UP News: यूपी में वोटर लिस्ट से करोड़ों नाम घटने पर विवाद, क्या 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ेगा सियासी संकट?

UP News: उत्तर प्रदेश में SIR के बाद अंतिम मतदाता सूची में करीब 2.04 करोड़ की शुद्ध कमी दर्ज हुई। 16.18 लाख फॉर्म-6 आवेदनों और 85,854 विलोपन फॉर्मों पर उठे सवालों के बीच जानिए क्या है चुनाव आयोग का पक्ष और 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की आगे की प्रक्रिया।

Newstrack Network
Published on: 18 Oct 2026 12:02 PM IST (Updated on: 18 Oct 2026 12:02 PM IST)
UP SIR Voter List Controversy
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UP SIR Voter List Controversy (Image Credit-Social Media)

UP News: देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। कर्नाटक में शनिवार को चुनाव आयोग के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लगभग 50 छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में लिया, जबकि महाराष्ट्र में राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मतदाता पंजीकरण के एक महत्वपूर्ण नियम में बदलाव के लिए केंद्रीय चुनाव आयोग को प्रस्ताव भेजा है। विवाद की जड़ में एक बुनियादी सवाल है—मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाने की प्रक्रिया में कहीं वास्तविक मतदाताओं के नाम तो नहीं हट रहे हैं? चुनाव आयोग का कहना है कि मृत, स्थानांतरित, दोहरी प्रविष्टि वाले और अन्य अपात्र मतदाताओं के नाम हटाना निष्पक्ष चुनाव के लिए आवश्यक है। दूसरी ओर विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों का आरोप है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में दस्तावेजों की जटिलता, तकनीकी त्रुटियों और प्रशासनिक फैसलों के कारण बड़ी संख्या में पात्र नागरिक मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश के लिए यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और यहाँ एसआईआर के दौरान प्रारंभिक मतदाता सूची से लगभग 2.89 करोड़ नाम बाहर होने की जानकारी सामने आई थी। हालांकि प्रारंभिक सूची से नाम हटने और अंतिम सूची से स्थायी रूप से बाहर होने में महत्वपूर्ण अंतर है। इसलिए इस विवाद को समझने के लिए राजनीतिक आरोपों के साथ निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आँकड़ों और पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया का परीक्षण आवश्यक है।

कर्नाटक में प्रदर्शनकारियों की हिरासत से विवाद और बढ़ा

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में 17 अक्टूबर को ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन और अन्य सामाजिक संगठनों से जुड़े लगभग 50 लोगों ने मतदाता सूची पुनरीक्षण के विरोध में प्रदर्शन करने का प्रयास किया। प्रदर्शनकारी मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग कर रहे थे। पुलिस ने टाउन हॉल के आसपास प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। अधिकारियों का कहना था कि कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार सार्वजनिक विरोध प्रदर्शनों के लिए निर्धारित फ्रीडम पार्क का उपयोग किया जाना चाहिए। इसके बावजूद टाउन हॉल के पास एकत्र हुए प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर चामराजपेट स्थित सिटी आर्म्ड रिजर्व परिसर ले जाया गया। बाद में उन्हें छोड़ दिया गया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस कार्रवाई को शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार पर रोक बताया, जबकि पुलिस ने इसे निर्धारित प्रदर्शन स्थल और अनुमति संबंधी नियमों का अनुपालन कराने की कार्रवाई कहा।

कर्नाटक में मतदाता सूची का विवाद केवल शनिवार की घटना तक सीमित नहीं है। सितंबर के अंतिम सप्ताह में भी कांग्रेस नेताओं ने एसआईआर के खिलाफ प्रदर्शन किए थे। राज्य के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने चुनाव आयोग पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप लगाया था। यह आरोप चुनाव आयोग के विरुद्ध राजनीतिक पक्षों द्वारा लगाया गया है; इसे प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। विवाद का महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि चुनाव आयोग की प्रशासनिक निष्पक्षता को लेकर उठ रहे सवाल अब केवल राजनीतिक दलों की बैठकों तक सीमित नहीं रह गए हैं। छात्र संगठनों और नागरिक समूहों की भागीदारी ने इसे सार्वजनिक विरोध का विषय भी बनाया है। हालांकि इन प्रदर्शनों के आधार पर पूरे देश में एक समान जनमत या व्यापक आंदोलन बनने का निष्कर्ष निकालना अभी उचित नहीं होगा। 

