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Varanasi News: संस्कृति पर्व के 52वें विशेषांक का भव्य लोकार्पण, काशी में संतों की रही मौजूदगी
Varanasi News: संस्कृति पर्व के 52वें विशेषांक का लोकार्पण शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने किया, काशी की संस्कृति संसद 2026 के विषयों को इस अंक में प्रमुखता दी गई है।
संस्कृति पर्व के 52वें विशेषांक का भव्य लोकार्पण, काशी में संतों की रही मौजूदगी (Photo- Newstrack)
Varanasi News: काशी के रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में आयोजित संस्कृति संसद 2026 के उद्घाटन सत्र में संस्कृति पर्व मासिक पत्रिका के 52वें विशेषांक का भव्य लोकार्पण किया गया। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने महामंडलेश्वरों और संतों की मौजूदगी में इस विशेषांक का विमोचन किया। यह अंक सनातन संस्कृति, अध्यात्म, दर्शन और मौजूदा समय में संस्कृति के सामने खड़ी चुनौतियों पर केंद्रित है। इस विशेषांक का प्रकाशन इसलिए भी खास है, क्योंकि इसके साथ ही संस्कृति पर्व मासिक पत्रिका अपने प्रकाशन के आठ वर्ष पूरे कर रही है।
संस्कृति संसद 2026 पर केंद्रित है विशेषांक
संस्कृति पर्व का यह 52वां विशेषांक काशी में आयोजित संस्कृति संसद 2026 को समर्पित है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, गंगा महासभा, अखिल भारतीय संत समिति और श्रीकाशी विद्वत्परिषद की ओर से आयोजित होने वाली यह छठवीं संस्कृति संसद है। भारत संस्कृति न्यास के उपक्रम के रूप में प्रकाशित इस विशेषांक में सनातन संस्कृति, अध्यात्म और दर्शन के साथ ही वर्तमान समय की चुनौतियों पर विस्तार से विचार प्रस्तुत किए गए हैं।
विशेषांक का लोकार्पण रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में संस्कृति संसद के उद्घाटन सत्र के दौरान किया गया। इस मौके पर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने सभी महामंडलेश्वरों और संतों की मौजूदगी में पत्रिका का विमोचन किया। कार्यक्रम में विशेषांक के अतिथि संपादक और संस्कृति संसद के संयोजक आचार्य गोविंद शर्मा ने इसकी महत्ता पर प्रकाश डाला। वहीं, संस्कृति संसद के पथ प्रदर्शक और अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती ने भी विशेषांक के उद्देश्यों और इसके महत्व के बारे में जानकारी दी। महामंडलेश्वर राधेबाबा ने विशेषांक की भूमिका प्रस्तुत की।
सनातन संस्कृति की चुनौतियों और समाज के भविष्य पर चर्चा
संस्कृति पर्व के इस विशेषांक में कई महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। इसमें संस्कृति संसद की अब तक की यात्रा और उससे प्राप्त परिणामों को प्रमुखता से जगह दी गई है। इसके साथ ही सनातन संस्कृति के सामने मौजूद वर्तमान चुनौतियों पर भी विस्तार से विचार किया गया है। विशेषांक में इस विषय को भी उठाया गया है कि विश्व में शांति और मानवता की रक्षा केवल सनातन संस्कृति के माध्यम से ही संभव है। भारत में सनातन की पुनर्स्थापना के लिए किए जा रहे प्रयासों और उनके परिणामों को भी इसमें शामिल किया गया है।
इस अंक में सनातन संस्कृति को समाज के संचालन के लिए शिक्षा से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया गया है। सामाजिक विभेद, जातीय संघर्ष और समाज को बांटने वाले षड्यंत्रों से बचने के उपायों को भी प्रमुख विषय बनाया गया है। इसके अलावा नए भारत के निर्माण के लिए नई पीढ़ी को किस तरह तैयार किया जाए, इस पर भी विचार रखे गए हैं।
प्राचीन और अर्वाचीन के बीच वर्तमान परिस्थितियों का सामयिक विश्लेषण, संस्कृति संसद के माध्यम से दुनिया को दिया जाने वाला संदेश और आधुनिक संदर्भ में संस्कृति, संस्कार तथा समाज की भूमिका जैसे विषय भी इस विशेषांक का हिस्सा हैं। इन विषयों के जरिए सनातन संस्कृति के विचारों और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों के बीच संबंधों को समझने का प्रयास किया गया है।
संतों और कई प्रमुख हस्तियों की रही मौजूदगी
लोकार्पण कार्यक्रम में शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के अलावा विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक, दिनेश, अशोक तिवारी, चंपत राय, सुधांशु महाराज और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रवींद्र पुरी मौजूद रहे। इसके साथ ही श्रीकाशी विद्वत परिषद के महामंत्री आचार्य रामनारायण द्विवेदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ सदस्य तथा संस्कृति संसद की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुनील देवघर भी कार्यक्रम में शामिल हुए। इस अवसर पर अनेक संतों, महामंडलेश्वरों और अन्य प्रमुख लोगों की उपस्थिति रही।
कार्यक्रम में संस्कृति पर्व के संपादक आचार्य संजय तिवारी और कार्यकारी संपादक डॉ. अर्चना तिवारी भी मौजूद रहीं। संस्कृति संसद के विशेषांक का लोकार्पण पत्रिका के आठ वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया। इस विशेषांक के जरिए सनातन संस्कृति, अध्यात्म, सामाजिक समरसता, शिक्षा और मानवता से जुड़े विषयों को व्यापक स्तर पर सामने रखने का प्रयास किया गया है।


