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योगी को ललकार! अयोध्या से अखिलेश और बिजनौर से चंद्रशेखर ने दी चुनौती, 2027 पहले ये क्या खेल?
UP Election 2027: योगी को अखिलेश ने अयोध्या, चंद्रशेखर ने बिजनौर और ओवैसी ने संभल से चुनाव लड़ने की चुनौती दी। जानिए तीनों सीटों का सियासी गणित।
UP Politics: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनाव लड़ने की चुनौती देने का सिलसिला तेज हो गया है। पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अयोध्या से चुनाव लड़ने को कहा। योगी ने पलटकर अखिलेश को ही आमने-सामने उतरने की चुनौती दे दी। अब नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने बिजनौर की आठ विधानसभा सीटों में से किसी एक पर योगी को चुनाव लड़ने की चुनौती देते हुए राजनीति छोड़ने तक की बात कह दी है।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में अभी समय है, लेकिन सियासी अखाड़े में चुनौती पर चुनौती सुनाई देने लगी है। दिलचस्प बात यह है कि इन चुनौतियों का केंद्र एक ही नेता हैं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें चुनाव लड़ने के लिए मैदान अलग-अलग बताए जा रहे हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव चाहते हैं कि योगी अयोध्या से चुनाव लड़ें। वहीं नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने बिजनौर जिले की किसी भी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की चुनौती दे दी है।चंद्रशेखर ने तो यहां तक कह दिया कि यदि वह योगी को चुनाव में हराकर नहीं भेज पाए तो राजनीति छोड़ देंगे।
इन बयानों को महज चुनावी भाषण मानकर नजरअंदाज करना आसान है। लेकिन इनके पीछे उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति का एक महत्वपूर्ण सवाल भी है 2027 में योगी सरकार के खिलाफ चुनावी मुकाबले की अगुवाई करने का दावा कौन और किस आधार पर पेश कर रहा है?
अयोध्या से शुरू हुई चुनौती अब बिजनौर तक कैसे पहुंची?
पूरे घटनाक्रम की शुरुआत 8 अक्टूबर को हुई। अयोध्या में सपा नेता तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय के यहां आयोजित श्रीमद्भागवत कथा कार्यक्रम में पहुंचे अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी। अखिलेश ने दावा किया कि सपा की ओर से उम्मीदवार घोषित होने के बाद भाजपा लगातार सर्वे करा रही है और उसे अनुकूल नतीजे नहीं मिल रहे हैं।
इसके बाद योगी आदित्यनाथ ने भी चुनौती का जवाब दिया। उन्होंने अखिलेश से कहा कि यदि मुकाबला करना है तो वह भी अयोध्या से मैदान में उतरें। यहां तक तो मुकाबला भाजपा और समाजवादी पार्टी के दो बड़े नेताओं के बीच था। लेकिन अब चंद्रशेखर आजाद की एंट्री ने इस राजनीतिक बयानबाजी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक पहुंचा दिया है।
बिजनौर की आठ सीटों का नाम लेकर चंद्रशेखर ने क्यों दी चुनौती?