महाराष्ट्र में सामने आई मतदाता पंजीकरण की गंभीर प्रक्रियागत समस्या

महाराष्ट्र में मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने केंद्रीय चुनाव आयोग को फॉर्म-6 में बदलाव करने का प्रस्ताव भेजा है। यह मामला उन मतदाताओं से संबंधित है जिनके नाम पहले मतदाता सूची में दर्ज थे, लेकिन किसी कारण से हटा दिए गए। जब ऐसे मतदाता दोबारा नाम दर्ज कराने के लिए फॉर्म-6 भरते हैं, तो उनसे यह घोषणा करने की अपेक्षा की जाती है कि वे पहली बार मतदाता के रूप में पंजीकरण करा रहे हैं। समस्या यह है कि पहले से पंजीकृत रह चुका व्यक्ति स्वयं को पहली बार पंजीकरण कराने वाला कैसे घोषित करे? गलत घोषणा करने पर कानूनी कार्रवाई की आशंका भी उत्पन्न हो सकती है। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इसी विसंगति को दूर करने के लिए चुनाव आयोग से फॉर्म में संशोधन या स्पष्टीकरण देने का अनुरोध किया है। 

यह समस्या केवल महाराष्ट्र तक सीमित रहने की संभावना नहीं है, क्योंकि मतदाता पंजीकरण के निर्धारित प्रपत्र राष्ट्रीय स्तर पर उपयोग किए जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति का नाम गलती से हट जाता है, तो उसे वापस जुड़वाने की प्रक्रिया स्पष्ट, सरल और कानूनी रूप से सुरक्षित होनी चाहिए। अन्यथा मतदाता को दो कठिन विकल्पों का सामना करना पड़ सकता है—या तो वह अपने नाम की बहाली के लिए गलत घोषणा करे या फिर पंजीकरण की प्रक्रिया में उलझा रहे। महाराष्ट्र की पहल इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि यह मतदाता सूची के विवाद को राजनीतिक आरोपों से आगे बढ़ाकर चुनावी प्रशासन की एक वास्तविक प्रक्रियागत समस्या के रूप में सामने लाती है।

उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़ नामों का मामला क्या है?

उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया 27 अक्टूबर 2025 से शुरू हुई थी। जनवरी 2026 में प्रकाशित प्रारंभिक मतदाता सूची के समय लगभग 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम पहले की सूची की तुलना में बाहर होने की जानकारी सामने आई। उस समय उपलब्ध विवरण के अनुसार, लगभग 1.26 करोड़ मतदाताओं को स्थानांतरित, 46 लाख को मृत, 23.70 लाख को दोहरी प्रविष्टि वाला, 83.73 लाख को अनुपस्थित और 9.57 लाख को अन्य श्रेणियों में रखा गया था। ये आँकड़े प्रारंभिक गणना और वर्गीकरण से संबंधित थे। इन्हें अंतिम रूप से अपात्र सिद्ध हो चुके 2.89 करोड़ नागरिकों की संख्या समझना गलत होगा। किसी व्यक्ति का गणना के समय अनुपस्थित मिलना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि वह मतदान के लिए अपात्र है। इसी प्रकार स्थानांतरण की स्थिति में यह भी देखना आवश्यक है कि उसका नाम नए पते की मतदाता सूची में दर्ज हुआ है या नहीं। 

