। जब उसकी चुनावी क्षमता घटी, यही नेता अलग दलों और सामाजिक गठबंधनों की ओर जाने लगे।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन

नीचे कांग्रेस की चुनाव-दर-चुनाव यात्रा दी जा रही है। 1969 के बाद अलग-अलग कांग्रेस गुटों के कारण तालिका में उस समय इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली मुख्य धारा—कांग्रेस या कांग्रेस (आर), बाद में कांग्रेस (आई)—को निरंतर राजनीतिक धारा माना गया है।


वर्ष विधानसभा सीट जीती वोट प्रतिशत राजनीतिक स्थिति

1952 388 47.93% प्रचंड बहुमत

1957 286 42.42% स्पष्ट बहुमत

1962 249 36.33% स्पष्ट बहुमत

1967 199 32.20% सबसे बड़ा दल, बहुमत से पीछे

1969 211 33.7% सरकार बनी, अस्थिरता जारी

1974 215 32.2% बहुमत, बहुगुणा सरकार

1977 47 31.94% आपातकाल के बाद, ऐतिहासिक हार

1980 309 37.7% इंदिरा लहर में पासी व

1985 269 39.3% अंतिम स्पष्ट बहुमत

1989 94 27.9% सत्ता से बाहर

1991 46 17.3% भाजपा के उदय में गिरावट

1993 28 15.1% सपा बसपा युग में संकुचन

1996 33 8.4% बसपा गठबंधन से सीटें बची

2002 25 9.0% चौथे स्थान की शक्ति

2007 22 8.61% सीमित उपस्थिति

2012 28 11.65% राहुल अभियान के बाद सीमित लाभ

2017 7 6.25% सपा गठबंधन के बाद भारी पराजय

2022 2 2.33% न्यूनतम प्रदर्शन

प्रारंभिक चार चुनावों के आँकड़े निर्वाचन आयोग पर आधारित चुनावी अभिलेखों में क्रमशः 388 सीटें और 47.93 प्रतिशत, 286 और 42.42 प्रतिशत, 249 और 36.33 प्रतिशत तथा 199 और 32.20 प्रतिशत दर्ज हैं। 2017 में कांग्रेस ने सपा गठबंधन के अंतर्गत 114 सीटों पर चुनाव लड़ा, 54,16,540 मत—6.25 प्रतिशत—प्राप्त किए और केवल सात सीटें जीतीं।

1952: 388 विधायक और कांग्रेस का सर्वोच्च शिखर

1952 का पहला विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश कांग्रेस के इतिहास का सर्वोच्च प्रदर्शन था। 430 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस ने 388 सीटें और 47.93 प्रतिशत मत प्राप्त किए। गोविंद बल्लभ पंत मुख्यमंत्री बने रहे। पार्टी के पास लगभग नौ-दसवाँ सदन था। जबकि सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, कम्युनिस्ट और स्वतंत्र उम्मीदवार बिखरे हुए विपक्ष में थे। केवल आधे से कम मत प्राप्त करके इतनी बड़ी संख्या में सीटें मिलना प्रथम-पास-द-पोस्ट चुनाव प्रणाली और विपक्ष के विभाजन का परिणाम भी था।


पंत के शासनकाल की प्रमुख उपलब्धियों में जमींदारी उन्मूलन, प्रशासनिक पुनर्गठन, हिंदी को सरकारी भाषा के रूप में बढ़ावा, शिक्षा और सिंचाई का विस्तार तथा स्वतंत्रता आंदोलन से शासन-व्यवस्था की ओर संक्रमण शामिल था। जमींदारी उन्मूलन ने पुराने भू-स्वामित्व ढाँचे पर प्रहार किया।लेकिन भूमि सुधारों का लाभ हर जगह भूमिहीन और सबसे गरीब किसान तक समान रूप से नहीं पहुँचा। मध्य जातियों के संपन्न किसानों और ग्रामीण प्रभुत्वशाली समूहों का उदय बाद में चरण सिंह की किसान राजनीति के लिए आधार बना।

पंत के बाद नेतृत्व संघर्ष—सम्पूर्णानंद बनाम चंद्रभानु गुप्त

गोविंद बल्लभ पंत के केंद्र में गृहमंत्री बनने के बाद सम्पूर्णानंद मुख्यमंत्री बने। वे विद्वान, संस्कृतनिष्ठ और वैचारिक नेता थे। लेकिन प्रदेश कांग्रेस के भीतर चंद्रभानु गुप्त, कमलापति त्रिपाठी और दूसरे नेताओं के गुट मजबूत हो रहे थे। 1957 में कांग्रेस ने 286 सीटें जीतीं और मत 42.42 प्रतिशत रहा। यह बहुमत सुरक्षित था, पर 1952 की तुलना में 102 सीटें कम हो गईं। विपक्ष में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ मजबूत हुए।

सम्पूर्णानंद और चंद्रभानु गुप्त के संघर्ष ने कांग्रेस की उस आंतरिक संस्कृति को सामने रखा जिसमें मुख्यमंत्री की स्थिरता केवल विधानसभा बहुमत पर नहीं।बल्कि केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश गुटों के समीकरण पर निर्भर रहती थी। 1960 में सम्पूर्णानंद को हटाकर चंद्रभानु गुप्त मुख्यमंत्री बनाए गए। आधिकारिक विधानमंडलीय अभिलेख सम्पूर्णानंद और गुप्त के अलग-अलग कार्यकाल दर्ज करते हैं।

1962 में कांग्रेस ने 249 सीटें और 36.33 प्रतिशत मत प्राप्त किए। बहुमत बना रहा। लेकिन जनसंघ 49 सीटों और 16.46 प्रतिशत मत तक पहुँच गया। कांग्रेस के मत और सीट दोनों लगातार तीसरी बार घटे। स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति अभी प्रभावी थी, पर शहरी हिंदू मध्यवर्ग, व्यापारी समुदाय और वैचारिक दक्षिणपंथ का एक हिस्सा जनसंघ के साथ संगठित होने लगा था।

