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5 किलोमीटर के सफर में 2.5 घंटे! उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के बीच क्यों बिगड़े हालात?
Uttarakhand Char Dham Yatra Traffic: मानसून के बाद उत्तराखंड में चारधाम यात्रा और पर्यटन ने फिर रफ्तार पकड़ी है। बदरीनाथ मार्ग पर 5 किमी के सफर में 2 घंटे से ज्यादा लगे, जबकि यमुनोत्री हाईवे पर भूस्खलन और केदारनाथ मार्ग पर यातायात दबाव बढ़ा।
Uttarakhand Char Dham Yatra
Uttarakhand Char Dham Yatra Traffic: मानसून की मुश्किलें कम होते ही उत्तराखंड के पहाड़ों में तीर्थयात्रियों और पर्यटकों की भीड़ एक बार फिर तेजी से बढ़ गई है। बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री से लेकर हेमकुंड साहिब तक जाने वाले मार्गों पर शनिवार को कई जगह वाहनों की लंबी कतारें देखने को मिलीं। बदरीनाथ मार्ग पर ज्योतिर्मठ से मारवाड़ी पुल तक करीब पांच किलोमीटर की दूरी तय करने में वाहनों को दो घंटे से अधिक समय लग गया। वहीं, केदारनाथ यात्रा मार्ग पर रुद्रप्रयाग, गुप्तकाशी, फाटा, सीतापुर, सोनप्रयाग और गौरीकुंड तक यातायात का दबाव बना रहा
उधर, यमुनोत्री हाईवे के सारीगाड़ क्षेत्र में भूस्खलन ने यात्रियों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। धार्मिक यात्रा के साथ दशहरा और गांधी जयंती की छुट्टियों का असर सामान्य पर्यटन पर भी दिखाई दिया। नैनीताल, जागेश्वर और मुनस्यारी जैसे पर्यटन स्थलों पर होटल और होमस्टे लगभग भरने की स्थिति बन गई। बिना अग्रिम बुकिंग के पहुंचे पर्यटकों को ठहरने की जगह तलाशने में भी परेशानी का सामना करना पड़ा।
अक्टूबर में क्यों बढ़ जाती है चारधाम यात्रा की भीड़?
चारधाम यात्रा के लिए अक्टूबर का महीना सामान्य तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। जुलाई-अगस्त में मानसून के दौरान पहाड़ों में भूस्खलन, सड़क बंद होने और भारी बारिश के कारण यात्रियों की संख्या घट जाती है। सितंबर के आखिरी हिस्से और अक्टूबर में बारिश कम होने और मौसम साफ होने के साथ यात्रा फिर रफ्तार पकड़ती है।
इसके अलावा चारों धामों के कपाट शीतकाल के लिए बंद होने से पहले श्रद्धालुओं के पास सीमित समय बचता है। ऐसे में मानसून के दौरान यात्रा टालने वाले लोगों में से बड़ी संख्या सितंबर के अंत और अक्टूबर में उत्तराखंड पहुंचती है। इस बार लंबे अवकाश ने यात्रियों और पर्यटकों के इस दबाव को और बढ़ा दिया है।
बदरीनाथ मार्ग पर 5 किलोमीटर के लिए दो घंटे से ज्यादा
शनिवार को सबसे ज्यादा यातायात दबाव बदरीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर ज्योतिर्मठ के आसपास दिखाई दिया। सुबह करीब सात बजे ज्योतिर्मठ से निकले कई वाहन लगभग ढाई घंटे बाद मारवाड़ी पुल तक पहुंच सके। सामान्य परिस्थितियों में कुछ ही मिनट में पूरी होने वाली करीब पांच किलोमीटर की दूरी के लिए यात्रियों को दो घंटे से अधिक समय जाम में बिताना पड़ा।
सड़क पर तीर्थयात्रियों के वाहनों के साथ स्थानीय यातायात भी फंस गया। स्कूल जाने वाले बच्चों को भी परेशानी उठानी पड़ी। ज्योतिर्मठ बदरीनाथ यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है और बदरीनाथ जाने तथा लौटने वाले वाहनों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से गुजरता है।
पहाड़ी सड़कों की सीमित चौड़ाई के कारण एक साथ बड़ी संख्या में वाहन आने पर छोटी-सी रुकावट भी लंबी कतार में बदल जाती है। किसी वाहन के गलत तरीके से खड़े होने, बस को मोड़ने में अधिक समय लगने या सामने से भारी वाहन आने पर दोनों दिशाओं का यातायात प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि मैदान में पांच किलोमीटर का जाम और पहाड़ में पांच किलोमीटर का जाम अलग तरह की चुनौती बन जाता है।
केदारनाथ मार्ग पर गुप्तकाशी से गौरीकुंड तक दबाव