निर्वाचन आयोग ने उत्तर प्रदेश में दावे और आपत्तियाँ दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाई थी। संशोधित कार्यक्रम के अनुसार, दावे और आपत्तियाँ प्रस्तुत करने की अंतिम तारीख 6 मार्च 2026 निर्धारित हुई तथा अंतिम मतदाता सूची 10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित की जानी थी। उत्तर प्रदेश के कई जिलों की आधिकारिक वेबसाइटों पर 10 अप्रैल को प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची और एसआईआर से संबंधित अन्य दस्तावेज उपलब्ध हैं। इसका अर्थ है कि जनवरी की प्रारंभिक सूची के आधार पर ही अक्टूबर 2026 की मतदाता संख्या का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। वास्तविक स्थिति जानने के लिए जनवरी की प्रारंभिक सूची, अप्रैल की अंतिम सूची और उसके बाद हुए अद्यतनों की अलग-अलग तुलना आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश में वास्तव में कितने मतदाता घटे और कितने बढ़े?

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा द्वारा 10 अप्रैल 2026 को जारी अंतिम मतदाता सूची के आँकड़े इस विवाद को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आधार हैं। एसआईआर शुरू होने से पहले प्रदेश में कुल 15,44,30,092 पंजीकृत मतदाता थे। 6 जनवरी 2026 को प्रकाशित प्रारंभिक सूची में यह संख्या घटकर 12,55,56,025 रह गई थी। इसके बाद दावे, आपत्तियाँ, सत्यापन और सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होने पर 10 अप्रैल को प्रकाशित अंतिम सूची में 13,39,84,792 मतदाता दर्ज किए गए। इस प्रकार प्रारंभिक सूची की तुलना में अंतिम सूची में 84,28,767 मतदाताओं की शुद्ध बढ़ोतरी हुई, लेकिन एसआईआर शुरू होने से पहले की सूची के मुकाबले अंतिम मतदाता संख्या फिर भी लगभग 2.04 करोड़ कम रही। यह लगभग 13.24 प्रतिशत की शुद्ध कमी है। 

यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। लगभग 2.04 करोड़ की संख्या पुरानी और अंतिम मतदाता सूचियों के बीच शुद्ध अंतर है। यह जरूरी नहीं कि इतने ही व्यक्तियों के नाम अलग-अलग विलोपन आदेशों के जरिए हटाए गए हों, क्योंकि पुनरीक्षण के दौरान नए नाम भी जोड़े गए थे। जनवरी की प्रारंभिक सूची और अप्रैल की अंतिम सूची के बीच लगभग 8.15 लाख अतिरिक्त नाम हटाए जाने तथा लगभग 92.44 लाख नाम जोड़े जाने की रिपोर्ट सामने आई है। दोनों को समायोजित करने पर लगभग 84.29 लाख की शुद्ध बढ़ोतरी बनती है। इसलिए कुल मतदाता संख्या में परिवर्तन, नाम जोड़ने के आवेदन, स्वीकृत आवेदन और नाम हटाने के आदेशों को अलग-अलग दर्ज करना जरूरी है।

दावे और आपत्तियों की अवधि के दौरान 6 जनवरी से 6 मार्च 2026 तक नाम शामिल कराने के लिए लगभग 70.69 लाख फॉर्म-6 आवेदन और नाम हटाने की माँग से संबंधित लगभग 2.68 लाख फॉर्म-7 आवेदन प्राप्त हुए थे। अक्टूबर 2025 से 6 मार्च 2026 तक फॉर्म-6 आवेदनों की कुल संख्या लगभग 86.69 लाख बताई गई थी। इसी अवधि में 3.26 करोड़ मतदाताओं के विवरण में सत्यापन की आवश्यकता सामने आई थी। इनमें लगभग 1.04 करोड़ ऐसे मतदाता थे जिनकी पुरानी सूची से मैपिंग नहीं हो पाई थी और लगभग 2.22 करोड़ मामलों में तार्किक विसंगतियाँ पाई गई थीं। निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार, इन मामलों में नोटिस और सुनवाई की प्रक्रिया अपनाई गई।

16.18 लाख मतदाताओं को लेकर नया विवाद क्या है?