1967: कांग्रेस के एक-दलीय प्रभुत्व का अंत

1967 का चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ था। कांग्रेस 199 सीटों और 32.20 प्रतिशत मत के साथ सबसे बड़ा दल तो बनी। पर 425 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए आवश्यक 213 सीटों से पीछे रह गई। जनसंघ ने 98 सीटें जीतीं और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट, स्वतंत्र पार्टी तथा दूसरे विपक्षी समूहों ने मिलकर कांग्रेस को चुनौती दी।


चौधरी चरण सिंह, जो लंबे समय तक कांग्रेस के भीतर किसान और मध्यवर्ती कृषक जातियों का प्रभावशाली चेहरा थे, कांग्रेस से अलग हुए। कांग्रेस के लगभग 21 विधायकों और विभिन्न विपक्षी दलों को मिलाकर संयुक्त विधायक दल सरकार बनाई गई तथा चरण सिंह मुख्यमंत्री बने। इस घटनाक्रम ने कांग्रेस को दोहरा नुकसान पहुँचाया। पहला, उसकी सरकार गई।दूसरा, ग्रामीण किसान और मध्य जातियों के लिए कांग्रेस के बाहर एक स्वतंत्र राजनीतिक धुरी तैयार हुई। 1967 की टूट केवल विधायकों का दलबदल नहीं थी—यही आगे भारतीय क्रांति दल, भारतीय लोकदल, जनता पार्टी, लोकदल और अंततः उत्तर भारत की अनेक किसान-पिछड़ा पार्टियों की सामाजिक धारा बनी।

कांग्रेस ने बाद में सत्ता वापस प्राप्त की और 1969 के मध्यावधि चुनाव में 211 सीटें जीतीं।लेकिन पुराना अजेय प्रभुत्व वापस नहीं आया। चंद्रभानु गुप्त फिर मुख्यमंत्री बने, पर पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर भी विभाजन की ओर बढ़ रही थी।

1969 का राष्ट्रीय विभाजन और उत्तर प्रदेश

1969 में राष्ट्रपति चुनाव, बैंक राष्ट्रीयकरण, संगठन पर नियंत्रण और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तथा कांग्रेस के पुराने ‘सिंडिकेट’ के बीच संघर्ष ने पार्टी को दो भागों में बाँट दिया। एक ओर इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर)—रिक्विजिशनिस्ट, दूसरी ओर पुराने संगठन की कांग्रेस (ओ)—ऑर्गनाइजेशन थी। बाद में इंदिरा की धारा कांग्रेस (आई) और अंततः निर्वाचन आयोग द्वारा मुख्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में मान्य हुई।


उत्तर प्रदेश में चंद्रभानु गुप्त जैसे पुराने संगठनवादी नेता कांग्रेस (ओ) से जुड़े, जबकि कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा और युवा नेतृत्व इंदिरा गांधी की धारा में आया। इससे कांग्रेस की जिला इकाइयों, विधायकों, संसाधनों और समर्थक वर्गों में विभाजन हुआ। इंदिरा गांधी का ‘गरीबी हटाओ’, बैंक राष्ट्रीयकरण और राजाओं के प्रिवी पर्स समाप्त करने वाला कार्यक्रम गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों में लोकप्रिय हुआ।इसलिए उनकी धारा मुख्य कांग्रेस बन गई। लेकिन संगठनवादी अनुभवी नेताओं के अलग होने से प्रदेश स्तर की संस्थागत क्षमता कमजोर हुई।

कमलापति त्रिपाठी और हेमवती नंदन बहुगुणा का दौर

कमलापति त्रिपाठी पूर्वांचल के प्रभावशाली ब्राह्मण नेता, स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार और संगठनकर्ता थे। वे 1971 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनके पास बनारस और पूर्वांचल में मजबूत राजनीतिक नेटवर्क था। वे इंदिरा गांधी के विश्वस्त नेताओं में गिने जाते थे। उनका कार्यकाल प्रशासनिक चुनौतियों, छात्र आंदोलनों और प्रांतीय गुटबाजी से प्रभावित रहा।

1973 में हेमवती नंदन बहुगुणा मुख्यमंत्री बने। बहुगुणा असाधारण संगठनकर्ता, लोकप्रिय वक्ता और सामाजिक गठबंधन बनाने वाले नेता थे। वे ब्राह्मण होते हुए भी मुसलमानों, पिछड़ों, दलितों और श्रमिक वर्ग के बीच पहुँच रखते थे। 1974 के चुनाव में कांग्रेस ने लगभग 215 सीटें जीतकर बहुमत बनाए रखा। बहुगुणा के नेतृत्व ने यह दिखाया कि कांग्रेस अभी सामाजिक विस्तार और स्थानीय नेतृत्व के माध्यम से चुनाव जीत सकती थी। आधिकारिक विधानमंडलीय रिकॉर्ड उनके दो लगातार कार्यकाल—नवंबर 1973 से मार्च 1974 और मार्च 1974 से नवंबर 1975—दर्ज करता है।

लेकिन आपातकाल के दौरान संजय गांधी के बढ़ते प्रभाव और बहुगुणा की स्वतंत्र राजनीतिक शैली के बीच तनाव बढ़ा। 1975 में उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाया गया। बहुगुणा का अपमान और बाद में कांग्रेस से अलग होना उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए गंभीर क्षति था। वे 1977 में जगजीवन राम और नंदिनी सत्पथी के साथ कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी में गए, जिसने जनता पार्टी का साथ दिया। यह टूट कांग्रेस के दलित, मुस्लिम और पिछड़ा समर्थक नेतृत्व को और कमजोर करने वाली साबित हुई।

