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3 बार सांसद, नेहरू के खास और फिर ₹1 का वेतन! कौन थे बनारस के पहले सांसद डॉ. रघुनाथ सिंह?
Varanasi First MP Raghunath Singh: कौन थे बनारस के पहले सांसद डॉ. रघुनाथ सिंह जो तीन बार चुनाव जीते, नेहरू के करीबी रहे और फिर ₹1 वेतन पर सरकारी कंपनी की जिम्मेदारी संभाली।
Varanasi First MP Raghunath Singh: वाराणसी की आब-ओ-हवा में शुरू से ही एक अलग किस्म का फक्कड़पन और बेबाकी रही है। यह वो शहर है जो सत्ता के आगे कभी नतमस्तक नहीं हुआ, बल्कि सत्ता खुद चलकर कई बार बनारस की देहरी पर सिर झुकाती नजर आई। आज की तारीख में जब चुनावी रैलियों में बड़े-बड़े वादों और पोस्टरों की होड़ मची रहती है, तब इतिहास के पन्नों में झांकने पर बनारस की राजनीति की एक ऐसी शख्सियत सामने आती है, जिसकी चमक के आगे आज का राजनीतिक तमाशा बिल्कुल फीका पड़ जाता है। आजादी की जंग में अंग्रेजों की जेल काटना, कांग्रेस के कद्दावर संगठन की कमान संभालना, संसद में लगातार तीन बार जीत का परचम लहराना और फिर पंडित जवाहरलाल नेहरू के बेहद करीब रहकर भी सत्ता की मलाईदार कुर्सियों को लात मार देना यह कोई कपोल-कल्पित कहानी नहीं, बल्कि बनारस के खांटी नेता ठाकुर रघुनाथ सिंह की जीती-जागती हकीकत है।
जिस दौर में सांसद बनते ही लाल बत्ती और मंत्री पद पाने की अंधी दौड़ शुरू हो जाती थी, उस दौर में इस बनारसी मिजाज के नेता ने केंद्र सरकार में मंत्री बनने के प्रस्तावों को कथित तौर पर यह कहकर ठुकरा दिया था कि "जनता ने मुझे अपनी आवाज बनाने के लिए संसद भेजा है, हुकूमत का नौकर बनने के लिए नहीं।" आज की तारीख में जब रघुनाथ सिंह का नाम वक्त की धूल में कहीं खो सा गया है, तब पुराने संसदीय रिकॉर्ड, नेहरू आर्काइव के पन्ने, चुनावी आंकड़े और तत्कालीन सरकारी दस्तावेज जब एक साथ मेज पर रखे जाते हैं, तो एक ऐसी तस्वीर उभरती है जो आधुनिक राजनीति के मुंह पर तमाचा जड़ती नजर आती है। वे सिर्फ चुनाव जीतने की मशीन नहीं थे, वे आजादी के आंदोलन, बौद्धिक विमर्श, संसदीय बहसों, किताबों के पन्नों और देश के सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले एक विरले युगपुरुष थे।
1928 की शुरुआत और BHU से राष्ट्रीय राजनीति तक का सफर
ठाकुर रघुनाथ सिंह के जीवन को लेकर इंटरनेट और आम जानकारियों के बीच तमाम तरह की भ्रांतियां फैली हुई हैं। कई जगहों पर 1928 को उनका जन्म वर्ष बता दिया जाता है, लेकिन अगर हम प्रथम लोकसभा के आधिकारिक 'Who's Who' रिकॉर्ड के पन्ने पलटें, तो यह पूरी तरह साफ हो जाता है कि उनका जन्म वर्ष 1910 था और उनकी जन्मभूमि बनारस ही थी। पिता बी. बटुक नाथ सिंह के घर जन्मे रघुनाथ सिंह का मन बचपन से ही देश की आजादी और समाजसेवा में रमता था। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से एम.ए. और एल.एल.बी. की डिग्रियां हासिल कीं और फिर बनारस की अदालतों में वकालत की काली पोशाक पहनकर गरीबों और स्वतंत्रता सेनानियों के हक की लड़ाई लड़ने लगे।
साल 1928 दरअसल उनके पैदा होने का साल नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक और सामाजिक चेतना के प्रस्फुटित होने का मील का पत्थर था। इसी साल उन्होंने बनारस की सरजमीं पर 'प्रताप जयंती' के भव्य आयोजन की नींव रखी और युवाओं को एक सूत्र में पिरोने के लिए 'Citizens Association' का गठन किया। यानी जिस उम्र में आम लड़के अपने करियर के ताने-बाने बुनते हैं, उस किशोर उम्र में रघुनाथ सिंह बनारस की सड़कों पर राष्ट्रीय चेतना की अलख जगा रहे थे। आगे चलकर वे बनारस सिटी कांग्रेस कमेटी के महासचिव बने और फिर 1938 से लेकर 1948 के दौर में कई बार अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। नेहरू आर्काइव के मुताबिक 1938-41 और 1946-48 के कठिन दौर में उन्होंने बनारस में कांग्रेस संगठन को मजबूत करने में दिन-रात एक कर दिया था।