अमरोहा के हसनपुर में आयोजित एक रैली में चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि बिजनौर जिले में आठ विधानसभा सीटें हैं और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इनमें से किसी भी सीट से चुनाव लड़कर दिखाएं। चंद्रशेखर ने दावा किया कि यदि वह योगी को हराकर नहीं भेज सके तो राजनीति छोड़ देंगे। अब सवाल उठता है कि चंद्रशेखर ने चुनौती देने के लिए बिजनौर को ही क्यों चुना? इस सवाल का एक महत्वपूर्ण संदर्भ 2024 का लोकसभा चुनाव है।
चंद्रशेखर आजाद ने बिजनौर जिले से जुड़ी नगीना लोकसभा सीट पर जीत हासिल की थी। उन्होंने भाजपा के ओम कुमार को बड़े अंतर से हराया था। यह जीत आजाद समाज पार्टी के लिए संसदीय राजनीति में महत्वपूर्ण उपलब्धि बनी। नगीना में जीत के बाद चंद्रशेखर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी का संगठन बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में बिजनौर से दी गई चुनौती को उनके राजनीतिक आधार क्षेत्र में सक्रियता और पहचान से जोड़कर भी देखा जा सकता है।
हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि लोकसभा चुनाव का परिणाम 2027 के विधानसभा चुनाव में दोहराया जाएगा। दोनों चुनावों में उम्मीदवार, मुद्दे और मतदाताओं के सामने विकल्प अलग हो सकते हैं।
एक तरफ अयोध्या, दूसरी तरफ बिजनौर; दोनों की राजनीति में बड़ा अंतर
अखिलेश यादव ने अयोध्या को चुना, जिसकी राष्ट्रीय राजनीति में अलग पहचान है। राम मंदिर के कारण अयोध्या लंबे समय से भाजपा की राजनीतिक और वैचारिक प्राथमिकताओं में शामिल रही है। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या को समेटने वाली फैजाबाद संसदीय सीट पर सपा के अवधेश प्रसाद ने भाजपा उम्मीदवार लल्लू सिंह को हरा दिया।
इसी परिणाम के बाद अयोध्या का नाम राजनीतिक बहस में लगातार आता रहा है। हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य है। 2024 में फैजाबाद लोकसभा सीट सपा ने जीती थी, लेकिन अयोध्या विधानसभा खंड में भाजपा को बढ़त मिली थी। इसलिए लोकसभा की हार को अयोध्या विधानसभा सीट पर भाजपा की हार मानना सही नहीं होगा। दूसरी तरफ बिजनौर का संदर्भ अलग है।
यह चंद्रशेखर आजाद के संसदीय क्षेत्र और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ा इलाका है। यहां उनकी पार्टी की संगठनात्मक उपस्थिति, स्थानीय उम्मीदवारों और 2024 के लोकसभा प्रदर्शन का सवाल महत्वपूर्ण है। यानी अखिलेश और चंद्रशेखर ने जिन दो क्षेत्रों का नाम लिया है, उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि अलग-अलग है।
क्या चुनौती योगी को है या विपक्ष में अपनी जगह दिखाने की कोशिश?
यहीं से कहानी दिलचस्प मोड़ लेती है। उत्तर प्रदेश की विपक्षी राजनीति में समाजवादी पार्टी सबसे बड़ी विधानसभा विपक्षी पार्टी है। अखिलेश यादव 2027 में भाजपा सरकार के खिलाफ अपने गठबंधन की चुनावी तैयारी कर रहे हैं। वहीं चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी विधानसभा स्तर पर अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश में है।
ऐसे में मुख्यमंत्री को सार्वजनिक चुनौती देने के इन दोनों घटनाक्रमों की राजनीतिक व्याख्या अलग-अलग हो सकती है। अखिलेश के लिए अयोध्या का मुद्दा भाजपा के राजनीतिक दावों और 2024 के फैजाबाद परिणाम पर सवाल उठाने का अवसर है। चंद्रशेखर के लिए बिजनौर की चुनौती उनके संसदीय क्षेत्र से जुड़े इलाकों में अपनी पार्टी की सक्रियता और चुनावी महत्व को सामने लाने का माध्यम हो सकती है। लेकिन दोनों नेताओं ने यह बयान किस विशेष रणनीति से दिया, इसका निश्चित निष्कर्ष केवल उनके सार्वजनिक बयानों से नहीं निकाला जा सकता।
बिजनौर में 2022 का चुनावी गणित क्या कहता है?
