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अखिलेश के PDA को घेरने उतरे विनोद तावड़े! UP में BJP ने दी अमित शाह जैसी जिम्मेदारी
Vinod Tawde UP Election Strategy: यूपी चुनाव 2027 से पहले बीजेपी ने विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रभारी बनाकर बड़ा सियासी दांव चला है। अब उनके सामने अखिलेश यादव के PDA फॉर्मूले को चुनौती देने, गैर-यादव OBC और दलित वोट बैंक वापस BJP के पाले में लाने और संगठन को मजबूत करने की बड़ी चुनौती है। क्या तावड़े अमित शाह वाला चुनावी करिश्मा दोहरा पाएंगे?
Vinod Tawde UP Election Strategy: 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की उल्टी गिनती शुरू होते ही भारतीय जनता पार्टी ने अपनी सबसे बड़ी बिसात बिछा दी है। बीजेपी के नवनिर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का नया चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है। वहीं, गुजरात से आने वाले वरिष्ठ नेता जगदीश ईश्वरभाई पटेल को राज्य का सह-प्रभारी बनाया गया है। ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद मिली इस पूर्णकालिक कमान से साफ है कि बीजेपी अब किसी भी तरह की ढिलाई के मूड में नहीं है।
अमित शाह का 2014 वाला फॉर्मूला
साल 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जब अमित शाह ने उत्तर प्रदेश का प्रभार संभाला था, तब राज्य में पार्टी की हालत बेहद खस्ता थी। अमित शाह ने सोशल इंजीनियरिंग का ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला, जिसने बिखरे हुए हिंदू वोट बैंक को एक मंच पर ला दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी ने 80 में से 73 सीटें जीतीं और 2017 में 312 सीटें जीतकर 15 साल का राजनीतिक सूखा खत्म किया। अब 12 साल बाद वैसी ही कठिन परिस्थितियों में विनोद तावड़े को यूपी के रण में उतारा गया है।
'शांत रणनीतिकार' विनोद तावड़े
महाराष्ट्र से आने वाले विनोद तावड़े को बीजेपी संगठन में 'साइलेंट किलर' और माइक्रो-मैनेजमेंट का उस्ताद माना जाता है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से राजनीति की शुरुआत करने वाले तावड़े संघ के बेहद भरोसेमंद चेहरा हैं। हाल ही में बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड जीत दिलाने में उनकी भूमिका निर्णायक रही थी। उन्होंने बिहार में जटिल जातीय चक्रव्यूह को जिस शांति से सुलझाया था, उसी सफलता को देखते हुए शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें उत्तर प्रदेश जैसी बड़ी और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है।
अखिलेश यादव का 'PDA' चक्रव्यूह
2024 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले के दम पर बीजेपी के पारंपरिक गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक में भारी सेंधमारी की थी। पूर्वांचल और अवध के क्षेत्रों में बीजेपी को हुए सियासी नुकसान ने संगठन की चिंता बढ़ा दी थी। खुद ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले विनोद तावड़े के सामने सबसे बड़ी चुनौती इसी खिसके हुए वोट बैंक को दोबारा साधने और सपा के सामाजिक समीकरण को पूरी तरह ध्वस्त करने की है।
तावड़े के सामने 5 बड़ी चुनौतियां
403 विधानसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश को जीतना केवल रैलियों से संभव नहीं है। विनोद तावड़े के कंधों पर कई बड़े और जटिल काम हैं:
पन्ना प्रमुख और कैडर को री-एक्टिवेट करना: बूथ स्तर पर शिथिल पड़ चुके कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना।
सहयोगी दलों में संतुलन: अपना दल (एस), निषाद पार्टी, सुभासपा और आरएलडी के साथ सही सीट शेयरिंग और संवाद स्थापित करना।
संगठन और सरकार में समन्वय: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्य संगठन और केंद्रीय नेतृत्व के बीच मजबूत तालमेल बनाए रखना।
एंटी-इंकंबेंसी और टिकट बंटवारा: 10 साल की सत्ता के बाद विधायकों के प्रति उपजी नाराजगी को दूर कर सही प्रत्याशियों का चयन।
ओबीसी व कोर वोट बैंक की वापसी: गैर-यादव ओबीसी और अति-पिछड़ों को दोबारा पाले में लाना।
क्या दोहरा पाएंगे 'अमित शाह' जैसा इतिहास?
अमित शाह की शैली आक्रामक और डेटा-संचालित थी, जबकि विनोद तावड़े शांत कमरे में मैराथन बैठकों के जरिए रणनीति बनाने में विश्वास रखते हैं। अमित शाह के दौर में मोदी लहर का बड़ा सहारा था, जबकि आज विपक्ष पूरी तरह एकजुट और आक्रामक है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या विनोद तावड़े अपनी माइक्रो-प्लानिंग से अखिलेश यादव के 'PDA' को मात देकर अमित शाह जैसा ऐतिहासिक जादू यूपी की धरती पर दोबारा दोहरा पाएंगे।