अंग्रेजी हुकूमत की जेल और स्वतंत्रता आंदोलन
रघुनाथ सिंह कोई महज़ ड्राइंग-रूम पॉलिटिशियन नहीं थे जो आजादी मिलने के बाद सीधे मलाई खाने की कतार में आ खड़े हुए हों। संसद के आधिकारिक रिकॉर्ड इस बात की तस्दीक करते हैं कि कांग्रेस की क्रांतिकारी और राजनीतिक गतिविधियों के चलते वे कई दफा अंग्रेजी हुकूमत की जेलों में बंद रहे। आजादी की लड़ाई उनके लिए कोई राजनीतिक करियर बनाने की सीढ़ी नहीं, बल्कि उनके खून में बहने वाला जुनून थी। स्थानीय और पारिवारिक किस्से-कहानियों में आज भी यह बात बड़े फक्र से सुनाई जाती है कि कैसे उन्होंने बहुत कम उम्र में ब्रिटिश हुक्मरानों के खिलाफ जुलूस निकाले, पुलिस की लाठियां खाईं और जेल के भीतर बंद कैदियों के अमानवीय उत्पीड़न के खिलाफ भूख हड़ताल तक कर डाली।
हालांकि इन सभी प्रसंगों का एक-एक लिखित दस्तावेजी प्रमाण मिलना मुश्किल है, इसलिए इन्हें बनारस की लोक-परंपरा और पारिवारिक स्मृतियों के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि संसद के पन्नों में दर्ज उनकी 'जेल यात्राएं' ही वो तपस्या थीं, जिसने उन्हें आजादी के बाद के भारत की राजनीति में एक कद्दावर और निर्भीक नेता के रूप में स्थापित किया। इसी राजनीतिक धरातल ने उन्हें राष्ट्रीय क्षितिज पर चमकने का अवसर दिया।
1947 का नेपाल मिशन और दूरदर्शी संसदीय सोच
जब 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, तो चारों तरफ उथल-पुथल का माहौल था। रियासतों का विलय हो रहा था और पड़ोसी मुल्कों के साथ कूटनीतिक संबंधों की नई इबारत लिखी जा रही थी। ऐसे नाजुक दौर में रघुनाथ सिंह के राजनीतिक कद और कूटनीतिक समझ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत सरकार ने 1947 में नेपाल भेजे गए अपने बेहद खास प्रतिनिधिमंडल में उन्हें बतौर सदस्य शामिल किया था। पहली लोकसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में इस ऐतिहासिक नेपाल यात्रा का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।
यह नियुक्ति साफ बताती है कि रघुनाथ सिंह का दायरा सिर्फ बनारस की अस्सी और गोदौलिया की गलियों तक सीमित नहीं था, बल्कि देश के शीर्ष नेतृत्व को उनकी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों की समझ पर पूरा भरोसा था। वे केवल वोट बटोरने वाले नेता नहीं थे; संसद के रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि राजनीति विज्ञान, देश की सुरक्षा नीति, रक्षा तंत्र और सामाजिक सरोकार उनके प्रिय विषय थे। और बनारसी मिजाज की बात करें, तो खुद को चुस्त-दुरुस्त रखने के लिए योगासन करना उनका रोजमर्रा का शौक था।
1951-52 का पहला आम चुनाव
आज जिस वाराणसी संसदीय सीट को देश की सबसे हाई-प्रोफाइल सीट माना जाता है, उसका ढांचा 1951-52 के पहले आम चुनाव के समय आज जैसा नहीं था। उस दौर में बनारस का इलाका अलग-अलग चुनावी हिस्सों में बंटा हुआ था और कांग्रेस ने 'Banaras District (Central)' सीट से अपने सबसे भरोसेमंद चेहरे ठाकुर रघुनाथ सिंह को चुनाव मैदान में उतारा।