अक्टूबर 2026 में उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची को लेकर एक और विवाद सामने आया। खोजी पत्रकारिता संस्थान द रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने अपनी पड़ताल में दावा किया कि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध फॉर्म-6 आवेदनों और अंतिम मतदाता सूची में जोड़े गए नामों के बीच अंतर है। संस्थान के अनुसार, उसे लगभग 71.38 लाख आवेदनों का विवरण मिला, जबकि अंतिम सूची में प्रारंभिक सूची के मुकाबले लगभग 84.3 लाख की शुद्ध बढ़ोतरी दर्ज हुई थी। रिपोर्ट ने सवाल उठाया कि अतिरिक्त मतदाताओं के आवेदन और उनकी प्रक्रिया का पूरा सार्वजनिक विवरण कहाँ उपलब्ध है। रिपोर्ट में विशेष रूप से 16.18 लाख फॉर्म-6 आवेदनों का उल्लेख किया गया, जो प्रारंभिक सूची प्रकाशित होने से पहले गणना अवधि में प्राप्त हुए थे।

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 7 अक्टूबर को इस रिपोर्ट के निष्कर्षों का खंडन किया। उनके अनुसार, 16.18 लाख की संख्या उन फॉर्म-6 आवेदनों की थी जो 6 जनवरी को प्रारंभिक सूची प्रकाशित होने से पहले बूथ लेवल अधिकारियों ने घर-घर गणना के दौरान एकत्र किए थे। आयोग का कहना है कि आवेदन प्राप्त होने का अर्थ नाम स्वतः मतदाता सूची में शामिल हो जाना नहीं है। प्रत्येक आवेदन की जाँच और निर्धारित प्रक्रिया के बाद ही निर्णय लिया जाता है। निर्वाचन अधिकारी ने यह भी कहा कि प्रारंभिक सूची के प्रकाशन के बाद प्राप्त आवेदनों का विवरण निर्धारित प्रपत्रों में सार्वजनिक किया गया था और पुनरीक्षण की प्रक्रिया कानून के अनुरूप संचालित हुई थी।

इस मामले में स्वतंत्र जाँच का मुख्य प्रश्न केवल यह नहीं है कि 16.18 लाख आवेदन मिले थे या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि कितने आवेदन स्वीकृत हुए, कितने अस्वीकृत हुए, कितने लंबित रहे और उनके आधार पर कितने नाम अंतिम सूची में शामिल किए गए। इसके लिए विधानसभा क्षेत्रवार तथा बूथवार आवेदन और निस्तारण का मिलान आवश्यक है। फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों और निर्वाचन अधिकारी के स्पष्टीकरण के आधार पर इन नामों को फर्जी या अवैध घोषित करना उचित नहीं होगा।

85,854 नाम हटाने वाले फॉर्मों पर भी सवाल

9 अक्टूबर 2026 को द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक अन्य पड़ताल में आरोप लगाया गया कि उत्तर प्रदेश में 85,854 ऐसे फॉर्म तैयार किए गए जिनके माध्यम से मतदाताओं के नाम हटाने की कार्रवाई प्रस्तावित थी, लेकिन उनमें नाम हटाने का स्पष्ट कारण दर्ज नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार, ये फॉर्म निर्वाचन आयोग के सॉफ्टवेयर से स्वतः तैयार हुए और निर्वाचन अधिकारियों द्वारा अनुमोदित किए गए। यदि किसी मतदाता का नाम हटाने की प्रक्रिया में आवश्यक कारण दर्ज नहीं किया गया या संबंधित व्यक्ति को उचित सूचना और सुनवाई का अवसर नहीं मिला, तो यह मतदाता पंजीकरण के कानूनी प्रावधानों के अनुपालन से जुड़ा गंभीर प्रश्न होगा। हालांकि इन आरोपों को अंतिम रूप से प्रमाणित मानने से पहले संबंधित फॉर्म, निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों के आदेश, नोटिस और चुनाव आयोग का विस्तृत जवाब देखना आवश्यक है।

चुनाव आयोग का पक्ष क्या है?