आपातकाल और 1977 की ऐतिहासिक पराजय

1975 में लगाए गए आपातकाल का उत्तर प्रदेश में व्यापक प्रभाव पड़ा। नागरिक स्वतंत्रताओं पर रोक, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, प्रेस सेंसरशिप और विशेष रूप से संजय गांधी से जुड़ी जबरन नसबंदी तथा झुग्गी हटाने की कार्रवाइयों ने ग्रामीण और शहरी गरीबों में गहरा असंतोष उत्पन्न किया। उत्तर भारत उन क्षेत्रों में था जहाँ आपातकालीन दमन और नसबंदी कार्यक्रम का राजनीतिक प्रतिघात सबसे तीखा रहा। शोध में भी आपातकालीन नीतियों से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में कांग्रेस के दीर्घकालीन राजनीतिक नुकसान और विपक्षी उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने का संबंध पाया गया है।

1977 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से कांग्रेस लगभग साफ हो गई। इसके बाद जनता सरकार ने कांग्रेस-शासित राज्यों की विधानसभाएँ भंग कराईं और जून 1977 में हुए विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी ने 352 सीटें जीतीं। कांग्रेस केवल 47 सीटों पर सिमट गई, यद्यपि उसका मत-प्रतिशत 31.94 रहा। इसका अर्थ था कि कांग्रेस का एक बड़ा मतदाता आधार अभी मौजूद था। लेकिन विपक्ष के एकजुट होने से सीटें ध्वस्त हो गईं।

1977 का चुनाव कांग्रेस की पहली पूर्ण सत्ता-पराजय था।लेकिन उसका स्थायी अंत नहीं। जनता पार्टी सरकार के भीतर जनसंघ, समाजवादी, चरण सिंह समर्थक और पुराने कांग्रेस-विरोधी गुटों के संघर्ष ने कांग्रेस की वापसी का मार्ग खोल दिया।

1980 की वापसी और संजय गांधी की भूमिका

जनता पार्टी की टूट और केंद्र में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद 1980 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस ने लगभग 309 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया। इस चुनाव में संजय गांधी ने उम्मीदवार चयन, युवा नेतृत्व और प्रचार में निर्णायक भूमिका निभाई। उत्तर प्रदेश के अनेक नए नेताओं को संजय गांधी के नेटवर्क से अवसर मिला। 1980 के गाजियाबाद अभियान की तस्वीर उस समय कांग्रेस के प्रचार में इंदिरा गांधी के चेहरे, हाथ के चुनाव चिह्न और संजय गांधी की केंद्रीय भूमिका को दिखाती है।


विश्वनाथ प्रताप सिंह मुख्यमंत्री बनाए गए। उनकी छवि ईमानदार, प्रशासनिक रूप से कठोर और अपराध-विरोधी नेता की थी। डकैत समस्या के विरुद्ध अभियान उनके शासन का प्रमुख विषय रहा। लेकिन कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद पर केंद्रीय नियंत्रण इतना मजबूत था कि स्थायी प्रदेश नेतृत्व विकसित होने के बजाय थोड़े-थोड़े अंतराल पर बदलाव होते रहे। वी.पी. सिंह के बाद श्रीपति मिश्र, फिर नारायण दत्त तिवारी मुख्यमंत्री बने।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उत्पन्न सहानुभूति लहर ने कांग्रेस को लोकसभा और फिर 1985 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड सफलता दिलाई। 1985 में कांग्रेस ने 269 सीटें और लगभग 39.3 प्रतिशत मत प्राप्त किए। यह उत्तर प्रदेश में उसका अंतिम स्पष्ट बहुमत था। इसके बाद वह आज तक अपने बल पर राज्य सरकार नहीं बना सकी।

वीरबहादुर सिंह और नारायण दत्त तिवारी—कांग्रेस शासन का अंतिम चरण

1985 के बाद वीरबहादुर सिंह मुख्यमंत्री बने। वे पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र के प्रभावशाली नेता और विकासवादी प्रशासक माने जाते थे। उनके कार्यकाल में बुनियादी ढाँचे, शहरी विकास और प्रशासनिक विस्तार पर जोर रहा। लेकिन पार्टी के भीतर गुटबाजी और केंद्रीय नेतृत्व की दखल बनी रही। 1988 में उन्हें हटाकर नारायण दत्त तिवारी को फिर मुख्यमंत्री बनाया गया।

एन.डी. तिवारी कांग्रेस के सबसे अनुभवी प्रशासकों में थे। वे अनेक बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और बाद में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने। उनकी ताकत प्रशासन, उद्योग, नौकरशाही और ब्राह्मण नेतृत्व में थी। लेकिन 1988–89 तक उत्तर प्रदेश की सामाजिक राजनीति इतनी बदल चुकी थी कि प्रशासनिक अनुभव अकेले कांग्रेस को नहीं बचा सका।

बोफोर्स विवाद, राजीव गांधी सरकार की विश्वसनीयता में गिरावट, वी.पी. सिंह का भ्रष्टाचार-विरोधी अभियान, किसान राजनीति, पिछड़ा वर्ग की बढ़ती चेतना और अयोध्या आंदोलन ने कांग्रेस के पुराने गठबंधन को एक साथ झकझोर दिया। 1989 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 94 सीटों और लगभग 27.9 प्रतिशत मत पर आ गई। मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में जनता दल की सरकार बनी। यही चुनाव उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के दीर्घकालीन पतन की वास्तविक शुरुआत माना जाना चाहिए।

लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश कांग्रेस का प्रदर्शन

उत्तर प्रदेश से लोकसभा में कांग्रेस की यात्रा विधानसभा जैसी ही है—पहले तीन दशकों में लगभग पूर्ण प्रभुत्व, 1977 में सफाया, 1980–84 में वापसी, 1989 के बाद लगातार गिरावट, 2009 में अस्थायी पुनरुद्धार और 2024 में गठबंधन आधारित वापसी।