उस पहले ऐतिहासिक चुनाव में रघुनाथ सिंह ने सोशलिस्ट पार्टी के दिग्गज उम्मीदवार विश्वनाथ शर्मा को चारों खाने चित कर दिया। रघुनाथ सिंह को जहां 78,763 वोट मिले, वहीं विश्वनाथ शर्मा के खाते में महज 39,446 वोट ही आ सके। रघुनाथ सिंह ने करीब 39 हजार से ज्यादा वोटों के भारी अंतर से एकतरफा जीत दर्ज की और पहली लोकसभा में बनारस का परचम लहराया। तकनीकी रूप से भले ही वे 'बनारस डिस्ट्रिक्ट सेंट्रल' के सांसद चुने गए थे, लेकिन इतिहास गवाह है कि वही सीट आगे चलकर आज की आधुनिक वाराणसी सीट की जनक बनी, इसलिए उन्हें वाराणसी का पहला लोकसभा सांसद कहना हर लिहाज से मुकम्मल और ऐतिहासिक रूप से सटीक है।
1957 में दूसरी बड़ी जीत
पहले आम चुनाव की जीत तो बस एक शुरुआत थी। संसद में उनकी आवाज जितनी बुलंद हुई, बनारस की जनता के दिल में उनकी जगह उतनी ही गहरी होती चली गई। 1957 के दूसरे आम चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर वाराणसी लोकसभा सीट से रघुनाथ सिंह पर ही दांव खेला। इस बार बनारस की जनता ने अपने इस चहेते नेता पर वोटों की ऐसी बारिश की कि विरोधी चित हो गए।
1957 के चुनाव में रघुनाथ सिंह को कुल 1,31,087 वोट हासिल हुए, जबकि उनके सबसे नजदीकी प्रतिद्वंद्वी शेओमंगल राम को केवल 59,161 वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। जीत का अंतर 71,926 वोटों का था, जो उस दौर के हिसाब से एक प्रचंड जनादेश माना जाता था। यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि इस बात की मुहर थी कि रघुनाथ सिंह का अपना एक व्यक्तिगत वजूद था, जो कांग्रेस के सिंबल से भी बड़ा बन चुका था। बनारस की जनता उन्हें सिर्फ पार्टी का उम्मीदवार नहीं, बल्कि अपना अभिभावक मानती थी।
1962 में तीसरी जीत
1962 का तीसरा आम चुनाव रघुनाथ सिंह के राजनीतिक जीवन का स्वर्णिम अध्याय लेकर आया। इस चुनाव में उन्होंने जनसंघ के कद्दावर नेता रघुवीरा को भारी शिकस्त दी। रघुनाथ सिंह को 1,04,682 वोट मिले, जबकि जनसंघ के उम्मीदवार को 58,775 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। 45,907 वोटों के अंतर से जीतकर उन्होंने वाराणसी सीट से लगातार तीन बार जीत की ऐतिहासिक हैट्रिक पूरी की।
लेकिन इस तीसरी जीत के साथ ही रघुनाथ सिंह का कद केवल एक क्षेत्रीय सांसद का नहीं रह गया था। वे अब देश की रक्षा और विदेश नीति के बड़े रणनीतिकार बन चुके थे। नेहरू आर्काइव के आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि 1952 से 1967 के दौरान वे लोकसभा सदस्य रहने के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के 'Parliamentary Study Group on Kashmir' के Convenor (संयोजक) भी रहे। यानी आजादी के बाद कश्मीर का जो सबसे संवेदनशील और पेचीदा मुद्दा था, उस पर कांग्रेस पार्टी और संसद की क्या नीति होनी चाहिए, उसका खाका तैयार करने की जिम्मेदारी इसी बनारसी सांसद के मजबूत कंधों पर थी।
संसद में गूंजी आवाज
अगर आप पुराने संसदीय रिकॉर्ड और नेहरू आर्काइव के पन्नों को खंगालेंगे, तो रघुनाथ सिंह की बहुमुखी प्रतिभा देखकर हैरान रह जाएंगे। नेहरू आर्काइव में रघुनाथ सिंह के नाम से जुड़े कम से कम 133 आधिकारिक रिकॉर्ड दर्ज मिलते हैं। हालांकि, इन 133 रिकॉर्ड्स को लेकर थोड़ा सतर्क रहना जरूरी है- इनमें सिर्फ उनके द्वारा पूछे गए सवाल या दिए गए भाषण ही नहीं हैं, बल्कि पंडित नेहरू के भाषण, नेहरू के साथ उनका पत्राचार, मंत्रालयों के जवाब और वे दस्तावेज भी शामिल हैं जिनमें रघुनाथ सिंह का नाम एक मुख्य संदर्भ के रूप में दर्ज है।