बिजनौर जिले में आठ विधानसभा सीटें हैं नजीबाबाद, नगीना, बढ़ापुर, धामपुर, नहटौर, बिजनौर, चांदपुर और नूरपुर। 2022 के विधानसभा चुनाव में इनमें भाजपा ने चार और समाजवादी पार्टी ने चार सीटें जीती थीं। धामपुर में भाजपा के अशोक कुमार राणा महज 203 वोट से जीते थे। नहटौर में भाजपा की जीत का अंतर 258 वोट था। चांदपुर में सपा के स्वामी ओमवेश ने सिर्फ 234 वोट से जीत दर्ज की थी। यानी जिले में कुछ मुकाबले बेहद करीबी रहे थे।
लेकिन 2024 के नगीना लोकसभा चुनाव में चंद्रशेखर आजाद ने अपनी पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की। इस तरह 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में क्षेत्र के राजनीतिक परिणाम अलग रहे। यही वजह है कि बिजनौर को केवल एक दल के स्थायी प्रभाव वाला क्षेत्र मानना उचित नहीं होगा।
चुनाव आयोग से लेकर बुलडोजर तक, चंद्रशेखर ने किन मुद्दों को उठाया?
हसनपुर की रैली में चंद्रशेखर आजाद ने केवल मुख्यमंत्री को चुनाव लड़ने की चुनौती नहीं दी। उन्होंने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए और ईवीएम के बजाय बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग की। चंद्रशेखर ने दावा किया कि विपक्ष चुनाव आयोग के खिलाफ एकजुट होकर प्रदर्शन कर रहा है। उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग से जुड़े आंदोलन का भी उल्लेख किया।
इसके अलावा उन्होंने भाजपा नेताओं की रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए पैसे देने और सरकारी कर्मचारियों को जनसभाओं में भेजने के आरोप लगाए। चंद्रशेखर ने बुलडोजर कार्रवाई को लेकर भी सरकार पर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि कार्रवाई में समानता नहीं बरती जा रही है। ये चंद्रशेखर आजाद के राजनीतिक आरोप हैं। रैली में लगाए गए इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट के लिए उपलब्ध नहीं है। संबंधित सरकारी पक्ष की प्रतिक्रिया भी आवश्यक है।
क्या 2027 में योगी वास्तव में अयोध्या या बिजनौर से चुनाव लड़ेंगे?
यह सवाल राजनीतिक चर्चा के केंद्र में जरूर है, लेकिन फिलहाल किसी चुनौती को उम्मीदवार की औपचारिक घोषणा नहीं माना जा सकता। योगी आदित्यनाथ वर्तमान में गोरखपुर शहर विधानसभा सीट से विधायक हैं। 2027 में वह किस सीट से चुनाव लड़ेंगे, इसका निर्णय भाजपा की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगा। इसी तरह चंद्रशेखर की चुनौती का अर्थ यह नहीं कि योगी और चंद्रशेखर का सीधा विधानसभा मुकाबला तय हो गया है। अखिलेश यादव वर्तमान में लोकसभा सांसद हैं। उनका 2027 के विधानसभा चुनाव में स्वयं उम्मीदवार बनना भी अभी घोषित नहीं है। इसलिए फिलहाल यह चुनावी बयानबाजी है, घोषित चुनावी मुकाबला नहीं।
2027 से पहले तीन नेताओं की चुनौती ने उठाए नए सवाल
यूपी में 2027 का चुनाव भाजपा सरकार के कामकाज, विपक्षी दलों के गठबंधन, उम्मीदवार चयन और स्थानीय मुद्दों के बीच लड़ा जाएगा। लेकिन उससे पहले योगी आदित्यनाथ को अयोध्या और बिजनौर से चुनाव लड़ने की चुनौतियों ने एक नई राजनीतिक बहस जरूर छेड़ दी है।
अखिलेश यादव अयोध्या के जरिए भाजपा से सवाल पूछ रहे हैं। चंद्रशेखर आजाद बिजनौर का नाम लेकर अपनी चुनौती सामने रख रहे हैं। योगी भी अखिलेश को सीधे मुकाबले का जवाब दे चुके हैं। अब देखना यह होगा कि आने वाले महीनों में यह बयानबाजी किस तरह उम्मीदवारों की घोषणा, गठबंधन की बातचीत और चुनावी मुद्दों में बदलती है। क्योंकि 2027 की चुनावी लड़ाई का मैदान भले अभी तय न हुआ हो, लेकिन उसे लेकर राजनीतिक बयानबाजी अयोध्या से बिजनौर तक पहुंच चुकी है।