लोकसभा चुनाव उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सीटें उत्तर प्रदेश में अनुमानित/आधिकारिक मत-प्रतिशत प्रमुख संदर्भ

1951–52 लगभग 81 लगभग 50% से अधिक नेहरू युग का प्रभुत्व

1957 लगभग 70 लगभग 47% स्पष्ट वर्चस्व

1962 लगभग 62 लगभग 43% गिरावट के बावजूद बहुमत

1967 लगभग 47 लगभग 34% जनसंघ–समाजवादी उभार

1971 लगभग 73 लगभग 49% इंदिरा की ‘गरीबी हटाओ’ लहर

1977 0 लगभग 25–26% आपातकाल का प्रतिघात

1980 लगभग 51 लगभग 36% इंदिरा की वापसी

1984 83 लगभग 51% सहानुभूति लहर; लगभग पूर्ण विजय

1989 15 लगभग 31–32% जनता दल और भाजपा का उभार

1991 5 लगभग 18% राम मंदिर लहर

1996 5 लगभग 8% बसपा गठबंधन का दौर

1998 0 लगभग 6% अब तक की बड़ी संसदीय गिरावट

1999 10 लगभग 14–15% सोनिया गांधी और अमेठी–रायबरेली प्रभाव

2004 9 लगभग 12% यूपीए गठन से पूर्व सीमित वापसी

2009 21 18.25% के आसपास राहुल गांधी अभियान का शिखर

2014 2 7.53% के आसपास केवल अमेठी और रायबरेली

2019 1 6.36% के आसपास केवल रायबरेली

2024 6 लगभग 9.46% सपा–कांग्रेस गठबंधन

प्रारंभिक चुनावों में निर्वाचन क्षेत्रों और सीटों की संख्या आज से अलग थी तथा उत्तराखंड 2000 तक उत्तर प्रदेश का हिस्सा था। इसलिए 1952 से 1999 तक के आँकड़ों की तुलना करते समय वर्तमान 80-सीट वाले उत्तर प्रदेश से सीधी तुलना सावधानी से की जानी चाहिए। निर्वाचन आयोग अपने सांख्यिकीय पुरालेख में सभी लोकसभा और विधानसभा चुनावों की पूर्ण रिपोर्ट उपलब्ध कराता है।

1989–91: कांग्रेस का सामाजिक आधार क्यों टूटा?

1989 और 1991 के बीच तीन बड़ी राजनीतिक धाराओं ने कांग्रेस के पुराने गठबंधन को अलग-अलग हिस्सों में बाँट दिया।

पहली धारा मंडल राजनीति थी। वी.पी. सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने के बाद पिछड़ी जातियों में स्वतंत्र राजनीतिक चेतना तेजी से बढ़ी। मुलायम सिंह यादव ने मुस्लिम–यादव आधार पर समाजवादी राजनीति विकसित की। कांग्रेस पिछड़ा आरक्षण के प्रश्न पर न तो स्पष्ट अग्रणी रही और न ही उसके पास उत्तर प्रदेश में विश्वसनीय पिछड़ा नेता बचा।

दूसरी धारा राम मंदिर आंदोलन थी। भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या को हिंदू राजनीतिक एकीकरण का केंद्र बनाया। कांग्रेस ने शाहबानो प्रकरण में मुस्लिम पर्सनल लॉ के दबाव के आगे कानून बदलकर और फिर 1986 में विवादित ढाँचे के ताले खुलवाने तथा 1989 में शिलान्यास की अनुमति देने जैसे कदम उठाए। इससे उसे दोनों दिशाओं में नुकसान हुआ। भाजपा ने उसे ‘छद्म धर्मनिरपेक्ष’ कहा, जबकि मुसलमानों ने उसे बाबरी मस्जिद की प्रभावी रक्षा न करने वाली पार्टी माना।

तीसरी धारा दलित स्वायत्तता थी। कांशीराम और मायावती ने दलित मतदाता को समझाया कि कांग्रेस में दलित केवल समर्थक और आरक्षित प्रतिनिधि हैं, सत्ता का स्वतंत्र केंद्र नहीं। बसपा ने विशेषकर जाटव मत को कांग्रेस से लगभग पूरी तरह अलग कर लिया।

1991 के चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में बहुमत प्राप्त किया और कांग्रेस केवल 46 विधानसभा सीटों तक रह गई। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद 1993 में सपा–बसपा गठबंधन ने पिछड़े, मुसलमान और दलित मतों को एक साथ संगठित किया। कांग्रेस केवल 28 सीटें जीत सकी। कांग्रेस का पुराना ‘छाता गठबंधन’ अब चार अलग-अलग राजनीतिक घरों में बँट चुका था।

नारायण दत्त तिवारी की अलग कांग्रेस

1990 के दशक के मध्य में कांग्रेस के भीतर पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्व, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पार्टी की दिशा और संगठनात्मक नियंत्रण को लेकर असंतोष बढ़ा। नारायण दत्त तिवारी और अर्जुन सिंह ने 1995 में अलग होकर अखिल भारतीय इंदिरा कांग्रेस—तिवारी बनाई। उत्तर प्रदेश में तिवारी के साथ कई पुराने कांग्रेस नेता और कार्यकर्ता गए।

यह विभाजन ऐसे समय हुआ जब कांग्रेस पहले ही भाजपा, सपा और बसपा के बीच अपना सामाजिक आधार खो रही थी। तिवारी का अलग होना ब्राह्मण, कुमाऊँ–गढ़वाल और पुराने प्रशासनिक कांग्रेस नेटवर्क में पार्टी को क्षति पहुँचाने वाला था। सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति में आने और नरसिंह राव युग समाप्त होने के बाद यह संगठन 1996 में कांग्रेस में वापस मिल गया। विभाजन स्थायी नहीं रहा। लेकिन उसने कमजोर होते प्रदेश संगठन को और नुकसान पहुँचाया।