इसके बावजूद, ये रिकॉर्ड इस बात के अकाट्य प्रमाण हैं कि वे संसद की कार्यवाही के सबसे सक्रिय स्तंभों में से एक थे। कश्मीर के जलते सवाल से लेकर तिब्बती शरणार्थियों का पुनर्वास, पाकिस्तान सीमा पर जारी तनाव, गोवा का भारत में विलय, नागालैंड की समस्या, चीन की आक्रामकता और दक्षिण अफ्रीका में नस्लभेद जैसे गंभीर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर रघुनाथ सिंह ने संसद के भीतर कई बार ऐसी तीखी और तथ्यपरक बहसें कीं कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों उन्हें सांस रोककर सुनते थे। 1960 और 1961 के दौरान पाकिस्तान सीमा पर गोलीबारी और भारतीय मछुआरों के अपहरण के मुद्दों पर उन्होंने सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
1962 के युद्ध के दौरान चीन पर ऐतिहासिक हस्तक्षेप
1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय इतिहास का वो काला पन्ना था जिसने देश के स्वाभिमान को झकझोर कर रख दिया था। उस बेहद तनावपूर्ण माहौल में जब संसद के भीतर बहस छिड़ी, तो रघुनाथ सिंह ने खड़े होकर अपनी मातृभाषा हिंदी में जो वक्तव्य दिया, वो आज भी संसदीय इतिहास की धरोहर है।
उन्होंने बेहद विद्वतापूर्ण अंदाज में प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक ग्रंथों और पुराणों का हवाला देते हुए चीन और भारत के सदियों पुराने संबंधों का कच्चा चिट्ठा खोला। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने अपनी अद्भुत राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए यह चेतावनी भी दी कि "प्राचीन ग्रंथों के आधार पर आज की आधुनिक सीमाओं का निर्धारण नहीं किया जा सकता, हमें जमीनी हकीकत और सामरिक सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।" उनका यह बयान बताता है कि वे सिर्फ भावनाओं में बहने वाले नेता नहीं थे, बल्कि उग्र राष्ट्रवाद के दौर में भी वे इतिहास और आधुनिक राजनीति के बारीक अंतर को बखूबी समझते थे।
पंडित नेहरू से रिश्ता
रघुनाथ सिंह की शख्सियत का सबसे दिलचस्प पहलू था भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ उनका अनोखा और पारदर्शी संबंध। नेहरू आर्काइव में इन दोनों दिग्गजों के बीच हुए पत्राचार के कई ऐतिहासिक दस्तावेज सुरक्षित हैं। 1957 में पंडित नेहरू ने रघुनाथ सिंह को एक बेहद महत्वपूर्ण निजी पत्र लिखा था। मामला देश के राष्ट्रपति के कार्यकाल को अधिकतम दो बार तक सीमित करने वाले एक संवेदनशील विधेयक का था।
रघुनाथ सिंह ने एक निष्पक्ष सांसद के तौर पर नेहरू को खत लिखकर इस विधेयक पर अपनी गंभीर चिंताएं जाहिर की थीं। नेहरू ने बेहद आदर के साथ उनके पत्र का जवाब देते हुए लिखा कि देश के कानून मंत्री भी इस विधेयक के पक्ष में नहीं हैं और सरकार इसे आगे बढ़ाने का कोई इरादा नहीं रखती। इस खत के फुटनोट में रघुनाथ सिंह को 1910 में जन्मे, 1952-67 तक सांसद रहे और कश्मीर स्टडी ग्रुप के संयोजक के रूप में स्पष्ट पहचान दी गई है। यह चिट्ठी साबित करती है कि रघुनाथ सिंह कोई जी-हुजूर सांसद नहीं थे, बल्कि वे सीधे प्रधानमंत्री की आंखों में आंखें डालकर नीतिगत मुद्दों पर अपनी बात रखने का हौसला रखते थे।
जब नेहरू ने खुद लिखी रघुनाथ सिंह की किताब की 'भूमिका'
रघुनाथ सिंह सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे एक उच्च कोटि के विचारक और लेखक भी थे। उन्होंने भारत में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा पर एक कालजयी पुस्तक लिखी थी, जिसका शीर्षक था 'धर्म निरपेक्ष राज'। यह किताब 1961 में प्रकाशित हुई थी।
