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दोस्तों की एक शर्त और बन गए SDM...कौन हैं काशी विश्वनाथ के CEO रहे विश्वभूषण मिश्रा? चौंका देगी कहानी
Kashi Vishwanath CEO Vishwabhushan Mishra: दोस्तों की एक शर्त से शुरू हुआ विश्वभूषण मिश्रा का सफर UPPSC में तीसरी रैंक और SDM बनने तक पहुंचा। जानिए अयोध्या से काशी विश्वनाथ धाम के CEO और अब UPSSSC तक का उनका प्रेरणादायक सफर।
Kashi Vishwanath CEO Vishwabhushan Mishra: यह किसी फिल्मी कहानी जैसी लगने वाली लेकिन सौ फीसदी सच दास्तान है एक ऐसे अफसर की, जिसने कभी प्रशासनिक सेवा को अपना लक्ष्य बनाकर सालों-साल कोचिंग में पसीना नहीं बहाया था। दोस्तों के बीच चाय की चुस्की के साथ हुई एक सामान्य-सी शर्त में उसने परीक्षा का फॉर्म भर दिया और जब परिणाम आया, तो उसने पूरे उत्तर प्रदेश में तीसरी रैंक (UPPSC PCS Rank 3) हासिल कर सबको चौंका दिया। यह कहानी है विश्वभूषण मिश्रा की, जो आगे चलकर उत्तर प्रदेश कैडर के एक बेहद सम्मानित और लोकप्रिय डिप्टी कलेक्टर (SDM) बने।
इस अद्भुत सफलता की यात्रा में एक ऐसा पल भी आया, जिसे शायद विश्वभूषण मिश्रा आज तक नहीं भूल पाए हैं। जब उन्होंने अपनी मां के पास जाकर बेहद खुशी से कहा कि वह डिप्टी कलेक्टर बन गए हैं, तो मां ने बिना बात समझे सहजता से जवाब दिया- "जाओ, कुछ बड़ा बन जाना तब बताना।" लेकिन जब अगले दिन सुबह के समाचार पत्रों में बेटे की तस्वीर छपी और बधाई देने वालों का तांता लगा, तब मां को समझ आया कि उनके बेटे ने सचमुच कितना बड़ा मुकाम हासिल कर लिया है।
27 दिसंबर 2007 की वह शाम और दोस्तों की खुली चुनौती
विश्वभूषण मिश्रा के जीवन का यह ऐतिहासिक मोड़ 27 दिसंबर 2007 की शाम को आया। लखनऊ यूनिवर्सिटी में एलएलबी (LLB) के छात्र विश्वभूषण अपने दोस्तों के साथ बैठे हुए थे। बातचीत के दौरान प्रशासनिक सेवाओं पर चर्चा छिड़ गई। विश्वभूषण ने सहज भाव से कह दिया कि आखिर आईएएस-पीसीएस बनना इतना मुश्किल भी क्या है, लोग बनते ही तो हैं!