1996 में बसपा से गठबंधन

1996 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने बहुजन समाज पार्टी के साथ समझौता किया। कांग्रेस सीमित सीटों पर लड़ी और 33 सीटें जीतने में सफल हुई, जबकि उसका राज्यव्यापी मत लगभग 8.4 प्रतिशत रह गया। सीटों की संख्या 1993 की 28 से बढ़ी। लेकिन यह स्वतंत्र पुनरुत्थान नहीं था। बसपा के साथ सीट-वितरण और मत हस्तांतरण का परिणाम था।


गठबंधन का सामाजिक तर्क कांग्रेस के शेष सवर्ण–मुस्लिम आधार को बसपा के दलित मत से जोड़ना था। लेकिन दोनों दलों के संगठन, नेतृत्व और राजनीतिक उद्देश्य अलग थे। बसपा स्वयं उत्तर प्रदेश की सत्ता की दावेदार बन चुकी थी और कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के बजाय उसे सहयोगी के रूप में सीमित रखना चाहती थी। यह समझौता स्थायी गठबंधन में नहीं बदला।

1997 की बड़ी विधायक टूट—लोकतांत्रिक कांग्रेस

उत्तर प्रदेश कांग्रेस की सबसे गंभीर विधायक-स्तरीय टूट 1997 में हुई। नरेश अग्रवाल के नेतृत्व में कांग्रेस विधायकों का एक बड़ा समूह अलग हुआ और अखिल भारतीय लोकतांत्रिक कांग्रेस अथवा लोकतांत्रिक कांग्रेस बनाई। इसमें जगदंबिका पाल सहित कई प्रभावशाली विधायक शामिल थे। इस गुट ने भाजपा के नेतृत्व वाली कल्याण सिंह सरकार को समर्थन दिया और बदले में मंत्री पद प्राप्त किए।

इस विभाजन ने कांग्रेस को दो स्तरों पर नुकसान पहुँचाया। पहला, विधानसभा में उसकी संख्या और विपक्षी भूमिका कमजोर हुई। दूसरा, यह संदेश गया कि कांग्रेस के विधायक वैचारिक संघर्ष के बजाय सत्ता में भागीदारी के लिए भाजपा के साथ जा सकते हैं। दलबदल की इस राजनीति ने प्रदेश संगठन की विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुँचाया।

फरवरी 1998 में जगदंबिका पाल को अत्यंत विवादास्पद घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित किया गया। लेकिन अदालत के हस्तक्षेप के बाद उनका शासन लगभग एक दिन में समाप्त हो गया। कल्याण सिंह वापस मुख्यमंत्री बने। बाद के वर्षों में लोकतांत्रिक कांग्रेस के नेता अलग-अलग दलों में चले गए और संगठन का अस्तित्व समाप्त हो गया। कुछ नेता कांग्रेस में लौटे, कुछ बसपा, सपा या भाजपा में गए।

सोनिया गांधी, अमेठी–रायबरेली और 1999 की वापसी

सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति में आने से उत्तर प्रदेश कांग्रेस को अमेठी और रायबरेली के पारंपरिक नेहरू–गांधी क्षेत्रों में ऊर्जा मिली। 1999 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में लगभग दस सीटें जीतीं। सोनिया गांधी अमेठी से निर्वाचित हुईं और बाद में रायबरेली को अपना राजनीतिक क्षेत्र बनाया। अमेठी से राहुल गांधी 2004 में पहली बार सांसद बने।


लेकिन इस दौर में पार्टी का पुनरुत्थान कुछ संसदीय क्षेत्रों और व्यक्तिगत नेताओं तक सीमित था। लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय नेतृत्व, गांधी परिवार और स्थानीय प्रभावशाली उम्मीदवार सीटें जिता सकते थे, पर विधानसभा के लिए आवश्यक ब्लॉक, बूथ, पंचायत और जातीय नेतृत्व का संगठन कमजोर ही रहा। 2002 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस केवल 25 सीटें और लगभग नौ प्रतिशत मत प्राप्त कर सकी।

2004 और 2009—कांग्रेस के पुनरुद्धार की अधूरी संभावना

2004 में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में नौ लोकसभा सीटें जीतीं। केंद्र में यूपीए सरकार बनी और उत्तर प्रदेश के कई कांग्रेस नेता केंद्रीय मंत्री बने। सलमान खुर्शीद, श्रीप्रकाश जायसवाल, बेनी प्रसाद वर्मा, आर.पी.एन. सिंह, जितिन प्रसाद, प्रदीप जैन आदित्य और दूसरे नेताओं को राष्ट्रीय स्तर पर स्थान मिला। इससे पार्टी को लगा कि केंद्र की सत्ता के माध्यम से प्रदेश संगठन पुनर्जीवित किया जा सकता है।

2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 22 सीटें और 8.61 प्रतिशत मत ही प्राप्त कर सकी। रीता बहुगुणा जोशी को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर संगठन में सक्रियता लाने का प्रयास किया गया। राहुल गांधी ने दलित परिवारों के घर जाने, बुंदेलखंड, युवा कांग्रेस चुनाव और किसान मुद्दों के माध्यम से पार्टी को पुनर्जीवित करने की कोशिश की।

2009 का लोकसभा चुनाव इस रणनीति का सर्वोच्च बिंदु बना। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 21 लोकसभा सीटें और लगभग 18.25 प्रतिशत मत प्राप्त किए। उसने सपा, बसपा और भाजपा को कई क्षेत्रों में पीछे छोड़ दिया। अमेठी–रायबरेली के बाहर कानपुर, झाँसी, धौरहरा, कुशीनगर, महाराजगंज, प्रतापगढ़, फैजाबाद और दूसरी सीटों पर उसे सफलता मिली। इस परिणाम से ऐसा लगा कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में चौथे स्थान से निकलकर पुनः प्रमुख शक्ति बन सकती है।