इस किताब की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 22 अप्रैल 1961 को देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुद इस किताब की 'प्रस्तावना' (Foreword) लिखी थी। नेहरू ने लिखा था कि "यह एक बेहद गंभीर और संवेदनशील विषय पर लिखी गई एक असाधारण पुस्तक है।" नेहरू ने किताब की तारीफ करते हुए लिखा था कि भारत जैसे बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक देश में राष्ट्रीयता की भावना किसी एक धर्म के थोपने से नहीं, बल्कि सभी धर्मों को समान आदर देने से ही मजबूत हो सकती है। किसी तत्कालीन सांसद की किताब पर प्रधानमंत्री द्वारा खुद भूमिका लिखा जाना अपने आप में एक अभूतपूर्व घटना थी, जो रघुनाथ सिंह के बौद्धिक कद को दर्शाती है।
कांग्रेस संगठन के असली 'संकटमोचक'
पंडित नेहरू के साथ उनके रिश्तों की गहराई सिर्फ पत्राचार तक सीमित नहीं थी। 1962 और 1963 के दौर में जब कांग्रेस पार्टी के भीतर सांगठनिक खींचतान चल रही थी, तब नेहरू ने कांग्रेस संसदीय दल (CPP) की कार्यप्रणाली, कार्यक्रमों और वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय बनाने के लिए रघुनाथ सिंह को कई गोपनीय पत्र लिखे।
1963 में जब उत्तर-पूर्व के कद्दावर नेता रिशांग कैशिंग को कांग्रेस संसदीय पार्टी से जोड़ने का मसला आया, तब भी नेहरू ने रघुनाथ सिंह की सांगठनिक क्षमता पर ही भरोसा जताया था। कश्मीर अध्ययन समूह का नेतृत्व करने के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी के आंतरिक मामलों को निपटाने में उनकी भूमिका ने उन्हें 'नेहरू युग' की भारतीय राजनीति का एक अदृश्य लेकिन बेहद शक्तिशाली केंद्र बना दिया था।
1967 का राजनीतिक भूचाल
कहते हैं कि राजनीति बड़ी निष्ठुर होती है और हवा का रुख बदलते देर नहीं लगती। 1967 का चौथा आम चुनाव पूरे देश में कांग्रेस के लिए एक भयानक दुःस्वप्न बनकर आया। उत्तर भारत के कई राज्यों में कांग्रेस के पैर उखड़ गए और देश में गैर-कांग्रेसवाद की लहर चल पड़ी।
बनारस की सरजमीं भी इस राजनीतिक भूचाल से अछूती नहीं रही। 1967 के चुनाव में वामपंथी उम्मीदवार एस.एन. सिंह ने 1,05,784 वोट हासिल करके एक बड़ा उलटफेर कर दिया। रघुनाथ सिंह को इस चुनाव में 87,617 वोट ही मिल सके और वे 18,167 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए।
यह हार उनके 15 सालों के शानदार संसदीय करियर का अंत साबित हुई। हालांकि पुराने और नए चुनावी आंकड़ों में एस.एन. सिंह की पार्टी को लेकर थोड़ा विरोधाभास मिलता है कुछ जगह उन्हें सीपीआई (CPI) तो कुछ जगह सीपीएम (CPM) का उम्मीदवार दर्ज किया गया है। लेकिन कड़वी हकीकत यही थी कि बनारस ने अपने तीन बार के हैट्रिक विजेता सांसद को संसद से बाहर का रास्ता दिखा दिया था।
हार के बाद असली इम्तिहान
आम तौर पर चुनाव हारने के बाद राजनेता डिप्रेशन में चले जाते हैं या फिर जोड़-तोड़ करके राज्यसभा की राह तलाशते हैं। लेकिन रघुनाथ सिंह का बनारसी खून अलग ही मिट्टी का बना था। 1967 में चुनावी शिकस्त मिलने के बाद उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बना ली, लेकिन देश सेवा का जज्बा कम नहीं हुआ।
1968 में सरकार ने उनकी प्रशासनिक क्षमताओं को देखते हुए उन्हें देश की महारत्न सरकारी कंपनी Hindustan Zinc Limited का चेयरमैन नियुक्त किया। समकालीन सरकारी राजपत्रों और स्थानीय वृत्तांतों में इस बात का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। और इसी मोड़ पर उनकी जिंदगी का वो किस्सा शुरू होता है, जो आज के नेताओं के लिए किसी दिवास्वप्न जैसा लगता है।
₹1 का प्रतीकात्मक वेतन और सरकारी ठाट-बाट को लात!