केदारनाथ यात्रा मार्ग पर भी शनिवार को वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी। रुद्रप्रयाग से आगे अगस्त्यमुनि, गुप्तकाशी, फाटा और सीतापुर होते हुए सोनप्रयाग पहुंचने वाले मार्ग पर अलग-अलग स्थानों पर जाम की स्थिति बनी रही। सोनप्रयाग से आगे गौरीकुंड तक सड़क की क्षमता सीमित है, इसलिए यहां यातायात को नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ाना पड़ता है। गौरीकुंड से ही केदारनाथ की पैदल यात्रा शुरू होती है।
केदारनाथ में यात्रियों की संख्या बढ़ने का सीधा असर सोनप्रयाग पर पड़ता है। निजी वाहनों की आवाजाही एक सीमा तक ही संभव होने के कारण आगे यात्रियों को स्थानीय परिवहन व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ता है। हजारों यात्री एक ही समय में पहुंचने लगें तो पार्किंग, शटल वाहन, होटल, भोजनालय और पैदल मार्ग सभी पर दबाव बढ़ जाता है। यही वजह है कि केदारनाथ में बढ़ी भीड़ का असर सड़क पर कई किलोमीटर नीचे तक दिखाई देता है।
यमुनोत्री हाईवे पर भूस्खलन, छह घंटे प्रभावित रहा यातायात
यमुनोत्री यात्रा मार्ग पर परेशानी केवल वाहनों की संख्या बढ़ने के कारण नहीं हुई। सारीगाड़ क्षेत्र में भूस्खलन के कारण शुक्रवार रात करीब छह घंटे तक यातायात प्रभावित रहा। मार्ग बाधित होने से वाहनों की लंबी कतार लग गई और बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों को देर रात तक सड़क खुलने का इंतजार करना पड़ा।
पहाड़ों में किसी एक स्थान पर सड़क बंद होने का असर कई किलोमीटर तक दिखाई देता है। यहां मैदानों की तरह कई वैकल्पिक और चौड़े मार्ग उपलब्ध नहीं होते। जो वैकल्पिक रास्ते होते हैं, वे अक्सर लंबे और सीमित क्षमता वाले होते हैं।
जाम से बचने के लिए कुछ वाहनों ने छांतीखाल और खेड़ाखाल की ओर से वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल किया। हालांकि, अचानक बड़ी संख्या में वाहन इन छोटे मार्गों पर पहुंचने से वहां भी यातायात का दबाव बढ़ सकता है। यही पहाड़ी यातायात प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती है।
चारधाम यात्रा का दूसरा व्यस्त दौर
चारधाम यात्रा में आम तौर पर दो प्रमुख व्यस्त दौर देखने को मिलते हैं। पहला दौर कपाट खुलने के बाद मई-जून में आता है, जब गर्मियों की छुट्टियों के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मानसून के दौरान यात्रा की रफ्तार कम हो जाती है। इसके बाद सितंबर के आखिरी हिस्से से अक्टूबर तक दूसरा उछाल देखने को मिलता है।
साफ मौसम, पर्व-त्योहारों की छुट्टियां और कपाट बंद होने से पहले दर्शन की इच्छा इसके प्रमुख कारण होते हैं। इस बार भी पिछले दिनों खराब मौसम और पहाड़ी मार्गों की अनिश्चितता के कारण यात्रा टालने वाले कई यात्री मौसम सुधरने के बाद उत्तराखंड पहुंच रहे हैं।
इसका असर होटल, धर्मशाला, टैक्सी, पार्किंग और स्थानीय बाजारों पर भी दिखाई दे रहा है।
सिर्फ चारधाम नहीं, कुमाऊं भी पर्यटकों से भरा
छुट्टियों की भीड़ केवल गढ़वाल के चारधाम मार्गों तक सीमित नहीं रही। नैनीताल, जागेश्वर और मुनस्यारी जैसे कुमाऊं के पर्यटन स्थलों पर भी पर्यटकों की संख्या तेजी से बढ़ी है। कई जगह होटल और होमस्टे लगभग पूरी क्षमता तक भर गए।
बिना अग्रिम बुकिंग के पहुंचे कुछ पर्यटकों को कमरे तलाशने में काफी परेशानी हुई। कुछ स्थानों पर यात्रियों को वाहन या बस स्टेशन जैसी जगहों पर रात बिताने की नौबत आने की सूचना भी सामने आई है।
नैनीताल में पार्किंग और सड़क क्षमता पहले से सीमित है। शहर की भौगोलिक स्थिति के कारण पर्यटन के चरम दिनों में प्रशासन को वाहनों को शहर से बाहर रोककर शटल सेवा का सहारा लेना पड़ता है। एक साथ हजारों अतिरिक्त वाहन पहुंचने पर शहर की पार्किंग भर जाती है और इसका असर हल्द्वानी-नैनीताल मार्ग तक दिखाई देने लगता है।
मुनस्यारी की स्थिति अलग है। यहां पहुंचने का मार्ग लंबा और पहाड़ी है तथा बड़े शहरों की तुलना में होटल क्षमता सीमित है। ऐसे में अचानक पर्यटकों की संख्या बढ़ने पर उपलब्ध कमरे तेजी से भर जाते हैं। जागेश्वर में धार्मिक और प्राकृतिक पर्यटन दोनों तरह के यात्री पहुंचते हैं। छुट्टियों के