लेकिन 2009 की सफलता को संगठनात्मक विस्तार में नहीं बदला गया। सांसद अपने क्षेत्रों तक सीमित रहे, प्रदेश नेतृत्व और केंद्रीय प्रभारी बदलते रहे, टिकट वितरण में गुटबाजी बनी रही और बूथ संरचना मजबूत नहीं हुई। केंद्र की यूपीए सरकार के विरुद्ध महँगाई, भ्रष्टाचार और नीतिगत जड़ता के आरोपों का प्रभाव भी पड़ा।

2012: बड़ा अभियान, सीमित परिणाम

2012 के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश में व्यापक प्रचार किया। कांग्रेस ने राष्ट्रीय लोकदल के साथ गठबंधन किया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद के जाट आधार और कांग्रेस के मुस्लिम, दलित तथा परंपरागत मतों को जोड़ने की कोशिश हुई। कांग्रेस ने 28 सीटें और 11.65 प्रतिशत मत प्राप्त किए। 2007 की 22 सीटों से मामूली बढ़त हुई। लेकिन 2009 के लोकसभा प्रदर्शन के आधार पर अपेक्षित बड़ी सफलता नहीं मिली।


इस चुनाव ने कांग्रेस की बुनियादी समस्या उजागर कर दी। लोकसभा चुनाव में मतदाता राष्ट्रीय नेतृत्व और केंद्र सरकार को देखकर कांग्रेस को वोट दे सकता था। लेकिन विधानसभा स्तर पर उसके पास सपा, बसपा और भाजपा की तरह मजबूत मुख्यमंत्री चेहरा, जातीय गठबंधन, स्थानीय संगठन और जीतने वाले उम्मीदवारों का विस्तृत नेटवर्क नहीं था। अखिलेश यादव ने युवा और आधुनिक चेहरे के साथ सपा को बहुमत दिलाया, जबकि कांग्रेस का अभियान बाहर से संचालित प्रतीत हुआ।

2014: मोदी लहर और कांग्रेस का लगभग सफाया

2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से चुनाव लड़कर उत्तर प्रदेश को भाजपा के राष्ट्रीय अभियान का केंद्र बना दिया। गैर-यादव पिछड़ों, गैर-जाटव दलितों, सवर्णों, शहरी मध्यवर्ग और हिंदुत्व समर्थकों का व्यापक गठबंधन भाजपा के साथ गया। कांग्रेस केवल अमेठी और रायबरेली की दो सीटें बचा सकी। उसका राज्यव्यापी मत लगभग 7.5 प्रतिशत रह गया।


अमेठी में राहुल गांधी और रायबरेली में सोनिया गांधी जीतीं। लेकिन पार्टी के अधिकांश पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद पराजित हुए। 2009 में जीती 21 सीटों में से 19 चली गईं। इससे प्रदेश संगठन के संसाधन, नेतृत्व और कार्यकर्ताओं का मनोबल गंभीर रूप से प्रभावित हुआ।

2017 का सपा–कांग्रेस गठबंधन

2017 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव और कांग्रेस ने गठबंधन किया। नारा दिया गया—‘यूपी को यह साथ पसंद है।’ समझौते में सपा ने 311 और कांग्रेस ने 114 सीटों पर चुनाव लड़ा। लेकिन गठबंधन देर से बना, कई सीटों पर स्थानीय विवाद रहे और कार्यकर्ताओं के बीच मत हस्तांतरण का पर्याप्त समय नहीं मिला।

कांग्रेस को 54,16,540 मत—6.25 प्रतिशत—और केवल सात सीटें मिलीं। सपा 47 सीटों पर रह गई। भाजपा ने 312 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत प्राप्त किया।

यह गठबंधन कांग्रेस के लिए विशेष रूप से नुकसानदेह माना गया क्योंकि उसे उसकी वास्तविक संगठनात्मक शक्ति से अधिक सीटें मिलीं। लेकिन अधिकांश उम्मीदवार मुकाबले में नहीं थे। इससे सपा कार्यकर्ताओं में असंतोष हुआ और कांग्रेस की चुनावी कमजोरी सार्वजनिक रूप से उजागर हुई। दूसरी ओर, अकेले लड़ने पर कांग्रेस शायद और कम सीटें जीतती। समस्या गठबंधन से अधिक उसकी सांगठनिक निष्क्रियता थी।

2019: अमेठी की हार और केवल रायबरेली

2019 के लोकसभा चुनाव में सपा, बसपा और रालोद ने महागठबंधन बनाया। कांग्रेस औपचारिक रूप से उसमें शामिल नहीं हुई। लेकिन अमेठी और रायबरेली में महागठबंधन ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ा।


राहुल गांधी अमेठी से भाजपा की स्मृति ईरानी से हार गए। सोनिया गांधी रायबरेली से जीतने वाली कांग्रेस की एकमात्र सांसद रहीं। पार्टी का मत लगभग 6.36 प्रतिशत पर आ गया। अमेठी की हार प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण थी, क्योंकि वह दशकों से नेहरू–गांधी परिवार का सबसे सुरक्षित क्षेत्र माना जाता था।

इस चुनाव ने यह प्रमाणित किया कि केवल परिवार की विरासत और केंद्रीय नेतृत्व पर आधारित सीटें भी स्थायी नहीं हैं। स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की उपलब्धता और मतदाता संपर्क की उपेक्षा पारंपरिक गढ़ को भी समाप्त कर सकती है।

प्रियंका गांधी का अभियान और 2022 की सबसे बड़ी पराजय

2019 के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा को उत्तर प्रदेश संगठन की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने सोनभद्र के उभ्भा कांड, हाथरस, लखीमपुर खीरी, महिला सुरक्षा, बेरोजगारी और किसान प्रश्नों पर आक्रामक सक्रियता दिखाई। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने ‘लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ’ अभियान चलाया और लगभग 40 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए।