Hindustan Zinc का चेयरमैन बनने के बाद रघुनाथ सिंह ने जो मिसाल कायम की, वो भारत के प्रशासनिक इतिहास में विरले ही देखने को मिलती है। उन्होंने चेयरमैन का भारी-भरकम वेतन और भत्ते लेने से साफ इनकार कर दिया और केवल ₹1 का प्रतीकात्मक वेतन स्वीकार किया।
स्थानीय और पारिवारिक स्मृतियों में यह कहानी आज भी गर्व के साथ दोहराई जाती है। कहा जाता है कि वे सरकारी बंगलों और गाड़ियों के सख्त खिलाफ थे। जब उन्हें लेने के लिए सरकारी कार पहुंचती थी, तो वे ड्राइवर को हाथ जोड़कर वापस भेज देते थे और खुद आम जनता की तरह बनारस की सड़कों पर साइकिल रिक्शा या फिर ट्रेन के जनरल डिब्बे में सफर करते थे। हालांकि इन सभी किस्सों के शत-प्रतिशत प्राथमिक सरकारी कागजात उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन बनारस के बुजुर्गों और समकालीन पत्रकारों के लेखों में इस सादगी का बार-बार जिक्र मिलना यह साबित करता है कि वे सत्ता के अहंकार से मीलों दूर रहने वाले फकीर संत नेता थे।
SCI के कर्ता-धर्ता और 1979 का मास्टरस्ट्रोक
रघुनाथ सिंह का सार्वजनिक क्षेत्र में सबसे बड़ा और ऐतिहासिक योगदान Shipping Corporation of India (SCI) के चेयरमैन के रूप में रहा। वे केवल नाम के चेयरमैन नहीं थे, बल्कि वे देश के समुद्री व्यापार की नीतियां खुद तय करते थे।
दिसंबर 1979 में भारत सरकार की आधिकारिक पत्रिका 'योजना' में डॉ. रघुनाथ सिंह का एक ऐतिहासिक शोध पत्र प्रकाशित हुआ था, जिसका शीर्षक था 'Shipping in India'। इस लेख के नीचे साफ-साफ लिखा था: "डॉ. रघुनाथ सिंह, चेयरमैन, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया"| इस दस्तावेज से उनके इस शीर्ष पद पर रहने की पूर्ण आधिकारिक पुष्टि होती है।
उस लेख में रघुनाथ सिंह ने भारत के समुद्री बेड़े का जो विजन पेश किया था, वो आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने आंकड़ों के साथ बताया कि 1961 में महज 19 जहाजों से शुरू हुई SCI की क्षमता 1979 तक 141 विशाल जहाजों तक पहुंच चुकी थी। उन्होंने चिंता जताई थी कि भारत का अधिकांश समुद्री व्यापार विदेशी जहाजों पर निर्भर है, जिससे देश की गाढ़ी कमाई विदेशी मुद्रा के रूप में बाहर जा रही है। उन्होंने भारत को समुद्री व्यापार में आत्मनिर्भर बनाने के लिए जिस नीतिगत ढांचे का सुझाव दिया था, उसने आने वाले दशकों में भारत के जहाजरानी उद्योग की दिशा बदल दी। संसद में विदेश नीति पर बोलने वाला नेता अब देश के समुद्री जहाजों की कमान संभाल रहा था।
जब नेहरू और शास्त्री के प्रस्तावों को ठुकराया