निर्वाचन आयोग का मूल तर्क है कि निष्पक्ष चुनाव के लिए मतदाता सूची का सही होना आवश्यक है। मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से दूसरे स्थान पर चले गए मतदाताओं और दोहरी प्रविष्टियों को हटाना मतदाता सूची की विश्वसनीयता बनाए रखने का हिस्सा है। आयोग ने उत्तर प्रदेश में पुनरीक्षण के दौरान राजनीतिक दलों की भागीदारी और निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए जाने पर जोर दिया है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अनुसार, पुनरीक्षण में लगभग 1.77 लाख बूथ लेवल अधिकारियों तथा मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लगभग 5.82 लाख बूथ लेवल एजेंटों ने भाग लिया। उन्होंने यह भी कहा कि किसी मतदाता का नाम निर्धारित प्रक्रिया के बिना नहीं हटाया गया।

दूसरी ओर विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों का तर्क है कि प्रक्रिया की वैधता के साथ उसका वास्तविक प्रभाव भी जाँचना चाहिए। यदि कोई पात्र व्यक्ति दस्तावेजों की कमी, तकनीकी त्रुटि या सूचना न मिलने के कारण सूची से बाहर हो जाता है, तो उसके लिए मतदान के अधिकार का व्यावहारिक उपयोग कठिन हो सकता है। दोनों पक्षों के दावों की जाँच का सबसे विश्वसनीय तरीका व्यक्तिगत मामलों के रिकॉर्ड, बूथवार आँकड़ों और अपीलों के निस्तारण का स्वतंत्र परीक्षण है।

क्या मतदाता सूची से नाम हटने पर कानूनी अपील की जा सकती है?

भारत में मतदाता सूची तैयार करने और संशोधित करने की व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 324, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 तथा निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 के अंतर्गत संचालित होती है। मतदाता सूची में नाम शामिल कराने, प्रविष्टि में सुधार कराने या किसी नाम को हटाने के लिए निर्धारित प्रपत्र और प्रक्रियाएँ हैं। सामान्यतः फॉर्म-6 नए पंजीकरण, फॉर्म-7 नाम हटाने संबंधी आपत्ति और फॉर्म-8 निवास परिवर्तन अथवा विवरण में सुधार जैसे उद्देश्यों के लिए उपयोग होता है।

उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने अप्रैल 2026 में बताया था कि निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के निर्णय से असंतुष्ट व्यक्ति जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 के अंतर्गत अपील कर सकता है। एसआईआर की अंतिम सूची के प्रकाशन के बाद संबंधित निर्णय के विरुद्ध प्रथम अपील के लिए 15 दिन और जिला मजिस्ट्रेट के निर्णय के विरुद्ध दूसरी अपील के लिए 30 दिन की अवधि बताई गई थी। ये समय-सीमाएँ संबंधित निर्णय और लागू प्रक्रिया के अनुसार समझी जानी चाहिए। अप्रैल की विशेष अपील अवधि समाप्त हो जाने का अर्थ यह नहीं है कि भविष्य में पात्र नागरिक सामान्य कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन नहीं कर सकते।

क्या 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले फिर बदलेगी उत्तर प्रदेश की मतदाता सूची?

इस प्रश्न का उत्तर महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण का कार्यक्रम भी घोषित किया है। उपलब्ध कार्यक्रम के अनुसार, प्रारंभिक मतदाता सूची 12 नवंबर 2026 को प्रकाशित की जानी है और अंतिम सूची 4 जनवरी 2027 को जारी होने का कार्यक्रम है। इसका अर्थ है कि अप्रैल 2026 की एसआईआर सूची ही विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं की अंतिम स्थिति नहीं होगी। आगामी पुनरीक्षण में नए पात्र मतदाताओं के नाम शामिल करने, आवश्यक सुधार करने और नियमानुसार प्रविष्टियों को अद्यतन करने की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। 

इसलिए उत्तर प्रदेश में 2027 के चुनाव से पहले तीन चरणों की तुलना अत्यंत महत्वपूर्ण होगी। पहला, अक्टूबर 2025 में एसआईआर शुरू होने से पहले की सूची; दूसरा, अप्रैल 2026 में प्रकाशित अंतिम एसआईआर सूची; और तीसरा, जनवरी 2027 में प्रकाशित होने वाली संशोधित अंतिम सूची। इन तीनों के आधार पर यह देखा जा सकेगा कि कुल मतदाताओं की संख्या कैसे बदली, कितने नए मतदाता जुड़े, कितने नाम हटे और पहले हटाए गए कितने नाम दोबारा दर्ज हुए।

क्या मतदाता सूची का विवाद 2027 के चुनाव में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनेगा?