अभियान ने मीडिया और राजनीतिक चर्चा में स्थान बनाया। लेकिन संगठनात्मक आधार नहीं होने के कारण वोट में नहीं बदल सका। कांग्रेस ने 399 सीटों के आसपास चुनाव लड़ा, केवल दो सीटें जीतीं और उसका मत 2.33 प्रतिशत रह गया। अनेक उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई। पार्टी केवल रामपुर खास से आराधना मिश्रा ‘मोना’ और फरेंदा से वीरेंद्र चौधरी की सीट जीत सकी।

इस पराजय ने दिखाया कि सामाजिक संदेश, महिला उम्मीदवार और उच्चस्तरीय प्रचार तभी चुनावी लाभ देते हैं जब बूथ संगठन, संसाधन, स्थानीय नेतृत्व और जीत की विश्वसनीय संभावना मौजूद हो। कई मतदाताओं ने कांग्रेस के मुद्दों से सहमति के बावजूद भाजपा को हराने के लिए समाजवादी पार्टी को अधिक सक्षम विकल्प माना।

2024: सपा गठबंधन से संसदीय वापसी

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 2017 की तुलना में अधिक व्यावहारिक गठबंधन किया। समाजवादी पार्टी ने 62 और कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा। भदोही सीट तृणमूल कांग्रेस को दी गई। इस बार सीटों का चयन कांग्रेस की वास्तविक संगठनात्मक और प्रत्याशी क्षमता को ध्यान में रखकर किया गया।


कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं:

सांसद लोकसभा क्षेत्र

राहुल गांधी रायबरेली

किशोरी लाल शर्मा अमेठी

इमरान मसूद सहारनपुर

राकेश राठौर सीतापुर

तनुज पुनिया बाराबंकी

उज्ज्वल रमण सिंह इलाहाबाद

किशोरी लाल शर्मा ने अमेठी में स्मृति ईरानी को हराकर गांधी परिवार के पुराने गढ़ को वापस लिया। राहुल गांधी ने रायबरेली से बड़ी जीत दर्ज की। इमरान मसूद ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश, तनुज पुनिया ने दलित–कुर्मी–मुस्लिम प्रभाव वाले बाराबंकी और उज्ज्वल रमण सिंह ने प्रयागराज क्षेत्र में गठबंधन की सामाजिक पहुँच बढ़ाई।

कांग्रेस का उत्तर प्रदेश में मत लगभग 9.46 प्रतिशत रहा। लेकिन उसने केवल 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था। राज्यव्यापी प्रतिशत को इस तथ्य के साथ पढ़ना चाहिए कि शेष सीटों पर कांग्रेस समर्थकों ने सपा और दूसरे इंडिया गठबंधन प्रत्याशियों को वोट दिया। 2024 की सफलता संविधान, आरक्षण, बेरोजगारी, अग्निवीर, पेपर लीक और स्थानीय असंतोष पर बने विपक्षी अभियान का परिणाम थी। चुनावोत्तर विश्लेषणों में संविधान और आरक्षण को लेकर आशंकाओं तथा जातीय प्रतिनिधित्व को भाजपा के नुकसान के प्रमुख कारणों में रखा गया।

कांग्रेस ने कब किसके साथ चुनाव लड़ा?

वर्ष/चुनाव सहयोगी या राजनीतिक व्यवस्था परिणाम


1937 प्रांतीय चुनाव स्वतंत्र कांग्रेस बहुमत; पंत प्रीमियर

1946 प्रांतीय चुनाव स्वतंत्र कांग्रेस बहुमत; पंत सरकार

1952–1962 विधानसभा मुख्यतः अकेले लगातार स्पष्ट बहुमत

1967 के बाद कोई स्थायी गठबंधन नहीं; विधायी जोड़-तोड़ पहली बार सत्ता गई

1977 अकेले; जनता गठबंधन के विरुद्ध 47 विधानसभा सीटें

1980–1985 अकेले दो बड़े बहुमत

1989–1993 मुख्यतः अकेले लगातार गिरावट

1996 विधानसभा बसपा कांग्रेस 33 सीटें

2002–2009 मुख्यतः अकेले सीमित विधानसभा, 2009 में 21 सांसद

2012 विधानसभा राष्ट्रीय लोकदल कांग्रेस 28 सीटें

2017 विधानसभा समाजवादी पार्टी कांग्रेस सात सीटें

2019 लोकसभा अकेले; अमेठी–रायबरेली पर महागठबंधन का अनौपचारिक सहयोग एक सीट

2022 विधानसभा अकेले दो सीटें

2024 लोकसभा समाजवादी पार्टी और इंडिया गठबंधन कांग्रेस छह, सपा 37

2027 की तैयारी सपा से गठबंधन पर बातचीत/आंतरिक मतभेद चुनाव होना शेष

2027 को लेकर कांग्रेस के भीतर दो मत दिखाई देते हैं। प्रदेश संगठन का एक हिस्सा चाहता है कि कांग्रेस अधिक सीटों पर लड़कर अपना स्वतंत्र आधार बनाए, जबकि उत्तर प्रदेश के कई कांग्रेस सांसद मानते हैं कि भाजपा को चुनौती देने के लिए सपा से समय रहते समझौता आवश्यक है। अगस्त 2026 में कांग्रेस सांसदों ने केंद्रीय नेतृत्व से गठबंधन शीघ्र तय करने की माँग की।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस कब-कब टूटी?