रघुनाथ सिंह के जीवन की सबसे लोकप्रिय और अचंभित कर देने वाली किंवदंती है केंद्र में मंत्री पद लेने से इनकार करना। बनारस की गलियों और पारिवारिक वृत्तांतों में यह बात दर्ज है कि पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू और बाद में 1964 में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने का न्योता दिया था। कहा जाता है कि 1964 में जब लाल बहादुर शास्त्री ने उनसे कैबिनेट मंत्री बनने का आग्रह किया, तो रघुनाथ सिंह ने हंसते हुए मना कर दिया और तर्क दिया: "शास्त्री जी, आप भी पूर्वांचल से हैं और मैं भी बनारस से हूं। अगर एक ही इलाके से इतने मंत्री बन जाएंगे, तो देश में क्षेत्रवाद का आरोप लगेगा, जो मुझे कतई मंजूर नहीं।"
एक अन्य पारिवारिक किस्से के अनुसार, वे मंत्री पद को एक 'सरकारी नौकरी' या 'क्लर्क की कुर्सी' मानते थे। उनका मानना था कि मंत्री बनने के बाद इंसान फाइलों के जाल में उलझकर अपनी जनता से कट जाता है, जबकि एक स्वतंत्र सांसद के रूप में वे निर्भीक होकर जनता की आवाज उठा सकते हैं। यद्यपि नेहरू या शास्त्री के प्रधानमंत्री कार्यालय से इन प्रस्तावों की कोई आधिकारिक फाइल सार्वजनिक नहीं हुई है, इसलिए इतिहासकार इसे 'पारिवारिक और स्थानीय परंपरा के दावे' के रूप में देखते हैं। लेकिन बनारस की लोक-स्मृति में यह बात पत्थर की लकीर की तरह दर्ज है।
संसद से लेकर आध्यात्मिक और ऐतिहासिक किताबों तक
रघुनाथ सिंह की पहचान केवल भाषणों और राजनीति तक सीमित नहीं थी, उनका अध्ययन अत्यंत गहरा और व्यापक था। उनकी लिखी प्रसिद्ध पुस्तक 'धर्म निरपेक्ष राज' (1961) के अलावा, राष्ट्रीय पुस्तकालयों के कैटलॉग में उनके नाम से 'दक्षिण-पूर्व एशिया' जैसी किताबें दर्ज मिलती हैं। पारिवारिक और स्थानीय स्रोतों की मानें तो उन्होंने इतिहास, दर्शन, धर्म और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर करीब एक दर्जन से ज्यादा किताबें लिखी थीं। इनमें 'Towards Freedom', 'बुद्ध कथा', 'योग वशिष्ठ', 'आधुनिक राजनीति के क-ख-ग', 'जागृत नेपाल', 'विश्व के धर्म प्रवर्तक' और 'सर्वधर्म समभाव' जैसी कृतियों का जिक्र मिलता है।
हालांकि, शोधकर्ताओं को यहां थोड़ा सावधान रहने की जरूरत है। भारत में 'रघुनाथ सिंह' नाम के कई अन्य लेखक और विद्वान भी हुए हैं, इसलिए कुछ ऑनलाइन कैटलॉग में दूसरे लेखकों की किताबें भी इनके नाम से जुड़ गई हो सकती हैं। फिर भी, इस बात में कोई दो राय नहीं है कि वे एक ऐसे सांसद थे जिनका अधिकांश समय किताबों के अध्ययन और लेखन में बीतता था।
बनारस के खेवलिया से जुड़ा परिवार
संसदीय रिकॉर्ड के अनुसार, रघुनाथ सिंह के पिता का नाम बी. बटुक नाथ सिंह और उनकी पत्नी का नाम श्रीमती लीलावती था। उनका विवाह 1926 में हुआ था। इसके अलावा उनके पारिवारिक बैकग्राउंड की जानकारी मुख्य रूप से बनारस के स्थानीय सूत्रों से मिलती है। उनका पैतृक संबंध वाराणसी के ग्रामीण इलाके खेवलिया से बताया जाता है। आज भी बनारस में उनके परिवार के सदस्य और प्रशंसक उनकी स्मृति में सांस्कृतिक और सामाजिक आयोजन करते हैं। हालांकि, इंटरनेट पर उनके परिवार की वंशावली को लेकर काफी भ्रम और अलग-अलग दावे मौजूद हैं, इसलिए केवल वही तथ्य सही माने जा सकते हैं जिनकी पुष्टि आधिकारिक दस्तावेजों से होती है।