उनकी यह बात उनके एक दोस्त को चुभ गई। उसने चुनौती देते हुए कहा "अगर इतना ही आसान लगता है, तो खुद क्यों नहीं बन जाते? एक बार परीक्षा देकर देखो, तब समझ में आएगा कि सिविल सर्विसेज कितनी कठिन होती हैं।"
विश्वभूषण ने इस चुनौती को सीधे अपने स्वाभिमान से जोड़ लिया। उन्होंने बिना देर किए 3 जनवरी 2008 को पीसीएस परीक्षा का फॉर्म भर दिया। उनके पास कोई लंबा-चौड़ा स्टडी प्लान नहीं था और न ही उन्होंने कोई महंगी कोचिंग ज्वाइन की थी। लेकिन पहली ही बार में उन्होंने प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) पास कर ली। इस सफलता ने उनका आत्मविश्वास कई गुना बढ़ा दिया। इसी बीच उनका चयन दिल्ली यूनिवर्सिटी में एलएलएम (LLM) के लिए भी हो गया। उन्होंने मुख्य परीक्षा दी और वर्ष 2009 में इंटरव्यू भी पूरा किया।
कुल्लू में लीगल ऑफिसर से संसद तक का सफर
पीसीएस के नतीजे आने में समय था, लेकिन विश्वभूषण खाली नहीं बैठे। पढ़ाई में मन लगने के कारण उन्होंने यूपीएससी की तैयारी भी शुरू कर दी। इसी दौरान भारत सरकार की एक प्रतिष्ठित नवरत्न कंपनी में उनका चयन लीगल ऑफिसर के पद पर हो गया और उनकी पहली तैनाती हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में हुई। नौकरी के साथ-साथ वह छुट्टियों में दिल्ली आकर अपनी परीक्षाओं की तैयारी करते रहे।
उनकी मेहनत रंग लाई और यूपीएससी परीक्षा के तीसरे प्रयास में उनका चयन पार्लियामेंट्री ऑफिसर (Parliamentary Officer) के रूप में हो गया, जिसके बाद वह दिल्ली आ गए। नौकरी, दिल्ली का परिवेश और संवरता करियर देखकर उन्हें लगा कि जिंदगी एक सही पटरी पर आ चुकी है। लेकिन उन्हें क्या पता था कि जल्द ही आया एक फोन कॉल उनकी जिंदगी की पूरी दिशा बदलने वाला था।
'बधाई हो मिश्रा जी! आप डिप्टी कलेक्टर बन गए'
विश्वभूषण छुट्टी लेकर अपने गृह जिले अयोध्या आए हुए थे। एक दोपहर जब वह घर पर सो रहे थे, तभी उनके फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ से दोस्त ने खुशी से चिल्लाते हुए कहा- "अरे वाह! बधाई हो मिश्रा जी... तुम तो सीधे डिप्टी कलेक्टर बन गए! यूपी पीसीएस में तुम्हारी पूरे प्रदेश में तीसरी रैंक आई है।"
विश्वभूषण के लिए यह खबर किसी सपने जैसी थी। उन्होंने तुरंत टीवी न्यूज चैनलों और अधिकृत वेबसाइट पर परिणाम कंफर्म किया। राज्य में तीसरी रैंक आने की खबर से उनका मन खुशी से झूम उठा। वह दौड़ते हुए नीचे उतरे। घर के बाहर चबूतरे पर उनकी मां मोहल्ले की महिलाओं के साथ बैठी बातचीत कर रही थीं। विश्वभूषण ने मां के पैर छुए और उत्साह में कहा- "मम्मी, मैं डिप्टी कलेक्टर बन गया हूं।"
लेकिन मां को उस समय 'डिप्टी कलेक्टर' शब्द का सही अर्थ और उसकी ताकत समझ नहीं आई। उन्हें लगा कि बेटा उनकी बातचीत के बीच आकर बाधा डाल रहा है। मां ने थोड़े चिढ़ते हुए कह दिया- "हां जाओ-जाओ, कुछ बड़ा काम कर लेना तब आकर बताना।"
विश्वभूषण मुस्कुराते हुए अपनी बाइक उठाकर दोस्तों के पास चले गए। देर रात लौटे, खाना खाया और सो गए। लेकिन अगली सुबह घर की फिज़ा पूरी तरह बदल चुकी थी। सुबह के सभी प्रमुख अखबारों में विश्वभूषण की तस्वीर और तीसरी रैंक की खबर प्रमुखता से छपी थी। घर के बाहर बधाई देने वालों का हुजूम लग गया। जब पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने मां को अखबार दिखाकर समझाया कि उनके बेटे ने पूरे प्रदेश में नाम रोशन किया है, तो मां की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। उन्होंने बेटे को गले से लगा लिया।
SDM का मतलब तक नहीं पता था