नरमपंथी–गरमपंथी विवाद

1907 का सूरत विभाजन राष्ट्रीय स्तर पर था। लेकिन संयुक्त प्रांत के कांग्रेस नेताओं पर भी उसका प्रभाव पड़ा। बाद में 1916 में दोनों धाराएँ फिर एक हुईं। यह उत्तर प्रदेश कांग्रेस की चुनावी टूट नहीं थी, पर आरंभिक वैचारिक विभाजन अवश्य था।

कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी

1934 में कांग्रेस के भीतर आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डॉ. राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी बनाई। उत्तर प्रदेश इसकी प्रमुख प्रयोगभूमि था। स्वतंत्रता के बाद सोशलिस्ट नेतृत्व कांग्रेस से अलग होकर स्वतंत्र विपक्ष बना। इससे कांग्रेस ने अपनी वैचारिक वाम–समाजवादी धारा के अनेक प्रतिभाशाली नेता खो दिए।

आचार्य कृपलानी और किसान मजदूर प्रजा पार्टी

1951 में जे.बी. कृपलानी तथा कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं ने किसान मजदूर प्रजा पार्टी बनाई। उत्तर प्रदेश के पहले विधानसभा चुनाव में उसने कांग्रेस को सीमित चुनौती दी। बाद में इसका प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में विलय हुआ।

चरण सिंह की टूट—1967

चरण सिंह और उनके समर्थक विधायक कांग्रेस से अलग होकर संयुक्त विधायक दल सरकार का आधार बने। आगे भारतीय क्रांति दल और लोकदल की राजनीति ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान और मध्य जाति मतों को कांग्रेस से दूर कर दिया। यह कांग्रेस के सामाजिक आधार को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली शुरुआती टूट थी।

कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (आर)—1969

इंदिरा गांधी और संगठन कांग्रेस के विभाजन में चंद्रभानु गुप्त जैसे प्रदेश नेता कांग्रेस (ओ) की ओर गए, जबकि कमलापति त्रिपाठी और बहुगुणा इंदिरा की धारा में रहे। मुख्य चुनावी आधार इंदिरा कांग्रेस के पास गया। लेकिन संगठन का अनुभवी हिस्सा बँट गया।

कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी—1977

हेमवती नंदन बहुगुणा, जगजीवन राम और नंदिनी सत्पथी ने आपातकाल के अंत में कांग्रेस छोड़ी और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाई। इसने जनता पार्टी के साथ चुनाव लड़ा। उत्तर प्रदेश में बहुगुणा का जाना मुस्लिम, पिछड़ा और ब्राह्मण मतों के बीच कांग्रेस की पकड़ को क्षति पहुँचाने वाला था।

कांग्रेस (यू), कांग्रेस (एस) और दूसरे गुट

1978 के बाद देवराज अर्स तथा दूसरे नेताओं की कांग्रेस (यू) और शरद पवार की कांग्रेस (एस) जैसी धाराएँ बनीं। उत्तर प्रदेश में उनका प्रभाव सीमित रहा। लेकिन मुख्य कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता विभाजित हुए।

विश्वनाथ प्रताप सिंह का जाना

वी.पी. सिंह राजीव गांधी सरकार में वित्त और रक्षा मंत्री रहे। बोफोर्स तथा भ्रष्टाचार के प्रश्न पर उन्होंने कांग्रेस छोड़ी, जनमोर्चा बनाया और जनता दल के नेता बने। उत्तर प्रदेश में उनकी ईमानदार और भ्रष्टाचार-विरोधी छवि ने 1989 में कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुँचाया। वे बाद में प्रधानमंत्री बने।

तिवारी कांग्रेस—1995

एन.डी. तिवारी और अर्जुन सिंह ने अखिल भारतीय इंदिरा कांग्रेस—तिवारी बनाई। 1996 में इसका कांग्रेस में पुनर्विलय हो गया। लेकिन कमजोर प्रदेश संगठन को और विभाजित कर गया।

लोकतांत्रिक कांग्रेस—1997

नरेश अग्रवाल के नेतृत्व में विधायकों का बड़ा समूह कांग्रेस छोड़कर लोकतांत्रिक कांग्रेस में गया और भाजपा सरकार को समर्थन दिया। यह उत्तर प्रदेश कांग्रेस की सबसे बड़ी विधायक टूटों में थी...आगे की खबर पढ़ने के लिए Next Page पर क्लिक करें

Yogesh Mishra
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Yogesh Mishra

Founder & CEO Mail ID - mishrayogesh5@gmail.commishrayogesh5@gmail.com

Journalism for Yogesh Mishra is not a profession but a mission. In his career, spanning over 26 years, he has served just not as journalist but an educationist and literary as well. Looking at journalism as an instrument of change, he has also highlighted corruption and problems faced in various sectors like education, health, water, sanitation and agriculture. The exposes to his credit which deserve mention include largest tax evasion in the country by Hasan Ali and the fraud committed by 25 Indians, while he was working for the Outlook magazine as the UP Bureau Head. The amount involved was whopping Rs 18,000 crores. He was the first to report the PMO’s involvement in the ‘2G Spectrum Scam’, during the UPA regime. Another commendable work by him is exposing the Commonwealth Games Scam along with the video footage of a meeting before the beginning of the tournament. The issue of banning the video is sub judice. His news item, “Uttar Pradesh ke sau gaon bhi Nirmal Gram Pusaraskar ke layak nahi” exposed how the state government wrongly claimed prizes for 1,269 villages. It led to the cancellation of the prizes. Even UNICEF research testified and led to discontinuation of the NIRMAL GRAM AWARDS. He is, presently Member of Fee Review committee set up by the government of Uttar Pradesh to fight menace of arbitrary fee structure in private schools across the state. Many of his suggestions concerning electoral reforms have been adopted and implemented by the Election Commission of India. He was a member of the ‘Navoday Vidyalaya Samiti’, review committee constituted by Govt. of India for the implementation of Sarv Siksha Abhiyaan in UP. Besides writing in national and international newspapers and magazines, he has taken up teaching assignments and served as a visiting faculty in about a dozen universities. Author of ten books, he has also received prestigious Madhu Limaye and Yash Bharti awards. His new goal is to set up a new media house. A beginning has been already made as he has launched a multi-lingual news portal and a weekly magazine, Apna Bharat.

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