मृत्यु की तारीख को लेकर इतिहास का सबसे बड़ा सस्पेंस
रघुनाथ सिंह के जीवन से जुड़ा सबसे हैरान कर देने वाला पहलू उनकी मृत्यु का वर्ष है, जिसे लेकर दो अलग-अलग आधिकारिक रिकॉर्ड आमने-सामने खड़े नजर आते हैं। एक तरफ, संसद का नेहरू आर्काइव और आधिकारिक प्रविष्टियां उनका जीवनकाल 1910 से 1982 दर्ज करती हैं। 1957 के नेहरू के पत्र के फुटनोट में भी स्पष्ट रूप से उनकी मृत्यु का वर्ष 1982 ही लिखा गया है। लेकिन दूसरी तरफ, वाराणसी की स्थानीय स्मृतियों, समकालीन समाचार पत्रों, परिजनों और राजनीतिक इतिहासकारों के मुताबिक उनकी मृत्यु 26 अप्रैल 1992 को हुई थी। बनारस में हर साल 26 अप्रैल को ही उनकी पुण्यतिथि पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
इतिहास का यह विरोधाभास आज भी एक बड़ी पहेली बना हुआ है। सरकारी अभिलेख (नेहरू आर्काइव) जहां 1982 की तरफ इशारा करते हैं, वहीं स्थानीय जमीनी साक्ष्य 1992 की तारीख पर मुहर लगाते हैं। इस ऐतिहासिक उलझन को हमेशा के लिए सुलझाने के लिए नगर निगम के मृत्यु प्रमाण पत्र या 1992 के तत्कालीन समाचार पत्रों की शोक-संदेशों की प्रतियों का गहराई से अध्ययन करना जरूरी होगा।
आखिर क्यों देश को याद रहने चाहिए रघुनाथ सिंह?
ठाकुर रघुनाथ सिंह की दास्तान सिर्फ इसलिए अहम नहीं है कि वे बनारस से तीन बार लोकसभा का चुनाव जीते। उनका जीवन आजाद भारत के उस दौर का आईना है जब राजनीति व्यापार नहीं, बल्कि त्याग और राष्ट्रनिर्माण का जरिया हुआ करती थी।
उनका जीवन एक महाकाव्य की तरह है जिसकी शुरुआत आजादी की जंग में अंग्रेजों की जेल जाने से होती है, जो बीएचयू से वकालत करते हुए कांग्रेस संगठन के शीर्ष तक पहुंचती है, जो पहली लोकसभा से लेकर 1962 तक संसद में कश्मीर, चीन, तिब्बत और रक्षा नीति पर सरकार को दिशानिर्देश देती है, जो पंडित नेहरू जैसे दिग्गज को अपनी किताब की भूमिका लिखने पर मजबूर करती है, और जो अंत में चुनाव हारने के बाद ₹1 की सैलरी पर देश के जहाजरानी उद्योग को नई ऊंचाइयों पर ले जाती है।
आज जब वाराणसी की राजनीति की बात होती है, तो चर्चा केवल आज के हाई-प्रोफाइल चुनावी समीकरणों तक सिमट कर रह जाती है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि आज से सात दशक पहले इसी बनारस की मिट्टी ने एक ऐसा 'फक्कड़' सांसद पैदा किया था, जिसने सत्ता के सबसे बड़े पदों को ठुकरा कर अपनी शर्तों पर जिंदगी जी।
रघुनाथ सिंह उस दौर के ऐसे असाधारण योद्धा थे जिन्हें इतिहास के पन्नों ने भले ही पीछे ढकेल दिया हो, लेकिन जब भी बनारस की राजनीतिक शुचिता, स्वाभिमान और बेबाकी का जिक्र होगा, ठाकुर रघुनाथ सिंह का नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों पर सबसे ऊपर चमकेगा।