मतदाता सूची से संबंधित विवाद का राजनीतिक महत्व इसलिए है क्योंकि उत्तर प्रदेश में विधानसभा की 403 सीटें हैं और प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संरचना तथा मतदान का अंतर अलग-अलग होता है। यदि किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम सूची से बाहर होने की शिकायतें सामने आती हैं, तो यह राजनीतिक दलों, नागरिक संगठनों और चुनाव प्रशासन के लिए महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। लेकिन केवल मतदाता संख्या में कमी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी विशेष राजनीतिक दल को लाभ या नुकसान हुआ है। इसके लिए वास्तविक विलोपन के कारण, संबंधित व्यक्तियों की पात्रता, नाम दोबारा शामिल होने की स्थिति और निर्वाचन क्षेत्रवार प्रमाणित आँकड़ों की आवश्यकता होगी।

समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की आपत्तियों के साथ भाजपा तथा निर्वाचन आयोग के पक्ष का भी दस्तावेजों के आधार पर परीक्षण आवश्यक है। किसी राजनीतिक दल द्वारा लगाए गए वोट चोरी या जानबूझकर मतदाता हटाने के आरोप को बिना प्रमाण के तथ्य नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार निर्वाचन आयोग द्वारा प्रक्रिया को पारदर्शी बताए जाने से स्वतंत्र परीक्षण की आवश्यकता समाप्त नहीं होती। निष्पक्ष रिपोर्टिंग का आधार यही होगा कि जहाँ प्रशासनिक गलती प्रमाणित हो, उसे स्पष्ट रूप से बताया जाए और जहाँ आरोपों की पुष्टि न हुई हो, वहाँ उस सीमा को भी पाठकों के सामने रखा जाए।

मतदाता सूची की शुद्धता और मताधिकार की रक्षा, दोनों जरूरी

लोकतांत्रिक चुनाव के लिए सही मतदाता सूची अनिवार्य है। मृत व्यक्तियों, दोहरी प्रविष्टियों और अपात्र नामों को हटाना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम सूची में बनाए रखना भी है। चुनाव की निष्पक्षता केवल मतदान के दिन की व्यवस्था से तय नहीं होती। उसकी शुरुआत उस प्रक्रिया से होती है जिसमें यह निर्धारित किया जाता है कि मतदान करने के लिए कौन पात्र है और उसका नाम सूची में दर्ज है या नहीं।

उत्तर प्रदेश में एसआईआर के बाद मतदाताओं की संख्या में लगभग 2.04 करोड़ की शुद्ध कमी एक बड़ा प्रशासनिक और सार्वजनिक महत्व का तथ्य है। लेकिन यह संख्या अपने आप में अनियमितता, राजनीतिक पक्षपात या चुनावी हेरफेर का प्रमाण नहीं है। इसकी वास्तविक व्याख्या के लिए प्रत्येक श्रेणी के विलोपन, नाम जोड़ने के आवेदन, सुनवाई, अपील और अंतिम निर्णयों की जाँच आवश्यक है। अक्टूबर में सामने आए 16.18 लाख आवेदनों और 85,854 विलोपन फॉर्मों से संबंधित सवाल इस पारदर्शिता की आवश्यकता को और महत्वपूर्ण बनाते हैं।

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं होगा कि मतदाता सूची में कितने नाम घटे या बढ़े, बल्कि यह होगा कि क्या हर पात्र नागरिक का नाम सही तरीके से दर्ज है और क्या किसी नाम को हटाने या जोड़ने का प्रत्येक निर्णय कानून के अनुरूप, सत्यापन योग्य और पारदर्शी है।

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