इस पूरी यात्रा का सबसे दिलचस्प पहलू यह था कि मुख्य परीक्षा के बाद जब इंटरव्यू फॉर्म में पदों की वरीयता भरनी थी, तब विश्वभूषण को एसडीएम (SDM) के कामकाज के बारे में ठीक से पता भी नहीं था। उन्होंने अपने दोस्तों से पूछा कि डीएसपी और टैक्स ऑफिसर का रुतबा तो दिखता है, लेकिन यह एसडीएम क्या करता है? दोस्तों ने हंसते हुए कहा कि ज्यादा मत सोचो, बस पहली पसंद एसडीएम भर दो।
डिप्टी कलेक्टर बनने के बाद उनकी पहली पोस्टिंग गाजीपुर में हुई। जब वह गांवों में गए और जनता की समस्याएं सुलझाईं, तो लोगों के चेहरों पर आई खुशी देखकर उन्हें अहसास हुआ कि उनका फैसला बिल्कुल सही था। इसके बाद उन्होंने मथुरा, प्रयागराज, लखनऊ और वाराणसी जैसे महत्वपूर्ण जिलों में अपनी प्रशासनिक सेवाएं दीं। लखनऊ में कोविड के कठिन समय में कमांड कंट्रोल सेंटर संभालना हो या कुंभ 2019 का कुशल प्रबंधन, उन्होंने हर जगह अपनी कार्यकुशलता साबित की।
अयोध्या से काशी विश्वनाथ धाम के CEO तक
विश्वभूषण मिश्रा का बचपन अयोध्या के छोटे से गांव ईंटगांव में बीता। उनकी शुरुआती पढ़ाई गांव के प्राइमरी स्कूल में हुई, जिसके बाद उन्होंने जवाहर नवोदय विद्यालय, डाभा सेमर से 12वीं तक की शिक्षा प्राप्त की। उनके पिता स्वर्गीय जगदीश प्रसाद मिश्रा एक बेहद लोकप्रिय और आदर्श गणित शिक्षक थे, जिन्हें पूरा गांव 'गुरुजी' कहकर बुलाता था। पिता जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त पढ़ाया करते थे। जब विश्वभूषण 8वीं कक्षा में थे, तभी पिता का साया उनके सिर से उठ गया। पिता के दिए संस्कार ही आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बने।
12वीं के बाद वह ग्रेजुएशन और एलएलबी करने लखनऊ यूनिवर्सिटी पहुंचे, जहां उनकी रुचि छात्र राजनीति में भी रही। एलएलबी के वाइवा के दौरान जब एक जज ने उनसे भविष्य की योजना पूछी, तो उन्होंने बार एसोसिएशन का चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। तब जज साहब ने उन्हें सिविल सर्विसेज में जाने की सलाह दी थी।
जनवरी 2024 में विश्वभूषण मिश्रा को 'श्री काशी विश्वनाथ मंदिर न्यास' के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (CEO) की ऐतिहासिक और बेहद जिम्मेदारी भरी कमान सौंपी गई। अपने ढाई साल से अधिक के सफल कार्यकाल में उन्होंने मंदिर की सुरक्षा, सुगम दर्शन, डिजिटल सेवाओं और क्राउड मैनेजमेंट के लिए बेहतरीन मानक प्रक्रियाएं (SOP) लागू कीं। सावन के महीने में आम श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए वीआईपी दर्शन पर रोक लगाने का उनका फैसला काफी सराहा गया।
प्रशासनिक सेवा के साथ-साथ कलम के धनी
प्रशासनिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभाने के साथ-साथ विश्वभूषण मिश्रा एक स्थापित लेखक भी हैं। बचपन से कविताएं लिखने के शौकीन विश्वभूषण की अब तक 5 प्रसिद्ध पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 'ग्लोबल सनातन', 'सनातन संवाद कथाएं', 'सनातन कुंभ', 'शूर्पणखा का शाप', 'मासूम शहर' और 'मैंने अनुभव से सीखा है' जैसी उनकी किताबों को पाठकों का भरपूर प्यार मिला है।
हाल ही में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के सीईओ पद से स्थानांतरित होकर उन्हें 'उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग' (UPSSSC) में उप सचिव की नई और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। एक दोस्त की चुनौती से शुरू हुआ उनका यह सफर आज देश के लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुका है।


